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Full text of "Shri Satyarth Prakash"

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| श्रीमदयानन्दसरस्वतीस्वामिविरचितः क्‍ 
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5४ अजमेर-नगरेधोए ४५४८ 
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अट्टांसर्षों चार |; 
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क्लब तक कपल+ लक ०53 + 5७०० «>+++२+«२++- 


पुस्तक मिलने का पता-- 
.( १) बैदिक-पुस्तकालय, अजमेर. 


(२) वैदिक-यन्त्रालय, अजमेर. 


॥ ओोश्म ह 
अप सत्यार्धअकाशस्य सूचीपयरस । 





विषया) प्ठठ-पृष्टएू |. पिषया) 420 | 8/2। 

भूमि »*».. **. १-४ | पठनपाठनविशेषविधि] **. * ३६-8२ 

प्रस्थप्रामाण्याप्रामाए्यवि ० ४ ४२-४४ 

१ सप्न्नास) ॥ खीयद्राध्ययनविधि। ** "९ ४४-४५ 
इंश्वर्वामब्याए्या.. ४. १-१३ 


० ४ सम्ृन्नात३ ॥ 
मद्जज्ञाचरणसमीज्षा '** 7, श्३ 


हि समावत्तनविषयः श्इ 

२ सम्ुव्रात्र) ॥ दूरेरे विवादकरणम्‌ **. *** ४६-४७ 
गालरिक्षाविपय/. ४. १४-१४ | विवादे खीपुरुषपशीक्षा “४० ,एफश८ 
सूतप्रेताविनिषिष८. ४. १५-१६ | भव्पदयसि पिवाहूनिपेषर ++  एप-४६ 
जन्‍्मप्रसंयीदि्रएसगिण्ा “१६-१६ । शुर्षकशामुमारेण पशब्यत्स्या ««« श्ह्श् 
। विश्एलएणानि हा »« इए-६ 
| खरीपुरुषध्ययद्दारः +००... «०० 





३ सद्न्नाम) ॥ 


अध्ययना5प्यापनाविषय! **.. **' २०-४५ पदचगद्दायशञा. . ** 
गुशमस्त्र्याख्या डेंल *** ६०-२२ , पासटिट्विसस्कारश/. "** 
भ्राणायामारीक्षा 2644 *»* २२-२३ भातद थागादि पमेहदयन्‌** 
यशपात्राइतयः ४४ ध्ध २३ पससिध्तण्षणनि 
सरध्याग्गिद्ोधोगरेश।. ०... २३-२४. एृएयरमी। बबब 
दोगफतगिर्शेयः ड शक २४. एप्टिवपएटानि.. *« 
डपगयनसमीक्षा ७. “४ २४-२५ मूर्सलह्छानि.. «२ 
प्रधा््योपरेश+ न... २६-३० , विश्यिशलरस ++ 


जद्ापर्यदलावर्णनमू.. ३०-३१ , पुर्नावदाहनिस्फीया -« 
पष्चधापरीष्याध्गपयम "११-३६ | गृहामसोझपर.. +» 





हि 


8, कक अजीज ली 


दिपया३ 

४ सम्न्नासः 

चानप्रस्थविधिः 2283 
संन्यासाश्रमविधिः 


६ सम्ृन्नासः 


शानपमविपयः 
समापन्रयकयनम्‌ 
यनतश्याति 
दृएटव्याउ्या 
राजकर्चव्यमू 
अपष्टादशव्यसननिपेष। **' 
मन्त्रदृतादिगजपुरुषलक्षणानि 
सेल्थ्यादिपु कार्यनियोग। ** 
इर्गनिमोणब्याण्या 
युद्धकरपप्रकार! 
साजप्रजारणणादिविधिः *** 
प्रामपिपदादिवर्णनम्‌ *** 
बरप्रदणप्रयारः 
मस्त्रच्रयप्रझरः 
अामनारिपाइगुटयव्यास्या 
गरशामिशेदासीनरादुषु बर्तसमू- 
शहुमियु दकएप्रगाय्य 
! ध्यणगरदिषु सरतभागकुयनम्‌ 

४ ब-+5 १5 अन्ब घर्मे - 
“म्परपरणाय्‌ यू 
हंटटिकदैकपपरेशाः 
झाइप्टरे द्टवियिए * ५ 
रोप्एु दष्घरिम्पल्प 


रु 





घत्पार्षप्रकाशध्य सूचीपत्रम्‌ ॥ 


पृष्ठद+- एम 
॥ 


७६-७७ 
+** छज-प्ाए 
दश-१०७ 
दर 
द्र्श्न्प्द 
ददन-द< 
दाह-€० 
€० 

कक क रे 
€१ 

6१ 

€२-€ ३ 
€३-६४ 
€४-€५ 
+*" €५-€६ 
€६ 
€६-६७ 


दृ८द-१०१ 
१२०१ 


+** १०१-१०२ 
४7 १०२-१०३ 
+7* १०३-१०४ 
४२९ १७०४-२०७ 





पिपयाः पृष्ठव+-एष्ठम्‌ 

७ यय्नद्बात) ॥ 
इंश्वरविषयः है. #** १०८-११२७ 
इश्वरविषये प्रभौत्तरणि *** १०८४-१११ 
इंश्वरस्तुविष्रार्यग्रेणसना। *** १११-११४५ 
झश्वरक्षानप्रकारः.. *.. *** ११५ 
इंश्वरस्पास्तित्वमू. *. "!ह ११६ 
ईश्वययत्तारनिपेघश. "४ ११६-११७ 
जीवस्थ स्वातन्त्यमू **.. *** ११७-१ १८ 
,जीवेश्स्वोर्भितन॒लयर्शनम्‌.._ */* ११८-१२३ 
ईश्वरस्थ सगुणनिर्मुशकयतम्‌_ *** १२३-१२४ 
वेदविषयविधार:/.. **'.. *** १२४-१२७ 

८ समुज्ात) ॥ 


सृध्टूयुलत्त्यादिषिषय/ "** 
ईश्वराभिज्ञाया: प्रकृतरुपा- 
दानकारणलम,. ** 
सृष्टी भास्तिकमतनिराकरणम्‌ 


*+**" १२८-१४४ 


**' १२८-१३९२ 
४" १३२-१३६ 


मनुष्याणामादिसृट्टेः स्पानादिनिर्णयः १४० 
आ्यम्लेच्छादिव्याज्या ** १४०-१४२ 
इच्धरस्थ जगदाघारत्वपू *+** १४२-१४४ 
& परहशातः ॥। 
विषाधविद्याविषया..  + १४४-१४७: 
धन्धमेक्षविषया ** १४८-१६० 
१० समुझ्गातत ॥ 
आवचाण5नाचाणदिषय/ * “४ १६१-१६७ 
| अदयाभद्यविषया.. *** *** १६७-१७५ 


इति पूर्वाद। ॥ 


४ शस्यायैप्रकाशस्प घुवीपदम्‌ ॥ 





पिपया। शतः-शष्ट प्‌ 
जैनवौद्धयोजियम्‌.. "/!.. / २६५-२६७* 
प्रास्तिकनाध्तिकसंवाद३ * २६७-२७० 
जगतोनादित्वसमीज्ञा **.. *** २७०-२७२ 
जैनमते भूमिपरिसाणम्‌ *** २७२-२७३ 


जौवादन्यस्य जड़त्वे पुदंगलानां- 
पापे प्रयोजनकत्वं थे ***.. *** २७३-२७४५ 


जैनधमैप्रशंसादिसमीक्षा +" २७५-रे८६ 
जैनमतमुक्तिसमीज्षा *** . *** रेदज्-रदथ 
पतेनलाघुरूक्षणसगीर्ा “+ शबब-२६२ 
जेनतीयंड्वर (२४) व्याब्या. ** २६२-२६४ 
* लैनमते जम्बूद्पादेवि०.. ४ २६४-२६७ 
१३ समुन्नात३ ॥ 
्ँः 
अनुभूमिका आज श्च्द 
शकृख्घीममतसमीकज्षा.. "| **" २६६-३१३ 


दायव्यवस्थापुस्तकमू, *** “” ३१३-३१४ 


पिषया। दृष्ठा-्य 
गणनपुस्तऊय्‌ रन * ३१४-३१ 
समुएल्ास्यस्य द्वितीय॑ पुस्तझ्म्‌ *** ३३१: 
ण्ञां पुस्तम्म हंगड 82 ३१ 
कालवृत्तस्य १ पुम्तकम *+ ३२१४-३१ 
ऐयूवरास्यस्प पुस्तकम्‌ >३ ३१! 
उपदेशस्य पुस्तकमू "९ *** श्! 
मत्तीरचितं इश्लीलाए्यसू **० ३१६-३२/ 
माऊणवितं इब्जीलाएयम्‌ जद ३२ 


लूऊथचित इब्जोलाल्यम्‌ 
योदनरचितमसुसमाचारः 
योदनप्रकाशितवाक्यप्र 


** ३२६-३२: 
*** ३२७-३४: 
+ ३२८०-३३ 


१४ सपुक्कास) ॥ 


अजुभूमिका +०भ न्न्न ३३६ 
यबनमतपुरानास्यसमीक्षा.. *** ३३७-१८! 
स्वमन्तब्यामन्तव्यविषय/. *** | 


इत्यूचराई। ॥ 


झा 





जि समय मैंने धद्द प्रस्ध “/सरवार्यप्रकाश" बनाया था रस समय और उससे पूर्ठ संस्हत मादण 
करने, पठनपाठन मैं संम्शत द्वी बोलने झोर जम्ममृति बरी सादा सुश्राती होरे के दारण 
पे मुझको इस माण का विशेष परिह्ाग मे था, इससे भाषा भशुद धन गईं थी। झत मादा दोशने भौर 
लिखने का अभ्यास हो गया दे | इसलिये इस भ्रन्थ को भाषाध्यापरणादुसार छुद्ध करके दूसरी दार 
दण्पाया दै, षड्ठी ६ शब्द, वाक्य, रखना का भेद हुथा टे सो करना डाॉंचत था, क्योंकि इसके भेद किये 
बिना भाषा की परिपाटी छुधरणी कठित थी, परस्तु अर्थ का भेद न्टी किया गया दे प्रस्युत विरेद्र तो 
लिया गया दै | दां शो ध्रधम दूपने में काटी २ भूल र्ट्टी थी थह् तिकाल शोधकर टीफ २ कार्दी गई टै ॥ 
पद प्रस्ष १४ ( धोदद ) समुज्ञास चर्चात्‌ धोदइ विभागों मे रथा गया है। इसमें (० (६5 ) 
समुशास पूर्वार्स थोर ४ ( धार ) उत्तराद में पने हैं, परस्तु भ्रसुय के दो समुझास और पदात, 
प|सदास्त किसी कारण से प्रथम मदीं दवप सके थे भष थे भी छृपदा दिये हैं । 
( १) अपम सम्मप्वात में [धर फे भोकारादि नामों पी व्याख्या । 
(३ ) द्वीय समुप्नास में सन्‍्तानों दी शिवा । 

३ ) दृवीय समन्नाम्र में प्रद्नर्य, पठनपाठन व्यवस्था, सत्यासत्य पन्यों बे: मास भौर पे 
पढ़ने की रीति | 

४) घतुप सप्त्राप्त में विवाह भौर एशथम फा प्यव्टार । 

४) पत्चम सम्ृद्वास में वानप्रस्ष भौर संस्यात्ताथम थी विधि । 

६ ) छठे समुध्नास में रागपमे । 

७ ) सप्तम ससुद्नास में पेदेशर रिएप । 

८ ) भष्टम सदद्वास में जयत्‌ पी उत्पत्ति, स्थिति भर प्रलय । 

& ) नाम सामप्तास में पिया, भविया, पन्‍्थ भौर मोत्त ढी ध्याए्पा। 

५०) दशरें सहप्ताय में आचार, भनापार भौर भदयामक्प रिएए | 

२१) एकादश सद्नद्नास में झआायादर्सीय मतमतास्तर को सयणडन मएटन शिय । 
'३) द्वादश सदत्तास में चरारोइ, बोद्ध भोर जैनमत का रिप्य । 

३) धरयोदश सदुष्तास में [साईंमत बाय दिष्य । 

३) पौदाएं स्न्ताम में हमलमानों $े मत इग पिपप । और चौरा सहड्टारों डे, अन्ह हें 
आप दे; सनादन वेददित्ति मत ही रिशेष्व। ब्याऊण लिखी है, शिग्रऐ # शछे 
पयारद्‌ मानता हूं । 

4 





सूमिका ६ 


2 5 3 52232: नस्ल सलमल 5२०55 नननआ २३०३६: 
भेरा इस प्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य २ अर्थ का प्रकाश करना दे अर्थात्‌ जो स 
है इसको सत्य भौर ज्ञो मिथ्या दे उसको मिथ्या दी भतिपादन करना सत्य अर्थ का प्रकाश सममा दै 
घट्ट सत्य नहीं कद्दाता ज्ञो सत्य के स्थान में असत्य ओर असनन्‍्य के स्थान में सत्य का प्रकाश क्िः 
ज्ञाय । किम्तु जो पदार्थ जैसा दे, उसको वैसा दी कहना लिखना और मानना सत्य फहाता दे।' 
मनुष्य पद्पाती द्वोता दि, यद्द अ्रपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत थाचे के सत्य को म 
झप्तत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त द्ोता दे, इसलिये थद्द सत्य मत को प्राप्त नहीं द्वो सकता। इसीपए़ि 
विदाद आ्तों का एट्टी मुझ्य काम दे कि उपदेश था लेख द्वारा सइ मनुष्यों के सामने सत्यासत्य $ 
स्वरूप समर्पित करदें पश्चात्‌ वे स्थयं अबना दितादित समझ कर सम्यार्थ का प्रदरा ओर मिच्यार्थ 
परिस्याग करके सदा आनन्द गे रहें | मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जाननेवाला दे। तथापि अर 
प्रपोधन की सिद्धि, इट, दुराप्रह और अवियादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में मुक जाता है । पए 
इस प्रस्थ में पेसी बात नहीं रकली दे ओर न किसी का मन दुखाता वा किसी की हानि पर तात्पय 
किस्तु हिससे मनुष्र झ्ञाति की उन्नति झोर उयकार हो, सत्यासत्य को मनुष्य लोग ज्ञानकर सत्य 
ग्र८ण भौर भसस्प का परित्याग करें, क्‍योंकि सत्योपदेश के बिना अन्य कोई भी मलुप्प-ञाति की उप 
का फाए्य मद है ॥ | 
इस प्रग्प में शो कद्दीं २ भूल घृक से अधया शोधने तथा छापने में भूल चूफ रद्द ज्ञाप उस* 
झामने शनाने पर भैधा यह सरप द्वागा पैसा दी कर दिया ज्ञायगा | झोर ज्ञो कोई पतक्तपात से अत्य' 
शहा था छग्डन मगइन करशा, उस पर ध्यान म दिया ज्ञायया। हां जो यद्द मनुष्यत्ात्र का ६ 
इं'बर बुच शनारता उसको समय समय समझने पर उसका मत संणृह्द'त द्वोगा। यद्यपि आजकरख णहु। 
दिद्वान्‌ प्रस्वेछ मतों में दें थे पततपात छोड़ सर्वेठस्त्र सिद्धान्त अर्धात जो २ यातें सप के अमुफूल रे 
मैं स्य हैं, इतर प्रदय भौर जो एक दूसरे से विद बातें हैं, उनका त्याग कर पररुपर प्रीति से 
दक्तावें ती हृग्‌ का पूर्ण दित दोवे। क्‍योंकि विद्वानों के विरोध से झविदवानों में विरोध बढ़ कर भरे 
विध दुःख की वृद्धि ओर सुख की हानि होती दे | इस द्वानि ने, ज्षो कि स्वार्थी मनुध्यों को प्रिय दै। # 
म्रतुष्शें छो दु छसायए में डुडा दिया द|े। इनमें से जो कोई सार्यज्ञनिक द्वित हदय में धर प्रदत्त ड्ो 
है, इसमे स्वार्दी छोग पिराध करने में तत्पर दोकर अनेक प्रकार विप्त फरते हैं। परर्तु "स्थाई 
झूपते लानत सरवेग कथा दिततो देवपातः” अर्थात्‌ सर्वदा सत्य का विजय और असरय का परा* 
अरोर सत्द ईी से विद्वानों का मार्ग विम्दृत होता दे, इस रृढ़ निश्वय के आलस्वत से आए छोग परोप+! 
करने से उदासी होशर कमी सतवार्थ प्रकाश करने से नहीं दटते । धद्द बढ़ा हक़ निश्यप दे कि “यत्तः 
एदिपनित प रिशाये मृत परम” यह गीता का बचत दे ५ इसका अभिथाय यह दे कि शो २ विदा ञो 
उर्देशाति ले कम हैं दे मधम काने में दिव ले मुस्य और पथ्यात्‌ अस्त के सइश इोते दें। ऐसी वा 
को दिक्ष से धर « हैंड इस प्रम्ध को रचा दे । धोता व पाठऋगण मी प्रथम प्रेम से देश के इस प्र 
का सत्द २ सान्पये झागइर थवेद करें। इसमें बइ अप्रिव्राप रक़्या गया है कि जो झो सब मतों 
सत्र २ बड़े हैं बे २ सद में अदिदद होते से इनका स्वीकार करके जो २ मतमतास्तरों में प्रिध्या 4 
है, इब २ छा कप इन डिदा टै  इसवें यह मी असिवाय रकया टै कि शत्र मतमतास्तरों की गा 
अडट हरी बातों का प्रइशश ऋर दिद्वान्‌ अविद्रान्‌ सत्र साधारद प्रनुष्यों के सामने शक्‍या है, जि 
सदसे सह कर! दिविनर इ'डर परस्पर धेमी ले पु सत्य मतस्थ होवें।! यथपि मैं आरयादर्स न 
कल्बओ हुआ शोर इसरा हैं तयएय देते इस देश छे प्रतमतास्तों वी भूटी बातों का पक्तपात मे ४ 
दत्दाजपद दशप्श छरता ह देखे ई? दूसरे देशस्थ दा मतो श्रतिवाणों के साथ प्री बर्चता है। शैसा - 


| षालों के साथ मनुष्योश्नति के विषय में थर्चता हूँ पैसा विदेशियों के साथ मी; तथा सइ सद्धनों को 
; भी यर्सता योग्य है । क्‍योंकि मैं भी को किसी एक फा पक्षपाती दोता तो जैसे आजकल के स्थमत की 
| स्तुलि, मएडन और धचार करते और दूसरे मत की निन्‍्दा, हानि और पम्द करने में तन्पर होते हैं येसे 
; मैं भी दोता, परस्तु ऐसी बातें मनुष्यपन से बाइर दैं, फ्योंदिः जैसे पश्च बलवान होकर निर्ईलों को 
दुःख देते ओर मार भी डालते हैं। जब मनुप्य शरीर पाणे वैधा दी कर्म करते हैं तो थे मनुष्यस्थमावयुक्त 
भर्दी किन्तु पश्चयव्‌ दें। झोर शो दश्वान्‌ धोकर नियेत्रों की शद्दा करता दे थद्दी मनुष्य कष्टाता दे, भर 
जो स्वार्थथश दोकर परदानिमात्र करता रहता टै, यद ज्ञानों पश्चभों का भी दढ़ा मा दे। झअद झारयो- 
धर्ियों के विषय में विशेष कर ११ स्थारइवें समुल्ञास तक लिखा है। एन समुल्लासों मे शो कि सरपमत्र 
प्रकाशित किया दै, वह बेरोक्त दोने से मुझको सर्देथा मस्तम्प द|े। भर जो मग्रीन पुरादा शग्बादि 
प्रग्थोक्त दातों का छणडन किया दे वे स्यकब्प दैं | जो १२ धारइपें समुल्लास में दर्शाया छात्रा बा मत 
पद्धति इस समप क्षीणास्तसा है भर यद धार्याक बोर मैन से बहुत सम्द्ध अनीश्डरबादादि में 
रखता दे । यद् च्रार्धाप्य सइ से बढ़ा सास्तिक है। उसकी घेष्टा का रोकता अयश्य है । कपोंकि हो 
मिच्या बात भ रोशी ज्ञाप तो संसार में बहुत से भनर्थ प्रदूत्त हो शाये। धार्वाद का हो मत टै घद् तथा 
दोद भौर मैन का ज्ञो मत है, दद्द भी १२ थें सपुझास में संछेप से लिखा गया है। और बोदों हया 
जैनियों का भी यार्षाक के मत के साथ मेल है भोर कुछ थोड़ा विरोध भी टै। भर शेग भी बहुत से 
अंशों में थार्पा रु भोर बोदों के साथ मेल रखता दे चोर थोड़ीसी दातों मैं भेद दि। इसलिये शेणों छी 
प्रिप्त शाणा गिनी ज्ञाती है। यह भेद १२ बारइपें समुशास में लिख दिया टि परधापाष्य बडा धममझ 
तेहा | शो इसका भेद द॑े सो २ बारहवें समुन्ास में दिछाया दि। ौद और ऊँग मत का दिष प भी लिखा 
है। इनमें से पीद्धों के दीपधंशादि प्राखीय प्रस्थों में पोशमतससंप्रद् सपेदर्श गरोप्राद्द मे दिशकाया है, हारे 
से पद लिणा टै। और जैनियों के मिप्नलिलित सिद्धास्तों के पुस्तक हैं, इसमे पे घार सूच् पत्र, जैसे-- 
१ झावश्पकरूत्र, ९ विशेष भ्रावश्यरुसुइ, ३ दशयेधालिकरुत्र भोर ४ पादिदगपज # ११ ( स्पताह ) धा, 
जैत--१ आयाशंगयत्र, ९ सुप्टांगपूत्र, ४ धादांगघुइ, ७ समपरायोगदत्च, २ भगवर्ष'णदबे, ६ हावाधमे- 
काथापत्र, ७ दपास शदशासूत्र, ८ शस्तगइदशापत्र, ९ अगु त्तरोबदा पु, १० विरास पृत्र, ११ ्श्नण्या- 
करतपुत्र ॥ १२ ( दारद ) उतींग, जसे--१ उप्धागुत, रे रायररोगीदृत्र, थे शीवानिंगमग्‌ व, ४ पथ धरा: 
एश्न, £ जंए्द्ीपपप्मतीए्‌र, ६ घब्द्पत्रतीपुच्ष, ७ प्फ्थतीपुत्र, ८ गिरियाद«सृत्र, ६ कप्ययाद४, ० 
कपबवदी सपाएत्र, १६ पृष्सिषायत्र और १४ पुष्यय लिया » ५ बसशपरु, जसे--१ इक राध्यपशरूइ, २ 
निशीयपूत, $ पर्पपत्र, ४ स्यवद्स्यूत्तञ भोर ४ जीवर्एप्पत् ४६ छ छेद, शसे - २ मशागिश'ध हर इच्छ- 
भारत, २मद्दानिशीयणपुषायरापृत्र, ४ मध्यमवाघताएच, ७विदनिशत सत्र, 2 ऋरो्एन्ह ले दृज, ६ एप्प 
बरशाएुत्र ॥ १०( दशा ) पफ्यासत्र, जेसे-१ अनुश्पर्णपुद, २ पध्यस्शत्पूर, हे तदुत्तवेपा लिक श्‌, के 
भक्तितरिशानयुत, ४ मद्टाप्श्वात्यातपत्र, ६ भ्रन्दाविश्पदृत्न, ७ गणापिहपराुइ, ८ पसरत्समारणिय्र, ४ 
देदर स्तमग्यूत्र झोर १० संसारपत्र शपा मस्दीधूष् पाग'दवा ुत्र भी शा्माद्कू साबत्रे है ३ एशफ, 
झमे--१ पूर् सद प्रग्पों बसे टीका, ऐ निशक्ति, $ घरणी, ४ भाष्य, से छार इःदपद छोपर सवा पूछ 
विल्लफे प[शञाह कषाते हैं, इसमे हू टिएा अवपदों को बहटों मासते। झरोर इनसे मिप्र भी रेक घम्द हैं दि 
जिमको सेगी खोत मारने टें। इन मंत्र पर दिशेष दिययार १६(दारइ्े ) स ,शास मे हर शॉाडफिएं 
झनिपों के प्रण्चों मैं लाएं चुनटरः दोष हैं, और इधर) यह भी स्वमाद दे कि के कएदा ध्द दूसरे 
मत बले के दाए में हो था दएा दो तो छोई ए इस प्रस्य को ऋषण्राज कट्टर हैं, दद दाह दशक समिध्पा 
है, बयोकि फिपको कोई माने कोई नए रघसे बद भस्य सेग मत से दाइर करों हो सदरा। हा ! शिफ्तको - 








हा 








रे सूमिका 


कोई म माने और म कमी किसी जैनी ने माता हो शप तो अप्राद्य हो सकता दे; परसतु देसा हो 
प्रन्थ भईों है कि जिसको कोई मी भैती नहीं मानता ही, इसलिये शो जिस प्रस्थ को मानता थोगा इसे 
प्रम्थस्थ विषयक साएडन सएडन सी दसी के लिये समझा ज्ञाता दे | परसतु कितने दी ऐसे मी दैँ हि 
उस प्रन्थ को मानते जानते ह्वों वो भी समा था संवाद मैं बदल जाते दें इसी हेतु ले शत क्ोग ्रपो 
प्रन्थों को छिपा रखते हैं। ओर दूसरे मतस्प को मदेते में घुताते और सम पढ़ाते, इसलिये कि रस 
देखी २ भसम्भव बातें भरी हैं झिनका फोई मी उत्तर जैतियों में से गदों दे सकता । भूठ बात को पते 
देगा दी उत्तर दि ॥ 


१३ थें समुन्नास में इंसाइयों का मत लिया है। ये लोग यायबिल फी अपना धर्मपुम्तऋ मां 

हैं। इनका विशेष समाचार उसी १३ थें समुल्नास में देश्षेये। थ्रोर १४ चोदद्दयें समुन्नास में मुर्त 
मानों के मत विषय में लिखा दे, ये खोग कुट्ान को अपने मत का सूलपुम्तक मानते दें । इनका मै 
घिशेष व्यवद्दार १४ यें समुल्लास में देखिये | ओर इसके झागे यैदिक मत के विषय में लिखा दे, जो को 
इसे भ्रन्थकर्त्ता के तात्पय से विरुद्ध मनसा से देखेगा ठसको कुछ भी अभिष्राय विदित ने होगा। करोंडि 
बाक््पाथेयोध में चाए कारण होते हँ--आकादत्ता, योग्यता, आसत्ति ओर तात्पर्य! झव इन चाररों दातों 
पर ध्यान देकर जो पुरुष प्रन्थ फो देखता है, तव उसको प्रन्ध का अमिप्रय यथायोग्य विदित होता है 
“आ्राकाडत्ता” किसी विषय पर घक्ता की ओर वाक़्यस्थपदों की झाकांका परस्पर होती है। "योग्पर्ता 
यद्द कट्टाती दे कि जिससे जो हो सके- जैसे जल से सोंचना। “आसत्ति” जिस पद के साथ जिसश 
साथन्ध दो उसी फे समीप उस पद का थोलना या लिखना | “तात्पर्य” मिल्रके लिये बकरा मे शददीः 
रुघारण या लेख किया दो उसी के साथ उस वचन था लेख को युक्त फरना।यहुत से हृढी दुरापरी 
मलुष्य दोते दें कि जो दका के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पता फिथा करते, विशेषकर मत याले लोग 
क्योंकि मत के झाभ्रद्द से उनकी चुदि अन्धकार में फंस के नष्ट हो जाती दे! इसलिये जैसा मैं पुराण, 
ज्ैनियों के प्रत्थ, धायविख ओर क्वरान को प्रथम दी धुरी द॒ष्टि से न देखकर उनमें से शुर्णों का प्रइ५ 
ओर दोषों का त्याय तथा अन्य मलुष्यज्षाति की उन्नति के लिये प्रयक्ष करता हूं, येसा सथ फो करना 

योग्य कप । इन मतों के थोड़े २ द्वी दोष प्रकाशित किये हैँ, जिनको देख कर मनुष्य लोग सत्यासत्य मत 

का निर्णय कर सकें और सत्य का प्रदरण ठथा असत्य का त्याग करने कराने में समर्थ होवें। क्योंकि 

एक मलुष्यशञाति में बदका कर, विदद्ध धुद्धि कराके, एक दूसरे को शत्रु बना, लड़ा मारना विदानों के 

स्वमाष से यद्विः दे । पथपि इस प्रन्थ फो देख कर झविदान लोग श्रन्यथा द्वी बिचारेंगे तथापि बुद्धिमान 

खोग यथावोग्प इसका अभिष्राप सममेंगे, इसलिये मैं अपने परिथम को सफल समभाता और अपना 

अभिप्राय सप सझ्नों के खामने धरता हूं। इसको देख दिखल्ला के मेरे थम को सफल करें। और इसी 

प्रकार पच्पात मे करके सत्या्थ का भ्रकाश करना भेरा वा सब मदाशपों का मुब्य कर्तव्य काम दे। 

सर्वान्दर्योमी सच्चिदानन्द परमात्मा अपनी कृपा से इस भाशय को विस्दव ओर चिसस्थायी करे | 


॥ अ्रद्धमति विस्तरेय बुद्धिमद्वग्शिरोमणिषु ॥ 
॥ इवि मसूमिका ॥ 


हे 


रे 





स्थान महाराणाजी का इदयपुर, [। (्‌ स्वामी ) दयानन्दसरसती 


आदपद शकफ़फ्ड सेपत्‌ १६३९ 


# झोश्मू # 


जल लेन्ण लोक 


सबिदानन्देशराय मगो नमः 


/क>क-+-क->क 





का 


अथ सत्यार्थप्रकाशः 


प्रीसरिए' *- ग्रधादय | 
बजा (। 





प्रधमसमुझ्ासः 





ओप शक्षों पिप्रः श॑ परुणः शर्मों मबतवप्पमा । शन्न इत्रो प्रशम्प्िं: शप्तो पिष्एुकरुक्रम: ॥। नमो 
अप्य॑ण नमुस्ते दायो त्वमेयन प्रस्पर्च प्रशांति । त्वाजुव प्रत्यर्ष पप्मे यदिष्यामि शुखवे पृदिष्यामि सुर्त् 
यदिष्यामि तस्मामंदतु सदुड्ारंमयतु । अब॒तु पापवतु बफ़ारंप्‌ ॥ ओरेम शाम्तिश्शान्तिश्शाओविः ॥ १॥ 
अर्थ--( भोध्म्‌ ) यद झोंकार श परमेश्यण का सर्वोशम शाम दि, क्योंकि इसमे जोश, 

- * तीन अध्षार मिक्त कर एफ ( शोझ ) समुदाप हुए? दे! इस एक नाम से एरमेशपर के रटरुत 

भाते हैं, जेसे--अक्ार से विशदू, अप्रि और पिश्यादि | उकार से द्विरएयगर्म, वायु और तैड्सादि। 

से ईश्पए, आदित्प और प्रायादि भारों फा धाचक ओर प्राइक दे । उसका पेसा ही पेदादि 

२. राों मे बपए ध्यादयान किया टै कि प्रकरशप्मुकूल ये सब ज्ञाम पर्मेशर ही के हैं। ( पक्ष ) परमेश्वर 
“, मित्र अरथों के बाथक विराट आदि माम क्यों नहीं है प्रझाएड, एथिवी आदि भूत, एन्द्रादि देवता 
*« वैधकशार्प में शुएद्यावि झोषधियों के भी ये माम हैं था मई है [ उक्तर ) हैं, परम्तु परमार्मा के 
*हैं।( प्रश्ष ) रेवल देयों झा भ्रघण इस हामों से करते दो था भद्दों। ( उत्तर) आपके प्रदण करने 
क्‍यों प्रमाण है १ (प्रश्ष) देव सप प्रसिद् और दे उत्तम भी हैं, इससे मै उसका प्रडण करता हे। 
डक्तर ) क्यो परमेश्वर अप्रसिद भोर उससे कोर उत्तम भी दे दुलः ये नाम परमेश्यर के भी क्‍यों 
५ मानते है जब पर प्रेश्पर क्ृप्सिय झौर उससे सुरप भी कोई श्टी लो उससे शक्तम फोई फ्णेकर हो 

+ इससे आपका पद पाइना सत्य गहों। क्योंकि: आपके इस कटने में बदुतसे कोप भी आते दें 
'* _.*वपस्थित परित्यज्यानुपस्थितं पाचत इति धामितत्याप/" किसी ने किसी के लिये भोजन का 
+ इस थे; कष्ठा कि ऋप भोजन चरीडिये शोए थ्द ज्ञो उसको छोड़ के अपात मोजन के. लिये शहां 

'घ आम्रण करें उसको दुद्धिमान्‌ न जानता चािये, क्‍योंकि यद्द उपस्थित माम समीप भाप हुए पदार्थ 
«छोड के अनुपस्थित अर्थात्‌ अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति के छिये शम करता दे इसहिये ऊसा चद 
,७० “ « नहों पैसा दो आपका कथन हुआ क्योंकि आप उन विशेद आदि भाममों के हो प्रसिय 

//.. परभ्रेशर और अश्याएडादि उपस्थिठ अर्थों का परिस्षाग करके असम्भप और अनुपस्थित 
के पर में धम करते हैं। इसमें फोई भी प्रमाण था सुक्ति महाँ। शो आप पेपा कटह्ेंकि | + 
प्रफरण दे, वर्शा उसी का भ्रदए करना पोग्प दे, सैस किसी ने किसी से कट्टार ५ 


34 


हल ' 


शा > 


रे छत्यायेंप्रकाशः 





त्प॑ सै्धधमानय” अर्थात्‌ सू सैन्थध को हे आ, तप उसको सप्रय अर्थात्‌ भ्रकर्ण का पिचार कप्श 
भपश्य दे क्‍योंकि सैन्धय नाम दो पदार्थों का है, एक घोड़े और दूसरे लवण का। जो स्वस्वामी छ 
गमनसमय हो तो घोड़े और भमोजनकाल्त हो तो लवण को ले आना उचित है | और ज्ञो गमनसमर गे 
लघय झौर भोजव-समय में घोड़े को ले आवे वो उसका स्थामी उस पर क्रद्ध डोकर कहेगा किए 
निर्दुद्धि पुरुष द|े। गमनलम्य में लयण भोर भोजनकाल में घोड़े के लाने का फ्या प्रयोजन थार 
प्रकग् एपित्‌ नहीं दे, नहों तो शिस समय में जिसको लाना चाहिये था. उसी फो हाता | जो तु डे 
प्रकरण का पिचार करना आयश्यक था यह सूने नहों किया, इससे तृ मूल है, मेरे पास से चता शा 
इससे क्या सिद दुआ कि हहदों किसका प्रइए करना डचित हो यहां उसी अर्थ का प्रण करना चाहिये! 
सो ऐसा दी इम और आप सद स्रोगों की प्तानना ओर करना भी चादिये ॥ 
झथ मन्चाथे 

ओरेगू सम्पन्न ॥ १॥ यशुई अ० ४० | में> १७ ॥ 

देखिये थेदी में ऐसे २ प्रकरणों में 'ओम्‌' आदि परमेश्पर के नाम दें । 

आोमित्पेतद्शरथ्द्वीयमुपासीत ॥ रे ॥ छान्दोग्य उपनिषत्‌ [ मं० १ ] 

आपस्पेतददगमिद ७ सर्द तस्पोपस्या्यानम्‌ ॥ रे ॥ साणएडक्य [ सें० १]  - 
जद ले, ष न 4 

सर"े देदा यन्‍्पइ्मामनन्ति हपारेैप्ति स्वोशि च यद्वदन्ति । यदिच्छम्तों ग्रद्मवर्मे चर्म 
हे पं संप्रोग प्रवीस्पोमित्येतत्‌ ॥ ४ ॥ कठोपानिपदि [ वन्नी २ मं० १४ ] 

प्रशामितारं सईपामशी्यासम्णोरपि । रुपभा्म स्वप्नधीगस्प विद्या्ति पुरुष परम ॥ ४ |! 

एमोये ददस्तयक्रे मनुमस्ये प्रनापतिं । इन्द्रमेक परे प्राय पपरे प्रद्य शास्रनम्र ॥ ६ ॥| 

मतु० भ० १२ [ छो० १९२ । १२३] 

स छृष्ा से रिप्णुः से रुदरस गिदस्मोप्चरस्स परण। स्थ॒राद। हू इस्द्रस्स फालागिए 
घन्द्रएाए 4 ७ ॥ वैवर्प उपनितत ॥ इस्द् मित्र य॑णमप्िमांदुस्थों। दिव्यस्स संपर्णो गुरुमव | 
शई १६४ बहुपा दंद मप्र ये प्रतिर्सिनिमाहुए॥ ८॥ ० मं० १ । सू० १६४ मं० १६) 

भ्रम मूसिस्ण्य्िकिसि खुबघाप। पुअ॑स्य झुबनस्प घर्तरी । पृथषितती येच्छ पृथ्वी रा 
दिए झा हिंणडीए ॥ & ॥। यह्ः भर १३ ॥ में? १८ ॥ हि 

दो सट्टा रोइभी पश्वच्डव इन्द्र: हूरपेमरोचपत्‌ । इसदरेए दिया झुपतानि बेमिर ऐऐ 
झारार इन्द्र: ॥ २१० ॥। साझोद द्रपा५ ६ । विरू ८। में० २ ॥ 

५... टिपाप उहो बाप सर 24 बर्म । दो मूतः सर्वेष्येशों यत्मिस्सई प्ररिप्टिवम्‌ ॥ रै! 
झाप्पार इपरड ११। झ २ मूस ४ । में है ।। 

करे बाहर दब अनकों दे किये ये हात्वपे वईं! दि दि जो देसे २ प्रयाणों में झोंटापदि गे 
के ,प्ररेक्षाफा बा ऋडए हटा है, दइ लिश् राय सया दर मश्वर का कोई मी नाम इस्थक नहीं जे 
कक ई इसेड्ा आदि रे कल्प का्पि कान इसे हैं। इससे बह लिए हुआरि कई गोदिश, डा 


अष्क्रेक ऋार शडो स्शावाफिस अऋूपो ू पाकर हैं। “झोसमू ” इएंदु दाम सार्थक हैं सेरो (झा वं* 


प्रष्मतपृहारः $ृ 


॥डचरीलटोशू, ब्याष ए्ामिय ध्यापशश्यान रूप. रण प्पो इषाच'टट एवम इक्ता करने हे चचझोग मं, आकाशवाद 
दा व' होगे हे) (कप ५ छोर गाब रे बहू) इते के (ह। ईयर चग काम है ७१७ ओवि्य०) | झो३भ ) 
जलता शाम है कौर के घ भी लए भहों दंप्ता, शपरी थी पदाधना अप हे! धोप्प है. ऋणा की महा ॥७२॥ 
(कताप्राद१०) भा चैधादि शार्मों यै पर घैत्तर था प्रधान और हि शाप (छो रेपू। छ ब हा टै, ६हव शाप 
ऋषि, कण हैं ६६ धर रहाक ) कपोदि: पद देगु रव धमोतुष्टाण्द्रप सपशधरणा शिपदा रु धन और 
इक पे चतले छोर किएदते एम बी एद6ा बह प्रह्मघपो ऋध करत ऐ सवा काय "भाध्म" दै॥ ४ 
( प्रह्ठाहिदा ' ) हो पर कते शिक्षा देंगे दशा शष्म से पृर्ध पदप्दाशावछूप, सपाजिष्य बुद्धि 
हो हाशरे धोष्य है, इक परमपुपद काशशा बटिये १8 ५ ओर बदधदाश होने से "आदि", विदान- 
६द६प हम के आग, प१ए बा पाशन बाते सर "प्राायति', छोर पा रिक्व दै दान होने से! (7२०, रब का 
शदतमुण् होगे से प्राण", कोर गिशालर प्यापएड होगे से परमेध्यर था भाप "प्राव" है ॥ ६॥( शा प्रह्मा 
हुए दिच्तु $ ) शार शपयाए्‌ के बाने दो * प्राय, इस्दच ध्यायडः होडे ले 'पदच्तु”, दृपों को दए४ 3ेके शलाने 
से पद ' प्कष्टमप झोर पर का भरयाटाकर्ता होरे से "टच, “व: स्वेमश्गु| मे शदाति ते पिरयति 
हद्क्ष्म/) ६१॥ “दः इदचर्ष शांशते ल ध्दण१त0॥२॥ “पाउप्रिप्ए बताए. बालदिता प्रशपकर््तास 
बालाहिटीएइदए 0 ६४॥ ( ऋत्तर। जो गर्ंइ प्यार हदिनाएँ, (<शराद। सयप प्रराशध्दरय भोर 
६ छाल! दि ) प्रह्मप है बरद अ। बगल ओए का छा भी दब दि, श्यहियदे परमेशर का माप काआपि, 
€५७॥ (६४ पिच ) झो एइ भट्टिदीद गररप प्राप्र दरदु दे, झरी दे; एप्द्रादि रद शाम दें। अधुचु 
ए्ेदु पदार्पेचु भदो दिव्य" 'शोधरानि कदोदि पालमामि पूर्णाति बर्मादि वा पम्प सः” "यो यु्शास्मा 
हर गशशमार" “थो सातरिश्दा घायुत्वि बत्रवान शा मादरित्य" ॥ | दिप्य ) हे प्रकृ्पादि दिग्य पदार्थों में 
ब्यार, ( शुपर्य) श्सिदैः उत्तम पालन ओर पूर्ण कर्म टैं, ( गणग्मान ) शिएका भाग्य अर्थात्‌ स्परूप 
अ्रद्दाद है, [ प्रादरिश्या ) शो दायु के समान अलम्त इसपान्‌ है; इसलिये परमात्मा फे दिप्य, शुपर्ण, 
शाधरशन्‌ और स्‍्ातरिक्षा थे नाम हैं। शेष हामों रा भर्घ झागे बिरेंग ॥८० ( मूमिप्सि० ) *प्रपन्ति 
धूतानि पस्दां सा भूमि” शिलमे रद भूत धाएी होते हें इसालव रेशएर का गाम 'मृत्रि" है। शेष गाशों 
का अरे झारे किखेंग॥ ६३ ( एप्रो मद्दा० ) श्स मर्द में इस्द्र एश्मेश्यर दी का माम है, शसहिये 
बढ मशरण लिशा द|ि ॥ १०॥ ६ ग्राणाए ) असे प्राय छ दश सर शरीर और इम्द्रिएं द्ोती है वैसे 
परप्रेः्णर दे; यश में सदर शव रइता दि॥ ११ ॥ इस्पादि धमाणों के टीए टीफ अचों के शातने से इत भामो 
बरके परमेशर ही वा प्रइए होता टै। क्योंकि ओध्म ओर अग्य्यादि लामों के मुख्य अर्थ से परमेधयर 
दचा प्रदए होता टे। जैसा दि: व्याकरण, नियत, प्राह्मण, दशदि ऋषि मुनिषों छ स्पाण्यानों से परफ्रेशर - 
दा भ्रण देखने दे. छाता दे दैसा प्रएण करना सबको योग्य दे परन्तु “बोशम० पद तो बदल परमात्मा 
टी बा शाम दे भोर अप्ति आदि हामों से पप्मेखर के प्रहण में पका ण और विशेषण निपमझार्क है। 
इससे क्‍या सिद्ध दुआ कि जहां २ स्तुति, प्राथगा, उपासना, सर्दए, व्यापक, राद, सनातत भोर शष्टिकर्ता 
आादिविशेषणलिण हैं, द्दी २ इन नामों से परमश्पर का प्रदण होता है और शा < ऐसे प्रर0 है कि:-- 
ह। व्राइमायत पिगलों अधिपुरु: | थोओट्रपृ्े प्राण धुसोदप्रेजापव । सेन 
देवा भर्यजस्त ददाद्वमिमयों पुर। ॥ यजुर झ० ३१ ॥ 
रुष्पाडा एकस्पादात्मन भादाराः सम्घृता । आकाशादापु।। यायाराि) | अग्रेप) ) अड्औप 
भृषिद्री । शृधिष्या गोपधयः । झोपधिमस्पो:अम्र ) भन्नाद्गेता । रेतसः धु़प: | से वा दुप ह 
प्रसुज्मपः ॥ [ प्रद्ा० बच्ची ऋर० १३ है ५. 


/ह 


) सत्पापध्रशाशः 


था टैसिरीपेपनिपड का ददत है। देसे प्रमायों में बिशद्‌, पुयद, देव, भाकाश, यायु. भपि, 
हड, भूमि ऋपदि माय लोोकिऊ पदार्थों के होते हैं। क्‍योंकि जुदा २ उत्पत्ति; श्विति, प्रशप, झश्पणश, शेड, 
द४प आदि दिफ्रेषय भी शिएे हो बह २ परमेशरर का प्रइण गद्य होता। यह उत्पत्ति आदि ब्वपद्दारों 
पे चृषछ दे। झर ब्रेड मन्त्रों में झापत्ति आरि स्पवइार हैं इसी हो यशां बिशद आदि मामों शे पए- 
पाया छा ध्र्ाए रू दोहे सॉसएरी दराधों का प्रदया होता दे। फिस्तु श्डा २ सर्यशादि विशेषश हों वह्श रे 
पमामा कौर हुये + इशया डेप, प्ररव, छुश, दुएशा चोर ऋल्पणारि विशेषय दो यहां २ जीय का प्रइण 
हल दै। देशा शरद समझता धादिरे। करोंकि पर्मेश्यर का जम्य मरण कमी गद़ी दोता। इससे 
[धरम ऋधहि आाद बौर हत्या हि विफेदापं से जगत के लए भोर जीपारि पदाथों का प्रदष्ठ करता डचित है, 
दर बैपटर आए #ई। ऋरइ किय क्रशपर वित्ार आरि भामों से दर मेरवर का गइण दोता दे, थइ मकाए गीये 
[कर ध्रहनो कर ओंपुजप्३रे:॥ (वि) शसर्भबूषेक ( राज दीशे ) इस घातु से किप प्रशणण्करनते 
हे (व हू कद वि होता है। "चो किरिपं माम चरापचर जगद्ाज्ाति प्रकाशवतिहा विशद 
।४/५६३ दाद को दई बचत के क१प्‌ को प्रकाशित करे इससे "विधर/ भाग हे परगरपर का प्रश्ण दोगा 
हैं| इन कॉलूक्क्‍ए ) (झा, ऋति, इव शायरक्त ) चाए हैं. एको "“शहि" शण गिए दोता दे । 
रकाऋूछा हक कह बाप दि कि, चुदाई राम शाक्तार:” "गोप्शति अध्यते३गायहायरति था सोडप- 
हा" के इफतापइाइह कारक होकर, हत होते अर पूजा करने योरत दे, इसरो उस परमेरवर का भासे 
कक है, (कक हनी ३) हक घाहु से विक्व/ शाद विद दोता है। "विशरित प्रषिष्याति शाथोँ: 
कयाक फहतटक आफ रक बस्‍्थक १९ ह१३ ८ शर्वनु गृतितु प्रिष्ठ हर विश्व ईश्यर७। जिस 
खा रह १९० है कछ &॥ ३१7१ अर ३६३ हैं ऋषाणा कर पखतै धयता ६) ६ प्रतिष हो रहा है इरालिय बगल प्योएवर 
आाहस पढ़ है. दस हकारों । 94% छकारमाच है दप्ता दे। 'वयोतिति दिए हि्ो ये दिशा 
मैक & अर ह ७३ के ३ गे" “पा दिल्कतालर हवा दमा सैज़सां गाय इपलितिसिचधधिकर्णंस दिप्पा 
कह” टिक्ततं (६ ३ #फरूओ ऋाइ प्रटकक हा ओ विशके झापाह ॥से हैं अथवा जो दर्योदि सैजर्पदप 
का थे ४७४ कर काएक कोह सलकापतपाख है इस ३ इत परमिक्यर का भाग "दििवगर्त" है। इसने 
2 ३४६ # #हक ७  फभआ है 











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है रकपूर $. #+ ४७ ८७३ कम श्रत: 57 


अगीनू । मे दधार परी पाएुतेमी $४मं 
है पइरद रैए  ! 5३ ४» १३१ ० ४ | 





बेल्व ने कंप्यों है “दिए क्ादादी। के फ्म्ेड्दा ही का आहला इासा है; | का सतिराम्यशर्यों: ) 

कक झाह के “यु इच्च #िएा इंचय हैं; वधम्कन दिस. था बादि चर; चर व्रत इरति बिता 
डचाए # अत के आटा, डह फल कर प्राण, डइत छा प्रवात करता झोर खत अजगानारों 
कुसूथ है इकाई कझे देफदत का कार काय है, । लि जिदार | इग चानु हि "जड़ हो इससे 
इक अप & ४ की शाप शरद हाट डट आशाच बटयप्इाश आर मुधाविलेल्ावी क्राफ हा 
इकरद %८ १३ छक्का हैं उमड़ ४५ रैपडग छा बस्य हक है; दव्याडड आम्र्थ इदारशत मे धरक 
दल हु. ३ पद, इफ शा4 ऋू हिडजओ द्राड निद हाल हि। “ बईए हरें।वर्तकत पर्षत ले 
हा फेइकाक २६ खाइज्साओ शत कोर अजनद पडचफ है इस इसे परड्ाका का बाय  दैेउवह 
है. मं ऋषभात्यव सब बड़े हक कि तल हज हकरे कद्रव अऱडे के ऋितिएुा कृत सिक 
इस है. व बयान िियएा प्रकथ को स्ाायोल न के दल पे कर्च वन्‍्क,7 सदर हा दिमाज ऋमी मे हो 
छपा शफया का किए अंडा है । कु ऋषणोकर | प्र पूपेक कस यसु से “्रड़ा भाह इसमे 





प्रथमसमुन्नासः 





तदित करने से “प्राइ/ शब्द सिद्ध द्ोता दे। “यः प्रकएतया चग5ध्चर्स्य ज्ञगतो ध्ययद्धारं ज्ञानाति 
स प्रश;+प्रश एव भाश/” जे निर्धान्त शानयुक्त सव चश$चर जगत्‌ के ध्ययद्वार को यथावत्‌ ज्ञानता दे 
इससे इंश्र का नाम '“प्राउ” दै। इत्पादि नामार्थ मकार से शुद्दीत दोते हैं| जैसे एक २ माधा से तीन २ 
अर्थ यहां व्याष्यात किये हैं बसे दी अन्य मामार्थ भी झोफार से ज्ञाने ज्ञाते हैं। ज्षो ( शन्नो मित्र; शे 
थु० ) इस मन्ध्र में मित्रादि माम दे वे भी परमेशर फे दें, फ्योंदि स्तुति, प्रार्थना, उपासना थरेष्ठ ही की 
की ज्ञाती दे। धष्ठ उनको कइते हें जो गुण, फर्म, स्यध्षाप और सत्य सत्य ध्यवद्वारों में सर से अधिक 
दो। डब सप थ्ेष्ठों में मी घो अत्यन्त थ्ेष्ठ इसको परमेश्वर कहते हैं। मिसके तुस्य फोई न हुआ, न 
दै और न दोगा। ज्व मुल्य नही तो उससे थ्िक फ्योंकर द्वो सकता दे! जैसे परमे)बर के सत्य, 
स्याय, दया, सैसामध्ये और सर्वे्ष्यादि अनन्त गुण हैं येसे अन्य फिसी जड़ पदार्थ था ज्ञीव के भट्दों 
ह। जो पदार्थ सत्प दे उसके पुण, कर्मे. स्वभाव भी सत्य होते हैं। इसलिये मनुष्यों को योग्प दै कि 
परमेश्वर दी की स्तुति, प्रार्य ना और उपासना करें, उससे प्रिप्ष की कमी न करें, फ्योंकि प्रह्मा, पिष्णु, 
मद्दादेष नामक पूयेज मह्यय विद्वान, देत्य दामयादि निरूुए मलुप्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी 
परमेश्वर शी में विश्यास फरके 3सी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे मिश्न की नहीं की । 
पैसे दम सब फो करना याग्य दे । इसका विशेष बियार मुक्ति और उपासना पिपय में क्रिया ज्ञायगा | 
( प्रश्न ) मित्रादि नामों से सच्ा और इन्द्रादि देयों के प्रसिद/ घ्यपष्टार देखने से उन्हीं का 
प्र:ण करना घादिये | (उत्तर ) यद्वां उनका प्रदण करना योग्य महीं, क्‍योंकि लो म्रभुप्प किसी का मित्र 
दैषदी अन्प का शत्रु भौर किसे से उदासीन भी देखने में ध्राता दे । इससे भुझ्यर्थ में सप्य ऋादि 
का प्रदण नहीं दो सकता। किश्तु सेसा परमेभ्वर सब ज्गत्‌ का निश्चित मित्र, न किसी का शत्रु और 
न फिस्री से उददासीन दे, इससे भिश्न फोई भी ज्ञीय इस प्रकार का कमी भहों हो सकता। इसड्रिय 
परमान्मा दी का प्रदण यहां द्वोता दि। हां | मौण अथे में मित्रादि शप्द से सट्ददादि मरुष्यों ला पाण 
होता दै। ( भिमिदा स्नेहने ) इस धातु से ओणादिक "क्तू” प्रत्यय करने से “मिश्र” शख मिद इंटः 
है। “मेथति स्रिद्यति सिधते था समिश्रः” ज्ञो सब से स्नेट्ट करके और सद फो प्रीति इरैने पद 
है इससे उस पस्मेश्यर फा भाम “मित्र” दे ( घृ्ठ परणे धर ईप्सापाम्‌। इस धातुधों से रपाद टेस्ट 
प्रत्यय दोने से “वरुण” शघ्द सिद्ध द्ोता दे। “यः खर्बान शिए्ान म॒ुमुझूम धर्मात्मनों पृन्कयध ब८ 
शिफ्रमुमुचुमिर्धमास्मभिर्ियते धस्पेते था स चणणः परमेश्यर/” जो आत्मपोगी, विश्वार्‌, मुन्धि रए दऋए- 
करने याते मुझ ओर धर्मात्माश्रों का स्थीकार करता, अथपा शो शिष्ट, मुमुझठ मुद झट डनफतओर 
से प्रदण किया जाता दे पद एंग्वर “यरण" संशक दे। अथषा "थरुणों मान दग मं: प्रसन्कर 
परमेश्यर सब से थे्ठ दै, इसीलिये उसका नाम “ययण ! दे । ( ऋ गविध्रापणेट) हक इफ & न्ख्ना 
प्रस्यय करने से “अरपे" शप्द सिद्ध दोता दे ओर ' अस्ये" पृरददः ( माह हारे ) 8 श> हे *%>०- 
प्रत्यप दोने से “अयेमा" शब्द सिद्ध दोता द॑े। योड्यान स्वामिमों सफर 5: के 
च रोति सोडयेमा" जो साप ग्याप % करनेधार मनुष्यों का मान्य झोर पार हु हद इस्फेडपछन 
ओर पुणएए के फलों का यधावत्‌ साथ २ निप+कर्सा टे इसी से रख एक: 2 
(।दि करमेश्ण्ये । इस धातु से टन प्रस्यय करने रे “इन्द्र” शद 
शरवेवान्‌ सदृति स इम्दः परपेखर:” जञ' आलिल देश्पयेयुर दे इसी के बए ८८० द्न्ल्क्प्र 
*गृहह्‌" शपूरषक (पा सतले । इस धातु से “शति” प्रत्पप दृष्द डपज इ> बीए डे को. 
दोन स्‌ "युहम्पति" शप्द सिद दाता दै। “यो पृषतामाधयाीश ३७ बसे २००... >- 
शो बड़ों से भरी बढ़ा भोर डे आाकाशादि प्रमाण बा बरू ह:स० हा कक 
हु न जे पक लक 













नन्हे 





घ सद्यार्पप्रकाछः 

«इृदस्पति” दि । ( दिप्द सगमी ) इस घातु से “तु” प्रत्पप दोकर "दिष्ए” शब्द सिद्ध हुआ है। 
बवचपेडि सपामोति ाराधवरे डगव्‌ स विप्युण घर और अऋचररूप हुगत्‌ मे स्पापफ इोने से परमात्मा 
का शाम 'दिपय दे। 'डर्स्मशार कमः पराकमो पस्प स उस्क्रम:” अनन्त पराक्रम युक्त द्वोने से परमात्मा 
बय माय “डस्कस दे। डो परमात्मा ! इदकमः ) मइापराकरमयुक ( मित्र: ) सए का झुद़त्‌ शशिरोधी 
£ दए (शत) सुचभारक, बइ ( बरुयः ) सर्षोत्तम, यश (शम्‌) सुद्स्परूप, यह ( अर्यमा) 
स्थापाया, बइ (शम्‌) सुख्यचारक्र, बइ (इन्द्रः) जो सकल पेश्वगेयान,, यह (शम्‌) सरल 
इसेकशपैशापऋ, बट ( इशम्पति: ) सद का ऋशिष्ठाता ( शम ) पिधापद भोर ( विप्णः ) शो सप में स्यापर 
चरफेश्ााः है, दुष्ट ६ राग ) इमारा कस्रायक्रारक ९ मषतु ) शो ॥ 

[ दपों से मघये ग्सो5स्तु ) ( दृइ दृष्टि घूदो ) इन धातुओों से "प्रह्म” शब्द सिद्ध द्वोता है। 
शो साई डे हद विशम्यपर, सगाई से बड़ा, अनम्त*कयुक्त परमात्मा है उस प्रढा को इम समस्कार 
अप हैं। है पा देवर ! ( खेर दत्पधे प्रफासि ) आप दी अस्तर्पामिकष से पर्पदा प्रहम दो ( त्वामेर 
झा कम चाॉंदिच्यानि) हैं ऋाए हो को ए"पश् प्रञा कट्ंपा, क्योंकि आप सब जगद में व्याप्त दोके हर 
को मिलद ही दाद हैं ( शत बचत) ओ आप को येदर्थ यधार्थ भाजा दे उसी का मैं सप के लिये 
कपटरेश! आफ झअकाश मी ऋश्गा ( शाप वीीच्यामि)शा्प बोलूं, शाप मानू भोर सप्य ही कदंणा 
( ऋत्तवादलु ) | छा देरी रक्षा औडिये( तदकारमबत)सलो आप शुझ भाप सारपत्कां फी रणां 
शहद बि किकसे ऋत्र हो ऋाइ मै मैरी बुडि छिर दोकर विदश कसी मं हो। क्योंकि शो भाग 
अर कपड़ा है हएए अप ऊपर को इधर विदय बडी अ्रभधर्म है। ( अपतु मासयतु पक्तारम ) पद हृशरी 
आत शत क्र हुई के धिई है। औये “करित्‌ कशित्‌ प्रति बदति हव॑ प्राम॑ गंष्घ गरुण” इहाये दी पार 
३० दे हक अाक को | है ड हो इणय छो शा देशा लिद होता दे देते दी यह कि आप मैरी अपरप 
कर्ण अप! करण करके आओ रहिडि्क ऋण अचमें मे पुला सदा कह! पेसी कृपा मुझ पर कीजिये, 
का ०६ के कक्छन अर्थ ज #ारेच+। (७ ४म शात्य: शारिस! शान्ति: ) बह मैं लीत थार शारितपाठ की पई 
कप कक हैं हि सिएेइलाता कद हल रोधार मै सीख प्रकार के धुल हैं बक "झआाष्यारिमक जो झाएमां 
कमीक है ७“ एव्टो इक इंच आर छह उपर पीडाति होते दें। दूसरा “प्राधिभौतिक्त" जो शत, ध्याप और 
काएाईं के इगफ डशत है । कमल “कार विक  अर्धाय औ अतियूद्धि; झतिशीत, झति इस्णला, गत 
कोई इफदाएं को ४३ तक के इज है। ह4 वीह प्रदार दे क्‍्येशों से आप इम करों को दूर करके 
के स्यण्फक हक $गे हे कहा अगुच शकिय । कक्‍रयोंडरि आप ही फत्यायल्वकंप, सब दांतार के 
के करण्एाक बट छोड ऋविइ मर कुकर ६+ कप्पापत के दाता दैं। इसलिए आप श्यर्य ऋपती के देश्या हो दा 
कफ & हपद ई 2३ टन हुए फि फिलसे कब बय परम का आाचरख झट झथर्म को छोड़ के 
अष्ध कब का इपक दो कोर इक से एकक बहू । अूर्य आता अगतस्तम्पपशा' दस यदु्वेद के बपसे 
ह का करन धक इज कर छोर अमर आयात ओंबयत किले हैं तावुप: काशी अति 
रूपा: अब छत पडिओं कवि हैँ इक ऋज के कांप इजे लयह अवश्ाशनंप सब है प्रकाश करने 
क्‌ बदफे आए का क्र प्टिपए हैं; करे ऋशयारत्ते काल आग मे चअत्या शाप सिक इोला है 
“दोहन अयाश्थीपड के इटय्ा डी कट बडे आरल बी जिरब्टर छापक हु हा है। वरक्मप्स'च्धा 
डा के कक नए अजिजश ऋुलडिल्‍य अर: ट्िकृदल, मा परिमाम्यी को हब ड्रीच आवि से डल्ट्रड और 
कक आअपू से डा्था क हाफ के मी ऋजिटटधद कह वहा हीयों हा झालतपापी अल्या डी दुसरे इंशर का 
डक फियाओा है फमां कक छा काल इनक है। “य ईआरेच अमवेंदू पर अपा सर विश्व: 
कई ऋषाओ सफ़र ई कमके फरिल्क शम्द बडे हीजही उसका शाप परदेलण है। 








प्थमसमुन्लासः. ७ 








( घुज््‌ अभिषये, पूडः प्राणिगर्भविमोचने ) इन घातुभों से “सदिता” शब्द सिद्ध द्ोता है। “अमिषयः 
प्राणिगर्भविमोच्म॑ घोत्पादनम्‌ | पश्चराचर कगत्‌ सुनोति सूते योत्पादयति स सविता परमेश्यरः” ज्ञो 
सब ज्यत्‌ की उत्पत्ति फरता दै इसलिये परमेश्वर फा नाम “सदिता" दे | (दिवु क्रीढ़ाविजिगीपाव्यवद्ार- 
चुतिस्तुतिभोदमद्स्वप्रकान्तिगतियु ) इस धातु से “देव” शब्द सिद्ध द्वोता दे। (कीड़ा) को शुद्ध 
जगत्‌ को क्रीड्टा कराने ( बिजियीषा ) धामिकों को जिताने की इच्चायुक्त (व्यवद्दार ) सब चेष्टा के 
साधनोपसाधनों का दाता (चघुति) ख्यंप्रकाशस्थरूप सब का प्रकाशक (स्तुति ) प्रशंसा के योग्य 
६ मोद ) आप झआानन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देनेडाय ( मद ) मदोन्मत्तों का ताइने द्वारा ( स्वप्न ) 
सए के शपनार्थ रात्रि और प्रलय का करनेद्वारा ( कानिति ) कामना के योग्य और ( गति ) ज्ञानखरुप दे 
इसलिये डस परमेम्वर का माम "देव” दे। झथथा “यो दीव्यति क्रीड्ति स देधः” ज्ञो अपने स्वरूप में 
आनन्द से आप दी धीड़ा करे अथया किसी के सद्दाप के बिना क्रीड़ायत्‌ सहज स्वभाय से सब जगत 
को बनाता या सय प्रीढ्ञओं फा आधार दै। "पिमिगीपते सदेवः” जो सब का औतनेड्ारा स्वयं 
अज्जेप अर्थात्‌ जिसको कोई भी नज्ञीत सके। “थ्ययद्टास्यति स देवः” ज्ञो म्याय और झम्यायरूप 
ध्यवद्दारों का जानने दारा और उपदेश, “यश्वराचरं जगत्‌ च्योतयति” ज्ञो सद का प्रकाशक, “यः स्तूपते 
स देवः” जो सव मलुष्यों फो प्रशंसा के योग्य और मिन्दा के योग्य न हो, “यो मोदयति स देयः” शो 
स्वयं आमन्दस्वकूप और दूसरों को आनन्द कराता, जिसको दुःख का लेश भी न हो, "यो माथति स 
देवः” जो सदा इर्षित, शोकरट्टित और दूसरों को दर्पित फरने ओर दुःखों से पृथक रखने थांत्ा, “यः 
स्पाएयति स देवः” जो प्रखय समय अध्यक्त में सब ज्ञीषों को सुखाता, “यः कामयते फाम्यते था से 
“यः” जिसके सब सन्‍्य काम और जिसकी प्ापति की कामना सप शिप्ट करते हेँ तथा “यो गष्छति 
गम्पते थां स देव:” जो सब में स्याप्त और ज्ञानने के योग्य दे इससे उस परमेश्यर का माम “देव” £ ॥( कुषि 
आध्छादने ) इस धातु से "कुपेर” शब्द सिद्ध द्ोता हि । "यः सर्थ कुयति स्वष्याप्त्यायछादपति रू कुचेरों 
ज्गदीःवर!” झो झपनी व्याप्ति से सब का आच्दादन करे इससे उस परमेश्वर का माम “कुचेर” | । 
( प्रथ यिस्‍्तारे ) इस धातु से “एथिपी” शप्द सिद्ध द्ोता दे । "यः ग्रथते सर्वजगद्विभ्युणाति स एृथियी" 
ज्ञो सप विस्दृत श्गत्‌ का विस्तार करनेधाला दे इसलिये उस परमेश्वर का माम प्थिष्री दि। जल 
घावने ) इस धातु से "जल" शब्द सिद्ध द्ोता दि। “जलति घातयति दुष्टान्‌. संपावपति-अष्यकतएरमा- 
एयादीन्‌ तदु धह्म शलम” को दुष्टों का ताइन और अभ्यक्त शथा परमाएचों का अन्योडस्थ संपोग था 
दिपोग करता दे व परमात्मा "हल" सं कद्दात! दे १( काश दीशे ) ईस धातु ले “दादा” शब्द 
सिद्ध दोवा दि, “पः सर्यतः से जयत्‌ प्रफाशयति स झादाश:" शो सव झोर से जगत्‌ दा प्रशाशक दे 
इसलिये उस परमात्मा का माम “झाकाश" दै। ( ऋद भदयणे ) इस धातु से “अत” शप्द सिद्ध दीता थे 


अपवेधति व्‌ भूगानि तस्मादर्स तदृच्यते ॥ १ ॥| 
आमस्रमहमभ्रमामसम्‌ | भदमघादोष्मपादोहमसाद३ ॥ २॥ तैचि० उपनि० [झजुबाब २। १०] 
अत्ताचरावरपएगात्‌ ॥ [ देदान्ददशने भ० १। पा" २। घ० ६ ] 

यह ध्यासमुनि शत शारीरिक खुद दे। को सब को भीतर रखने था सद को प्रत्ट रुपने 


योग्य घराचर झगत्‌ का प्रशण करने धाहा टै, इससे ईश्वर के “इच्च' “हाई” छोर “ऋक्त। सम 
<। भोर को इनमें तीन बार पाठ टै सो आदर र किये द|। जेसे गदर के फल में हमि इत्पशा हद 


इसी में रइते चोर नए द्वो झाते दें देसे परमेश्वर ले बीच में सब रुयत्‌ की ऋषस्पा टै । ( बस लिदास ) ...० 


इस चातु से 'चसु" शप्द सिद्ध हुआ दि। “वसम्ति भुतानि दस्पिप्रथया या सर्चपु भूल्चु दसते झा 
नजर हि 


कप हल 





च् है सत्यार्थ प्रकाशः 








धसुरीश्यर/” जिसमें सप आकाशादि भूत यसते हैं और हो सब में घास कर रहा दे इसलिये र 
परमेश्वर का नाम “बसु” है। ( रुदिर अशु विमोचने ! इस धातु से "पिच" प्रत्यप दोने से “रद्र" ह 
सिद्ध द्ोता है। "यो रोदयत्यस्यायकारिणो जनान्‌ स रुद्र:” ज्ञों दुए कर्म करनेद्वारों को रलाता दे ए 
डस परमेश्वर का नाम “रुद्र” दे । १ था 
यन्मनसा ध्यायति उद्बाया बद॒ति यद्वाचा यद॒ति तत्‌ कर्मणा करोति यद्‌ कर्मेशा करे 
तदमिसम्पच्ते ॥ 
यह यजुर्वेद फे त्राक्षण फा धचन दे। ज्ञीय जिसका मन से ध्यान करता उसको बारी 
बोलता, जिसको घाणी से बोलता डउसफो कर्म से करता, स्सिको कर्म से करता उसी की प्राप्त ई 
ह। इससे क्‍या सिद्ध हुआ कि ज्ञो जीब औैसा फर्म करता दे वैसा डी फल पाता दे | जब दुष्ट 5 
फरने बाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते तब रोते दें और इसी पकार ईः 
उनको झलाता है । इसलिये परमेश्वर का भाम “झरुद्” दे ॥ 
आपो नारा इति शओ्रोक़्ा आपो यै नरमूनवः । ता यदस्यायन पूर्व तेन नारायुणः स्पृतः 
मनु? [ श्र० १। छो० १० ] 
* जल ओर जीवों का नाम नारा है, वे अयन अ्रर्थात्‌ निवासस्थान हें जिसका इसलिये 
ज्ञीयों में व्यापक परमात्मा का माम “तारायण” है ( चदि श्राह्यादे ) इस धातु से “चन्द्र” शब्द सि 
होता दि | “यश्वन्द्ति चन्दयति था स चन्द्र” जो आनन्दखरूप और सब फो आनन्द देने वाला 
इसलिये इंश्वर का नाम “चन्द्र” दै। ( मगर गत्यर्थक ) धातु से “भन्नलेरलच्‌” इस सूच से “महत 
शब्द सिद्ध द्ोता दि । “यो मह्ृति मह्नयति था स मक्नलः” जो आप मद्ृज्तस्वरूप और सब ज्ीयों के मा 
का फारण दे इसलिये उस परमेश्वर का नाम “मइल” है। ( घुध अवगमने ) इस धातु से 'वुः 
शब्द सिद्ध द्ोता है। “यो चुध्यते बोधयति बा स बुध:” जो स्वयं बोधस्वरूप आर सब जीथों के ष 
का कारण दे इसलिये उस परमेश्वर का नाम “बुध” दे । “बृदसुएति” शब्द का अर्थ कइ्ट दिय 
( इंशुचिर पृतीभावे ) इस धातु से “शुक्र” शब्द सिद्ध डुप्मा है। “यः शुच्यति शोचयति या स श॒क्र/” 
अत्यन्त पव्िच और जिसके सद्ठ से जीव भी पविच दो जात! दे इसलिये इंश्वर का नाम "शुक्र 
( चर ग्तिमछणयोः ) इस धाठु से “शनैस” अव्यय उपपद इोनते से “शनैश्वर” शब्द सिद्ध हुआ: 
“या शर्नेश्वग्ति स शनैधरः” ज्ञो सत्र में सह॒ज्ञ से घराप्त पैयेधान है इससे उस परमेश्वर का न 
“पनैद्यर” है / रद्द स्थागे ) इस धातु से “राहु” शब्द सिद्ध होता दै। “यो गद्दति परित्यजति दुएट 
शाहयति स्पाज्ञपति था स राष्टुरीश्यर:" जो एक्तात्तस्यरूप जिसके स्वरूए में दूसरा पदार्थ संयुक्त ना 
ज्ञो दुष्ठों को छोड़ने ओर अम्य को छुड़ाने द्वारा टि इससे परमेश्वर का नाम ' राहु” दे । ( कित सिया 
शोगापनयने थे ) इस धातु से “बेतु' शब्द सिद्ध होता टै। '“यः केतयति चिकिससति या स फेतरीश्वर 
हो सद जगत्‌ का निदासस्थान सद रोगों से रटड्टित और मुमुछुओं को मुक्ति समय में सय शेगों 
छुद्ाता दि इसलिये उस परमात्मा का नाम “केतु” दै। ( यज्ञ देवपृश्ञासज्तिकग्णदारेचु ) इस धातु 
*बड/ शब्द सिद्ध होता दे । “यड़ो थे विष्णु:” यद आहयणप्रस्य का यचन है। “यो यज्ञति विद्द्धिरिज्य 
या स दश्च/ जो सव जगत के पदार्थों को संयुक्त फरठा और सब दिद्वानों का पृज्य दे और प्रह्मा 
ले के सइ ऋषि मुनियों का पूज्य था, दे झर द्वोगा इससे इस परमात्मा का नाम “यह” है, क्‍योंकि ध 
सर्वत्र स्यापक दे । ( हू दानाइदनयो:, आदाने चेत्येके )इस धातु से “दोता" शब्द सिद्ध हुबआ दै। “ 
छह्ेवि स द्ोवा” शो हीयों को देने योग्य पदार्थों का दाता और प्रदण करने योग्पों का प्रादक दे इस 


$ 






डे 


उस ईश्वर का माम “होता” है। ( पन्ध पन्‍धने ) इससे “बन्घु” शूद सिद्ध होता दे । “यः स्थस्मिन्‌ 
घराचरे क्षणद्वध्ताति पन्धुषद्धर्मास्मनां सुखाय सट्टायो या यन्षते स यन्धु:” ज्ञिसने अपने में सब लोक- 
लोकान्तरों को मिय्मों से बद् कर रक्ले और सद्दोदर के समान सद्ायक दे इसी से हऋपनी ३ परिधि 
या नियम का उल्लंघन नहों कर सकते | जैसे साता भाश्यों का सदायकारी द्वोवा दे येले परमेश्वर मी 
पृथिय्यादि लोकों के धारण गक्तण और सुख देने से 'दन्धु" संशक है "(पा रक्तरों)इस धातु से "ऐिता” 
शब्द सिद्ध हुआ दे। 'यः णति सर्थान स पिता” जो सरका रकतक जैसे पिता अपने सत्तानों पर सदा 
झृपालु होकर इनकी उस्नति खाइता है भैसे छी परमेश्वर समण ज्ीयों की उप्तति चाहता दे इससे इसका 
शाम “पिता" है। “यः पितर्णां पिता स पितामद्र:” ज्ञो पिताओं का भी पिता दे इससे उस परमेश्वर का 
नाम “वितामद” दे “यः पितामद्ानां पिता स प्रपितामइः” जो पिताओं के पितरों का पिता है इससे 
हरम्ेश्यर का नाम “फ्रपितामह" दे । “यो मिमीते मानयति सर्वाजीबान, स माता" जैसे पूर्णक्ृपायुक्त 
झतमी अपने सम्तानों फा खुस्द और उच्चति खाइती दे येसे परमेश्र भी सब ज्ञीवों फी पढ़ती चाइता दे 
इससे परमेश्यर या माम “माता” दै।। चर गतिमणणयो:ः ) चाइपूर्वक इस धातु से “आादार्य्य” शप्द सिद्ध 
दोता दि। “यः भाचारं प्रादयति सर्वा विद्या योधयति स चाचाये एंस्व८" शो सत्य भाचाद का श्दय करानेट्रारा 
ओर सब विदाशों की प्राप्ति का हेतु द्षोझे सौर दिया प्राप्त करात! दे इससे परमेश्वर का नाम “झांचाये” 
दै।(श शदे ) इस धातु से “गुर” शब्द बना दे । “यो धर्म्पान्‌ शब्दान शणात्युपदिशति स गुर । 

स्‌ पूर्वेपामपि गुरु; कालेनानवच्छेदात्‌ !| योग छू० । समाधिपाद ध्वृ० २६ || 

यद् योगसत्र दे। ज्ञो सत्यधर्प्रतिपादक सकल विद्यायुक्त पेड़ों का उपदेश करता, एुष्टि 
की आदि में अप्नि, वायु, आदित्य, अड्लिरा भोर प्रह्मादि गुरझ्ों वा भी गुय भौर शिस्तवा नाश कभी 
मद्दी दोता इसलिये उस परमेश्वर का नाम “गु्ं दे । ( अज गतिछ्ेपणयो), जनों प्रादुमवि ) श्त 
धानुच्ों से "झरज्ञ" शप्द घनता है। "यो5जति शर्ट प्रति सर्पान प्रशत्यादीन पदार्थान्‌ अधिपति जानाति 
था कदायिच्र शापते सी5ज:” ज्ञो सब प्रकृति के झ्ययव आकाशादि भूत परमाणुशों को पथयोग्य 
मिज्नाता, शरीर थे साथ जीयों का सम्वन्ध करके अम्म देता शोर स्पयं कभी झन्‍्म महीँ छेता इसे 
उस ईश्पर का माम “झज" दे।। यृद्द एृष्टि पदों) इन धातुझों से “प्रह्माए शब्द सिद्ध ोता दे 
“पोडजिल जगश्निमाणिन एूंदति पर्डयति स प्रद्या” छो सम्पूर्ण ज्गव्‌ को रच के पढ़ाता दे इस्सलिये 
परमेश्वर का माम /ग्रञ्मा” है । "सत्यं झानमनस्तं ध्रद्मए यद्द लैसिरीयोपनिषद्‌ का धन दै॥ "सम्तीति 
सन्तसस्‍्तेषु उरसु साधु तत्सत्यम्‌। यज्ञानाति घराउचरे कगतायानम्‌॥ सा दिघतेःम्तोःवधिभर्यादा 
पस्य तद्मस्तम्‌ । सर्येम्धो शृदस्वादु प्रदा/ ओ प्रदार्थे हों उतको सव कटे हें उनमें साधु ऐोने से 
परमेध्यर दा नाम सस्व दै। ज्ञो सद झगत्‌ का छाननेबाला है इससे पर्मेभ्वर का शाम “हासन” है। 
जिसका इम्त अधधि मर्पादा अर्थात्‌ इतना खग्बा, थोड़ा, दोटा, बढ़ा दै ऐसा परिमारा नहीं थे इस- 
लिये परमेश्वर का माम "“झमम्त” ह। ( दुदाभ दाने) झादपृर्दंक इस धातु से “झादि! शाद झीर 
नपूपूर्षेंक “चनादि श सिद्ध होता दै। “यस्मात्‌ पूर्व मारिष परे घास्त से आदितित्युस्योत 
[महामष्प १।१। २१ ] मे विचते झादिः कारण यस्‍सय सोडगादिरीखर” जशिसझे (पूर्व दुष्ठ भ शो 
झौर परे दो, उसको झादि बहते हैं। शिसका आदिकारण कोई भी महों है श्सक्िएे परमेश्यर 
का धाम अनादि है । ( दुनदि समझो) चाइपूर्षक इस थातु से “झातमश” शझश इनता टि । 
“झामम्दन्ति सर्पे मुक्ता यस्थिन्‌ णदा या सर्थाञ्ीयानावनइएत स झानन्द: [शो धानाइसदरूप 
किसमें सर मुझ जीय आनम्द को धार होते ओर जो सद धर्मास्या कीषों को घातत्द्रयुक्त बरता ऐै: .... 
इसपे ऐश्यर का साम "झानरद” दै( झस शुदि ) इस धातु से “सव्‌” शबद लि होता ट|। “बहस ” 


है 
अर ५७ 


न्‍्ट के 22 


१० सस्पार्धमराशः 


नब्नब अधाड 
पन्‍लज लि लल 5 अऑजलटल १ अऑलनल- आज लीी अली न लि ज थम की मी आन के मिल 


प्रियु कालेयु ग बाध्यत सत्सदु प्रश्च0 ओ सदा धर्भमान झधति सुत, संविध्धय, वर्भशात कार्बों ई 
जिसका पाध मे हो उस परमेश्वर को 'सत्‌” कदते हैं । | घिती संडाने ) इस धातु से "वित्‌” शद 
सिद्ध होठा दि। "वश्चेतति खेवयति संशापपति सर्वात्‌ सम्शनान्‌ पोधितस्तदिधर्परें धध जी बेर 
स्थरूप सप जीयों को खिताने भौर सत्याइसत्य का झनाजेडारा है इसलिये वस परश्मशातमों छोर 
"चित! है, इन तीनों शर्तों के पिशेषद द्वोने से पस्मेशर को "सब्धिवानसम्परुप” कहते हैं । 7 
तित्यधुपोषघलो 5 विनाशी स गिरय:” शो निश्चल अयिनाशी टैे सो "नित्य शख्पाध्य ईशा दे।( ग7 
शुद्धी ) इससे "शुद्ध" शब्द सिद्ध द्ोठा दे । "यः शरधति सर्वान, शोधपति वा से शय ईशर/ जो सी. 
पविनश्न सब अशुद्धियों से पृथर भोर सप को शुद करने यात्रा दे इससे उस ईशार का गाम 'यय हैं 
( युध भयगमने ) इस धातु से “छू” ने से “बुद्” शब्द सिय द्ोता है। “वो वुदबार सी 
शाताउस्ति स चुद्धो श्गदीशरः” ज्ञो सदा सब की ज्ञाननेद्दारा है इससे ईशर का नाम "पुर दे। 
( मुच्छ मोचने ) इस धातु से “मुक्त” शप्द सिद्ध इोता दि। “यो मुझति मोथयति था मुमुशन स मुठ 
जगदीश्रः” ज्ञो सवेदा अशुद्धियों से अज्ग और सप मुमुचुझों को पेश से छुड़ा देता दे इसलिए 
परमात्मा फा माम “मुक्त” है। “झत पय नित्पशदयुदमुछ्स्यमायों शगदीश्यरः” इसी कारण से परमेशर 
का खभाष नित्य शुय [यु] मुक्त दे । निश ओर आदपूर्यकी ( डुछशू करणें ) इस धातु से “निराधाण 
शब्द सिद्ध द्वोता दै। "निर्गत आफारत्स नियकार:" जिसका आकार कोई भी नहा झौर न फमी 
शरीर धारण करता दे इसलिये परमेश्पर फा माम “निराकार” दे | ( भम्जू स्यक्तिम्श क्षणफाम्तिंगतिय 
इस धातु से “अअञ्न” शब्द्‌ और निर्‌ उपसर्ग के पोग से “निरञ्ञन” शब्द सिद्ध द्ोता द|।“ 
व्यक्तिम्लक्तणं कुकाम इन्द्रियेः प्राप्तिश्वेत्यस्मादो निर्गतः पृथगूमूतः सा निरघ्यनः” जो व्यक्ति अर्थोर्द 
आकृति, स्लेच्छायार, दुष्क्ामना और चक्॒रादि इन्द्रियों फे पिषयों के पथ से पृथक है इससे ईशः 
का नाम “निरव्जन” दैे। ( गण संस्याने) इस धातु से “गण” शब्द सिद्ध होता और इसके झागे 
#इँश” था “पति” शब्द रखने से “गणेश” और “गणपति” शब्द सिद्ध द्योते हैं।“ये प्रकृत्यादयों हडी 
ज्ीयाश्च गणयमन्‍्ते संण्यायन्ते तेपामीशः स्वामी पतिः पालकों था” ज्ञो प्रकृत्यादि लड़ और सब जीव 
प्रक्यात पदार्थों का स्थामी था पालन करनेट्टाया है इससे उस्र ईंश्पर का भाम “गणेश” था “गणपति 
है। “थो विश्वमौष्टे स विश्वेश्वर:” जो संसार का अधिष्ठाता दै इससे उस परमेश्वर का नाम ”विश्वेश्वर' 
दै। “यः फूटेउनेकविधव्यवद्दारे स्पस्थरूपेशीद तिष्ठति स कूटस्यः परमेभ्वरः” ज्ञो सब व्यपद्दारों मैं 
ब्याप्त और सब व्यवद्दारों का आधार द्ोके भी किसी ध्यवद्दार में अपने स्थरूप को नहीं बदलता इससे 
परमेश्वर का नाम “कूटस्थ” है। जितने “देव” शब्द के अर्थ लिखे ८ डतने दी “देवी” शब्द फे मी 
हैं। परमेश्वर के तीनों लिज्नों में नाम हैँ, जैले-“ब्रह्म चितिरीभ्वरश्चेति” ज्ञव ईश्वर का विशेषण द्ोगा 
तथ “देव” जब चिति फा ध्ोगा तय “देवी”, इससे इंश्वर का माम “देवी” है । (शक्ल शक्तो ) इस 
धात से “शक्ति” शब्द बनता दे । "य सर्च ज़गत्‌ फतुं शक्ष्नोति स शक्ति:” ज्ञो खब झगत्‌ के यमाने में 
समर्थ दे इसलिये उस परमेश्वर का नाम “शक्ति" दे। (घरिज सेयायाम्‌) इस धातु से “भी” शब्द सिद्ध 
/ द्वोवा दि। “यः धीयते सेव्यते सर्वेण ज्ञाता विद्वद्धियोंगिमिश्च स धीरीश्यर:” जिसका सेघन सब ज्गतू+ 
/ विद्वान और योगीज्ञन फरते हैं उस परमात्मा का नाम “थी” दे। ( छत्त दर्शनाइनपो: ) इस घातु से 
“लद्दमी” शब्द सिद द्वोता है। “यो लक्तयति पश्यत्यज्ठते चिद्रयति चराचरं ज्गदथवा वेदेरप्तैयोंगिमिश्च 
यो लद्यते छ लच्मीः सर्प्रियेश्वरः” जो सब चराचर जगत्‌ फो देखता चिद्धित अर्थात्‌ दश्य बनाता 
जैसे शरीर के नेध, नासिका झोर यृक्त के पत्र, पुष्प. फल, मूल, पूध्ियी, जल के कृष्ण, रक्त, श्वेत, 
अलिका, पापाण, यंद्र, सर्यादि चिद्ध धनाता, तथा सद को देखता, सब शोभाओं की शोमा और जो 





*. प्रधमसमुष्तासः 

देद्ादि शाज था घामिक दिदान्‌ योषियों इ। शरप अ्धांद देखने पोग्प दे इसछे उस परमेश्वर क 
ष्मी” टै।( ए्‌ पती ) इस धातु से “सरस्‌” डसपे पनतुप्‌ ओर झप्‌ प्रत्यय दोने से “सरस 
*+  छिद्ध दोता है। "खरो पिविध हाम॑ विधते पस्पां चितो सा सरस्यती” मिसकतो पिदियई६ 
* शब्द अरे सम्दस्ध प्रयोग का छान पयापष्‌ दोषे इससे उस परमेश्वर का साम “सरस्यती' 
"खपोः शत्तपो विधम्ते पस्मिन्‌ू स सर्वशक्तिमानीश्यए?” ज्ञो अपने कार्य करने में किसी अन्य की स। 
करो इच्छा गईं करता, अपने ही सामध्ये से ऋपने सब फाम पूरे करता है इसलिये उस परमाद 
“सपेशकिमान” दे । ( णीज्‌ प्रापणे ) इस धातु से “म्पाप” शप्द सिद्ध दोता दे । “प्रमाणैरर 
| स्पायः” थद्द थम म्यापसत्रों पर यात्स्पापनमुमिए्त भाष्य फा दि। "पद्पातराष्टित्याथरणं श8े 
शो अस्यक्तादि प्रमायों की परीक्षा से सत्य ६ सिद्ध दो तथा पद्तपातरहित धर्मकप भाचरण दे पद 
७५दि।'फ्पायं कतुं शीलमस्य स भ्यायकारीश्यर:" शिसका स्थाय अर्थात्‌ पक्तपातरद्दित धर्म 
५ का स्पभाव दे इससे उस ईश्पर का माम 'ब्यापकारी” दै। ( दप दानगतिरक्षणहिंसादानेदु ) इस 
7 “हुए” शण सिद्द दोता दि  "दपते दृदाति झानाति गण्छुति रक्षति ट्विसष्ति षण सता दुपा, यह. 
“, धस्य स दयालुः परमेश्पर:" जो अम्य का दाता, सत्याउसस्य सये विधाझों फो आनमे 
- 7” की रक्षा करने भोर दुष्टों को ययापोग्प दर देनेधाला दे इससे परमात्मा का राम “दु 
८ ' “द्वपो्भोदो द्वाम्पामितं सा द्विता ल्‍्वीतं या सेप हरेव था ऐेतम्‌, न विधते द्वेते द्वितीपेश्सर 
7... + > झर्थाव्‌ “सह्यतोयविज्ञातीयस्थगतभेदगन्यं प्रध” दो का होना था दोनों से युक्त 
द्विवा था द्वीव अथवा देत इससे जो रदित दि, सज्ञातीय जैसे मनुष्य फा सजातीय दूसरा : 
है, विज्ञातीय सेसे भुष्य से भिन्न जातिवाला पृष्ठ, पापाणादि, स्थयत भर्थात्‌ शरीर में जैसे ' 
» फोन आदि अदपवों का भेद दे दैसे दूसरे स्यश्ातीय इंश्वए, विज्ञातीय ईश्वर या अपने आः 
- «,यस्तुषों से रष्दित एक परमेश्पर दे इससे परमारमा को नाम “'अद्वैत” है। "गयपन्ते 
था पैगेणपम्ति ते गुणा:, यो गुणेम्पो नि्गेठ: स निमेण दैश्यर/” जितने सत्य, रश, तम, राप, 
+ बआन्धादि शह के गुण, अधिधा, अल्पश्वता, राग, छ्लेष और अविदादि फ्लेश ज्ीय के गुण हैं 
" पृथक दै। इसमें “अशप्दमस्पर्श परुपमप्यपम” इत्यादि उपनिषदों का प्रमाण दे।जो शप्द,' 
*, गुणरदित दे इससे परमात्मा का घाम “निगुण” दे। “यो गुर: सद् यत्तेतेस सगुण/' जे 

«५ धान सर्पछुथ पवित्रता अनम्द बल्ादि गुणों से युद्ध दे इसलिये परमेश्वर का नाम “समग्रुण” 
* तृथिषी गन्धादि गुणों से “खगुण” ओर इच्द्ादि ध॒ु्णों से राष्ट्रित दोने से “निरेण"” दे पैसे 
- शीष के गुणों से पृथर्‌ दोने से परमेश्यर “निशेण” ओर स्येडादि पुझों से सद्दित दोः 
>_' दे। भर्धाद ऐसा कोई मी पदार्य र्दी दै जो सगुणता और निर्मुणता से पृथक दो। जैसे 
५ * से पृथर दोने से शष॒ पदार्थ निशैण भोर अपने भशु्णों से सशित होने ले सणुण पैसे ई 
/ शु्ों से एथक होने से जीव निशुण भोर इच्छादि अपने पुर्णोंसे सद्दित दोने से सभुण ॥ ऐस 
 ... मैं मी सममना चादिये। “इस्तयेस्तुं नियस्तुं शील॑ यन्‍््य सोउयमन्तर्पामी” जो सब प्राणि 
- शगद्‌ के भीतर व्यापक दोकेः सद का नियम करता दे इसलिये उस परमेश्यर का 
* ”" है। “यो धर्मे राजते स धमेशज?' ज्ञो घ्म ड्वी में प्रकाशमान झोर अरधर्म से रहित 
का प्रकाश करता दे इसलिये उस पस्मेश्वर का साम “धर्मराज” दे ( यम उपस्धे ) इस धाट 
" शब्द सिद्ध द्ोता दि। "या सर्वोन्‌ प्राथिनो निषच्छुति स यम: जो सब प्राणियों के क्र 
» की ध्यवस्था करता ओर सब अम्पायों से ग्रथक्‌ रहता दे इसकिये परमात्मा का भाम “ 

॥ ( झज् सेवापाम्‌ ) इस धातु से “संग” इससे मतुप्र इोने से “भगवान” लिरझ इोता 


१३ सावामप्रकाश.. * , 


“प्रगः सकलेश्वय सेवन था विधते यम्य स मगपान्‌” झों समार पैशाप से सुर या महते के बोय 
इसीलिये उस ईश्वर का माम “मगयान दे । ( मत पाने ) थातु से “मत शल बनता दि । "यो मरे 
प्रचुः" ज्ञो मनु अर्थात्‌ विश्ानशीस और मानने योग्य दे इसलिये उस ईशार का शाम "मत दे॥। 
पालनप्रणयो: ) इस धातु से “पुरप" शब्द सिद्ध दुआ दे। “यः स्वव्याज्या चााठवा अगय पूता ते एव 
यथा स पुरुषः” ज्ञो सब ज्ञगत्‌ में पूर्ण हो रदा दि इसलिये डस परमेशार का गाम 'पुरत/ है। हब 
धारणपोषणयो: ) “विश्व” पूर्वक श्स धातु से "विशवम्मर" शण सिंद होता दे | “यो पिर्प्य विमति ४० 
बुष्णाति था स विश्वम्मरों क्यदीश्वर:” ज्ञो झगय का धारण झोर पोषण फरता दे इसशिय उस ए 
उबर का सलाम “विश्वम्पर” दे । ( कल संख्याने) इस चातु से “काजल” शब्द पता दे | ता 
संख्याति सर्पान्‌ पदार्थान्‌ू स फाल:” ओ जगत्‌ के सब पदार्थ ओर ज्ञीयों की संख्या करतादे इमाः 
उस परमेश्वर का नाम “काल” है। ( शिप्ल्‌ यिशेषण ) इस धातु से “शेष" शबद सिद्ध होता दे। 
शिष्पते स शेपः” ज्ञो उत्पत्ति भोर भरक्तय से शेष अर्थात्‌ यच रहा दे, इसलिये उस परयात्मा शॉर्ट 
"शेष" है। ( आप्द व्याप्ती ) इस धातु से "झाप्त” शब्द सिद्ध दोता दे। "यः सर्वाव्‌ धर्मोत्मत के! 
था सर्वेर्ध्ात्मभिराप्यते छत्नादिरडित: स॒ श्राप्तः' ज्ञो सम्योपरेशक्र सकल विद्यायुक्त सब धर 
को प्राप्त दोता और धर्मात्माओं से प्राप्त होने योग्य छुल फपटादि से रद्धित दे इसलिये उस पता 
का नाम “आाप्त” है । ( डुछूम, फरणे ) “शम्‌” पूर्वक इस धातु से 'शद्वर” शाद सिद्ध दुआ दे! ५ 
शइलल्पाणं खुखं फरोति स शहर” जो कल्याण अर्थात्‌ सुख का फरनेद्दाग दि इससे उस ईशवर' 
न्ञाम “शहर” दै। “महत्‌” शब्द पूर्वक “देव” शब्द से “महादेव” शब्द सिद्ध इोता दे । “यो 7 
देव: स मद्ादेवः” जो मद्दान्‌ देवों का देव अर्थात्‌ विद्वानों का भी विद्वान, सर्यादि पदार्थों का प्रहार 
दे इसलिये उस परमात्मा का माम “मद्दादेव” दे। ( प्रीभ, तर्पणे कास्तो च ) इस धातु से “प्रिय ४ 
सिद्ध द्वोता है । “यः पृणाति भ्रीयते बा स॒ प्रिय:” जो सब धर्मात्माओं, मुमुचुश्नों और शिप्टों को परत 
करता ओर सब फो कामना के योग्य दे इसलिये उस इंश्वर का नाम “प्रिय” दे। ( मृ सत्तायाम्‌ 
“स्वयं” पूर्वक इस धातु खे “स्वयम्भू” शब्द सिद्ध दोता द्ै॥ “यः स्थयं भवतिख स्वयम्मूरीशा 
ज्ञो आप से आप दी दे, किसी से कभी उत्पन्न नहों दुआ दे इससे उस परमात्मा का नाम “सपयम 
दै। ( क शप्दे) इस धातु से “कवि” शब्द सिद्ध द्ोता है। “यः कौति शब्दयति सर्वा विद्या स कबि' 
श्यरः" ज्ो धेदद्वारा सप विद्याओं का उपदेष्ा ओर येत्ता दे इसलिये उस परमेश्यर का नाम “कवि" दै 
( शिष्ठु कप्पाणे ) इस धातु से “शिव” शब्द सिद्ध द्ोता दे । “बहुलमेतब्निदर्शनम्‌” इससे शिववु धातुमा 
ज्ञाता दि, ज्ञो फल्याणस्थरूप और कल्याण का करनेद्दारा दे इसलिये उस परमेश्यर का नाम शिव” है 
ये सो नाम परमेश्धर के लिखे हैँ | परन्तु इनसे भिन्न परमात्मा के अर्संख्य नाम हैं, क्योंकि जन 
परमेश्वर के अनन्त गुण कर्म स्वपाष हैं वैसे उसके अनन्त नाम मी हैं। उनमें से धत्येक गुण कर 
ओर स्वप्नाव का एक ६ नाम दि । इससे ये मेरे लिखे नाम खमुद्र के सासने विन्दुदत्‌ हू, क्योंकि वेदा। 
शात्यों मे परमात्मा के असंल्य गुण कर्म स्प॒भाव व्याध्यात किये हैँ। उनके पढ़ने पढ़ाने से योध । 
खसकठा दे | भर अन्य पदार्थों का ज्ञान मी उन्दीं को पूरा < दो सकता दे शो वैदादि शात्मों को पढ़ते हैं 
(धन्ष  शैसे अस्य प्रस्थकार लोग आदि, मध्य ओर अस्त में म्रश्नलावरणश करते दें वे 
आपने कुछ मी मन लिखान किया (उत्तर! पेसा हमको करना योग्य महों, क्योंकि ज्ञो आदि, मध्य कौ 
अस्त प्रें प्रज्मर् करेगा तो उसके भ्म्य में आदि मच्य तथा अस्त के यीच प्रेज्ो कुछ ख्ेख होगा वे 
अम्रहलत ही रहेगा; इसलिप “महलाचरणं शिप्टाच्यगात्‌ फलदर्शनाच्छुतितरचेति” यह सांख्यशाः 
[भ० ५। घू० १] रा वघत दि । इसका यद्द अभियाय दे कि हो स्पाय, पत्तपानरद्धित, सत्य. वंदोय 


प्रधमसमुन्नासः १३ 





श्यर की भाद्या दि उसी का यथाषत्‌ सर्येत्ष शोर सदा झावरण करना महलायरण कट्दाता दै। भ्न्य 
कै आरम्भ से ले के समाप्तिपर्यम्त सत्पायार का करना द्वी मझलाचरण दै, म कि कह्ों महल और कहाँ 
प्रमह्ल लिखरा । देखिये मद्दाशप मदर्दियों के लेख को-- 


यान्पनप्रधानि कमीणि तानि सेवितब्यानि नो इतराणि ! 


यह तिक्तिरीयोपनिषद्‌ [ प्रपाठक ७। अज्णु० ११ ] का बचन दे | दे सस्तानो! शी "अतवय" 
हनिन्दनीय अर्पाव्‌ धर्मयुछ कर्म हैं वे दी तुमको करने योग्प दें भधमेयुक्त महीं । इतलिये हो आधु- 
मिक प्रस्पों में “थीमयेशाय ममः" "सीतारामाभ्वां ममः" “राघाह्ृष्यास्यां गमम।। “थीपुरघरटारविरदाम्यां 
गम” "हनुमते मम: ।हुर्गारे गम: प्यदुकाय ममः” 'प्रैरधाय समः" “शिप्ाप गमः” “सरस्वस्ये मठः। 
"न्ारापणाय नमः" इत्पादि ऐोेस देखने में श्राते हैं इनको धुद्धिमान लोग पेद और शाप्रों से दियड्ध दोने से 
मिध्पा दी समभसे हैं, क्‍्योंदि वेद भोर प्रृषियों के प्रस्थों में कह्दों ऐेसा महकाघरग देखने में महों झा व, 
भौर आारष प्रस्थों में “भोश्म” हथा “अ्रष" शद तो देखने में भ्राता है। देखो-- 


“अप शब्दानुशासनम्‌!” अपेत्यप शम्दोइधिफाराथे! अयुश्पते || घइ व्याकरण मदामाण्य 0 
#ञपातों धर्मनिज्ञामा/” अयेत्पानन्तर्ये पेदाप्ययनानन्तरम्‌ ॥ घह पर्षपमीमांसा ॥ 
#झपातो प्म व्यास्यास्पाम/” भयेति घरमेकषनानन्तर धर्मल्ष विशेषेष ध्यास्या- 
स्पाम। || यट पैशेषिक दर्शन ॥ 
अपञ्नय योगानुशासनम्‌” अपेत्ययमधिकाराधे! ॥ यद योपशास/र त 
४झप प्रिव्रिधदुःखात्पस्तनिदृत्तिस्त्यन्तपुरुपाथ/// । संवरारिकरिषयमोंग्रानस्तरं विरिप- 
'खात्पस्तनियृत्पयः प्रयत्न। फंस्तेष्पः ॥ थदद सांच्यणशाल्र ॥ 
+अपातो प्र्ननिज्वाना? | घमुएयसाधमसम्पत्त्यनस्तरं प्रद्ष निश्ञापपम्‌ ॥ पद बेदास्तपद्ट टै ॥ 
» 'प्रोमिस्पेतदय रहुद्टीयत्ुपासीत”” ॥ दद्द छारदोस्प शपमिपद्‌ का वयन दि ॥| 


/ «/झोमिस्येतद्चरमिद ७» से हस्पोपम्पास्यानम्‌” ॥ वह माएंट्रस्प इपमिदप के: इपतरम्म 
हि बंधन द| ॥ 

५ देते एी चग्प ऋषि सुमियों के प्रस्षों मे "भोध्य” और “इथ'" शप्द लिए हैं, कैसे इ (ऋषेग, 
हे, भी, पे विषसाः परियमित३ ) थे शध्द धारों देशों के आदि मैं लिये हैं! “घोगऐशाप नम," रश्ट/ 
एए अादों न्दों। भौर जो पैदिक लोग देद के चघारस्म में “इरि: ऋोध्म” लिखते झर चढ़ने हैं ७६ 
वैशलिए झोर सांजिक छोगों रपे मिध्या कसपता से सीखे टैं। वेशादि शाररों में “शरि" शत्द ढर्तर हे 
प्रहें नहों। इसलिये “झोध्म" दा "४प" शप्द दो भग्प दे: झषदि में खिल्सा चादिए। यह दिफक्लिम्गाश 
हंदर के; विषय में लिया इसके झागे शिष्ता के दिपव में खिबय जाएगा है 


इति भ्रीमदयातसश्सरस्थतीस्वामिह ते सब्या्ेशदाश शुभा्यादित्धित 


. ईैददशशामविदये म्रधमः समुल्ासः सम्पूटें: ॥ १॥ 
6३७28 ५ जरू सब पु 


[  किकलयशालण 
अध ढ्विवीयसमुज्ञासारस्म: 


(0 0%-+क-+»कका+क-2२-+»क-+७-२०-२०७-८०७-२»क- सनम 


अयथ शिक्षां प्रवत्ष्या मः 





मात्मान्‌ पिठृमानाचार्यवान्‌ पुरुषों येद ॥ 


यह शतपथ ब्राह्मण फा वचन दे | यस्तुतः जब तीन उत्तम शिद्षाक भर्थात्‌ एक माता, ईह7 
पिता भर तीघ्लरा आयाये होवे तमी मनुष्प शानवान्‌ द्योता दे। वह कुल धन्य! यह सत्तावरशी 
भाग्यवान्‌ | जिसके मादा और पिता धार्मिक विद्वान हों। मिठना माता से सम्तानों को उपदेश न्रः 
उपकार पहुँचता दे उतना किसी से नहीं । जैसे माता सन्‍्तानों पर श्रेम् [ भोर ] उनका दवित का 
चाद्दती दे उतना अन्य कोई नहीं करता, इसलिये ( मादमान्‌ ) झर्थाव्‌ “प्रशस्ता धार्मिकी माता विद 
यरय स मातमान”' । धन्य यद माता दै कि ज्ञो गर्भाधान से क्लेकर जबतक पूरी विद्या म दो वर्क 
खुशीलता का उपदेश करे ॥ 


माता और पिता फो अ्रति डचित दै कि गर्भाधान के पूर्व, मध्य और पश्चात्‌ मादक द्रव 

मद, दुर्गन्‍्ध, झुक्ष, चुद्धिनाशक पदार्थों को छोड़ के जो शांति, आरोग्य, बल, बुद्धि, पराक्रम और 
लता से सभ्यता को भाप्त फरे वैसे घुत, दुग्ध, मिष्ट, अक्षपान आदि शर्ट पदार्थों का सेपम करे ४ 
जिससे रजसू धीये भी दोषों से रद्दित होकर अत्युच्म गुणयुक्त दो । जैसा ऋतुगमन का विधि अर्थारद 
रज़ोद््शन फे पांचवें दिवस से लेकर सोलइयें दियस तक ऋतुदान देने का समय दि उन दिलीं में पे 
प्रथम के चार दिन त्याज्य हैं, रद्दे १२ दिन उनमें एकादशी ओर ऋयोदशी को छोड़ के बाकी १० शत्रियों 
में गर्भाधान फरना उत्तम दे । ओर रज़ोदशेन के दिन से ले के १६ थीं रात्रि के पश्चात्‌ न समागम 
करना। पुनः ज्तक ऋतुदान का समय पूर्वोक्त न आतबे तबतक और गर्मस्थिति के पश्चात्‌ एक 
सके संयुक्त न दों। जब दोनों के शरीर में आरोग्प, परस्पर प्रसन्नता, किसी प्रकार का शोक न॑ द्दी। 
जैसा घरक और सुधुत में भोजन दादन का विधान ओर मनुस्म्॒ति में ख्री पुयष की प्रसन्नता की रीति 
दिखी दे उसी प्रकार करें और घर्ते। गर्माधान के पश्चात्‌ झरी को बहुत सावधानी से भोजने छादन 
करना चाहिये । पश्चात्‌ एक यर्ष पर्यन्त ख्री पुरुष का संग न करे। बुद्धि, पल, रूप, आरोग्य, पराक्रम, 
शांति भादि गुणकारफ द्ष्पों दी का सेषत झी करती रददे कि ज्बतफ सनन्‍्तान फा जन्म न दो! 


शब कन्म हो तव अच्छे छुगन्धियुक्त अल से बालक फो स्नान, नाडीदेदन करके छुगर्वि- 
युद्ध घुतादि के द्ोम # और स्त्री फे भी स्नान भोजन का ययायोग्य प्रयन्ध करे कि जिससे घालक झौर 


# दात्वक के अत्म-समय में “जाठकर्मसंस्काय/ होता है टसमें इदनाद़ि वेदोक्त कर्में होते हैं वे “संक्तारः 
विधि” में सदिस्तर किच्च दिये हैं ॥..._ 





द्विवीयसमुन्नासः १५ 





प्मी का शरीर क्रमशः आरोग्य ओर पुष्ठ दोता ज्ञाय। ऐसा पदार्थ उसकी माता था धायी खाये कि 
जिससे दूध में भी उत्तम गुण प्राप्त हों । प्रखुता का दूध छः दित तक बालक को पिलावे पश्चात्‌ धायी 
पिछाया फरे परन्तु धायी को उत्तम पदार्थों का खान पान माता पिता करावें। जो कोई दरिद्र दवों, धायी 
को म रख सर्पे तो ये गाय वा बकरी के दूध में उत्तम झोपधि ज्ञो कि युद्धि, पराक्रम, आरोस्प करने- 
एारी हों उनको शुद्ध जल में प्रिज्ञो, ओटा छान के दूध फे समान शल मिला के यालक को पिलावें। 
जम्म के पश्चात्‌ बालक ओर उसकी माता की दूसरे स्थान में झद्वां का वायु शुद्ध द्वो यहां रफ्सें, सुगर्ध 
तथा दर्शनीय पदार्थ भी रक्‍खें झोर डस देश में ध्रमण कराना उचित है कि ज्ड्टां का वायु शद्ध दो । और 


जहां धापी, गाय, बकरी झादि का दूध न मिल सक्ते यहां जेस्ता उचित सम वैसा करें ! क्‍योंकि प्रखुता * 


हरी के शरीर के अंश से बालक का शरीर होता दे इसी से रप्ती प्रसलसमय निर्देश होजाती दे, इसलिये 
प्रखता र््री दूध न पिलावे। दूध रोकने के लिये स्तन के द्विद्ध पर उस झोपधि का छेप करे जिससे 
थे खवित म शो। ऐसे करने से दूसरे मश्टीने में पुनरपि युवती द्वो जाती दि । तवतक पुरुष प्रह्मचस्ये से 
दीयें का निप्रद्द रफ्खे, इस प्रकार जो रुपी था पुरुष करेंगे उनके उत्तम सम्तान, दीर्घायु, बल पराकम 
की वृद्धि द्योती शी रदेगी कि जिससे सशइ सन्तात उत्तम, बल, पराश्मयुक्त, दीर्घायुं, धार्मिक हों। 
की पोनिसंकोचन, शोधन झौोर पुरुष धीग्पे का स्पम्भन फरे। पुनः सम्तान छितने होंगे थे भी सब 
उत्तम होंगे। 
बालकों को माता सदा उछम शिक्षा करे जिससे सनन्‍्तान सभ्य हों और किसी झ्रह्न से 
चेष्टा सम करने पाषें। झत्न बोलने रूगे तप उसकी माता बालक की ज़िह्ला जिस प्रकार कोमल 
जैकर स्पष्ट उच्चारण कर सके वैसा उपाय करे कि को जिस वर्ण का स्थान, प्रयक्ष अर्थात्‌ जैसे “प” 
“सका ओए्ठ स्थान और स्पए प्रयक्ष दोनों झोप्टों को मिलाकर योलना, हस्घ, दीर्थ, प्लुत भत्तरों को 
॥क २ बोल सकना। मधुर, गम्मीर, सुन्दर, स्पए, भत्तर, मात्रा, पद, वाक्य, संदिता, अयप्तान मिन्न रे भधषय 
ऐके । जग्र यद्द कुछ २ षोखने भोर सप्रकने खगे तव सुन्दर घाणी ओर बड़े, छोटे, माग्य, पिता, मांवा, 
पज्ना, विद्वान, झादि से भाषण, उनसे बस्तमान भर उनरे। पास पैठने आदि की भी शिक्षा करें जिससे 
कद्दों उनका 'अपोग्य व्यवद्वार मे हो के सर्वेत्र धतिष्ठा हुआ करे। जैसे सन्तान जितेन्द्रिय, पिधामिय झोर 
पस्संग में रसि करें दैसा प्रयक्ष करते रहें। ब्यर्थ कीड़ा, रोदन, इास्प, लड़ाई, इप, शोक, किसी पदार्थ 
: ल्लोलुपता, ईर्ष्या, देधादि म करें। उपस्पेन्द्रिय के स्पर्श ध्योट मदन से थी की क्षीएता, भपुसकता 
सती और इस्त में दुर्गग्ध भी ोता दे इससे उसका रुपर्श न करें। सदा सत्यमापण शोर्य, चैये, प्रस- 
अयदन आदि गुणों की प्राप्ति किस प्रकार हो, करायें। जद पांच २ ये के खड़का लड़की हों रा 
बनागरी अक्षरों का अम्पास करायें। भम्परेशीय माषाधों के झछ्यरों का भी। उसके पश्चात्‌ मिनसे 
पच्छी शिक्षा, दिया, धर्म, परमेश्वर, माता, पिवा, झावाये, विद्वान, अतिथि, श्र, प्रजा, कुद्धम्प, बस्धु, 
रगिनी, भुस्द आदि से कैसे २ यर्चना इन दातों के मस्त, कछोक, सूज, गध, पथ भी अर्थंसह्ित कंदस्थ 
हरावें । शिनसे सम्तान किसी घूते के बदकाने में मझयें, भोर जो २ विधाधसंपिस्य भ्राग्तिशल 
गिरानेयाले बषयद्वार हैं उनका भी उपदेश करदें, जिससे मूत भेत झादि मिथ्या दातों का दिश्वास न हो। 


, गुरोः प्रेवस्प शिभष्यस्तु पिद॒मे समाचरव्‌ । 
प्रेतहरै। सम तत्र दशरात्रेण शुध्पति ॥ मनु० [ झ० ५। ६५ ] 
आर्थ--कव शुरु का प्रायाम्त दो ठव सतक-शरीर मिसका माम ग्रेत दे उसका दाह छरनेद्वारा 


घ्य प्रेतद्वार अर्थात्‌ सुतक को डठानेवाष्ठों के साथ दशर्दे दि झुद शोता ट्ै।झोर जब उस शर्ट रे 


हि 


हु 


+ 











१६ हा है त्याथै प्रकाश: 








का दाइ होखुका तद उसका नाम भूत होता दे अर्थात्‌ यद' अमुकनामों पुरुष थाने लि 
पर्चभाव में आ के न रहें वे भूतस्थ दोने से उनका नाम भूत दे । पेसा ब्रह्मा से लेके आज “ 

, विद्वानों का सिद्धान्त है, परन्तु जिसको शह्ला, कु्ंग, कुर्सस्फार दोता-दे डस्तकी+ सं और ह 
थूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी झादि अनेक भ्रमजञाल दुःखदायक दोोतेएहें । देखोएः जब कोई आए + 
है तब उसका जीव पाप, पुएय के वश दोकर परमेश्वर की-व्ययस्था से छुस्र 'ढुःख केः फल ही ञ 
अर्थ झन्मान्तर धारण फरता दै। फण इस अपिनाशी परसेश्वर की व्यवस्था का कोई मी और 
सकता 5! शश्ञानी लोग वैधकशास्त्र या पदार्थ विद्या के पढ़ने, खुनने और पिचार से र्दित है 
सत्तिपात ज्ययूदि शारीरिक. आओीराम्उन्मादकादि - मानस रोगों फा माम भूत प्रेतादि चाहे हैं. वा 
ओऔवउधसेयन और पशथ्यादि डचित ध्यवद्दार व फरके उन घूते, पाखणडी, “मद्वामूखे, "धनाचारी, हक 
मंगी; चमाए, शुद्ध, स्लेच्थादि पर भी विश्वासी दोकर अनेक प्रकार के दोंग, छल, कपठ-और ०] 
मोशन, डोरा, धागा आदि मिथ्या मन्‍्ध पन्‍्च धंधिते पंधवाते फिरते दैं, अपने धन का नाश। ५ 
आदि फी दुर्दशा और रोगों को यढ़ा कर दुःश्ष देते फिरते हैँ। अब आंख के अंधे और गांठ 
उन डुर्युदधि पापी स्थाथियों के पास जाकर पूछते हैं कि “मद्दारात | इस लड़ृका। ३ 
धर झोर पुरुष फो न जाने क्या दो गया दे !” तप ये बोलते हैं. कि “इससे शरीर में बढ़ा मे 
मैरय, शीतका आदि देवी आगई दे ज्ततक तुम इसका उपाय न करोगे तबतक ये न छूठेंगे रे ध 
भी छेमेंगे | जो तुम मत्वीदा या इतनी भेट दो तो इम मन्त्र कप पुरश्यण्ण से फाड़ फे इसको मिक 
तब दें पे भोर उनके सम्बन्धी बोलते हैं कि "मद्दाराज ! चाहे धमारा सर्वस्थ ज्ञाओ परन्तु 
अस्डा कर दीडिये ।” ठद तो उनझी बन पढ़ती दे । ये घूर्च कते हैं “अच्छा लाझो इतनी सकी 
इतनी दृष्टिएा, देववा छो भेट और प्रददात कराझो |" क्रॉफ सदर, दोल, थाश्षी लेगे उसके घने 
दृफाने गाते झोए इसमें से एक पालयइ्टी उम्मत द्वोके न|य कूद के कद्दता दे “मैं इसका प्राण 
शूगा/ तप ये अंधे डस भन्ी यपार आदि नीच के प्गों में पह़ के कद्दते हैं "आप चाहईं सो- 
इसकी दयाएये 7” तब यह घू्त बोलता दे “मैं दनुमान हैं, लाओ पक्की मिठाई, तेल, सिन्दूर। सपा है 
कावोट भरोर शाल शंगोट।” "मैं देवी या भेरव है. लाभो पांच बोतल मच, यीस मुर्गी, पंच 
मित्रों झोर दरार” शर दे कटने हैं कि “शो धाददों सो लो” तव तो यद्द पागल थहुत गायते/ हैं 
कागता है परस्तु को कोई बुद्धिमान इतकी भेट पांच जूता दंदा था चपेटा खात मारे तो इसफे हा 
माय, देरी ओर शैरव सर प्रसप्र दोकर साग जाते दें, क्योंकि धद दतका फेयल धनादि इरण करे 
अप्ोडनर्य दोग है | थ ॥ 

आर आर दिसी प्रइप्रत्त, धडरूप, स्योति्यिदाभास के पास जादे वे कद्दते हें "टे मात ! 

दस हो का है [7 रब के कहते हैं कि “इस पर घूर्पादि छूर धइ चढ़े दें। जो तुम एसी झाडिए 
चूक, हगय बराप्र! जी इसडी सु्य दवोहाय, नई तो बहुत पीड़ित दोचट मरजाव तो भी हाइथपे गंदी 

( रच र ) ड दिये क्योटिदिय ! बसी बद पथितवी हक़ दे, वैसे दी गूर्यादि लोक हैं| थे तात धीर मरा 
शरि से शिशु शुध मी गई कर सहझते | क्या ये चेतन हैं जो क्रोचित द्वोदे दुः्य और शास्व ६ 

+: सुथ ई सह? (धक्न ) करा शो यश सात में गाहा प्रहा छुदी दु्ी दो रदे थे यद प्रहों का फात हि 
हू! [ इलप ) रुपए थे छा व बुतपों ले कज हैं । ( धक्ष ) तो कया ज्योति शाख्र भूड़ा दे! (इत्तएां 
कहर, जे डरे आप, ईीक रेखागटिव विधा दे वह सत्र सी, को फल की शीसा है. व हर धूटी दि 

35 क्ष ) कद ह याद कम्यपत्र है सो विच्सस है? ( उच्चर ) हा, वह शष्मयत्र गहीं6किसतु झसदा ही 
*श्ोचअपइअ रक्षरः भरटिरे, करोंकि हद सम्ताव का क्रय होता दि तब शव को धातख होता प्रैदएहठी 


के 


द्विवीदसमुच्नासः |४ 


झागरइ शदतवः होता है कि झदतक कप्मपच धमफे प्रहों का फल म झुमें, अप पुरोद्ित शस्मपत्र बनाने को 
बहती ऐै हर टपदे भावा, दिता पुरोदित ले कहते दें *मद्ाधक्ष। झाप बहुत धच्दा फस्मेपत्र पेमारये" 
औघमाटप हो शो धटुनपी धाल पीली एपाझों से चित्र विचित्र भोर मिर्धत दो तो साधारण सेर्ति 
से क्मपद एनाक छुताने को छाता दें । तेप उसके मा बाप उयोतिपीजी ' के सामने पेठ के ' के द्त हैं 
“दुरका शम्मपत्र अष्छा तो है!” क्पोतिरी वद्ददा दे "को है सो सुना देगा है । इसके शस्ममरद्द बहुत 
अस्त कोर मि' प्रदमी ऋदूत अच्छे एँ शिनक्ी पेल धमादध और 'प्रेति्तारान जिस समा में भा 
टैवेगा भी सएक ऊर्पेर इसका सैसे पड़ेगा! शरीर से आगेग्य भौर रासम्पमानी दोगे। ।" इस्पोदि दोते 
सुनझ पिता आदि पोशते ए “याद २ उदोतिषीसी ऋाप इटुत अच्छे हो ॥” ज्योतिषीजी समभकेत' हैं 
इस दातों से कार्य सिद्ध हों द्वोता | तर ज्योतिषी बोखता दे कि “यह प्रद्द तो पहुत अच्छे हैं, 
पष्णु पे प्रष शुर हैं भर्धात्‌ फछाने २ प्रद्द के योग से ८ यर्ष में इसशा सुस्युपोग दे ।” इसको सुमके 
माता पियादि पुत्र के अन्‍्म थे भानमद को दोड़ फे, शोकसागर में हृषकर ज्योतिपीजी से कटते हैं कि 
"प्रद्दाराजदी | अप हमर क्‍या करें [” तब ज्पोतिषीक्षी बहते दें “उपाय करो ।” गृहस्थ पूछे "फ्या 
बाय करें!" ज्योतिपीजी प्रस्ताव करने लगते दें कि “ऐसा २ दाम करो । प्रद्ट फे मन्त्र का 
शर कराशी झोर' रित्य धाह्रणों को भोशन कराशोंगे तो अमुमान दे कि भयमभ्रद्दों के 
विष्न दर ज्ञापेंग ।" अनुमान श्र इसछिये दे कि थो मर जायगा तो कहेंगे दम फया करें, परमेश्पर के 
ऊपर फोई महोंँ है, हमने तो यहुतसा पतन किया ओर तुमने कराया उसके कर्म ऐसे दी थे। भर जो 
दच शाप तो कद्दते हैं कि देखो, द्मारे मन्त्र, देषता और पाप्णों करी कैसी शक्ति दे! तुम्दारे राइफे 
को बया दिपा। या यट् घात दोगी चादिये कि जो इनके जप पाठ से कुदध न दो तो दूने तिपुने यपये 
डम घूर्तो से ले लेने धादियें। और बच जाप तो भी हे लेने खादियें क्‍योंकि औसे ज्योतिषियों मे कद्दा कि 
“इसके कर्म और पर मेश्यर के नियम तोड़ने का सामथ्ये किसी का नहीं” यैसे शदस्थ भी कहें कि “यह 
अपने कर्म और परमेश्पए के नियम से यचा दे तुम्दारे करने से नहीं” घोर तीसरे पुर आदि भी पुएंप- 
दान करा के झाप छे छेते दें तो उनको मी यद्दी उत्तर देना, जो ज्योतिषियों को दिया था ॥-' ५# । 
| अप रह गई शीतला और मग्च् तन्त्र यन्त्र आदि । थ भी ऐसे द्वी दोंग मचाते हैं । कोई 
कहता दि कि "औो-दम मन्त्र पढ़ के दोरा या पन्‍त्र यना देयें तो इमारे देवता भौर पीर उस मस्ध पन्त्र 
कप्प्रताप से उसको कोई, विध्न भी द्ोने देते ।” इनको धह्दी उत्तर देता थादिये कि फया तुम सृत्यु, 
परभेश्वर के नियम झोर कर्म फल ले से भी यचा सकोगे ! तुम्दारे इस प्रकार करने से भी कितने दी 
सड़के मर ज्ञाने हैँ और सुम्दांं घर में भी मर जाते थे ओर क्‍या तुम मर्श से बच सकोगे ! तय ये 
कुछ भी नहीं फट सफते और थे धूर्त जान लेते हैं किए यहां इमारी दास नहीं' गहेगी, इससे इमप्लव 
मिथ्या ध्यवद्वारों को छोड़कर धार्मिक, सब देश के उपकारकर्त्ता, निष्कप्टदा से सबको विद्या पढ़ाने 
याले, उप्तम विद्वान लोगों का श्रस्युपकार करना, जैसा ये जगत्‌ का उपकार करते हैं इस काम को 
कभी न छोड़ना चाहिये। शोर जितनी लीला रस्तायन, मारण, मोदन, उद्याटन, यशीफरण ब्यादि' फरणा 
कट्दते: हैं उनको -भी मद्ापामरं समभमा चादियेपत्र इत्यादि मिथ्या बातों का उपदेश बाल्यायस्था दी-में 
सम्जानों क हृदयों में डाल दें कि जिससे स्यसम्तान किसी के भ्रमज्ञाल में पहके 'दुःख मं पा७षें और 
बीदे वर रक्ता में आनन्द भोर माश करने में दुःखधासि भी जना देनी घादिये । - जैसे देखो जिसफे शरीर 
में सुरक्षित थीरय रहता है सब उसको आरोग्य, थुद्धि, बल पराक्रम यडू के यट्त सुख की श्राप्ति होती 
६&ै। इसदे रफ्तण में पदी रीति दि कि दिपयों की कथा, विषयी लोगों का संग्र; विषयों का ध्यान, ही का 
दर्शक, पुकान्त सेवन, संभाषण और हपर्श आदि कर्म छे मह्मचारी ःछोग- एथक्‌ रद्द क़-. उत्तम 


द 





१६ सत्याथैप्रकाशः 


का दाइ दोजुका तद उप्तफा माम्र यरृत -डोता दे अर्थात्‌ बद' अमुकनामों पुरुष थाने जितने गे 
पर्चनान में आ के न रहें वे मृतस्थ दोने से उनका नाम भूत दे । ऐसा अह्या से लेके धज् 
विद्वानों का सिद्धान्त है, परन्तु जिसको शड्डा, कुसंग, कुर्सस्काद द्वोता-दे उसको . 

' भूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी श्रादि अनेक ध्मजाल दुःखदायक द्वोतेनक | देखोफ अब कोई चागी 
है तब उसका जीव पाप, पुएय के वश द्ोकर परमेश्वर की व्यवस्था से छुख 'दुःख के। फल भोग है 
अथे ज्मान्तर घारण करता दै। फ्या इस अविनाशी परमेश्वर की व्यवस्था का कोई भी . 
सकता ६ ? ध्यश्ानी लोग वैद्यकशासतर धापपदार्थ विद्या के पढ़ने, छुनने भोर विचार से रह्दित 
सपन्निपात ज्ययूदि शारीरिक. और/-उन्प्रादकादि - मानस रोगों का नाम भूत प्रेवादि धरते.हैं। 
ओऔवधलेयन भर पथ्यादि उचित व्ययद्वार न करके उन घूर्त, पाखणडी, -मद्दामूस्थे अनाखारी, 
मंगी, चमार, घट, स्लेस्धादि पर मी विश्वासी होकर अनेक प्रकार के ढोंग़, छल, कपट-ओर * * 
मोशन, डोरा, धागा शादि मिथ्या मत्ध यन्त्र बांधते बंधवाते फिरते <दैं; एपतने धव फा गाश। . ' 








आदि फी दुर्देशा और रोगों को यढ़ा कर डुःख देते फिरते हैं| जय आंख के अंधे झोट गांठ ९ * 
डने दुर्युद्धि पापी स्वार्थियों फे पास ज्ञाकर पूछते हैं कि 'भद्दारात् ! इस लड़का «५ 
हरी झोर पुरुष फो न जाने क्या दो गया दे १” तय थे बोलते हैं कि “इसके शरीर में पढ़ा भू 
पैरप, शीतला झादि देधी आगई दे अबतक तुम इसका उपाय न करोय्रे तबतक ये न छूटेंग झोर ] 
भी छेजेंग । जो तुम मल्तीदा था इतनी भेट दो तो इम मन्ध्र जप पुसथ्यरण से फाड़ के इनकी निका 
हद वे भंधे झोर डनदे सम्दन्धी योलतें दें कि “मद्दारात ! घाद्दे इमारा सर्वस्थ जआ्श्रो परन्तु कि 
अच्छा घर दीडिये।” सद तो उनकी बन पड़ती दे । ये धूर्स कद्दते हैं “अच्छा लाझो एसमी हे 
इसमी दिया, देवता को भेट भौर प्रददान कराशो ।” मास) सदक्ष, दोश, थाली लेके उसकें मे 
बहाते धाते भोर उसमें से एक पाथगडी उन्मल दोके माय फूद के कद्दता दे 'फैं इसका भाग ई . 
सुगा" तह ये भंपे डस सही चपार आदि मीय के परों में पढ़ के कदते दैं “आप चादेँ सो मौर्गे 
इसको दयाइये ।” टब ददइ घूत्त दोल्षता दे “मैं हनुमान हैं, लाशो पकती मिठाई, तेल, सिल्दूर। सता हरे 
बा रोट भोर खाकर लंगोट।! “मैं देवी या भैरव हैं, लाशो पांच बोतत मध, बीस सुर्गी, पंध 
फिदए और बाह्य हुए दे फशते हैं कि “जो घादो सो लो” तप तो यद्द पागल बहुत माचते' करे 
कगता # * परम्तु हो कोई धृद्धिमान सनकी भेट पांच जूता दंडा था चपेंटा लात मारे तो ड्सझे | 
मा, देशी भर पैरद झट प्रसध दोऋर माग जाते हैं, क्योंकि धइ उनका केयल घनादि- रण करते 
अश्ष्शनर्द दो दि ५ हर बह 
कोर जइ हिसी धददपस्त, प्रडुरूप, उपोतिर्दिदामास के पास जाड़े मे कइते हैं “हे सदा 
दस्तझो कया है १" रुप वे छदने हैं द्वि “इस पर यूर्पादि र्टूर प्रद चढ़े दें। को सुप्त इगष्टी शशि 
दुष्ट, दब बााझा जो इस छी रुख इोडाप, सही तो बहुत पीड़ित दी चट मरजाय सो मी झाश्चप हीं 
६ शसर ) शटिये फरोलिदिव ! डेसी यद पूयिदरी जड़ दे, देसे दी सुर्यादि लोक हैँ। ये तार भोर 7४६. 
शापई से निज इंच भी हूदों कर सकते । क्‍या ये, येवन हैं. जो क्रोधित द्ोके गुःख और शाया हे 
हा हे हनई १ (प्रश्ष ) कया शो यह संसार में शादा प्रडा शुसी दुची हो न्ट्ट हैं यष् ्रड्दों का पल हर 
६! इतर ) करी ये सब बाप पुत्रों ऐे फच हें। ( श््ल ) तो क्या म्पोतिशाय्र मुझ दे! (अर 
ही, को इत्ते कट, बीज शेथा्शलित दिया दे बद सब सी, जो फ्र की शौसा है. कद कोइ भूठी है 
६ इक । करा हो पर कप्रपत्र है सो गिव्यल है? (उत्तर ) हां, बद कऋमापक महीं विस! ऊरारा नम 
कटोइरकों रखता ख्रट्रे, क्योंकि आप सम्शन का क्रम इया टि सद व को झानम्द होत) है २४१६७ १ 





दिवीपसम॒ज्नोसः छल 
करे। सम्पक्न दोकर गुणों का भ्दण भौर दोषों का स्थाग रफ्से | सज्ननों का संग ओर दुष्टों का त्याग, 
अपने माता; पिता झौर आवाप्ये की तन मन ओर धनादि उत्तम उत्तम पद्मार्थों से प्रीतिपूर्दक सेवा करे ॥ 
यान्यस्मा#७ सुचसितिने तानि लयोपास्यानि नो इवराणि ॥ 
यह तैत्ति० [ प्रपा० ७। अनु० ११] 
इसका यद्द अभिप्राय दे कि माता पिता आचार्य्य अपने सन्‍्तान और शिष्यों को सदा सत्य 
उपदेश करें और यद्द भी कद कि जो २ इमारे धर्मयुक्त कम हैं उनका प्रदण करो और जो २ दुष्ट 
कर्म हवों उनका स्पाग कर दिया करो | ओ २ सत्य ज्ञा्ें उन ३ का प्रकाश भर भ्रचार करें। किसी 
पाण्ण्टी, दुष्टाचारी मनुष्य पर विश्यास न करें और जि २ उत्तम कर्म के किये माता, विता भौर 
आचार झाएा देवें उस २ का यपेण्ट पालन करें। जैसे माता, पिता ने धर्म, विधा, अच्छे आचरण के 
स्छीक "“निधएदु! "नियक्त” “अष्टाष्पायी” अथवा अन्य सूत्र या वेद्मस्त्र कए्ठस्थ कराये हों उन २ का 
पुन! भ्र्थ विद्यार्थियों को विदित करावें। जैसे प्रथम समुल्लास में परमैश्यर का ध्याष्यान किया दे उसी 
प्रकार मानके उसकी ठपासना करें। जिप्त प्रकार झारोग्व, विधा और बल्ल भ्राप्त हो उसी प्रकार भोजन 
छादन और व्यवद्ार करें करायें झर्थात्‌ जितनी छुधा ट्वो उससे कुद्ध स्यूब भोजन करें। मध मांसादि 
के सेपन से अलग रहें | अष्ठात यम्मीर जल में प्रवेश न करें, क्‍योंकि शलजतन्‍्तु या किसी अम्य पदार्थ 
से दुःख भोर शो तैरना म शने तो ड्ूब दी ज्ञा सकता दै। “नाविशाते जलाशये” यद्द मनु का दधन दे, 
अविशज्ञात जलाशय में प्रविष्ट धोके स्तानादि म करें ॥ 
इृष्टिपूर्त न्यसेत्पाद) बस्नपूर्त जल पियेत्‌ । सत्यपूर्ता यदेद्वां, मन+पूर्त समाचरेत्‌ ॥ 
मनु० [१० ६। ४६ ] 
अर्थे--नीचे दृष्टि कर ऊंचे मीये स्थान फो देख के ले, पर्प से छान के शत पीपे, घत्प से 
पपित्र करवे; पचन बोले, मन से पियाए के भाचरण करे ॥ ट हु 
माता शद्ुः पिता बैरी पेन घालो न पाठितः । मे शोमते सभामध्ये इंसमध्ये बफ़ो यथा ॥ 
बाणवयनीति भध्या" २। छोड ११॥। 
थे माता और पिता भपने सम्तानों के पूर्ण गेरी हैं जिग्होंने उनको दिया की भाति न कराई, 
वे दिद्वानों की सभा में पैसे तिरस््वत झोर कुशोमित दवोते हैं जैसे इंसखों के दीय में बगुला। द्टी माता, 
पिता का कर्तव्य कर्म पस्मधर्म भौर कीर्ति का काम दे जो अपने सम्ताों फो तन, मन, घन से 
विद्या, धर्म, सभ्यता और उत्तम शिक्षायुक्त करना । यद्द बालशिक्ता में थोहासा लिया इतने दी से बुद्धि" 
माद्‌ खोग ध्दुत समझ णेंगे ॥ 


इति भीमइयागन्द्सरस्थतीस्वामिहते सत्यार्थ भकाशे छुमाषाविमूदिते 
बाजशिक्षाविपये द्वितीय: समुझालः सम्पूर्ण: ॥ २॥ 





भश न 





रद सत्यार्थ प्रकाशः न» 


हर मी कि 
भर पूर्ण विधा को प्राप्त होथें। झिसके शरीर में दीर्य नहों दोता घढ मुसक मद्ाकुशक्षणी और 
प्रमेइ रोग होता दे यद डुल, निस्तेजन, नियु द्धि, उत्साइ, साइस, थैयें, बल, पराक्रमादि गुणों से पति 
इोकर नष्ट हो जाता दे । ज्ञो तुम लोग सुशिक्षा भोर विद्या के प्रदण, बीर्य की रक्ता करने में एव हस 
खुझोगे तो पुनः इस जन्म में तुमझो यद अमूल्य समय प्राप्त नहीं दो सकेगा। क्षय तक इम लोग या 
कर्मो रे करनेयाले जीते हैँ तो तक तुमको विद्याप्रदण भौर शरीर फा यल यढ़ाना चादिये।” छल 
प्रकार की अन्य २ शिक्षा भी माता और पिता करें। इसीलिये “मादमान पिदमान” शसद का ष्राा 
इक बचने में किया दे भर्थात्‌ जन्म से ४ यें यर्ष तक्त यालकों को माता, ६ ठे यर्ष सेप८ दें यई 6६ 
पिठा खिक्षा करे ओर €£ दें ब्षे के आरम्म में द्वित अपने सन्‍्तानों का उपनयन करके आवायंइह 
अप्यांद शर्ट पूर्ण विद्वान भौर पूर्ण विदुपी करी शिक्षा और विधादान फरनेयाली हों दइं शहके भ 
छट्ककियों को भेज दें भोर घ्रद्धादि थणे उपनयन किये बिना विधाम्यास के लिये गुकुण में भेत दें। रत 
दे सम्दान दिद्वान, सम्य भौर सुशिद्तित दोते हैं, को पढ़ाने में सन्‍्तानों का लाइन कभी मई डे 
दिग्जु राहुसा दी करते रहते हैं इसमें स्याकरण मद्दाभाष्य का प्रमाण दैः-- 


माइतेः एरविमिष्लेसि गुरषो न विपोधितेः । शालनाआपैणों दोपास्तुडनाभपिणों गुधा ॥ 
[भ्र१5।१। ८) 


आ्च हरे शाह दिता भर आयाशं शस्तान भर शिष्पों का ताइम करते हैँ मे जागो झ्मपोे 
शफकान छोर हि हो छापने हाय सो अगूत पिला रहे हैं! भौर जो रास्तानों था शिष्पों का शाइत के 
है हे बारे स्पा कप टिच्दों को दिए पिखा के गए घष्ठ छूर देते हैं। क्योंकि शाइन हो हारतात धो 
दिख्य होबदुच एप शाप गो टुनापुस्द दोते हैं । और रास्वान ओर शिष्य श्ोग भी तादून से प्रता/ 
कह #जृक से ऋरस्त्फ अराउहा आर । परसतु माता, पिता तथा अ्ष्यापक शोग एंप्या, द्वेप से ताएँँ 
अब, बिन्दु हप॒र से धपरएज ओर मीवर से हववाइटि रकसें। सेसी अभ्रत्व शिक्षा की बैधी थोरी, 
कण, झाम्हरए४ अधाई अच्दुई शुघ्य, मिध्यानापण, हिसा, ऋरता, ईप्यॉ, पेष, भोइ आदि दोषों के चोडी 
कप कान्दाशअ के इस करते बे शिया करें । क्‍योंकि हित युदप में मिसके सामने एक धार थोरी, 
कही फिप्या&४करारी बर्य दिया इसी प्रतिष्ा इसरे सामने खरयुपर्य्यसत सहोँ होती । गेगौं 
है! इिशा फिच्रा ऋषधे व ले डी इॉती है देसी अन्‍य किसी की भदाँ । इशारे जिराहे साध मैसी 
कोलका ऋरकी इक के ७० हेड ह पूरी डरती खादिय अर्थात जेरी हिली मै किसी ही कहा कि “मैं 
कुडाइ” था हर शुक हे छत्क सयद में मिलता वा मिलया पता अमुक्त बल्लु अशुक्त ममत मै हमच्चो 
है (८० इझू दा दें | ह। दृटा खरे मदर ला इसी पर्तीति ूाई सीख फरता। इस अिये होता सत्पपाष थे 
कहे कष्दापा किक पाच्ट आर द+ दाता बता लि झा ऋतिमाय मं करणा थादित। दयथ, कप था 
इचलर के ऋषछ हा हइद पुचित बाला है 4 दर आओ कर या कहनी ाहिव ! छुक भौट कप! 
आफचा कइर है का बटर छोर शाइर कोर हक हुयर को मोड में डाख झट शूसर की हाति पर 
अएज के श्र अस्याय सब फिनप्र रूप ब्व । हिटप्रटरा इशषट! इडते हैं कि दिली के डिये हुए इपकार 
की के ऋाकमा छडायिईद छोड क्ुडाइज व हक टॉस और आर वचन ही बडे झीर कदूत 
अंक देह के कर वशितब्द दाह आदिं देसले न्यूज वा अंश भे इक बद को मज्य है, दे 
कर धार आ वे इंका मार का डेदाब अडन शफकणी काड़ड इतड़े हमने इच्टयाशम वर के गे! 
ऋन्डथ हे ६$ रद छत इै८ क्ेम्ती ऋग्नी ऋव्यला हु कोड दूसरा छ/ई थे उदजे) विसेद् दिए मी मे 





70 207 है 

-3 अथ तृतीयसमुद्धासारम्भः है 

च्उ 

६९५». >> 5 >> ५ ०5 2 >> 25/७5/७90७ ४ 
अशाध्ष्ययनाष्यापनविर्धि व्याख्यास्यामः 


अब तीसरे समुज्ञास में पढ़ने पढ़ाने फा प्रकार लिखते हैं। सन्‍्तानों फो उत्तम थिद्या, शिष्वा 
गुण फर्म भौर स्वभायरूप आमूषणों का धापण कराना माता, पिता, आचाय्ये ओर सम्बंधियों की 
सुच्य कर्म दै। खोने, चांदी, माणिक, मोती, मूंगा आदि रज्लादि से युक्त आभूषणों फे धारण कराते पे 
मदृष्य फा चारमा सुसूषित कभी नहों हो सकता। क्योंकि आमभूषणों फे धारण फरने से फेयल देहां 
मिमान, विषपासक्ति और चोर आदि का भय तथा झृत्यु का भी सम्भव दे। संसार में देखने में भाता 
६ हि झामूपपों के योग से वाल कादिफों का झ॒र्यु दुष्टों के दाथ से दोता दे । 


वियारित्ताममनसो श्वशीलशिप्ा), सत्यत्रता रहितमानमसापह्ारा। । 
एंसारदुःखदलनेन सुभूषिता ये, धन्या नशा व्रिश्ितरमपरोपफाराः ॥ 


डिन पुषरों का मन विद्या के दिषास में तरपर रदइता, सुन्दर शीलस्यभावयुक्त, सत्यमाषणारि 
िष्मराहसपुरू और जो अधिमाव अपवित्रठा से रदित, अस्य की मलीनता के माशक, सत्योपरेश! 
विधादान से संघारी श्नों छे दुःयों के दूर करने से सुभूषित, वेदविद्वित कर्मों से पराये उपकार फरने 
मै बएते दें बे लर ओर नारी धम्प दें । इसलिय आठ थर्ष के दो तसी लड़कों को लड़कों की और हई* 
हिद्यों को ल़कियों की पाय्याजा में भेज देवे।ज्लो अध्यापक पुदप या झ्री दुष्टाचारी दो उतसे 
रिक्ता न द्चातें। डिस्तु ओ पू ई विधायुत्द धामिर दो दे दी पढ़ाने और शिक्षा देने योग्य थें। दिए 
पते छर हे कर दुकों ला यरएएवीत और कम्पाधों का भी यथायोग्य संस्कार करके यथोक्त आचार्य 
कुछ इ्यो वू अपना > पाठशाजाएरं भेध दें। यिया पढ़ने का स्थान एकास्त देश में दोना चाहिये और 
है पद झोर श्र छियों छी पटशाला दो कोस पक दूसट से दूर दोनी थादियें। हो यहां अध्यापिका 
कौर ऋषषप्पत्पक पुरुद् रा भय, अनुखर हों वे रूमस्याहों की पाठशात्रा में सत दरी ओर पुदपों की 
इलराप्ता में दुदर रहें । ख्िरों छए पादशाना में पथ बर का लड़का और पुदतों की पादशात्र। में पच 
शा थट! लपुरूए मे व हुते राे। ऋाव्‌ जातक वे प्रह्मचारी था प्रह्मचारिशी रहें तवतक सी वा पुद्प 
आल देई ब इरशंब दछझफ्तलिदक मात, विपयय था, परकपरकीदा, दिष्य का दधाग और दशा इस आड़ 
काइाद के मेज दो से ऋहषय रहें शोर अध्यापद् खोग रत को इस बातों रो इयायें शितते उत्तम विधा, 
कटदा, शो के, कशदाइ शरीर ४४ झण्या से बकयुम्द दो ड आनस्द को सित्य बढ़ा रा्चे। पादश/क्ाधों 
हे दइ शोफर अप घाज कस दूर आम दा हपर बदि | सब को सु्य वर, घान पाग, झ्रासम दिये 
कई आटे बह राह हु स्टन हुए बाज हुमारीं हो खाद दरपिट्र के सस्वान हों, हाइ को तपस्वी होना चादिय। 
कद के शाला रिट: अपने सत्नहओ से दा सम्वाज आपने माता दिवाधों सेम मिश्र शहें कोट है डिती 
थग दपपतशदुवर बच गुर से का हाई विसठेगरसारी मिला से गदित इीकर  रेदश विपा 


दुतीयसमुश्ासः २१ 





डराने की घिस्ता रफ़खें। जप ध्मण करने को जायें तब इनदे साथ अध्यापक रहें डिससे किसी 
कार दी कृचेण्ा मन कर सकें झौर म ऋयलस्य प्रमाद करें। 
कस्यानां सम्परदान थे कुमारायों घ रत्थम्‌ ॥| मंनु० [ अ० ७। छोफ १५२] 
इसका आपिप्राए यद दे कि इसमें राशनियम झोर हातिमियम द्वोना छाट्टिय कि पांचयें अथवा 
प्राठवें थर्ष से आगे कोई अपने लड़कों और लडकियों को घर में न रख सके । पाठशाला में अवर्प 
जज दैयें, जो भे भेजे पद दरडनीय हो। प्रथम लड़कों का यश्योपवीत घर में ह्वी ब्ीर दूसरा पराठशाप्रा 
भावारयफकुल में दो | पिता माता पा अध्यापक झपने लड़का शइकिपों को अर्थसद्ित यापत्री मन्त्र 
मे डपरेश करदें। यह मग्ध यद्द ऐ-- 
ओरेम्‌ भूपुयः स्‍त्री । तर्म॑वितुएरिएय मर्गी देवस्प धीमहि । घियों यो मं; प्रधोदयाव्‌ ॥ 
[ यद्य० भे० ३६ । मं ३ ] 
इस मरम्त में जो भ्रधम ( झो१म्‌ ) दे उसका भर्थ प्रधगसमुस्लास में बर दिया है, थी थे शाम 
गां। भद तीन मद्दाष्पाइतियों के अर्प संक्षेप से लिखते हैं। /भूरिति ये प्राण:” “यः प्राद्य्त धरा5- 
ईं जञातू स भूः रफ्यम्भूरीश्यरः" शो सब श्गत्‌ के झीयन का झाधार, प्राण से भी प्रिय और श्वपस्सू 
उस प्राण का यापक के "भू:” परमेशर दा शाम है। “भुवरियपान:" ( थः स्व दु'लप्रपाहदत 
|5पाग:” को सद दुःफों पे रदित, जिसे सदन से शीद सर दुःफों से छूट शाते हैं घ्तलिये शर परशेकवर 
- माम "शुप” है। “पवरिति ध्याग:" "यो विविध शगदू च्यागपति ब्याशोति से प्पाम:” को शाहादिय 
गत्‌ मैं भ्यापक दो सर का धारण करता दि इसलिये हुस परमेशर बा गाम "रखा" है। दे हीढो 
बण तैत्तिशीय चारएपक [ प्रपा० ७ | झनु० २] के हैं। ( सवितुः ) "वः एुलोस्पुश्पाइपति बाप कृणचू 
सविता तस्‍्य” शो सप जगधू दा उशपादक ओर रा ऐश्वर्य था दाताएँ (दैदाप ) “दो दौप्योर 
प्यते था स देव:" शो सर्द छुप्ों का देनेदारा शोर शिसही पारि बरी दामता सत्र बरत हैं इस 
'मारमा का जो ( वरेएयम्‌ ) “वर्भुमईम्‌” हबीकार करने योग्य ह्मति थे (भर्ग | 'हृदादइप्रण” 
उष्यरूप और पवित्र चएनेश्ाया घेतत प्रह्स्यूप ५ (66 ) उसी परमात्मा क. बचढप ७॥। हआ छंशा 
यीमदि ) “घरेमदि ' धारण करें। विस प्रयोशन ने लिय कि (०) "“हगशीशवर'/ हो हादिता देव 
मारमा ( भ: ) “झरमाकम" इमारी ( घिव; ) "बुद्दी:" धुक्धिपों को ( प्रयोगपाव्‌। फिरदेशू" मेरहर 
€ हर्चात्‌ चुर दामों ऐे तुड्टारर अष्ते कामों में प्रतुत्त चर । “दे पररेशर ! ऐ श्थदानस्दाशण्भम्ब 
7 ऐ विर्मशदुयुणगुफस्वभाव | ऐ अाश मिरेजन गिर्विकार । ऐ सर्दास्तयामिंद ! है शापाधिर क्ृपरपने ! 
केलशग दुश्पादक | दे ऋताई | विश्शभर ! सर्पम्पापित ! है बर टाएतदारिय ! सदिदरेंध्स्थ लव बारें 
पुष! स्यपेरे एवं भगोविरित शद्ये धोमद इधीमदे भरेमाद ध्यापस था। बकरी अयाशमांहएक४ । हैं 
पर | थः सदिता देइ! एर्मेश्वरों भ्वानस्माझ धियः प्ररोदयातू, श्र एपास्म'र दृष्द शफ्सलीए 
ऐैदों भधतु गातोठस्प॑ भदततुह्य भषधोदण्िि ला व छित्‌ कदासिस्मस्यामों" है प्ुष्रो ! हे हरर 
पी हे रफ़दे, एचिय दशाकत्पाहम्तस्दरुए, विः्य शुरू, मिस्य छुटट, शिष्य शुक्तस्थशादद्ााका, ह एसाचार, 
7 ४ स्याप बत कर टेट्रारा, शह्ममरणादे क्‍्लेशरदित, ऋादार ध्टित, सब दे. पट ६ बए आसमेशाका 
का धर्सा पिता, बापाइक, झप्टादि रे विश न्‍ापोरए बरशेटारा, शव छत ऐम्यएऐंटर, साय का! 
जता, शाशरइकूप कर को प्रारगि की घास्भा चने सफप हैं उसपपगाप्मो बा हाट सेब्तस्टयाद 
पी को हम धारण करें। इस प्रयोश्त दे; हियेकि यह एरसेलार इगाई अदा कप शुक्ियों आग 
पर्षाशिवरूण इसको दृष्टाचार चाधहंटुक्त मागेशे इटा दे शेप्ाचार सत्य शर्पा हे झकतड इसके 
भर 





जलन नल 


बन 


री 


३ सत्यार्थ प्रकाशः 


पक जप कपिल 
धोडकर दूसरे किसी धस्तु का घ्यान हम खोग नहीं करें। फ्योंकि न कोई उसके तुल्य भौर * की 
£। दद्दी इमारा पिदा राश म्यापाधीश और सब सुसों का देनेद्वारा दे त 

इस प्रकार गायत्रीमन्च का उपरेश करके सम्ध्योपासन की ज्ञों स्तात, आचमता शा 
अगदि किया दें सिखल्लापे। प्रथम स्तान इसलिये दे कि जिससे शरीर के बाह्य अधय्ों की गिर 
आसोग्प आदे दोते हैं। इसमे प्रमभाय-- 


भद्वियोत्रायि शुप्पन्ति, मनः सत्पेन शुष्पवि। विद्यातपोस्यां भूतात्मा। युद्धिशनेत शी 


[ महु” आ० ५। स्तोफ १०६ ) 
पद मतुस्मृति का ज्पोक दे । शल्त से शरीर के यादर के अययय, सत्याचरणं से मतः 
हर शाप भधाय्‌ सर प्रकार के कए सी सइ फे थम दी के भनुप्तान करने से क्षीयारमा, होते का 
,इपरी से सेल धरमेशर पर्यस्‍्त पशाथों के विवेक से युद्धि दृढ़ मिश्वय पयिक्न दोते दें। इसपर ह 
मोहश के दूर ऋषरर करता। दूसरा धायायाम, इसवे प्रमाण-- 


गोगाप्नुष्टानाइशादिष पे ज्ञानदीपिराधिपेकण्यातेः ॥ [ योग ० साधनपादे छु० सटे 


दाग बोटणासय का घूत्र है । जा मंग॒ष्य प्राणायाम करता दे तदइ प्रतिद्राण इत्तरोत्(' 
है ूूटादि था शगा आर बन्त का प्रकाश दोता जाता द| । जपतक मुक्तित दो तइतक्षर 
कप ऋ। इप्क इराइर बहुपः आता दि। 


रृएटओे स्थापबाना गो पुन हि यपा मा: । तयेद्धियाणं दरचन्ते दोवाः आणस्प गिगगा। 
[ मगु० भ० १) ७१) 
कु अश्रसुरद ऋ! कक है। भेते अप्ति 2. तपाने रो हु्वर्णशादि भातुओं का मत गई 
हुह इए* हैं व बाषागाम अरदे मत आदि इरिदर्पोंके दोष क्ीण दोकर तिर्मेश हो हो 
कभ्कुलप्म चर पल४-- 
बष्दर शदिवए चारपा बा ब्रादस्य ॥ वोग० [ सम्रापियदे ] प्रू० ३४ ॥। 


केले अकाल केप के दमन इोफर अत जडह बार निकल शावा है वैरे सात को बता ते 
कुक के धाइर हा कह कि रक देक। शब बाहर विफाशता खादे तब सूलेर्द्रिय को ऊपर थींच 
कक अाखक कहर १हचा है हसी चर प्रा वाइर अधिक हर हाकता है। हप धररराइड £ 
करत *े हट #चु छा के के िर दर केस ही करता आय, जितता शामस्ये और इच्छा हो) झ। 
है | इस इकाइत कप सरशा का | इस प्रकार ऋरने ते आरमा और मत हो परतिचता शोट 
इता ॥ओ हैं (अचछ “हफप्र किफकी झा्पत बाइर डी वि दॉफता। वुतरा खारतागर ११ जप 
इक सिकरणण आफ अंक: काया छलका _ख औ ते सीकहरा “ब्लड अधोतु शअ ही बार हुइ 
छा अप डी इाद शतक गाक पे । ओऑदा काहम्वालराओरी' ऋर्थात जप प्राव भीतर है 
कैयई कब कटे रुक कम्टक अिदाड हे जिक कर इग के गिएदि काइट हि भीयर के और अष कादर मी ॥ 
आज ऋाद खा डा टड़ कर आड़र की छा पाच छा कड़ा देकर शाकता बररव वेसे कद बुशर के 
जहर कर का सीडी की आदि कद बटर द्र/क कपर कह वे हाश से धत बोर रद भी बवॉयौम होते 
कक १६४० दे अद कत हु डि आज आचामद ड़ हा आडी है दि?७8ही बुत इटिन चोट सूप विजव थ 
कीध्र ऋदाफ हाता है. दफा बजखयटटीर $ $5 कूद को कप हक किए बच राणा, डि) 
डाला औधा इ र्रा! # छह 4६ $ दे बजए क> इा्टखात यह कैता। का प्री इर्धा भरत्तार बता ४ 





हवीयसमुन्नासः श्र 


रे । भोजन, छादम, पेटने, उठने, घोलने, चालने, बड़े, छोटे से यथायोग्य ध्यवद्टार करने का उपदेश 
करें । सन्ध्योपासन जिसको ग्रह्ययश् भी कद्दते हैं । “झआचमन” उतने जल को हथेली में लेके उसके 
एल झौर मध्यदेश में भोष्ठ लगा के करे कि वष्ठ जल कराठ के मीचे हृदय तक पहुंचे, न उससे अधिक 
$ स्यून) इससे कएठस्थ फफ और पित्त की नियुक्ति थोड़ीसी होती है । पश्चात्‌ “मार्जन” अर्थात्‌ मध्यमा 
गैर भनाम्रिका अंपुली के अप्रमाग से नेत्रादि अ्ों पर जल दिड़फे। उससे आलस्प दूर होता है। 
गे आलस्य भोर अलभाप्त न हो तो म करे। पुनः समनन्‍्त्रक प्राणायाम, मनसापरिक्रमण, उपम्धान, 
गीढे परमेश्वर की स्तुठि, धार्थ ना और उपासना की रीति सिखलाबे। पश्चात्‌ “अधघमर्षण” अर्थात्‌ पाप 
7रने की इच्छा भी कभी म करे। यह सन्ध्योपासन एुकान्‍्त देश में एकाप्रचित्त से करे ॥ 
झंप समीऐे नियतों नेत्पिक विधिमास्यितः । साविश्रीमष्यधीयीत गत्वारएय समाहितः | 
[ मनु" झ० २। १०४ ] पद्द मजुरुखति का बचन दि । 
शड्ल में अर्थात्‌ एकान्त देश में जा, सावधान दो के, जन के समीप स्थित दो के नित्यकर्म 
गे करता हुआ साथिधी अर्थात्‌ यायत्री मन्त्र का उच्चारण, अर्थड्ान और उसके अनुसार अपने चाल 
ग्लग को फरे, परन्तु यद्द कप मन से करना उत्तम है | दूसरा देययश्ञ भो अप्रिद्योष भोर पिद्वानों का 
रेग सेयादिक से धोता दि। सरध्या और अमग्निद्दोत्र साय॑ प्रातः दो ही फाक में करे। दो शो रात दिन 
सी सन्धिवेत्ा दें भन्‍्प हों । न्यून से स्यून एक घण्टा ध्यान अवश्य फरे। जैसे समाधिस्थ कर योगी छोग 
रमार्मा का ध्यान फरते हैं दैसे दी सन्ध्योपासन भी किया करे । तथा धू्पोंदिय के पश्चात्‌ और पूर्पा- 
॥ के पूर्थ अप्निदोत्र करने का समय दे, उसके लिये एक किसी थातु था मट्टी के. ऊपर शरथा १६ 
/८: (रे प अंगुछ थोकोन उतनी द्वी यद्धिरी और मीचे ३ था घार अ्ंगुल परिमाण पे देदी इस 
प्रकार यनाघे झर्थात्‌ ऊपर मितनी घोड़ी दो उसकी घतुर्थीश मीचे घोड़ी रहे । 
उसमें चन्दन पत्राश था आधादि फे थेष्ठ फाष्ठों के डुकड़े डसी बेदी के परिमाण 
से पड़े छोटे करके उसे रक्‍फ्पे, उसके मध्य में झग्नि रख के पुनः डस पर सप्रिधा 


अर्थात्‌ पूर्षोक्त एन्धन रण दे एक प्रोषणीपाष् (809००-: ऐसा और तीसरा 
शीतापात्र ि----+७० इस प्रकार का शोर एक ञ्च्ो इस प्रकार की झाज्यम्थादी 


र्धाव्‌ घूथ रखने का पात्र और चमसा (छल ऐसा सोने,चांदी था फाष्ठ का बनथा क मीता 
पर प्रोष्षणी में जल तथा धृतपात्र में छुत रख के पूत को तपा लेबे। प्रणीता शव रखने झोर प्रोष्ठणी 
सलिये दे कि उससे दवाथ धोने को जल लेमा छुगम दै। पश्चात्‌ डस घी को अच्छे प्रकार देख लेगे 
रुप इन मन्त्रों से डोम करे-- 

को भूरतये प्राणाय स्थाह्य )। झ॒पर्याययेअ्पानाय स्वाहा ॥) स्परादित्याय स्यानाय स्वाहा ॥ 

पवा स्व॒राग्निवाय्थादिस्येम्पः प्राथापानब्यानेम्पः स्वाहा ॥| 

इत्यादि अभिददोत के प्रत्येक मस्त्र को पढ़कर एक २ शाद्ति देवे शोर शो ऋाधिक धाटटुतिदेदा ऐो तो: 

दिश्वनि देव सबितईरितानि पर सुद । यद्रढं दसु आासंप ॥ [ यद्ध० अ० २०। ३) 

एस मस्त्र झोर पूर्षो्त गायत्री मर्द से आदुति देवे। “मों भू” घोर “धारा” झादि ये सर गाम 
प्मेश्यर के हैं। इतरे अर्प कद चुके हैं। “सदा” शाप्द का झर्य यइ दे कि जेसा छाब झाप्मा में दो _ 








जा ह डा पे रह 
$॒ लय 
न न कै 


न का 


| सत्यार्थ पकाशः 





छोड़कर दूसरे किसी घस्तु का ध्यान हम लोग नदीं करें | क्योंकि न कोई उसके तुल््य और - 
है। बद्दी हमारा पिता राजा न्यायाधीश और सथ झुसतों का देनेहारा दि ॥ 

इस प्रकार गायत्रीमन्त्र का उपदेश करके सन्ध्योपासन की ज्ञो स्नान, आचमन, 
आदि क्रिया हैं सिखलायें | प्रथम स्नान इसलिये दे कि जिससे शरीर के वाह्य श्रधयों की ..७ 
आरोग्य आदि दोते हैं । इसमें प्रमाण-- न 


अद्विगोत्राणि शुष्यान्ति, मनः सत्पेन शुध्यवि | विद्यातपोन्यां भूवात्मा, ,छिए  "> * 


[ ममु० आ० ४ । होक १० | 
यदद मनुस्द॒ति का स्फोफ दै | जल से शरीर के बादर के अचयध, सत्याचरण से मन, | 
और तप अर्थात्‌ सब प्रकार के कष्ट भी सद्द के धर्म दी के अनुष्ठान करने से ज्ञीबात्मा, शान #* 
_एंपियी खे लेके परमेश्वर पयेम्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि दृढ़ निश्धय पविश्न दोते हैं। इससे 
भोजन के पूर्व अवश्य फरना । दूसरा प्रायायाम, इसमें प्रमाए-- 


योगाड्ानुष्टानादशादिचमे ज्ञानदीपिराषिवेकर्यातेः ) [ योग० साधनपादे छ० र८) 


पद योगशासत्र का घञ्र दे । जब मस॒प्य प्राणायाम करता दे तब प्रतिक्तण उठरोतर ४ 
में अश्ुद्धि का नाश और शान फा प्रकाश द्ोता ज्ञाता दि । अवतक मुक्ति न दो तथतक # 
आरमा का शान धरायर यदूता ज्ञाता दि । 


दद्मन्वे ध्मायमामार्नां घातूनां हि यया मलाः । तयेन्द्रियारणा दह्मस्ते दोषाः प्राणस्प निम्न 
[ मलु० भ० ६ | ७१), 
यह मज॒स्मृति का स्छोक दे | जैसे अप्रि में तपाने से सुबर्यादि धातुओं का मज्ष म् दे 
शुद्ध दोते दें वैसे प्राणायाम फरके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मण दो शत | 
प्रायापम फी विधि-- 
प्रच्छईनपिधारणाम्पां वा श्राथस्प |॥ योग० [ समाधिपादे ] सू० १४ ।॥। 


जैसे भत्यस्त वेग से वमन दोकर अध्न झल याइर निकल जाता है यैसे प्राण फो बल से 
पोंक के दाइर दी पयाशक्ति रोक देवे। जब बाइर निकालना थाद्दे तप मूशेन्द्रिय को ऊपर खींच 
तदतक धाल पाइर रहता दि | इसी प्रकार भाण वाइर झअधिफ टद्दर सकता दि। जब घषराइट 
धीरे २ मीठर वायु को हे के फिर मी यैसे द्वी करता ज्ञाय, जितना सामथ्ये ओर इच्चा दो। भोर 
मे ( झोशेम ) इसका अप करता हाय । इस प्रफार करने से आत्मा ओर मत को पवित्रता और | 
रता इोती दे | एऋ “दाष्मविषय” अर्थात्‌ बाइर दी अधिक शोकता। दूसरा “झाम्यस्तर” ऋ' 
मय मिलना ग्रोथ रोका झाय डतता शोक के! तीसरा “स्तम्मदृक्ति” अर्थात्‌ एफ दी बार कं 
हुई ब्राण को ययाश्ति गोद देगा। चोया “बाधयम्परतरादगी? अर्थात्‌ जप प्रादा भीतर से व 
निदकने कगे शद डसके विद मे निककने देने के लिए वाइर से मीदर से शोर जब याइर से मे 
ढ्रारे झते ऊए भीतर थे बाइर की झोर धाय को धका देकर रोकता जाप। देसे एक हूसरे के दि 
दिका छरें हो दोनों छत गति दक कर ग्राद अपने दश में होने से मत ओर इरिद्रियें मी स्थाधीन होते | 
अक्त पुरुपाएँ बइुऋर इसि सध्य खूदमरूप डो हाती दे दि यो बहुत कटिन ओर छदप विए्यकी 
शॉओआ अप आरती टै।वससे मनुच्चशरीर में बीते दृष्धि दो पात होकर स्थिर बल, पराक्रम, जिले 
बडा, सब शास्पों को थोड़े दी राक मे सपम कर इपत्यित कर क्षेया। स्री मी इसी प्रकार योगा 


चतीयसमुन्नासः हि २५ 
ओर ज्ञो कुलीन शभलघ्णयुक्त शद्र धो तो उसको मन्त्रसंह्िता धोड़ के सइ शास्त्र पढ़ाबे, धर पढ़े 
पररतु उसका दएनयन म करे, यड्ट मत भनेक आचाएँं का दे । पश्यात्‌ पांचवें वा आठवें वर्ष से लड़के 
ज्ड़कों फी पाठशाला में ओर लड़की लड़कियों द्री पाठशाला में जाएं कौर निम्नलिखित नियमपूर्यक 
अध्ययन का आरम्भ करें ॥ 

परप्रिंशदान्दिक चस्ये गुरौ मैयेदिक प्रदम । तदर्षिक पारिफ या ग्रहणशान्विक्मेय था | 
मनु० [० ३१] 
अर्थ--आठवपें बर्ष से आगे छत्तीस४ें धर्ष पर्यन्त अर्थात्‌ एक २ थेद के साहोपाह्न पढ़ने में 
बारद्द २ वर्ष मिल के छु्तीस भर झाठ मित्र फे खयालीस अथवा भठारद् दर्षों का प्रह्मचर्य और झाठ 
पूर्ष फे मिल्र के धष्पीस था मो दर तथा शश्तक पिया पूरी प्रदण न कर होवे तप्रवक प्रह्मचय्ये रफ्फे ॥ 
पुरुषो बाद यहस्तस्प यानि पतुर्विशवि बषोश तठ्माव/सपर्न, धतुर्विश्शत्यचरा गायत्री 
त् के २ का ५१ 
गायप्र प्रातशसवन, तदरप पस4ाध्न्यायत्ता; श्राणया पाप बसव एच ईद सर्व धासयन्ति ॥ १ | 
सब्चेंदेतस्मिन्‌ बयमि क्रिष्चिदुपतपेर्स शयाद्माणा यस्तय इडे में प्रातश्सयर्न माध्यन्दिमर- 
सपनमसुमंतनुतेति माह प्राणानां पयलां मध्ये यहो पिलोप्सीयेत्युद्धेीध सतत एस्यगदी इ भवावि ॥ २॥ 
अय यानि चतुयत्यारि०ेशदपाणि तन्माध्यन्दिनश्सपन यतुश्॒त्ारिश्शददरा बिधुप्‌ शैृम 
माध्येदिमश्सवन तद॒स्प रुद्रा अन्‍्यायचाः श्राया याद रुद्रा एवे दीदछ सबे७ रोदयन्ति ॥ ६ ॥ 
में घेदेतरिमन्ययासे क्रिम्घिदृषपेत्स श्रयात्माया रुद्रा इंद में माध्यंदिनश्मप् तृतीयस- 
पनमनुसस्तनुतेति माह प्राणाना€ रुद्राणां मध्ये यज्ो विलोप्सीयेत्युद्भे० तव एत्पयदों ह भरति ॥४ ॥ 
अप यान्यशचलारि०शद्प्रीणि इतृतीयसबनमण्टाचत्वारिश्शदश्षरा जगठी जागदं तृतीय" 
सबने तदस्पादिस्पान्याथत्ताः प्राया पावादित्या एव दीद७ सर्पमाददते ॥ ५ ॥ 
हँ चेदेतस्मिन्‌ बयाति फ्रिल्चिदुपतपेत्स हूपात्‌ प्राणा भादित्पा इद॑ में तृतीयसयनमायुर- 
मुसंतनुतेति माई भ्रायानामादित्यानां मध्ये यश्ो बिलोप्सीयेत्युद्वेीथ दद एर्एगदो एव भदति ॥ ६॥| 
यद छाम्दोग्पोपनिषद्‌ [ म्रपाटर ३। लण्ड १६ ) का थयन है। गष्माचये तीन धदार का होता 
दि कमिए, मध्यम भोर इस्तम, उनमें से कनिए--शो पुयप अद्रसमय देइ चोट घुरि हर्थात देश में शाप 
फरनेधाला ज्ीपास्मा यप भर्थात्‌ अतीय धमगुयों रो संगत और सरब्तव्प टै इसकों ऋषश्यक टै दि 
२४ बर्ष पर्येन्‍्त झितेर्रिय श्र्णात्‌ ध्रष्चचारी रइकर वेदादि दिधा और सुशिक्ता वा भशण करे झोर 
विधाद करपे भी लग्पटता म करे तो डशके शरीर में भाण बलदान्‌ द्ोषर सद झमर्तों दे: वास रा- 
भेषाले होते है । इस धथम दप में जो उसको विधाम्पास में रंतप करें और दइ बाप येसा ही ढप7- 
देश किया करें झौर प्रधाघारी ऐसा निधय रकरे दिए शो मैं स्‍्रधम अऋषस्था में टीकः ६ शरह्मचार्सी र हल 
9 भरा शरीर और झारमा झारोप्प दलदान्‌ होश सभएटों को दसानेदाएं मेरे प्राण शोगे। मनु दो! 
शुम इस प्रकार से छुफों का विस्तार करो, जो मैं धट्टाद दें बता छोए न करूं २४ दर्ए के रश्चाव एएशम 


करूंगा तो प्रसिद दे कि रोपरदटित स्टंया भोर झायुभी मेरी 3० था ८० दर्द लक्य रहे म धर 
प्रह्ाचदे यद्द दै-- जो मदुप्प ४४ दर्ष पर्दस्त प्श्नघारी रद्टदूर देदाम्पास करता दे बसदे शाण, इन्टियां, 





सत्यार्यप्रकाशः 
ट। जम से बोले, विपरीत नहीं | जेले परमेश्यर ने सब प्राणियों के छुख के अर्थ इस सइ 
रे पदाये रचे दें दैसे मनुष्यों फो भी परोपकार फरगा चादिये ॥ 

( प्रश्न ) होम से क्‍या उपकार होता है! ( उत्तर ) सप छोग जानते हैं कवि दुर्गस्धयुद * 
और झुख से रोग, शोग से प्राशियों को दुःख झोर सुगन्धित यायु तथा जज्ञ से आरोग्य और रेम 
रु डोने से सुस्त घाव होता दे। (प्रक्ष) चन्दनादि घिसके किसी फे खगावे या घृतारि शान ' 
शैदे हो दर उपकार दो | अग्नि में डाज्न कर ध्यर्थ मण फरना युद्धिमानों फा काम महों। (डा ) 
झुम पदाई दिया छातते तो कमी ऐसी शत म कहते, क्‍योंकि किसी द्रष्प का भमाष नहीं होता।। 
कु्श इोय होटा दे यहां से दूर देश में स्थित पुरुष फे लासिका से सुगन्‍्ध का प्रदत होता । 
इुसेरध का मी । इसने ही से सम्सो कि अप्नि में डाला हुआ पदार्थ धहम हो के फैल के बाय 
सहाथ हुए हेप में झाबर दुर्गन्ध की निशुत्ति करता दे। (प्रद्ध ) झुप ऐसा ही दैतों फेशर, कह 
शुनिदद पूरे भोर ऋषर कपरि के घर में रखे रो रुगन्धित वायु दोफर खुछकारक होगा।( ४ 
शाप घुशाओ घर दुइ संगम गद्ों पै कि गृदस्थ पायु को पादर गिकाश फर शुद्ध पायु का प्रेश 
शक, क्यों डि इसे सेदक श सिर गई दे, ओर अप्ति शी का सामर्ष्य है कि उसपचायु शोर व 
हाफ अरच्चों के (ुस दिप् और इक्षछा करने: बाहर गिफाल कर पवित्र बायु का ग्रयेश रा 
६ (४४ | । मत्व चह ले हपप क रते का क्‍या प्रयोगत दै ! ( उत्तर ) मत्पों # वह प्याध्यात है । 
फल इडा जरके हे लग्न दिए हो जाते भर मरचों की आवृत्ति होने रो कपउस्थ रहें, पे! पर 
के बह इक झोर रह भरी इते। ( प्रक्त ) कया वसा होम करने के दिगा पाप दोता दे (४ 
है! हे कट ह कितआयुध के हरीर से जिकता दूरिध उायप्त दो के मायु और जक कोरिया! 
दकीक लौक कए हि इक्ल हक हो ब्रार रो को दुःशय प्रशा करता दे उतहा दी पाप उस मगुष्य को 
है। इक कप इक पएंके विशाशलाएँ डवता शुधरध या वराते अधिक बायु और क्षत्र )% 
अडइई (कोन जिद! है पिक्र > दो इसी प छू क्यक्दि को रु विशेष डोता है। जितसा बूत भोर 
अं “३ आटत हें बच आरुआा के हर है इवते ठप *ै दम ले लाधयों मनुष्यों का उपकार होता डै। रि 
हो डरा के है धूठत पे दकतर फरतये के खाते को उस+ शरीर ओर आरमा के बत की ददीति* 
औ है इक्कर ऋपद इपट पे किकाशा वि्ञामा भौ भाडिये, बरातु उसाते होगा अधिक करता गखिप है 
पक ६ क्र इ३४३, के फपडइश ि। (६ प्र ) गायक मनुष्य कियती अादुति करें और एफ 7" 
१ कि 6४ हर भार हि है। इचह व्रायेक मु को धोलइ २ आदुति ओर जे ३ मारी भर न 
हक ६०११ का इज नाले ब्यूड मे यू ब से दिए अर को इससे अधिष्य करे हो बहुत आबयां देख 

किये कप इधफिएओाकि अद मय शूरर धावि, शाजे मडारात शोर बदुतसा होम कहीते कोर 8 
ह -कद+के दे गज ८३ बट फकन उहुए अबतक झाश्यांकर्ण वैय रीसों से २ दिन हर हुर्थों ही द्‌ 
के के |ॉ औकाह हू ४ कनत है इ साय 4 दे इप बव अक्रत अध्याय का पयभा पड़ा हालत 
हू +.ज शत ऋटा6 व्रफड: अर ना कशका, जुम्ता रेवय्क को सवमिदाणिर से के फ्रलतीफ परौस्त 
कफ 0 टायर के कद्धा मोर अरका परूत उट्ा आप रे पक अचयत इतर अपिहल्प का दी करना दाता 
कदर दे पाम इस लटन सम डे एडरल । आफस्यों दृश्य | बैरयों औैरवाै]/0 | ॥| 


आडि हु २ नफरत बमदण हम सपनो दनलप चित द्ऊ है ५ 





| सफल $ ऑडजपओ के दूष्भ आता डा कब है। वाशल नीतों तने अच्पण, की 
॑_ ४ #क0, डा येशकिद ४ अ/+ड ऋकुपत पपतई उ् हैपर कर्ड के केज दीन १३: सपू* झ्ब २० 


घ्तीवसमुन्नासः श्र 





ओर शो कुल्ीन शभलक्षणयुक्त शद्ध दो तो उसको मन्व्रसंदिता छोड़ के सइ शास्त्र पढ़ाबे, शद्ध पढ़े 
परस्तु उसका इपनयन मे करे, यट्ट मठ अनेक झआयापों का है। पश्चात्‌ पांचपें या आठवें थर्ष से लड़के 
छड़कों की पाठशाशा में और छड़की लड़कियों प्टी पाठशाज्ा में ज्ञावें और निम्नलिखित निश्मपूर्यक 
अध्ययन का झारस्म करें ॥ 
परटतिशदाम्दिक चय्ये गुरौ ग्रैयेदिक प्रतम । तदर्षिक पादिफ़ या ग्रहयान्विकमेय था ॥॥ 
मनु० [झ० ३। १] 
अर्थ--शाठवें धर्ष परे आगे छत्तीसर्वे थर्ष पर्यन्त भर्थात्‌ एक २ येद के साह़ोपाक पढ़ने में 
बारइ २ धर्ष मिल्त के छुत्तीस शोर झाठ मित्र के चालीस अथवा झअठारह वर्षो का प्रह्यतयें भौर झाठ 
पूर्व के मि्त के छुत्मीस या नो दे तथा जपतक दिया पूरी प्रदय न कर लेवे तप्रतक प्रश्नचर्य्य रफ्से ॥ 
पुरुषो घाव यहस्तस्प यानि घतुर्विछिशति वषाणि तत्माव/सपर्न) चतुर्विश्शत्पदरा गायत्री 
गायत्न प्रातःसबनं) तदस्य बसवे।अन्वायत्ता: श्राणा याव बसव एस हाद& सर्व बासयम्ति ॥ १ ॥| 
तब्चेदृतस्मिन्‌ बयमि किष्चिदुपतपेत्स ब्यात्माणा बस इद में प्रातःसदर्स माध्यन्दिन₹* 
सबनममुमंतमुतेति माह प्राणानां यम्ननां मध्ये यप्ञो विलोप्सीयेत्युद्ेथ तत एल्पगदो ६ भववि ॥ २ ॥ 
अय यानि घतुयत्वारि/शद्पाणे तन्माध्यन्दिनश्सबन यतुअत्वारिश्शददरा त्रिपरप्‌ बैएुमे 
भाध्यंदिनश्सवन तद॒स्य रुद्रा अम्वायत्ता: श्राणा बाद रुद्रा एव हीद७ सर्ब७ रोदयास्ति ॥ ३ ॥ 
हैं धदेवरिमन्ययसि डिम्चिदुपतपेत्स प्रयात्पाया रुद्रा इंद मे माध्यंदिनर्सपर्न हृतीयस- 
घममनुसन्तनुतेति भाई प्राणाना< रुद्रायां मध्ये यज्ञ विलोप्सीयेत्युद्धेब तत एत्पगदों ६ भबति ॥४॥ 
झध याम्य्टाचचारि०शद्धप्रोणि इसृतीयसवनमष्टाचत्वारिश्शदक्षरा जगती जाग तृतीय- 
सबने तदस्पादित्यान्यापत्ताः आणा याशदित्या एवं हद 0 स्येमाइदते ॥ ५ ॥ 
दे चेंदेतस्मिन्‌ धयसे फ्रिन्चिदुपतपेत्स श्रयात्‌ प्राया भादित्या इद॑ भे तृतीयसबनमापुर- 


झुस्तनुतेति माह प्राथानामारित्पानां मध्ये यशो बिलोप्सीयेत्युद्रेव रह एत्यगदो ईंए भदवि ॥ ६॥ 
यद द्ान्देग्पोपनिषदु [ प्रपाठक ३ सखए्ड १६ ] का धयन दि । ध्रद्माचये सीन प्रकार का दोता 
है फमिए्ठ, मध्यम भौर इत्तम, उनमें से फमिप्ट-शो पुरुष ऋध्ररसमप देश चोर पुरि अर्थाद्‌ देद में शपम 
कफरनेयाला जीधास्मा यज्ध भर्थाव्‌ अतोय घमयुणो से संगठ झोर सरदारत्तव्य है इसको आवश्यक है कि 
२४ दर्ष वर्षेन्त मितेग्द्रिप अर्थात्‌ ध्रह्चचारी रइकर वेशदि विधा भौर सुशिष्टा का भ्रशण करे झोर 
विवाद करपे भी लम्पटता म करे तो डसके शरीर में स्‍भ्राण दखदान्‌ द्वोबर सब शमणों के: धास हा- 
नेयाले झोते हैं । इस प्रधम दप में शो उसझो विदाम्यास में संत्त करे ओर दइ ऋायाय॑। येसा ही उप- 
देश किया करे झौर प्रहाचारी ऐसा निश्यय रफ्ये कि जो मैं ्रथम अपस्या में डीक २ अ्रहमघारी र| हा 
& भेरा शरीए झोए चारमा चारोग्य दशवाद होफे शुमणुर्यों को बसानेदाले मेरे शराण होगे। दे मनु धो | 
मुम इस प्रसार से छुखों का पिस्तार करो, को मैं शशदर्प का खोप नम करूं। २४ दर्ष क दश्चावु एप्स 
कहूंपा तो प्रसिद्ध दे कि रोगरदित रटंगा भौर ऊूायु भी मेरी उ० था ८० दर्द तह रद्देगी | मे प८ 


मरहाचये थद्द दै-- हो मशुष्प ४४ दर्षा पर्यन्ठ हाघारी रष्कटकर देशामभ्पास फरदा थे उसके शात, ररिए, 
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दीडाप ऋच्चीटो हकथेाई अंडर सटे बीयर ५ ० >न शक 





च्प्म्श ऋात्ट ऋत राहत कथा अदा अ्शलडइत 4 क्र, च 
ढपटड हे आह दाइए दे फतरे छे हधिट इइए कार. 





5. २2. 2. ८. - 


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ब््च्टीपित म विजय 4 आऋाशताजिप्राश: २. 


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खा के करा पानपियाकइण के । द्रहर पर, 
जद ने वडतीय्टाडीमकट * कफ के 





दतीयसमुन्नासः 3 


( ऋतं० ) पपार्थे आचरण से पढ़ें ओर पढ़ायें ( सत्यं० ) सत्याचार से सत्य विधाओं को पढ़ें वा पढ़ाने 
(तप: ) ठपखी अर्थात्‌ धर्मानष्टान करते हुए वेदादि शास्त्रों को पढ़ें और पढ़ावें ( दमः० ) बाह्य 
इन्द्रियों को घुरे झ्राचरणों से रोफ के पढ़ें ओर पढ़ाते शायें ( शमः) मन की घृत्ति को सब प्रकार के 
दोषों से इटा के पढ़ते पढ़ाते कार्य ( अम्नय;० ) आइवनीयादि अग्नि भोर व्रिदयुत्‌ झादि को छान छे 
पढ़ते पढ़ाते ज्ञाये और ( झग्निद्दोन्न॑० ) भम्निद्दोत्र करते हुए पठन और पाटन करें करावें ( अतिथपः० ) 
अतिथियों की सेवा करते हुए पे और पढ़ावें ( मालुषं० ) मलुष्पसम्दन्धी स्यदृद्दारों को यथायोग्य 
करते हुए पढ़ते पढ़ाते रहें ( प्र्ठा०) सम्तान ओर राज्य का पालन करते ड्वलुए पढ़ते पद़ाते छर्ये 
( प्रशन० ) धीये को रकछ्ता ओर दूद्धि करते दुए पढ़ते पद़ाते झायें ( अ्श्ातिः० ) अपने सनन्‍्तान और 
शिप्प का पाछतन करते हुए पढ़ते पढ़ाते शायें । 
यमान्‌ सेवेत सदर्त न नियमान्‌ केवलान बुधः । यमान्पतत्पदुर्बायों निपमान्‌ केबलान महन्‌ ॥ 

मनु० [ भ० ४ । २०४ ] 





थम पांच प्रकार के होते हें 7 
तत्राहितासत्पास्तेयप्रध्न चर्यापारयदा यमाई ॥ योग० [ साधनपादे घू० ३० ] 
अर्थात्‌ (अ्टिसा ) पैप्त्याय (सत्य) सत्य मानना, सत्य बोलना भोर साय ही करना 
( भस्तेय ) भर्थाद्‌ मन वचन कर्मे से चोरी त्याग ( ब्रह्मचर्य ) अर्थात्‌ उरस्थेन्ट्रिय का संप्म (अपरिप्रइ ) 
सी छोलुपता ख्वत्वाभिमागरह्ठित होना। इन पाँच यमों का सेदन सदा करें, कदल मिएमों का 
बन हर्थाद्‌:-- 
शौषसम्तोषत॒पःस्वाध्यायेशपणिधानाने नियमाः ॥ योग० [ साधनपरादें छ० ३२ ] 
( शीच) अ्पोत्‌ स्‍्तानादि से पवित्रता (रून्‍्तोष) सम्पक्ू प्रसप्त होकर निसधय रहइहा 
सन्तोष महों किम्तु घुदपाएे कितना होसदे उतना करना, शाति छाम में इप' दा शोद्य भ धररा ( 6५) 
अर्थात्‌ कप्टसदन से भी धर्मयुरू कर्मों का अमुष्टान (स्वाभ्याप ) पढ़ना पह़ारा ( ईंश्वरप पिचान ) 
इंश्वर को मत्ति विशेर से ऋत्मा को अपित रक्षना ये पांख निपम कड्ाते टें। दमों के दिगा रुक एम 
निएमों छा सदन न करे किम्तु इन दोनों का सेवन किया बरे, डी यमों का सेवन दोड़ र दे दर नियमों 
का सेवन करता दे व६इ दचवि को २हों धाप्त दोता किस्तु ऋधोयति अर्थात्‌ संसार में गिरा रहता हैः-- 
कामात्मता न प्रशस्ता न चेपरेहस्त्यपामता । क्रमम्पो हि वेशापिगमः इ्योगय देदेशः ह॥ 
मह० [ भ० २। २८] 
अर्थ - अत्यन्त कामावुरता झर निष्शामता शिसी ले दिए मी शष्ट रहो, कर्पोटट को छारख 
जे करे तो वेदों का डान ऋर वेददिदित वर्मादि शत्तम कम दिसी से न दोसहे | इसकिऐेः-- 
स्वाध्यायेन द्रतेइमिंस्रेविघनेश्यया सुतेशः । मद्पहैण यहथ् द्वाद्वीरें क्रियदे रुठुः ॥॥ 
मु [४४ ९१ *ड | 
अ्थे- स्दाध्याप ) सरश दिदा दट्टके पढ़ाने ( दव ) प्कूचये सत्यराचरएटरद मिधणश राहत 
(शोम ) इृफिशोश दि इस सा का ग्रहण रसत्य का न्याय छोर सत्य क्िओं का दाश देंगे / इविटेब ) 
बेइस्थ कर्मोगासश छान विदा ले घश्य ( एक्टर ) एटेश्यादि छरके ( सुठेः ) सम्भरोत्एसस (ब्दाचई) 
शर्म, रेद, पिच, देशटरेद आर झविियों छू सइुण इुपए एशमशाप्ड झोर ६ दईः ) झफिदोयाए हथर 
टिस्वाददा दिदागादि यहों « सदग से इस शरीर को हा्यी ऋदषाील देश ऋप्ट तरस जटर उमा बात... 





रद दे सत्या्वप्रकाशः 





क्रम्लःकश्णग ओर आत्मा सलपुक्त हो के सब दुऐों को रुखारे और भेष्ठों का पालन करनेहारे होते श्‌। 
डो मैं इसी प्रषम व में बेसा भाए ऋइते हैं कुछ सपश्सयर्गों करूं तो मेरे ये रदरूप प्राणयुक्त यह मध्यम 
प्रझच्े मिद छोगा । है परह्मचारी खोगो ! तुम ४स प्रझचय को बड़ाशों, मेसे मैं इस प्रझ्गपे का शोप 
श करदे ८शम्यरूप दोता है ओर उसी आचायेकुल से झाता ओर रोगरदित दोता है शेसा कि पई 
प्रध्घारी ऋच्दा भाम करता दे दैसा तुम किया करो । उत्तम आहययर्प अु८ थर्र पर्यस्त का तीसरे ध्रक्तार 
का होता है, हसे ७८ ऋचर की शगपी वैसे शो ४ दर्षा पर्रस्त पपापत्‌ प्रझषर्ष करता दे ऑसहे धाए 
झतुदुख होकर सकख दियाओों का प्रइय करते हैं। जो भाषाएं भौर माता पिता अपने सम्तानों को 
अधम कब में विधा और दपप्रशश के खिये तपस्री कर और जसी का इपरेश कर और वे हालात आर 
ही झार धकलिटत झमझमभाई सेदज हे तीसरे उत्तर प्रहादपे का सेपव करके पूर्ण अर्थात्‌ भराप्सो दर 
दाहेत्त आयु को पढे रेसे दूत भी बड़ा भो। क्‍योंकि जो प्रगुच्प इस प्रझघर्प को प्राश होकर क्षोप नहा 
अफ्के हे झाह दइाण दे शो से गद्क हो हर धर्म, अर्प, काम भोर मोद्ा को प्ा। होते हैं ॥ 


बष्मे/लखपर शरण इृद्धिपोपल सश्युर्शता किब्यिर्पशिणियेति | भाषोह़शातूदधि! । 
छाएह री टरेस एरद । चाषारागिंगा। सापूर्यता । तता विश्चित्यातिणियेति ॥ 
इककिए करे पपपे भुषाएु मारी हु पोइशे | समरवागतपीर्यी ही शानीपारइशणों गिष६॥ 


हि कप है? ८७ के ऋफ्क्तरत ३५4 आपयाप ऋा नचत है । इशा शरीर की यार अचार है एक (हरि) 
# १६ हैं रूरे  ह ६ २६३ कर्ष (रेल सत्र चातुओं भी बडुतीदोनी दे।वूशरी (पौयन) हो ९५ दें बच! के भरत 
ऋ। ९१ है ५ $ ७१ ई आर पल्तत इ! आर होता है। तीसरी (सण्पूर्णता ) पत्ी तें वर्षो हो ले के सारी 
हो है इर्प न्‍० कप का पक शो हुए इली है बची! फिमिएरिहारि!) हुप राव शाह्षोगाज़ शरीरशध आफ 
का? १६ 4 “हे हटकर लो इतर इज हैं। वतजल्तश जो चातु धडुता है बढ़ शरीर मैं ईदी रइता, किरतु स्वफ 
कन्‍कका पे # ४१ #झुई रिंक के अह्लय है. बह ३७ थी कर्क इलम सतत पिषाइ का है झर्धात इश्रोसा। 
का इच #कसा आप ब्रा ईं फियाओ अतआ ।! मा : कुरा यह अदपगी का तिगम हीं हां गुदष बोगों का 
दुआ हा है | हचर ।क्टों का 2४ कर्षा फसल चुदक अदा च्त कर तो १६ ( सोकद ) बच' पर्वत कर्मा, 
के मुंप४ 8५ इक करन कयाडारी ह६ै 4: की 73 कर औ दृदप 3३ बर्ण तक रहें तो की (४ वर्ष, जो 
हु६च ४९ अप केपेन ऋफाऊ$ 2 4 करी ++ को, ही खुझव बह क्तच वर्दस्त #झ्मय करें तो हरी २१ धरे, 
के हु झ। झा अककाई छठे ॥ शा २। बची करस्ण प्रख वर्ग तेयच रकुले अर्थाय ४४ मैं बर्ष से भाते 
कद छत ५६ हं हुए 8 ७४३४ क्रो का अकाकर्य बे खाना काडित, परस्त यह नियम वियाइ काने बाल 
६९६ कोड टिकायों छा हैं कोश का विदा इटमा दी ब बा ॥ सतत व्रत अद्ायारी रह सफडे हो तो 
5 हो रहें इत४त शत इधर ऋर् दिप:वाओक फ़िल्फिटड घड जिवाज बोगी हरी कौर बुरुप झा है। बई 
इक ३०.९ छध है व इ7 अप *% केस को छा 4 $ इमिट्याँ झा ऋपने घत। मैं रचरा के 
ऋह बे साप्शयपरद करे छ। हुनर व आध्य्यरानत के | कद हाश्यायपदवने € | 
दए। अफयापत्रबकर के शुस्द साथ्ाखदकर ब। अफ्यन शर्ते वे | 
के ना वन्‍्य ब्लटताअबरने €  झावियपत ब्वाथागशवकने व मारते च लोटायपतचते ब | 
हिई। ४ मरा शव कम ब॥ प्रफनद काट दयाहर ये) द्रशविव शा्यापप्रवनतर वह 
चय पक मं पशषयावण इड> + छात+ ६5 का क्‍दाम हैं; के पढ़ते फदुमिदाओं के जिका हैं। 


। 


हतीयसमुन्नासः - ] 


( ऋतं० ) यथा आचरण से पढ़ें ओर पढ़ावें ( सत्यं० ) सत्याचार से सत्य विधाओं को पढ़ें था पढ़ावे 
(तपः ) तपर्ी झर्थात्‌ धर्मानृष्टान करते हुए थेदादि शार्त्री को पढ़ें झोर पढ़ावें ( दमः० ) बाह्य 
इन्द्रियों को बुरे आचरणों से रोक के पढें झोर पढ़ाते हायेँ ( शमः ) मन की घृत्ति को सब प्रकार के 
दोषों से ददा के पढ़ते पढ़ाते जायें ( अप्नय/० ) आइयमनीयादि भग्नि भोर विद्युत्‌ आदि को जान के 
पढ़ते पढ़ाते ज्ञाये और ( अग्निद्दोत्र० ) अग्निद्ोत्र करते हुए पठन झौर पाठन करें कराये ( अतिथप:० ) 
अतिथियों की सेदा करते हुए पढ़ें और पढ़ावें ( माहुपं० ) मतु॒ष्यसम्बस्धी ध्ययद्वारों को यधायोग्य 
करते हुए पढ़ते पढ़ाते रदें (प्रशा०) सम्तान भोर राज्य का पालन करते ट्ुए पढ़ते पढ़ाते जायें 
(मजन० ) बी की रछ्ठा भोर वृद्धि करते हुए पढ़ते पढ़ाते आयें (प्रजावि/० ) अपने सन्वान और 
शिष्य का पाछनन करते हुए पढ़ते पढ़ाते शायें । 
यमान्‌ सेवेत सतत न नियमान्‌ फेयलान युधः । यमान्पतत्यदुयौणों नियमान्‌ फेबलानू भजन ॥| 
मनु० [ झ० ४ | २०४ || 








पम्न पांच प्रकार के द्वोते हैं ॥ 
तत्राश्धिसस्पास्तेयप्रक्षचर्यापाजिदय यमा३ ॥ योग० | साधनपादे ए० ३० ] 

भर्थात्‌ ( अद्टिस्ता ) वैर्याग (सत्य) सत्य मानना, सत्य बोलना और साय दी करना 
( भस्तेष ) भर्थात्‌ मन धचन कर्म पे घोरी स्पाय ( ध्रद्मयये ) अर्थात्‌ उप्स्पेन्द्रिय फा सरपम (अपरिधदट ) 
748५ 20538 स्वत्थामिमागरदित द्वोना। इम पांच धर्मों का सेवन सदा करें, केदल नियमों का 

बन भर्धातु:-- 
शौचसन्तोपतपःस्पाध्यायेश्रम्रणिधानाने नियमाः ॥ योग० [ साधनपादे ए० ३२ ] 

( शोच ) भर्थाव्‌ स्नागादि से पव्रिच्ता (झ्स्तोष ) सम्पर प्रसप्त होकर नियम रहा 
सम्तोष भर्दी किस्तु पुयपार्थ जिवमा होसके उतना करना, दामि लाभ में इर्प था शोषा न करता (तप) 
अ्रधोत्‌ कएसेवन से भी धर्मेयुक् कर्मों का अनुष्ठान ( स्वाध्याय ) पढ़ना पढ़ारा ( ईश्वर्प्रथियान ) 
ईंश्वट वी भक्ति दिशेष से आत्मा को अर्पित रखना ये पांच वियम कहते दें । यों ढे। दिला बेदत इन 
मियमों का सेदम ने करे किस्तु इन दोनों का सेदन किया करे, जो यमों का सेवन छोड़ के दे वज दिफमों 
का सेवन करता दे थद्द उन्नति को नहीं प्राप्त दोता किग्तु अधोगति धर्थाव्‌ संसार में गिए शहता है।-- 

कामात्मता न प्रशस्ता न भ्रैयेहास््थक्रामता । कराम्पों हि बेदाधिगमः बमेयोगश पेदिर: ॥॥ 
मनु० [भण० २। २८ ] 
अर्धथ- झत्यम्त रामावुरता और शिष्कामता किसी के छिये भी शेष्ट गद्दों, क्‍योंकि जो धामता 
ल करे तो वेदों का ह्वान और वेददिदित कर्मादि इत्तम कर्म किसी से भ दोसकों | इसल्िये:-- 
स्वाध्यायेन अ्रतेइमिश्लैदियनेज्यपा सुते? । मदाय्रेश्व यद्ेथ प्राझोये शियते हनुः ॥ 
मनु० [४० २। २८] 

अर्ष --( स्वाध्पाप ) सकल दिया पढ़ने पढ़ाने ( घत ) ध्रद्ाचर्य सायभाषणादि निएम पाहृमे 
(होम ) अपिदोजादि होम सत्य का धदण असर का स्थाग छोर सल्य विधाओों का दाह हेते । इकिद्रन ) 
वेद्रप कर्मोरासभा डास दिया के भट्ट रय ( इश्ण्या ) एलेएयर्दे बरने ( स॒ते: ) सब्तानोल्यास (महाएह:) 
प्रह्म, रेड, पिद, पैज्तरेद ओर झअतिदधियों के सेवन $ए एऑमट्रापड झोर (दथई ) ऋषि ही 
शिक्ष्यंबधा दिशाहादि यह्ोों के सेवन से इस शरीर को भारी अर्थात्‌ बेइ कोर परप्रेश्शर की सस्टि छत , 


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श्द्व सत्यार्थग्रकाशः 





आधाररूप दघाह्मण का शरीर किया ज्ञाता है ।-इतने साधनों के बिना द्राह्मणशरीर नहीं बन सकता ॥ 
इन्द्रिया्या पिचरता विपयेष्वपह्ारिपु | संयमे यत्नमातिष्ठेद्िद्धान्‌ यन्तेव वानिमाम ॥ 
मनु० [ २॥६८८] 
अर्ध--जैसे विद्वान सारधि धोड़ों को नियम में रखता दे वैसे प्तत और झात्मा को खोटे कारे 
में खंचनेयाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के निम्रद्ट में प्रयज्न सब्र प्रफार से करे, क्‍्योंकि-- 
इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोपमृच्छत्यसंशयम । सन्नियम्प तु तान्येव ततः सिद्धि नियच्छति ॥ 


मनु० [२। 8३ ] 
अर्थे--जीवास्मा इन्द्ियों के वश दोके निश्चित यढ़े २ दोषों को प्राप्त इोता दै, और जब इस्क्रिय 
को अपने यश में फरता दे तभी सिद्धि को प्राप्त दोता हैः-- दे 


वेदास्त्पागश्व यज्ञाथ्व नियमाश्र तपांसि च | न विप्रदुष्टभावस्प सिद्धि गच्छन्ति क्िपेत्‌ ॥| 
मनु० [२। ६७ |] 
जो दुष्टाचारी अजितेन्द्रिय पुरुष दे उसके वेद, त्याग, यश, नियम और तप तथा अन्य भच्दे 
काम कभी सिद्धि फो प्राप्त नद्ी दोते:-- 
येदोपररणे चैय स्वाध्याये चैब नेत्पिके । नानुरोधो5स्ल्पनध्याये होममन्त्रेषु चेव दि ॥ १ | 
भैत्पिके मास्त्यनध्यायों प्रश्नसत्न॑ हि तत्स्पृतम्‌ । ग्रक्षाहरतिहु्त पुपपमनध्यायवपदछृतम्‌ ॥ २ ॥ 
मनु० [२। १०४ । १०६ ] 
देद के पढ़ने पढ़ाने, सम्ध्योपासनादि पंचमद्ायशों के करने ओर समा में छानभ्याप- 
दिपयक झतुरोध ६ भाप्रद ) एड़ी है, क्‍योंकि ॥ १ ॥ नित्यकर्म में अनध्याय नहीं रे श्यास प्रश्यास 
सदा लिये हाते र. >रुद महों किये ज्ञा सकते वैसे निर्यकर्म प्रतिदिन करनाशादिये।म किसी दिन 
दोड़ता, क्योंकि अनष्याय में भी अप्निद्दोत्रादि उत्तम कर्म किया टुआ पुणयरुप दोता है जैसे मूठ पोलने 
में सद्दा चार भीर सर्व बोलने में सदा वुयव दोया दे वैसे दी घुरे कम फरने में रादा भतध्याय भोर 
अच्छे कर्म ऋणने में सदा स्वाध्याय दी दोता ट्टै0 मर न हे 
अमिवादनशीक्तस्प नित्य वृद्धीपपेयिनः । चत्यारि तस्प वद्धृन्त भायुर्षिधा यशो पलप ॥ 
ु ममु० [२। १२१ ] 
हो सदा मप्न शु्शाक्त विज्ञान भौर दृ्ों की सेवा करता दे दसका आयु, दिया, कीति और 
दल दे सार सदा बटते हैं, झोर थो ऐसा सही करते उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते ॥ 
अ्तीडियेइ शूवानों हा प्रषोप्तुशासनम्र । पाइचैव मथुरा ऋदशा प्रपोश्या धर्ममिच्छता ॥१॥ 
. पस्य बाहुननमे श॒दे सम्यगुत्रे ख म्ददा | से वै सर्वमय्राप्रोवि येद्ान्तोपयते छल्तमू ॥ २ ॥! 
कि पदनाद के देज्य दै कि ६ मनु० [२॥ १४६। १६० ] 
८8 भ् ज के रथ डर कर न द्श। जो धर्म की उच्नति चादे वद सर 
ले सर बेटच्न अदा सब देरों रे | युप्य के दाती और मन शुद्द ठ्या झुरक्षित 
सब देरी द सिद्धास्तकप फल को भाप डोठा ८ ॥ ९४ 


दृवीएसमुन्नासः डर 


-» 2 सेमानादू प्राक्णणों नित्पप्न॒द्धिमेद शिषादिव । अर्वुतस्पेष चाक्ाइप्ेदयमानस्य सबंदा [; , « 
मनु० [ २। १६२ ] 
चष्टी प्राझण समप्र वेद झौर परमेश्वर को ज्ञानता दे जो भतिष्ठा सै विष फे तुल्य सदा दरता 
है भोर च्रपमान की इच्दा अमृत केः समान किया करता है ॥ 
! « झनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा दिजः शनेः। गुरो बसर एँशिनुयादू अक्ञाधिगमिर्फ तपे !॥ 
मतु० [ २। १६४ ] 
,.. इसी प्रकार से कृतोपनपन द्विअ् प्रशचारी कुमार और भ्रह्मचारिणी कन्या धीरे २ देदार्थ के 
छानरूप उत्तम तप को बाते घल्े जायें ॥ 
योध्नपीत्प द्विजो वेदमन्यत्र झुस्ते भमम्‌ । स भीषश्नेव शद्रत्यमाशु गच्छाति सान्वयः/ हे 
* म्रहु९[३२। १६८] 
* जो पेद को श पढ़ के अम्यत्र थम किया करता दे थद अपने पुत्र पोच्च सद्दित शद्॒माष को 
शीघ्र दी प्राप्त दोजाता दे ॥ 
पर्मेयेन्मपु मांसम्च सन्ध सालय॑ रसान्‌ स्लियः। शुक्मानि यानि स्योणि प्राणिनां चैद हिंसनम्‌ ॥ १.॥ 
अभ्यप्मंजन चाच्योतपानच्थवपारणम्‌ । काम करों थे लोम॑ व नचेंने गौवबादनश ॥ २ ॥| ा 
पूते थे जनवादं घ पारियाद तथा$ह्तम्‌ । स्रीणां च प्रेधणालम्भप्रुपपात॑ परस्प व ॥ ह॥.. ४ 
एकः शयीत सर्यश्न न रंतः स्कन्दयेत्कनित्‌ । कामाद्वि सकन्दयलेतों हिनस्ति पतमात्मनः || ४ ॥ 
भज्ुु० [ २। १७७-६४० ] 
ब्रह्मधारी "और धरक्नचारियी मध, मांस, सम्ध, माला, रस, झी झौर पुरष का सझ्न, सब 
घटाईं, प्राणियों की हिंसा ॥ १ ॥ भर्तों का मर्देन, यिना निमित्त उपस्थेन्द्रिय का स्पशे, झांखों में झेशन, 
नूते शौर , छुत्र का धारण, काम, क्रीथ, खोम, मोइ, भय: शोक, इईर्ष्या, प्रेष, भाच, गाम और बाणा 
जाना ॥, २ ॥ चत, जिस किसी की कथा, निम्दा, मिथ्यामापण, स््रियों का दर्शन, आधय, दूसरे की 
परनि आदि कुकर्मों को सह छोड़ देयें ॥ ३ ॥ सर्वत्र एकाकी सोधे, थीर्यस्खलित फमी म करें, ओ कॉसता 
३ धोयेस्चलित करदे तो ज्ञामो कि झपने ध्रक्षययेथ्त का माश कर दिया ॥ 8॥ 
येदमबच्याचार्यो अ्तेषासिनममुशास्ति । सत्यं बद । धर्म घर | खाध्यायान्मा अमद्‌३ 
पाचायोग विय॑ धनमप्राहत्य अ्नातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः । सत्पाप् प्रमदितव्यम्‌ | धरममोन्न प्रमदिवव्यम्‌ । 
अशलान्न ,प्रमद्ितब्यम्‌ । भ्ूत्ये न अमर्दितव्यम् । खाध्यायप्रवचनास्पां न प्रमदितव्यम्‌ | 
ध्यविदिकार्यास्यां न अ्रमदितच्यम्‌ । मतृदेवो भव । पिठदेशो भव । आया्यदेदों मद । 
प्राविषिदेषों भव | यान्यनपद्यानि कर्माशि तानि सेविवव्यानि नो इतराणि। यान्यस्माझ७ सुचरिवानि 
गनि ल्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्‍्मच्छेया5तो आध्यास्तेर्पा त्यासनेन प्रधसितव्यम्‌ | 
द्धया देयमू । अभ्द्धया देयम । बिया देयम्‌ । दिया देयम्‌ | मिया देयम्‌ । संविदा देयम। झप 
दि ते करमेवेचिकेत्सा वा वृत्रवरिकिक्रित्सा दा स्पात्‌ | ये तत्र प्राध्षणा। शम्मशिनों युझा 
युक्का अलूधा घर्मफ्रामाः स्थुयेया ते तब वर्चेरन्‌ । तथा वग्न पर्चेया। । एप भादेश एप उपदेश 








श्द्व सत्य प्रकाश: 





आधाररूप प्राह्मण का शरीर किया शता है। इसने साधनों कै दिया प्राह्मगशरीर नहीं बन सकता 8 
इस्द्रियाणां पिधरतां विपयेध्यपहारिएु । संयमे यस्‍्नभातिष्तेदिदान सस्तेत सरामिनाम 
मनु> [ २। ८४८) 
अर्ध--मैसे विद्धान सारधि घोड़ों को शियम में रखता दे वैसे मत और आत्मा को खोडे कामे 
में सेचनेयाले विषयों में पियरती हुई इग्ट्रियों के निप्रइ में प्रपद्त सप प्रकार ले करें, करों कि-- 
इन्द्रियार्था प्रसंगेन दोपप्रच्छस्यसंरायम । सन्नियम्य तु सान्येत्र वत। विर्दधधि नियस्छति ॥ 
मठु० [२। ६३] 
अर्थ--शीयास्मा शरिद्रयों पेः वश दोफे निशिद्वत बढ़े २ दोबों को प्रा होता दे, भौर जद इस 
को अपने यश में करता दि तभी सिद्धि को प्राप्त दोता दै।-- 
बेदास्त्पागथ यश्ञात्र नियमाश्र तपोत्ति घ। न पिप्रदृष्टभावस्‍्य सिद्धि गच्छस्ति क्शिवेत्‌ ॥ 
मनु० [ २। ६०] 
जो दुष्टाचारी भ्रश्चितेन्द्रिय पुयप दे उसके बेद, र्पाग, यछ, नियम झोर तप यथा अन्य झब्दे 
काम फभी सिद्धि को प्राप्त नहीं होते:-- 
वेदोपरूरणे चैब स्वाध्याये चैव नेत्पिके | नानुरोधो$स्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चेव हि ॥ १ ॥ 
नैत्यिक्े मासत्यनध्यायों प्रद्मसत्रं हि तत्स्मृतम्र्‌ । प्रक्षाह्वतिहु्त पुएपयमनध्यायवपदकतम्‌ ॥ * ॥| 
है मनु० [ २। १०५। १०६ ] 
बेद के पढ़ने पढ़ाने, सम्ध्योपासनादि पंचमद्दायज्ञों के करने और द्ोममस्त्रों में अनध्याय- 
विषयक घअमुरोध ( आम्रद् ) नहीं है, क्योंकि ॥ १॥ नित्यकर्म में अतध्याय नहीं द्वोता जसे श्वास प्रश्यास 
सदा लिये ज्ञात है. उन्‍्द नहों किये जा सकते बैल नित्थकर्म प्रतिदिन फरना श्राष्टिय । न किसी दिन 
घोड़वा, फर्योंकि अनध्याथ में भी अम्निद्ोत्रादि उत्तम फर्स किया हुआ एुएयरूप दोता दे जैसे भूठ योलने 
में सदा पाप और सत्य धोलने में सदा पुएय द्वोता दे वैसे दी धुरे कम फरनते में सदा झमध्याय ओर 
अच्छे कर्म करने में सदा स्वाध्याय दी होता देता पद का 
अभिषादनशीलस्य नित्य बृद्धोपतेविनः । चत्वारि तस्प बद्धन्त आयुर्षिधा यशों बलघर ॥ 
५ मनु० [२। १२१] 
जो सदा न्न खशील विद्वान और घछुद्धों की सेवा करता दे उसका आयु, विद्या, कोति और 
चल ये चार सदा पढ़ते दे, ओर जो ऐसा गद्दों करते उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते ॥ 
अध्ितियेब भूवानाकाप भ्रेपोश्तुशासनम्‌ । पारुचैव मधुरा क्षण प्रमोज्या धर्ममिच्छता ॥१॥ 
. पस्य बाइसनसे श॒द्दे सम्यग्पुप्ते च सर्बदा | स वै सर्वमवाप्रोति वेदास्तोपगर्त फलम | २ ॥ 


मनु० [ २। १४६। १६०] - 
घोड़ के सब्र मम्ुष्यों को कल्याण मे मार्ग. 
पेश करे सद्म मधुर खुशीलतायुक्त धाणी योलें । ज्ञो धर्म की उन्नति चाहे बद्द सदा 
न्‍ + सत्य दी का उपदेश करे ॥ १॥ जिस मल॒प्य के वाणी ओर मन शुद्ध दया सुरक्षित 
+ सब बेदान्त अर्थात्‌ सब येदों के सिद्धास्तरूप फछ्त को प्राप्त होता दै॥र॥ 


विद्वान और ब्रियार्ियों को योग्य दे कि पैरबुद्धि 
डपदेश करें और उपरेश सदा 


चृतीपसमुन्नासः 83 


५ , सेमानाद प्राक्षणों नित्यय्द्विमेत विध्ादिव । भपृतस्पेव चाकाइपेदवर्मानस्य सदा ॥ 
मनु० [ २। १६२ | 
ये श्राप्मण समभ पेद ओर परमेश्वर को ज्ञानता दे जो प्रतिष्ठा से विष के तुस्य सदा डरता 
है भर अपमाम को इच्छा झमसृत फे समान किया करठा दै 
” , झनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विमः शनेः | गुरौ पसर संथिनुयाद्‌ प्रल्माधिगमिक तप) | 
मनु० [२। १६४ ] 
... इसो प्रकार से हृतोपनयन द्विल्र प्ह्मचारी कुमार भोर श्रह्मचारिणी कम्या धीरे २ चेदार्थ के 
शानतरूप उत्तम सप को यहदूते चले ज्ञायें ॥ 
योध्नधीत्य द्विजो पेदमन्यत्र छुरुते भथमम्‌ । स जीवलेव शुद्॒त्वमाशु गच्छाति सान्यय) ॥* 
* भन्ु० [२। १६८ ] 
जो येद की न पढ़ के अन्पत्र धम किया करता दे वधद अपने युत्र योत्र सद्दिप्त ग्रद्ठमाष को 
शीघ्र दी प्राप्त द्ोशाता दे ॥ 
ध्जेयेन्मधु मांममन्च गन्ध मालयं रसान्‌ स्लियः। शुह्मानि यानि सयोणि प्राणिनां चैद हिंसनम्‌ ॥ १.॥ 
अभ्यप्नमंजन चात्णोत्पानच्छत्रधारणम । फ्राम क्ोपं व लोग व नर्ततन गीठवादनय ॥ २।| 
यूते थे जनवादं च परिषाद तयाश्टृतम् | ख्रीणा च प्रेतणालम्भमृपपात परस्प च॥ है ॥. ' 
शयीव सर्वत्र न रेतः स्कन्‍्दयेत्कचित्‌ । फामाद्वि स्कन्दयक्ेतो हिनस्ति ब्रवमात्मनः ॥ ४ ॥ 
मन्ु० [ २। १७७-१८० ] 
घड्चाचारी -औदय प्रझ्ययारिणी भद्य, मांस, मन्ध, माला, रसे, झी ओर पुरुष का सक्ृ, सप 
घटाएं, प्राझिपों की दिखा ॥ १ ॥ भक्नों का मदद, थिना मिमित्त उपस्थेन्द्रिय फा स्पर्श, आंखों में अंडन, 
और , दश्च का धारण, फाम, क्रोध, ल्लोम, मोहद, भय, शोक, दर्ष्यो, द्वेप, मांछ, गान और याजा 
स्वाना ॥ २ ॥ धत, जिस किसी के कथा, निन्‍्दा, मिथ्याप्रापण, स्लियों का दर्शन, झाभय, दूसरे की 
गम आदि कुफर्मो को सद्ा छोड़ देवें ॥ ३ ॥ सर्यत्र एकाकी सोधे, पीर्यस्थलित फमी म करें, जो कह्मना 
3 षीपेश्वलित करदे तो ज्ञारो कि अपने प्रद्मचर्ययत का नाश कर दिया ॥ ४॥ 
वेदमद्च्याचायों सस्तेबामिनमडुशास्ति ) सर्त्य घद ) धमें घर ) खाध्यायात्मा प्रमद३ ) 
ग्राचायौय प्रियं घनमाहृत्य प्रजातन्‍्तुं मा व्यवच्छेत्सीः | सत्यान्न भ्रमदितव्यम्‌ । धमोन्त ्रमदिवव्यम ! 
इशलाप् प्रमदितव्यम्‌ । भ्रृत्ये न प्रमदिवव्यम्‌ । खाध्यायप्रवचनाम्पां न प्रमदितव्यम्र । 
खपितकायोस्ण ने अमदितव्यस। माहुदेशे मंत्र ) पिडदेयों भष्र ) आचास्यदेशों मब 
प्रतियिदेवों भव | याम्यनयद्यानि कमोशि ठानि सेविवध्यानि मो श्वराणि | यान्यस्माई७ सुचारितानि 
ग़नि स्वयोपास्यानि नो श्तयाणि | ये के चास्मच्छेया5सो ग्राध्षणास्तेपां त्ययासनेन प्रधसितव्यम । 
वरद्या देययू । अश्रद्धया देय । थ्रिया देयम्‌ ! ढ्विया देयणू | मिया देयम । संविदा देयमू । भय 
यदि ते फर्मेदिचिक्रित्सा या वृत्तविचिफ्रित्सा था स्पाद्‌ | ये सत्र प्राश्णा। शम्मर्शिनों युक्ना 
ग़युक्का अदूत्ा घमकामाः स्युयेया ते तंत्र पर्चेरन्‌ । तया तत्र वर्षेया। | एप आदेश एप उपदेश 
रे न्‍ 





३० सत्पार्थप्रकाशः 








एूपा पेदोपनिपद्‌ | एददलुशासनम्‌। एयप्युपासिदब्यस्‌ । एयमु चैतदुपास्पर््‌ | देचिरीय० [ प्रपा 
७। अठु० ११। क० १।२।३।४] 

आयास्‍्पे अस्तेयासी अर्थात्‌ अपने शिष्य ओर शिष्याशों को इस प्रकार उपदेश फरे हि' 
सदा सत्य घोख, धर्माचरण कर, प्रमाइरद्दित ोके पढ़ पढ़ा, पूर्ण प्रह्मचर्य से समस्त पिधाओं इ 
प्रशय भर आचाये के किये प्रिय धन देकर दिया करफे सम्तानोरपत्ति कर, प्रमाद से सस्य को कर 
मंत्र छोड़, प्रमाई से धर्म का त्याग मत कर, प्रमाई से आारोग्य और घतुराई को मत दोड़। प्रशा(रे 
इचम पेशे की थुद्धि को सत्र छोड़, प्रमाइ से पढ़ने ओर पढ़ाने को कमी मत घोड़, देषन्पिशानर हे 
झंडा परिदारि की सेया में प्रमाइ घत कर। जैसे विद्वान का सरकार करे उसी प्रकार माता, 
अगदाई और अवदिदि को सेदा सपा किया कर। जो आनस्दित धर्मयुझ कर्म दे डग सात्यमारणी 
को फिर कर, सस्से मिप्र रिप्यामापयारि कभी मत कर | शो हमारे सुधरित्र भर्यात भर्मपुक्त डरे 
हो इशअा) भरध ऋूर ओर शो इ्ाऐ पापणरण हो इसको कमी मत कर, शो फोई इमारे मध्य ते हर! 
इशिशार, अशोक धाझ्मप है, रन्दीं रे समीप पैठ भौर डस्दीं का पिश्याश किया कर, भरा रो रे! 
आऋशादर हो देश, गोया से देगा, शाझ्या मो देता, मप से देगा झोर प्रतिशा से भी देगा थाहिये) शप कं 
टू अ* कशे दर 2१क हत्दा इगाशता घात मैं किसी प्रफार का शैराप डत्पत हो तो शो ने पिचार् 
सटपलहिल बरी ऋवोरी आापविक्त चर्म की कामता करनेवाले धर्मात्मा शत दो भेरे के चर्म । 
रे थैसी यू ४ बता कर । बरी आपेरा, आड़, वददी इपरेश, पी बेप की बपतित्रत झीर पह 
(हल्दत है; इृशी अदतक इक? इन अपना लालचचन रुचारता चाहिये || 


कोष रपश हिंएर इगवेरू इश्यते नेई कर्टिवित्‌। पथद्धि इतने दिश्लित्‌ लचलकाप्रप भेशिए ॥ 
९ 
॥$ मनु" [२।४ ] 
कहकर ले फिसाड कर्क शादिये कि निष्काम पुदक मै मेज का दा फोच दिक्ताश का होना सौ 
ई गा डे १९ 
करा $प्हस्पार है. इसने $६ सित इता है हि हो २ फुख भी करता दे पइ २ भेदा फापता के चित्रा हद! है। 
कदर: कहप बईः त्युम: समाज वाद गे वष्मादग्मिम्गदा पुक्तो नि्य स्पादात्मपाव दिन है॥ 
हज के हा > <॒ पु न 
ऋष्शअ् पे हीप न देदइर रस्गे । आगे ते एयुकः सम्यूर्ग दखमार्मपेद ॥ २ ॥ 
मनु" [ है । १०८। " 
झफएर सूत्र लुक, पड़े, पदाशे काफओआ कही है कि ओ वेद और वेपरसृदृक्ष इ्यूतियों[ 
इकदमाए ५ हमे ४7 खाकर च क?हट, इ०टकपा परमार मैं मता धूक डेज (३ कराए हो कमल 
है <टक है. छइ अंदनािर पुर केक शुकदए फल को आप हही ही कषता, अफ जो विद्या बड़ हे 
इ्ल्यदई कूदाता है बड़ों अमन स्का बे वाप इता है क%# 
कल सल्कानी 
अंध्नानन्देत 4 सूर्य देटदाब बारद दिज:। मे शापूविततिल्ारयों करिको देइशिलड) ॥ 
2 0 हर मरृ* ( ९। ११] 
के झा ऋषष अफइुद या इषको के िित अप्यों का 
अिलक ४ करे बी इड बड़ से भगड़ छह टेट ऋौटिए, ऋनर 47% काला है कम है खिला 
डेटा बंदर / मे ऋण ब ईड्शान्दप: अदा 
कटा अरे दशाहम ऋष्त अ पिस्पान्यर: ? पक्सडू गई बादु। धाच'दरमेप्य सचरपु / 
इरृ५ [२। १३) 





दतीयसमुशासः ब१्‌ 


हैंइ, ध्यूति, देदाधुदुल धाशोक्त मजुष्युत्पादि शात्य/ सत्पुय्पों का ह्मानाए शो सनातन अर्थात्‌ 
हार परदैश्यरप्रतिषादित कर्म कयोए ऋपने धयर्मा मे पिए अर्धाए्‌ किसको झारमा साइता टै सैसा कि 
प्त्प्मादए, पे दरार चरम थे; शक्तण भर्याद्‌ इष्टों से धर्माइथर्म का भिध्प द्ोता दे। जो पद्तपातरद्दित श्याप 
हाय छ) ध्राएए ऋप्पत्य बा शर्वेधा परिग्याणपरूप आधार दे रपी का माम धर्म और इससे पिपरीत शो 
एच्पातापहित ऋष्यापाइरए एत्प बाज्याण और छसरप का प्रदणरुप कर्म दे बसी को झभर्म कहते हैं ॥ 


अर्थहामेप्यसहानां चर्मह्नानं विधीतये । धर्म मिह्ासमानानां प्रमाएं परम शरुतिः | 
मु" [ २। १३] 
को पुरुष ( ऋूर्थ ) छुपणोदि शत और ( काम) स्रीसेदनादि में भी पौसते हैं इष्दीं फो धर्म 
रा छा घार होता दे, को धमे दे: डान की इच्छा बरें वे वेद द्वारा धर्म का निश्यय करें, क्यों कि शर्माउधर्म 
का लिक्नप दिना देद थे; शीषा २ बएं होता ॥ 


इस प्रदार झादाए अपने शिष्य को उपदेश करे शोर विशेषकर शज्ा इतर द्ात्रिय, दैश्य और 
टततम झट ऊगों को मी पिया का अभ्यास झदश्प बरातें। क्‍योंकि: को ध्राझण हैं वे दी फेषण विधाम्पास 
ब:ए छौर क्त्रियादि गन करें तो विधा, धर्म, राज्य भोर धनादि की वृद्धि कभी भी दो सफती। क्‍योंकि 
शाह्ण| हो केवल पढ़ने पढ़ाने भोर क्त्रियादि से कीविका को धाप्त होके शीयम धारण फर सफते हैं। 
शीविका दे झाधीन झोर दियारि के शाइादाता और यथापत्‌ परीक्षक दपडदाता न द्वोने से प्रापणादि 
सब ध्यण पाणए्ट दी में पीस जाते हैं, झोर जब उछत्ियादि दिद्वान, होते दें तब प्राक्षण भी भ्धिक 
विधाभ्यास झोर धर्मपथ में एल है ऋोर इन क्दियादि दिद्वानों देः सामने पायपरड भूखा ध्ययध्धार मी मई 
कर सकते, झौर अर कत्रियादि भविधान धोते हैं तो बे छसा झपने मन में आता दे पैसा दी करछे 
बराते हैं। ईसकिये प्राकृए भी ऋएगा दःस्पाए चाहें तो क्ृभियादि को वेदादि सप्यशाज्र फा शभ्यासत 
अधिक प्रपक्त से करशर्पे। क्योंकि छद्रियादि शी विधा, धर्म, राज्य और जद्मी दी धृरि फरनेद्वारे हैं, मे 
रुभी मिद्ापृत्ति मददों करते इसकियेये दिधाष्यपद्टार में पश्षपाती मी गईं हो सफते। झध्य कप सब 
बों में विधा छुशिक्षा धोती टे तए कोई भी पाणएडडुूप झधर्मयुक्त मिथ्या ध्ययद्दार को गदटीं चलता सफता, 
एससे क्‍या सिद्ध हुआ दिः क्षत्रिधादि को नियम में खक्ानेवाले प्राभय भोर संम्पासी तथा प्राइझण चर 
सैश्पासी छो छुनियम में घतानेवाले क्तत्ियादि ते हैं। इसलिये सप पर्णों के रत्री पुरुषों में विधा 
शोर धर्म का प्रचार भ्रधश्प शोना सादिये | झष शो २े पड़ता पढ़ाना दो धद् वद्द भच्छे प्रफार परीक्षा 
बरके होगा योग्प टै--परीक्षा पांच प्रकार से दोती टै । एक--शो २ ईश्वर के श॒ण, कर्म, स्थभाष कोर 
वेदों से झगुकुल दो धद्द २ सत्य भौर डससे वियद्ध झसस्प दे । दूसरी--जो २ सष्टिकम छे झनुफूण थद्द २ 
छत्प झीर जो २ रष्टिकम से पिदय दि घचइ् सद असस्प दै, जैसे फोई कद्दे कि पिना माठा पिता के पोग 
3 छ्फा उत्पन्न हुआ पेसा कथन दृृष्टिकम से विश्ण दोने से स्वेधा असत्य दै। तीसरी--''भ्राप्त” 
प्र्धाद्‌ शो धार्मिक विद्वान, सत्पवादी, निष्कपटियों का संग उपदेश के झज॒ुफूल दि पद्द २ प्राह्ा और 
- २ विरश बद २ झप्माथ दै | चौथी-अपने भात्मा की पविन्नता विधा के अनुकूछ भर्थाव्‌ मैसा अपने 
को छुच प्रिय और युःश अझग्रिय दे दैसे दी सर्देत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को युःश था छुख हूंगा . 
> क्र सी भ्रप्रसप्त ओर प्रसन्न होगा । और पांचर्षी--झाठों प्रमाण अर्थात्‌ प्रत्यक्ष, झलुमाम, डपमान, 
एष्द, दैविदा, अर्धापत्ति, सम्भव भर अमाव | इनमें से प्रत्यक्ष के लक्तणादि में शो २ दत्र मीचे लिखेंगे वे २ 
सब स्यापशारऋू के प्रथम ओर द्वितीप अध्याय के ज्ञामो 0 
ल्‍्डा हे 
कअ 2 








इ्र 
इस्धिपायपसिशेियन्न इनमभ्पपरेश्पमप्यमि 
अर ० है। ऋष्िक १ छा ४ ॥। 
हो भोज, रद, जा, डिडा, फोर घाण का 
दि अथ्ोद्‌ आइश होश दे. - 
इईपोय से बार रार बना 
मे इल्रच दोता है दर ६. कह 
इतल धर रे इॉगा हि ९ 
कप टेक सबत। है । 
इापक सन है कए . - 
हुएच कप सिफरद धार , - 
हेसे लकी इक करे 
कर! जो इतए कोश रे 
है का शकपक काइफइ 
हलक की २75 
पुतला) शाप गान 
कप २ १०७ 
की प्राण ऋधु्ि हो 
कह दुँ॥* है कस इर | 
ऋ कापुशक अहभ हैं । २ 
हुक केश दे ६: का कब) की 
8१ हैक के $क रैइचाई 
हुह428 दुपका है. वच्च॥त 
ऋण हू आह इ ० ई को हैश २२ 
# रा का पथ % फिट के. 
इ 4६ % ऋशकछप क टेक के कांड 
ऋजइा हु को को ६४ का के 
हैं: | शॉप के फिडक्द आफ पूध्धह 
अड्था दा््आ है. ४4 कप हा 
इल्सछाउरले कादर 44 रत ९० 
करोए ऋा कष अ.ढठ कहीं डॉ आड- 
कयली शाफाक- 
22% 777 2 कय 
>न. अम्िड अगर 
अध्ययन हक है 
५. आई इृष्फ $ कट 





सत्पापप्रकामः , 


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घ कष्य . 


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! -क कहर शृख वी कह हि 


नम 






९ 


४! 





ध ६ ९। 





हः धर 


हक 

हब हि ऋोध मै 
आंधी + प्रात होते 
5 नधुओं तु 

ले गाए! 


, "कधा होने का 
तर! /शेवषत्‌ 
'# कऋषपर हूरें कर्षा 
उखर का होए पाप 

»  हैं।पसारा "शाधा' 
पक्के बगटे के साथ 
मी हकानिाशतर 2 हाजी 
अत अर्थात प्रत्यक्तत 
एकद देती विद्र। अर 


| हुए ६ ॥ 
कल का मिवयि ऋरत $ 





चत 

















ततीबसमुद्दासः श्् 


“तू विष्षमित्र को घुखास्ता” यह बोला कि 'पैने उसको कभी महों देखा” उसके स्वामी मे कष्टा कि 
“जैसा यह दैवदत्त है पेसाडही थइ विशपुमित्र दै” था सेसी यद्ट गाय दे पैसी दी गयय अर्थात्‌ 
मौलगाय होती है, जब वह वहां गया और देवदश्त फे सदश उसको देख निश्चय कर लिया कि यही 
विष्णुप्रित्र दै उसको ले झाया। भ्थवा फिसी जअद्गल में जिस पशु को गाय फे तुल्य देखा उसको निश्चय 
कर लिया दिः इसी का माम गषय दे ॥ का 

चोथा शम्द्रमाण-- # 

आप्तोपदेश। शब्दः ॥ न्‍्या० । झ० १ | आा० १ | सू० ७॥ 

»,,.. हो झांप्त अथांत्‌ पूर्ण विद्वान, धर्मोत्मा, परोपकारप्रिय, सत्यवादी, पुरुषार्थी, शितेन्द्रिय पुरुष 
जैसा अपने झात्मा में जानता दो भौर जिससे छुख पाया दो उस्ती फे कथन की इच्छा से प्रेरित सद 
मजुष्यों के फल्याणार्थ उपदेष्ा हो अर्थाव्‌ [जी ] जितने पृथियी से लेके परमेश्यर पर्यन्‍्त पदार्थों का 
शान प्राप्त द्ञोकर उपरेष्टा होता दि। जो ऐसे पुरुष और पूर्ण आप्त परमेश्यर के उपदेश थेद हैं उन्हों फो 
शब्दप्रमाण ज्ञानी ॥ « 

पाँचयां ऐतिश-- 

न चतुष्यमेतिद्यायीपश्िसम्भयाभावप्रामाएयात्‌ | न्‍्याय० | झ० २ | भा» २। छू० १ ॥ 

ओ इतिइ धअर्धात्‌ इस प्रकार कां था उसने इस घफार किया भर्थात्‌ किसी के जीपनघरित्र 

का माम देतिदय है ॥ 

छूठा अर्थापक्ति- ८ की ा ह ग 

७, » -“भर्धादापद्ते सा अ्र्थापत्ति” दे नचिदुच्यते हि 'ु घनेधु श्ृष्ति: सति फारण कार्य सवतीति 
किमश्र म्रसज्यते, भसत्सु घनेपु घृष्टिससति कारण घ.कार्य्य म भपति” जैसे किसी ने किसी से कट्दा 
कि “बदल के द्वोने से यर्षा भोर कारण ये होने से कार्य उत्पन्न होता दे” इससे दिमा क्े यद् दूसरी 
दात सिद्ध द्वोती दे कि पिगा बदल यर्पा और घिना फारण के कारयये कभी मद्दों दो सकता ॥ 

सातवां सम्भव-- ५ 

“सम्भवति यस्मिन्‌ स सम्भष:” कोई कदे कि “माता पिता के दिना सम्तानोश्पत्ति, किसी 
ने घतक किलाये, पद्ाड उठाये, समुद्र में पत्थर तशाये, चन्द्रमा के दुकड किये, परमेश्यर का अवतार 
दुभा, मनुष्प के सींग देखे और दर्ध्या भेर पुत्र और पुत्री का धियाद् किया" इस्पादि सब झसस्भव हे 
क्योंकि ये सब याते एष्टिकम से वियद हैं। भोर जो बात रष्टकम के अनुकूल हो यह्दों सम्मय टै ॥ 

झआाठपों झभाव-- 

"तु सपन्ति पस्मिन सोउभाष:” जैसे विसी ने किसी से कट्टा कि "हाथी ले छा” दद् वहां 
हाथी का अभाष देखकर कद्ों दाथी था यहां से ले आया। ये भाठ प्रमाण । इनमें से जो शद में देविह, 
और भगुमान में अर्थापत्ति, सम्भव भौर अभाष की गएना करें तो धार प्रमाण रइ ऊहते टैं। इन पांच 
प्रकार की परीक्षाओं से सत्यासस्य का तिश्यप्र ममुष्प कर|सकता दि अम्पथा महां ॥ 

* धर्मविशेषभ्सतादू दृष्यगुणफर्मसामान्यविशेष्तमशयानां पदार्यानां साधर्पशैषर््पाम्यां 
वेखड्ानानि!थेयतम्‌ ॥ पैशेषिफ । झ० है । आ० है । घू० ४ ॥ 

क्षय मनुष्य धर्म के यथायोग्य अगुष्ठान करने से पवित्र होकर “साधम्दें” ऋर्घाव्‌ थो तुस्प 
धर्म हैं शेसा:धपिपी लड़ और जल भी शड़ "पेधर्म्य” श्र्थोत्‌ पृथिदी कटोर झोर हुछ घोमल, इसी.” 
रकार से दृश्य, शुण, कर्म, सामास्य, विशेष झौर समदाप इन दः पदार्थों के तत्वड्ाम ... . . हु 
पे "निःश्ेयसम” मोक्ष को प्राम होता दि /// ] ही 

न्‍्छ मे, भ 


है] ८ 





8 सस्पार्थ प्रकाशः 


हने अननरन्‍लजननननन मनन तन +. 


,.. इच्दियार्थसन्रिकर्षोत्पन्न क्वासमब्यपदेश्यमव्यमिचारि 5 यसायात्मकम्पस्यक्षम्‌ है स्पास सू० । 
० १। झादिक | पत्र ४॥ हि! 
चि ज्ञो धोन्, स्वचा, घछु, शिद्ा, और घाण का शब्द, स्पशे, रूप, रस और गन्ध के साथ अ्रव्यय- 
द्वित अर्थात्‌ आवरणरदेत सम्बस्ध होता दे, इन्द्रियों के साथ मन का और मन के साथ आत्मा के 
संधोग से छान उत्पन्त द्योता दे उसको प्रत्यक्ष फटद्दते हैं परन्तु जो व्यपदेश्य अर्थात्‌ संशासंशी के सम्बन्ध 
ले उत्पन्न दोता दै धद्द शाप्र न हो । जैसा किसी ने फिसी से कद्दा कि “तू जल ले आ” थद्द ख्वाके उसके 
पास धर के दोला कि “यद्द ज्ञक दे” परन्तु यहां “जल” इन दो अ्रद्धारों फी संडा लाने वा मंगाने वाला . 
नहीं देख सकता दे । किन्तु जिस पदार्थ फा नाम जल दे यददी प्रत्यक्ष होता है, भोर ज्ञो शब्द से ज्ञान 
डस्प॑श्न द्ोता है धद्द शब्द्पमाण का विषय दे | “अव्यभियारि” जैसे किसी ने शत्रिर्म सम्मे को देख के 
धुरुष का निश्चय कर लिया घब दिन में उसको देखा तो राध्रि का पुरुषश्ञान नष्ट द्वोफर स्तस्मशान रहां 
ऐसे विनाशी छान फा नाम व्यभिचारी दे सो प्रत्यक्ष नहीं कट्टाता। “व्यवसायात्मफ” किसी ने दूर से 
मंदी की धालू को देख के कद्दा फि “वहां वस्त्र सूल रहे दें. जद दैया और कुछ दे” "यह देवदस 
दे वा यहद॒त्त” ज़वतक एक निश्चय न हो तबतक यद्द प्रत्यक्षशाम नहीं दे किन्तु ज्ञो अव्यपदेश्य, शज् 
मिचारि और निश्चयात्मक शान है उसी को प्रत्यक्त कहते हैं ॥ हि ३ 
, दूसरा अलुमान-८ ५ 3 शक 
“अय तस्पूषेक निषिधसलुमान पूर्षवच्छेप बत्सामान्यतो दृ्टन्च | न्‍्याय० | झ० १। आ० १) ध०४॥) 
7... ज्ञो प्रत्यक्षपूर्वक अर्थात्‌ जिसका कोई एक देश या सम्पूर्ण द्वव्य किसी स्थानया काल में 
प्रत्यक्ष हुआ दो उसका दूर देश से सइचारी एफ देश के भ्रत्यक्त धोने से अदृर्श अययवी फा छान होते 
* फो अलुमान फद्ते हैं। जेसे पुत्र को देख के पिता, प्बेतादि में घूम को देख के अभि, जगत्‌ में सुख 
घुःख देख के पूर्षेशन्म का छान द्ोता दे । यद्द अज्भमान तीस प्रकार का है । एफ “पूर्वबत्‌” जैसे बादलों 
को देख के बर्षा, विदाद्द को देखा के सम्तानोत्पत्ति, पढ़ते हुए दिद्याधियों फो देख के थिंया छोने का 
निश्चय द्वोता दै, इत्यादि जवां २ कारण को देख के कार्य का शान दो यद्द “पूर्ववत्‌” | दूसरा “शेषब्त्‌" 
अर्थात्‌ जद्दां कार्य फो देख फे फारण का ज्ञान दो,-जैसे नदी के प्रयाद्द की यढ़ती देख फे ऊपर हुईं धर्षा 
का, पुश्र को देख के पिता का, सृष्टि को देख के अनादि कारण का तथा कर्ता ईश्थंर का और पाप 
पुएंप के आचरण देख के; सुध दुःख का छान द्वोता दे # इसी को “शेषचत्‌” कद्दते हैँ। तीसरा '"सामा- 
स्यतोध्ष्ट” जो कोई किसी का कार्य कारण म द्वो परन्तु किसी भ्कार का साधम्य एक दूसरे के साथ 
दो, जैसे फोई भी विमा चले दूसरे स्थान को नहीं जा सकता वैसे दी दूसरों का भी स्थानास्तर में हा 
बिना 2420: के 8 भ्दों दो बस ॥ जाल शब्द का अर्थ यदी दे कि "अत अर्थात्‌ प्रत्यंततत 
पंश्चान्मीपते शायते येन तदगुमानम्‌ जो घत्यक्ष के पश्चात्‌ उत्पन्न जैसे धूम के भत्पक्ता देखे * 
अप्नि का शान फसी नहीं दो सकता।॥ गा अर जैसे भू के अवता दस दिला 
.तीसरा डफ्मीम-- * 
प्रमिदसाधम्पत्माष्यसाधनमुपणानम ॥ न्‍्याय० | झ० १ ॥ आ्रा० १ ७8० ६ ॥ 
॥._ही श्रखिशई बत्यक्ष लाधम्पे से साध्य अर्थात्‌ सिद्ध करने रत का ते का 
चीज पपस “डपमीयते देम तदुपमानम्‌" जैसे किसी मे किसी सत्य से कष्ट दो अर डपमात कदते हें । “उप्मीयते देन तदुएमानम्‌” जैसे 3०९ मे किसी बा अत 
$ भोर पाप घुरप के धाचादा दा सुश्च दुःख देख के शान होता है 



















पटक 








“9222 


हतीपसपुन्नासः | 





“पु वदिच्छुमित्र को शुशाज्षा” यह थोला दि 'पैने उसको कमी शह्दों देखा” उसके स्वामी मे कद्दा कि 
जैसा पट देवदत्त है दैसा ही वइ विभपुमित्र दै” था मैसी यद गाप दे वैसी दी गयप भहर्थात्‌ 
सोष्ठपाए दोती है, जहुद थाई द्दां गया और देवद्स के सदश उसको देख निश्चय कर लिया कि यही 
विप्युमित्र है शसको ले झाया। अथवा फिसी श्टल में जिस पशु को गाय फे तुल्य देया उसको निएचय 
छूर लिया कि इसी का भाम गधय दे ॥ स 
चोषा शध्दप्रमाए-- > 
आपोपदेश! शैब्दः ॥ न्या० | झ० १ । झा० १ | सू० ७ ॥ 
५ ». शो झोए अर्थात्‌ पूर्ण विद्वाद, धर्मोर्मा, परोपकारप्रिय, सरययादी, पुरुषाधी, जितेस््रिय पुरुष 
असा झपने आत्मा में जानता हो भोर जिससे सुस्त पाया दो उसी के फथन की इच्छा छे प्रेरित सब 
मनुष्यों के कस्पाएाएं डउपरेा दो भर्धाद्‌ [को ] शितने एथियी से लेके परमेश्यर पर्यन्त पदार्थों का 
हान भाम द्वोकर उपदेश दोता दे । को ऐसे पुरुष और पूर्ण आाप्त परमेश्पर फे उपदेश थेद हैँ उन्हों को 
शब्दपमारा जानोह «० 
पांचवां ऐतिश-+- 
न घतुएपमेतिश्यायोपणिसम्भवामावप्रामाएपात्‌ ॥ न्याय० । झ० २ । झा० २ । सू० १॥ 
शो इतिदद भर्थात्‌ इस प्रकार का था उसने इस प्रकार किया भर्थात्‌ किसी के शीयनचरित्र 
का माम देतिश है ॥ 
छठा अधोपत्ति-- .* ७2४ क हट 
“अर्थादापधते सा झर्थाएसि:” 4 मचिंदुघ्पते “सत्सु भनेषु धृष्टि: सति फारणो कारये भवतीति 
किमब्र प्रसज्यते, भसरसु घनेतु घृष्टिससति कारें चकार्स्यन भपति” जेसे किसी मे किसी से कट्ठा 
कि “बदल के शीने से यर्षा भोर कारण फे धोने से कार्य उत्पन्न ट्रोता दे” इससे बिना कट्टे यह दूसरी 
बात सिद्ध द्ोती दे कि पिना एदल दर्षा और पिना कारण के कारये फभी पहीं दो सकता॥ 
सागपां सम्मध-- न्‍ 
“सम्भवति यरिमन्‌ स सम्भयः” कोई कदे कि “माता पिता के घिना सस्तानोसपत्ति, किसी , 
मे घृतक शिलाये, पद्टाड़ उठाये, समुद्र में पत्थर तरये, धस्द्रमां के दुकड़े किये, परमेश्वर का झयठार 
(मा, मलुष्प के सींग देख शोर दन्ध्या दे: पुत्र और पुद्दी का वियाद् किया” इत्यादि - सब असस्मय दे 
क्योंकि ये सब बाते खष्टिफम से विरद हैं। भौर जो बात एृष्टिफम के अनुफृछ हो यट्टी सम्मद दे ॥ 
झाटवों झभाव-- * ५८ 
५ भयन्ति यस्मिन सोडभावः” जैसे किसी ने किसी से कट्टा कि “इाथी के ऋ' बद दा 
दाथी का माय देखकर कटा द्वाथी था यदां से ले चाया। ये आठ प्रमाण | इनमें से जो शब्द में दनिद्ा, 
और अलुमान में अर्थापक्ति, सम्भप भौर अभाष की गणना करें तो घार प्रमाण रद हते हैं । कस इंच 
प्रकार की परीक्षाओं से सत्यासत्य का तिश्चप्र मतुष्य कर,सकता दे अन्यथा नहीं ॥ 
५ घर्मविशेषप्रयताद द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदायरता साधस्ईइस्सस्स 
वल्ड्ानाप्रिः्येयसस्‌ ॥ वेशेपिक | भ? १ । आ० है| छू? ४ ॥ 
जप मनुष्य धर्म के यथायोग्य अनुष्ठान करने से पवित्र होकर “साइना ऋ॑ंश हे न्‍्द 
सम हैं जेसा:पूधिवी लड़ और जल भी जड़ “विधस्यें” भर्याव्‌ एथियी कहोर डर जछ इं>क ०6 
व्फार से दम्प, शुण, कर्म, सामान्य, विशेष और सखमयाप इन धः पदार्थों हे रुआर से कदरेट स्वरूए् 
3 “निःश्षेषसम्‌ मोक्त को प्राप्त दोता दि ॥ 5 “की 2 6४ 











३४ सत्यायप्रकाशः 


पी /अक नर: प लिन पदक 9६... 275: मिकी म कक कर 





एविब्याध्पस्तेमोपायुराकाश फालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ बै० । झर० १। आ० ६ | ६०१॥ 
चृधिषी, ज्ण, तेज, धायु, आकाश, फाल, दिशा, आत्मा और मन ये नव द्व॒व्य हैं ॥ 
क्रियागुणपत्समयापिकारणमिति द्रव्यलक्तणम्‌ ॥| बै० | अ० १ । आ० १। छू १४॥ 

- भृक्रियाश्व गुणाइच विद्य्ते यस्मिस्तत्‌ क्रियापुणशयत्” खिसमें क्रियागुण ओर केयल गरुय रहें 
उसको द्रष्य कहते हैं। उनमें से प्रथिषी, शल, तेश्, बायु, मन और आत्मा ये छः द्रव्य द्विया चोर 
गुणवाल्ले हैं। तथा आकाश, काल ओर दिशाये तीन क्रियारहित गुणवाले हैं। (समयायि) "समेत 
शीर्ष पस्प ठल्‌ समयायि, प्रास्ृत्तित्यं कारणं समथायि घ दत्कारणं थ सम्रयायिकारणम्‌” "ह्यते ऐग 
ठक्नषयम! जो मिलने के स्यमाषयुक्त, फार्य से कारण पूर्षकालस्थ दो उसी को हृम्य कहते हैं । मिससे 
लद्प जाना जाय जैसा आंख से रूप जाना जाता दे उसको लक्षण कद्दते हैं ॥ 

झूपरसगन्धर्प्शयती एयिप्वी ॥ बै० । झ० २ | भा० १। छ० १॥ 
+ रूप, रस, गर्ध, स्पर्शवाली पृचियी दै। उसमें रूप, रस और स्पर्श अज्मि, झल झोर वायु डे 
योगसे हैं ॥ 
स्पएस्पित३. एपिम्पां गन्धः | पै० । झअ० २ | झआा० २। छ० २॥। 
द्ृदिी में शन्‍्ब गुण स्वामापिक दे। पैसे हो जल में रस, अप्ति में रूप, थायु में ईपर्श झोर 
झाषाय में शाप स्वामापिक दे ॥ 
रूपरमरपशेरत्प आपो द्रवा) स्निग्पाः ॥ बै० । झ० २। आा० १। घछू० २॥ 
झूप, रछ और दफ्शेवान्‌ द्रपीमूत भोर फोमण जक्त कद्दाता है, परस्तु इनमें श्ष को एछ 
ब्दामादिक गुय तथा कप इस झप्मि भोर बायु के योग से हैं ॥ 
इप्सु शीडता ॥ दे० | अ० २ | भाब २। घू० ४॥। । 
ओर हूछ है एफ़रत्व धुण भी स्पाभाविक दे ॥ । 
देशे करस्पर्शरव्‌ ॥ बे० | भ० २। झा० है । घू० ९ ॥ 
हो रुप और स्पर्श दाता टै यह तेज दे । परस्तु इसमें कप स्वाभाविक ओर हइपश वायु के पोग से है 
इदशेरान्‌ बापू ॥ बै० । भ० २ | झभा० १। छ० ४ ।ी 
ढण्ं रुच्दवाओ बन्‍्यु है, परस्तु इसमें सी ड्यता, शीतजता, तेज और शत के पोग रो रइते हैं 
से ऋाधाशे न दिपनत ॥ दै* [ अ० २े। भा० है| यू ५ ] 
इर, बस. शहल झरोर झुपश अाफृष्रत में बी हैं, किनयु शत दो झाकाश का गुए है ॥ 
लिष्कशर ब्रोश्ननित्पशाशस्प सिश्ञम । बै० | अ० २। भा० है | ध्ू० २० ॥| 
सिफे अंश ओर विदधमा इोता है दइ आकाश का शिंग दे॥“,** 
अष्पएफ्रपादूर वाक्य शब्दः स्पर्श पदामठथः ।| बै० । श० २॥ झा० १ | घ० २४ ॥ 
ऊल्थ दूटिफ ऋएि कार्यों ले प्रदट ब होने से शष्द साय शणपाओे मूत्रि आदि का दुव गई 
इड्धमल इलए ऋ रपट इन कप गुष्छ है 8 
अप मयकरर इृदररिप दिवरिने बाहजिकुदन ॥ बैन | झ० २) आऊ २। ए* ६ ॥ 


५" है कक हक (वुदफर्‌ ) पक रा | विस ) विजन ( शित्म्‌ ) शीज रह्यारि प्रचोग दोते 


दीपसमुन्नासः शहर 


नित्पेप्षमाषादनित्येपु मापाकारणे कालाए्येति ॥ पै० । झ० २ | झा० २। घ्ू० 8 ॥ 

को मित्य पदार्पी में म द्वो और अनिएयों में दो इसलिये कारण में दी काल संशा है ॥ 

इत इृद्दमिति यतस्त्रिश्यं लिकुस ॥ यै० । भ० २। झा० २। ६० १०॥ 

दह्ां से पद पूर्व, द्तिण, परिचम, उत्तर, ऊपर, मीचे जिसमें यद्द ब्ययद्वार द्वोता दे उसी को 
दिशा कहते हैं ॥ 


आदित्यसंयोगादू भूवपूरषोद्‌ मपिष्पठों भूताथ प्राची | बै० । श्र० २। झा०२ | प्रू० १४ ॥ 

जिस ओर प्रथम झादित्य का संपोग हुझा, है, होगा, उसको पूर्ष दिशा कद्दसे हैं। झौर क्ष्धा 
अस्त दी उसको परिचम कहते हैं। पूर्वाभिमुण मजुच्प के दाइिमी ओर दक्षिण झोर थाई झोर उत्तर 
दिशा कइाती दे ॥ 

एवेन दिगम्तरालानि ध्याख्यातानि ॥ बै० | अ० २। आ० २। ७० १६ ॥ 

इससे पूर्ष द्चिण के दीच की दिशा को आप्रेयी, दक्षिय पश्चिम के धीच को सैऋति, पश्चिम 
डस्तर के बीच को धायदी झोर उत्तर पूर्ध के दीच को ऐशानी दिशा छइते हैं 

ईच्लट्देपप्रपस्नमुखदुःखट्जानान्पास्मनों लिल्नमिति || न्‍्याय० । झभ० १ | छ० १० ॥ 

जिसमें ( इच्छा ) राग, ( ह्वेप ) पेर, ( प्रयक्ष ) पुरुषार्थ, सुख, हुःशय, (ज्ञान) ज्ञानना गुण हों 
बह जीपारमा ( कट्टाता ) है ॥ पैशेषिक में इतना विशेष दे: 

प्राणाश्पाननिमेपोन्मेषजीषममनोगतीद्दियान्तर्विकाराः.. सुखदु/खेच्छाद्वेपप्रयत्नाबात्मनो 
किज्ञानि ॥ बै० | भ० हे । झआ० २। छ० ४॥ 

( प्राण ) मीतर से बायु फो मिकाछना ( अपान ) धाइर से वायु को भीतर छोता ( मिमेष ) 
आंछ की तीचे दांकता ( उन्मेष ) आंख को ऊपर उठाना ( ज्ञीवन ) पभाण का घारण करमभा ( भनः ) 
पधनम विचार अर्थात्‌ शान ( गति ) पथे.्ट गमन करना (इन्द्रिय ) इन्द्रियों फो विषयों में ध्क्षाना उनसे 
विषधों का स्‍्रदण करना ( भन्तप्रिकार ) दथा, दपा, ज्यर, पीड़ा आदि विकारों का होना, छुल, दुःश, 
इच्छा, टेप ओर प्रपक्ष भे सर झात्मा के लिंग भर्थात्‌ फर्म भोर गण दें ॥ 

युगपण्डानानुस्पचिमेनसों लिश्लस ॥ न्‍्याप० । झ० १। झा० १। छू० १६ ॥ 

जिससे एक काज़ में दो पदार्थों का भद्दय शान मह्दी द्ोता उसको मन कहते हैं. ॥ यह द्वृष्य 
का स्वकूप ओर छत्तण कद्दा, अब गुणों को कद्दते हैं-- 

रूपरसगम्पस्पशोः संख्यापरिमाणानि एयफ्त संयोगपिभागौ परत्वाउ्परत्वे घुद्धया सुख- 
दुःखे इच्छादेपी प्रयत्नाथ गुणा! ॥ बे? । झ० १ | भा० १। छ० ६॥ 

झूप, रस, गरथ, हपर्श, संदया, परिमाण, एथक्टव, संयोग, विभाग, परत्व, झपरत्य, धुद्धि, छुक्त, 
दुःख, इच्छा, पेष, प्रयक्त, गुरत्व, द्रवत्य, स्नेह, संस्कार, धर्म, भधर्म भोर शब्द ये २४ गुण कट्दाते हैं ॥ 

दम्पामय्यगुणवान्‌ संयोगविभागेप्वफारणमनपेद इति गुणलक्षथम्‌ ॥| 

वै० । अ० १॥ आ० २। प० १६॥ 
शुश उसको कट्दते हैं कि जो द्वब्य के आभय रहे, अम्य गुण का धारण म करे, संपोग भोर 
बैमाग में कारण से हो ( भ्मपेद्ष ) अर्थात्‌ एक दूसरे की अपेक्षा मे करे ॥ 

ओपोपलमब्धिडईद्विनिय्राध) प्रयोगेणाईमिज्वलित भाकाशदेशः शम्दः ॥ महाभाष्ये ॥ _.-- 

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हा ' 


“ईद सत्यार्थ प्रकाशः 


जिसकी भोत्रों से प्राप्ति, जो घुद्धि से प्रदण फरने, योग्य श्रौर प्रयोग से प्रकाशित तथा झाकाश 
जिसका देश दे यद्द शब्इ कष्ाता दे | नेत्र से जिसका ग्रदण दो यद्द रूप, जिद्वा से जिस मिष्टादि अनेड 
प्रकार फा प्रदण द्ोता द|े यद्द रस, नासिका से शिसका प्रदण दो यद्द गन्ध, त्यया से जिसका प्रइव 
होता दे चद स्पर्श, एक द्वि इत्यादि गणना जिससे द्ोती दे यद्द संख्या, जिससे तोल अर्थात्‌ इनका मारी 
विंद्त द्ोता दे बद्द परिमाण, एक दूसरे से अलग दवोना घद प्रथक्त्य, एक दूसरे के साथ मिलना वह 
संयोग, एक दूसरे से मिले हुए के अनेक द्ुकड़े दोना धद विभाग, इससे यद्द पर दे यद्द पर, उससे या 
बरे है' बद अपर, मिससे अच्छे चुरे का छान होता दे पह शुद्धि, आनन्द क़ा माम खुस्, फ्लेश का गाने 
दुःख, इच्छा-राग, द्वेष-विरोध, ( प्रयक्ष ) अनेक प्रकार का यल पुरुषार्थ, ( गुरुत्य) मारीपन, ( द्रवत्व ) 
पिघलजाना, ( स्नेद्द ) प्रीति ओर चिकनापन, ( संस्कार ) दूसरे के योग से यास्तना फा द्वोना, (धर्म) 
न्पायाधरण और फठिनत्वादि, ( अ्रधर्म ) अ्रन्यायाचरण और कठिनता से विरुद्ध कोमणता ये धोबीत 
(२४ ) गुण दें ॥ + बा 
धत्वेपणमवत्तेपणमाकुन्चन प्रसारण गमनमिति कमोयि ॥ बै० । झ० १।आ० । 8० ७॥ 
“उस्केपण” ऊपर को चेण्ठा करना “अवत्तेपण” नीचे को “चेष्टा करना /'आकुआन” सट्टोव 
करना “प्रसारण” फेलाना “गमन” आना जाना घूमना आदि इनको कर्म कट्दते हैं॥ अ्रव कर्म का तद्ए० 
« एकद्रव्यमगुर्ण संयोगविमागेष्यनपेत्तकारणमिति कमेलचणम्‌ ॥ बै० ! झ० १ । आ० ६० (७॥ 
०एकनद्ृव्यमाथ्रय आधारो यस्प तदेकद्रव्यं, न विद्वते गुणों यस्य यस्मिन्‌ था. तदगुणं, 
विभागेषु चापेत्षारद्दितं कारण तत्करमंलक्तणम्‌” श्रथषा “यत्‌ क्रियते .तत्कर्म, लच्यते येन 
कर्मणो लत्तर्ण कर्मलत्तणम” द्वव्य के आशित गुणों से रद्दित संयोग ओर विभाग ने में अपेदार्प्ित 
कारण दो उसको कम्मे फद्दते दें ॥ ह 5 ० 
द्रव्यगुणकरमर्ा द्रव्यं कारण सामान्युम्‌ | बै० | झ० १। झा० ६ ॥ छू० ६८॥, ..ह- 
५६... शो कार्य द्रव्प शण और कर्म का कारण द्रव्य दे थद सामान्य द्रव्य दि ॥ हक 
.»  द्वब्याणां द्रब्पं कार्य सामरान्यम्‌ ॥ बैं० | अ० १] आ० १। छ० २३॥ ,... ::' 
जो दग्पों का कार्य द्ब्य दे धद्द कार्येपत से सब कार्यों में सामास्य है॥ + , 22000 
द्व्पत्वं गुण कर्मत्वस्च सामान्यानि विशेषाण || पै० । अ० १ । आा०.२। सू० १ ॥| 
« द्वष्पों में द्रम्यपन, ग॒र्णों में गुणपन, कर्मों में फर्मपन ये सय खामान्य भोर विशेष, क्दाते हैं 
क्योंकि हष्पों में द्रष्पत्य सामास्य भर गुणन्य कर्मस्य से दब्यत्य विशेष दे इसी, प्रकार सर्वेन्न जानना ॥ 
सामान्य विशेष इति बुदयपेदम्‌ ॥ बैक । भ्र० ७१ | झा० २ | स्रू० दे ॥ 
सामास्य और पिशेष धुद्धि की अपेक्षा से सिद्ध दोते दे । असे--मलुष्प व्यक्तियों में ममुस्यव 
सापास्य और पशयुतवादि विश था स्थीरय और पुरुपस्य इनमें ग्राह्मणत्य चत्रियरय चेश्यत्य, श्रद्धा 
विशेष हें । झ्ाद्वण व्यक्तियों में ध्राक्षएस्व॒ सामान्य भर जत्रियादि से विशेष दें इसी प्रकार सर्वश्ष शनो! 
इरेदमिति या दायकाएथपोः स समवायः ॥ बै० | अ० ७। झा० ६ । घू० २६ ॥ 
कारण अर्थात्‌ अदयदों में अदयदी कार्यों में क्रिया क्रियायान श॒ण र 
कारए ऋवपद अददवी इनका निस्‍्य साम्इस्थ दोने से 22224 क43400 00402 बेल हम हा 
परस्पर सम्बस्ध इोता दै बह संयोग अर्षाव्‌ अनित्य सम्बन्ध दे ॥ ५ ५४ |] 
ट्रस्पपुदवों! सजादीयासम्मकर्व सापम्यंम्‌ ॥ बै० | झ० १३ भाई १ एू० ६॥ 











इथ सत्यायेम्रकाशः 


तह... >> ््््््लडचच सहन 





गास्ति धो गेह इति सतो घटस्प गेइसंसगेभ्रतिपेघ: ॥ बै० । झ० ६। झा० रै।सू 
अर में घड़ा मह्ीं अर्थात्‌ भन्यत्र दे घर के साथ घड़े का सम्पन्ध नहीं है, ये पांच अभाद कद्दाते 
इन्द्रियदोपात्संस्फारदोपाच्चाविद्या ) वे” | झ० & ॥ आ० रे | सू० १० ॥ 
सन्द्रिपों और संस्फार के दोष से अयिया उत्पन्न द्ोती दे ॥ 
सदुदृष्टहानम्‌ ॥ बै० । अ० ६ । झा० ३। सृ० ११॥ 
ज्ञो दुष्ट भर्पाव्‌ दिप्रीत धान दे उसफो अधिया कद्दते दें ॥ 
अदुएं पिया ॥ बै० । भ० ६ | झा० २। सू० ११॥ 
है भदुए अर्थात्‌ पधार्थ श्ञान दे उसको पिया कष्दते दें ॥ 
दृपिष्यादिरुपरस गन्परपशो द्रव्यानित्ययादनित्या ॥ बै० | भर० ७। झा यू ९ 
एजेन नित्पेषु नित्यसमुश्म ॥ बै० । झ० ७। भा० १। सू० ३॥ 
हो काईडप पृषिः्गरि पशर्थ और उसमें रूप, रस, गरध, रुपश गुण हैँ ये सप द्वप्यों के भी 
इसे से ऋषि है आर शो इससे कारणरूप पृथिष्यादि निएप द्रष्पों में शसधादि गुण दैँ ये निस्‍्प हैं ॥ 
दिशम्याप्रिस्पप्‌ ॥ पे* । अ० ७ | झा० १। सू० १॥ 
हो दिदमार शो भोर जिशका कारण कोई भी नस द्दो पद्द गि्य दे, भर्धात्‌ः--"साकाए 
साइन हो अल बचे कापेदत गुण दें ते अभित्प कट्टाते हें ॥ 
इप रेई हाई हाएज संयोगि रिगोयि समयायि भेति लेहिकयू ॥ बै * । झ० ६। झा० राहु 
दस! यह आर दा कारण दे एयादि समयायि, संयोगि, पकार्थसमयायि भर पिऐेरि 
बात पद रु छा में किइ धयाद विद्श्निप्ती के हाग्दरथ से शान दोता द|। "हामबादि” मैरे भार 
इापिशा्टाता है “सीपोरत केसे शरीर क्वधायात्ा दि इत्यादि का निन्‍्य संपोग दे /दुकार्प राशी 
रद आई हे हे! ऋाजइश डे के छार्वकप सुपर काये का लिक अर्थात्‌ जगाने बाला दे "विरोधि' हैते। 
सर शोशिच रा च्चप हा दिटयी जिफ है 4 /“ब्याति” «' 
लिखिए दियदृमपे रेफर ब्य या ब्याति; ॥ निमशक्रशुद्धवमिस्पाधार्षा! ॥ 
आदि रेत पति पष्वगिखः || सस्यियत्र ॥ [ झ० ४ ] १६ । ३१। ३२) 
के रनों कापए क्षादन अत सिद ऋरने योग्य और जिससे सिद्ध किया हाप इह ् 
कोइ रे ्ााइरनाओ का विशित बरसे दा सदयार दे इसी को स्याति कइते हैं जैसे धूम भोर 
बा झुका हैं: २६ ७ कथा ध्याध्य मो पते इसी जिद शब्दि ते उत्पन्न होता है अत हर पैएह 
है हुए दंग आद है वह दिस अध्रिरोस दे भी घुम स्यय रहदा दे। ढरी का भाप ब्याति है भर 
कफ ओ लेटर केदक सापाण्यें से डर बदल घूमदप मचट इोता हे ॥ ३१॥ जैते महताय 
डाइट क ही परत 2९ इइददिओें स्वल्यना चमें रे सम्तस्थ का नाप स्वाति है। जैते शरद दा 
कद झोट ६ दिकाज ऋापरकन का. सस्वरव दे । ६२३ इत्वादि शास्त्रों दे प्रमयारि हे परीणी ढ' 
हाई इरेह इपाई , अम्ददा विधा दियी बे कत्य बच कर बी हो सहता। जिए २ प्रत् 


कम + क।. रॉक इइज से दरीए्ा अ गए हो सतद डइटे बाद ६ धर बढ़ते हो २ इत परीए 
अर है हू +* - क्रऊएों बे व बहुओे. स्पॉड-- 





को 


कचिदरगदा न कलुदि दि वी 


ह॒तीपसमुन्नासः झ्ह 





छदाण भैसा कि "गन्धवती पृथिपी” जो पथियी है घद्द गन्धयाली दे, ऐसे छत्तण चीर प्रस्यक्षादि, 
प्रमाण इनसे सत्याउसत्य और पदार्षों का निर्णय हो जाता दे इसके दिना कुछ भी गद्ों होता ॥ 


अप पठनपाठउनावाधी 


अप पढ़ने पढ़ाने का प्रकार लियते टैं-प्रथम पाणिनिमुनित शिक्षा शो कि घजच्रूप टि उसकी 
रीति अर्थात्‌ इस अपर फा यह स्थान पह प्रयक्ष यह करण दे जैसे “प" इसका ओएछ ग्यात स्पष्ट 
प्रयक्ष और प्राण तथा भीम फी क्रिया करमी करण कह्दाता है, इसी घरकार यधायोग्य स३ भधारों का 
उद्यारण माता पिता च्ाचार्य सिखलाएें | तद्नस्वर ब्याकरण अर्थाव प्रथम भ्रष्टाभ्पायी के शत्रों का 
गठ जैसे "बुद्धिरादैच” फिर पदच्दे३ जैसे "यद्धि, झात्‌, ऐयू था शादेय" किर समास "आय ऐच्च 
प्रादेय" और अर्थ जैसे “आादँयां यृद्धिसेडा कियते” थर्थात्‌ था, ऐे, भी की सृद्धिसेश्ा [ करीशाती ] 
७ “तः परो पस्मात्स तपरस्ताद॒पि परस्तपर:” तकार जिससे परे शौर जो तकार से भी परे हो व 
पर कह्ाता है, इससे क्‍या सिद्ध दुआ जो झाकार से परे व्‌ ओर त्‌ से परे देख दोगों तपर हैं, दपर 
7 प्रयोशन पद्द द| कि हस्य भौर प्लुत की श्रृद्धि संशा मे हुए। उदाहरण ( भाग: ) पद्दां "मश्” धातु 
+ “घन” प्रत्यय के परे “घ, घझू्‌” की (्त्संशा होकर शोए ध्ोगया पद्यात्‌ “मेज्ञ भर" दर्शा कतार के 
ये भकारोत्तर हकार को धृशिसंएक भाकार घ्ोगया है। तो भाश पुनः "श" को थू्‌ हो शबार के 
पथ मिल से "भाग: देखा प्रपोग दुशा। “अध्याय?” यदों झधिपूषेक “दृश” धातु के टग्य ए दे 
पान में "घश्न” प्रत्यप के परे “ऐ" घुद्धि और उसको चायू हो मित्र के “झध्याद:”" । “शाप यहाँ 
मत के दीर्घ इंकार के सपान मे “एयुल्‌” प्रस्यव के परे “दे” शुद्धि और इएको श्राप होषर 
रेल के “भाषकः” | और “स्तायकः” यहां “रु” धातु से "एटुज्‌” प्रयय होपःर द्ररद हदार थे. 
यान में भो प्ृद्ि भाष्‌ भारेश धोकर अकार में मिल गया तो “स्तायकाः"। (हज ) धात से भागे 
एयुल" प्रत्पप लू फी इासंए दोके लोप “यु” के स्थाग में भक आरेश कोर भरकर पं. रधाद मैं 
भार" धृद्धि होकर “कारक: सिद्ध हुआ। शो २ दत्र झागे पीछे के प्रधोग में रूगें जसबा बाये रा 
जाता ज्ञाप और स्लेट हाथवा छकाड़ी के पट्टे पर दिखखा २ थे; कप्था रूप धर बे हुँते “मर 
मू+छु” इस भकार धर के प्रधम घकार पा फिर श्‌ का लोप होपएर “भशस्‍भ*्छु” पेशण रहा पर 
को झाकार पृद्धि भौर क्ष के स्थान में “ग" द्वोने से “भाए*अभ+छु” पुनः झदार मैं गिक्र झारे सो 
भाग+छु" रद, ऋब डकार की इत्संद्ा “रा के स्थान में “र" शोदूर पुनः उदार की हसरेडा शाप 
जाने पथ्यात्‌ "पागर” ऐसा दद्दा झऋद रेफ के रुपात में (:) विराशमीय होषर "भाग? दश इुफए 
रू दुआ | जिस २ धत्र से जो ऐ काये होता दि उस इसको पढ़ एट्रा के ऋर तिखादा कर बाण 
राता जाप । इस प्रकार पहुने पढ्ाने ते बहुत शीघ्र दृइ दोध धोता टै। एक दार इसी शबरर इाष्टा- 
पी पढद्ा के धातुपाठ अधेसदित और दशा राकारों थे: रूप शथा शविया सहित श॒हो के: बे 
चांतू सामास्प पत्र जैपे “दःमेएदणय"” कर्म डएपर छगा हो हो धाजुमाद से झाए प्रस्त्यट्टी केसे 
एग्भकार/' दधात्‌ ऋपदाद एुत्र जैसे “हझातो5गुपसमें क्:” डफ्सगे मिक्त बमे वपएइ क्र हो को 
काशम्त धातु से “का प्रस्यए होरे, अर्पात्‌ शो दहुग्पापर जेसा दि इम्शेप्पइ रूगा हो हो सपा 
जुध्ों से ऋएू मात्र दोता दे इससे विशेष अूधोंद्‌ ऋप्य दिधुण बसी पूर्व छूज ८ दिदर दे मे 
काशस्त धातु को "कर" शायद ने शटण बर लिया से इससे दे विषय में कएदद रद बॉग सुस्त 
दी टै दैसे ऋपवाद घच के दिदय मैं शप्सने धुश बे प्रप्तलि हों होतो | झेसे शरश्प्ष, गाजर के 


प्य मैं म्राएश लिंक झौर भूमिदारों बी भषुति होरी टै दैसे रागश्लिश राशदि दे शह्ण है चइइकी , ,.... 


श््‌ 












घ्० सत्यायेंप्रकाशः 


की प्रवृत्ति नहीं होती । इसी प्रकार पाणिनि मइर्दि ने सइस्त्र ख्छोकों के बीच में < शब्द झर्य श्र 
सम्बन्धों फी विद्या प्रतिपादित करदी दे । धातुपाठ के पश्चात्‌ उयादियण के पढ़ाने में सर सुबस्त इ| 
विषय अच्छे प्रकार पढ़ा फे पुनः दूसरी बार शद्बा, समाधान, घात्तिक, फारिका, परिभाषा फी घटने 
पूर्वक, अष्टाष्यायी की द्वितीयानुवृत्ति पढ़ते । ददुनन्तर मद्दामाष्य पढ़ाबे । अर्थात्‌ जो बुद्धिमार 
चार्थी, निष्क्रपटी, विद्यात्द्धि के चादनेवाले नित्य पढ़ें पढ़ावें तो डेढ़ वर्ष में अष्टाध्यापी ओर डेढ़ है] 
मद्दामराष्य पढ़ के तीस यर्ष में पूें चैयाफरण धोकर वेदिक और लोकिक शब्दों का व्याकरण से बोध *| 
पुनः अन्य शात्मों फो शीघ्र सइज में पढ़ पढ़ा सकते हैं। किन्तु जैसा बढ़ा परिश्रम व्याकरण में शः 
है पैसा भम अन्य शास्त्रों में करमा नहीं पढ़ता और जितना योध इनके पढ़ने से तीन यर्षों में दोग ॥ै 
उतना धोध झुप्रस्थ अर्थात्‌ सारस्वव, घन्द्रिका, कौमुदी, मनोरमादि के पढ़ने से पचास धर्षों में ई॑ 
नहीं दो सकता। फ्योंकि जो मद्दाशय मह्दि लोगों ने सइज्ञता से मद्दान. विषय अपने प्रन्थों में 7गी| 
शिव फिया दै वैसा इन छुद्दाशय मनुष्यों के कल्पित प्रन्‍्धों में क्योंकर दो सकता डे ? मह्ि छोगों ४ 
आशय, ज्ञर्ईा तक धोसफे वहांतक, सुगम और जिसके प्रदण में समय थोड़ा लगे इस प्रकार का हो 
है ओर छुद्राशय कोों की मनसा ऐसी द्वोती दै कि ज्टां तक यने यडां तक फठिन रचना करनी हित 
पड़े परिथम से पढ़ के अहप लाभ उठा सकें जैसे पदाढ़ का खोदता कौड़ी का लवाम होना। शोर श्र 
प्रन्थों का पढ़ता ऐसा दे कि जैसा एक गोता लगाना बहुूल्य मोतियों का पाना। व्याकण्ण को पर 
यास्कमुनिहत.निघण्द्ध ओर निदक्त छः या आठ मध्दीने में सार्थक पढ़ें और पढ़ावें। अन्य 
अमरश्कोषादि में झनेक ये व्यर्थ न स्रोथें। तदमन्तर पिश्नलाचायछूत घन्दोग्रन्ध जिससे वैदिक छ्ौडिई 
- छुन्दों का परिश्षान, मवीन रखना और खोफ बनाने की रीति भी यथावत्‌ सौखें। इस प्रन्थ और खोरो 
की रखना तथा प्रस्वार को चार महीने में सीख पढ़ पढ़ा सफते दैं। और दृत्तरह्ाकर भादि भर| 
धुद्धिपकरिपत धम्यों में सनेक थर्ष न खोयें | तरपश्यात्‌ मनुस्खति, बातमीकीय रामायण और मार्ग 
के उधोगपर्षोन्द्गेव विदुरनीति झादि अच्छे २ प्रकरण जिनसे द्ुए व्यसन दूर वो और उत्तमता सम, 
प्राप्त डो वैसे को फाव्यरीति से अर्थात्‌ पदच्छेद, पदार्थोक्ति, भत्वय, पिशेष्य विशेषण और भावार्थ * 
अऋष्यापक लोग जगाएँं ओर विदार्यी लोग जानते ज्ञायें। इनको थर्ष के भीतर पढ़लें। तदुनस्तर पे 
- मीमांसा, यैशेषिक, म्याय, योग, सांस्य और वेदान्त भर्थात्‌ ज््दवां तक यन सके थट्दां तक प्रषिष्ठत “| 
कयासद्दित अथपा उत्तम पिद्वातों की सरल व्यास्यायुक्त छः शास्तों को पढ़ें पढ़ायें। परस्तु बेदान्त रा 
दे पढ़ने के पूरे इंश, देन, कठ, प्रश्न, मुश॒डक, माएइक्य, पेनरेय, तैत्तिरीय, छाल्दोग्प और शददाप्प! 
इस दशा डपनिएदों को पढ़ ले छः शास्मों के भाष्य युसिसद्ित सुत्नों को दो थर्ष के भीतर पढ़ाएँ ई। 
पढ़ खेें। प्ाद्‌ छः यों के भीवर चारों ब्राह्मण अर्थात्‌ ऐेतरेप, शतपथ, साम और गोपथ * 
झे सट्दित घायों वेदों थे स्वर, शध्द, अर्थ, सम्दस्ध तथा क्रिया सद्दित पढ़ना धोग्प दै। इसमें | 
स्पय्य॑ मारधा स्लामृंदधीत्य बेए न विनानाति योध्येंघ्। यो5य॥ इत्सरल 
नाकमेति इर्त॑रिपूवपाष्मा ॥ [ निरक्त ३१। ३८]... श 
एइट दियख में मस्त टि।ज्नो देद को स्वर और पाठ्मात्र पढ़ के झर्थ नहीं झानता 
दुष्ट, बाकी, पके, फःख, दत्त और अग्य पयु घाग्य भादि का भार उठाता दै पैसे भारपाद भर्थाद 
का टटानेद!का टै, झोर शो देद को पड़ता और डसका यथावत्‌ अर्थ ज्ञानता दे यद्टी सम्पूर्य भाव 


कल) से रिएम्त के दशाल्‌ डाव से पापों को छोड़ पदिद चर्माथरण के प्रवाप से स्वासग्द दो 
दोटा है ॥ 


दवीपसमुज्ञालः भर 








उत लव पश्यक्ष दंदशे या्॑शुत तवे शुए्यलन मृंणोत्येबाम्‌। उतो लैसी तने! विसर्स 
जायेब पत्प॑ उशती मुबासोः ॥ ऋ० ॥ में० १० । सू० ७१। में० ४ ॥ 


हो अपिद्वान दें थे छुनते हुए नहा छुनते, देखते हुए. नहीं देपते, घोलते दुए नहीं घोलते 
अर्थात्‌ ऋदिदान लोग इस विधा दाणी के रइस्थ को नही ज्ञान सकते किन्तु जो शब्द प्र्थ और 
सम्बन्ध का जाननेपाला दै उसऊ लिये दिया जैसे सुन्दर धर्म भाभूषण धारण करती अपने पति की 
कामना दरती दर स्री भपना शरोर और स्वरूप का प्रकाश पति फे सामने करती दे वैसे दिद्या विद्वान के 
लिये अपने एयरूप का प्रद्याश फरती दे अऋपिदानों के लिये नह ॥ 


ऋषो झधरे परमे ध्योमन्‌ यर्मिन्देया भधिविश्वे निपेदुः। यस्तन्न पेद फ्िमचा फा्रियति 
य इसतद्विदुस्त इमे समासते ॥ ऋण० ॥ में० है। ० १६४ । मे ३६ ॥ 

छिस ध्यापक अपिताशी सर्दोत्तःए परप्मेश्पर में सब्र पिद्वान्‌ और पृथिपी छूपे आदि सप्र लोफ 
स्थित है कि जिस में सद बेदों का मुक्य तात्पये ऐ उस घह्म को जो नहीं ज्ञानता यह परगग्वेदादि से फ्यां 
कुछ एस को प्राप्त दो सकता दे ! भद्दों २, किन्तु जो बेशें को पढ़ रे धर्मात्मा योगी द्योकर उस प्रह्म को 
झामले हैं थे सब परमेश्वर में स्थित दोके मुक्तिरुपी परमानन्द को प्राप्त होते हैं। इसकिये जो कुछ पड़ना 
था पढ़ाना द्वो रद्द अर्थेदात सदित घादिये ॥ इस पभकार खब बेहों को पढ़ के आयुर्वेद अर्थात्‌ को घरक, 
सुशुत आदि ऋषि मुनिश्रणीत पेधक शाह्र दि उसको अथे, किया; शस्र, छेदन, भेदन, लेप, चिकित्सा, 
निदान, ओपध, पथ्य, शरीर, देश, फाल झोर यस्तु फे गुण घानपूवे फ ४ (चार) यपे फे भीतर पढ़ें पढ़ावे | तद्‌- 
शन्तर थत्तपेंद अर्थात्‌ शो राशसम्पस्धी काम फरता दे इसके दो भेद एक निभ्न राजपुरुपसम्धन्धी भोर 
दूसरा प्रशासम्धर्धी द्ोता दै। राजकार्य में सभा सेना के अध्यक्ष शस्त्रात्र विधा नाना प्रकार के व्यूहों 
का अभ्यास अर्थात्‌ सिस्तक्नो झाजकल “क्रवापद” कहते हैं जो कि शघुझों से छड़ाई फे समय में क्रिया 
करनी द्योती दे उसको यथादव्‌ सीखें भौर जो रे प्रश्ञा फे पालन ओर घृद्धि करने का प्रकार दे उनको 
स्रीख के व्यायपूर्यक सद प्रजा को प्रसप्त रफ्खें, दु्टों को यधायोग्य दणष्ट थ्रेष्ठों के पालन का प्रकार सब 
प्रकार सीखलें। 'इस राजदिधा को दो २ वर्ष में सीखकर यान्धर्षेषेद कि शिसको गानविधा कट्दते दें 
उसमें स्व॒र, राग, रागिणी, सम्रय, दाल, भ्राम, तान, धादित्र, हृत्य, गीत आदि फो यथावत्‌ सीखें परन्तु 
मुच्य करके सामवेद का गान धादिष्रवादमपूर्पछ सीख ओर मारदसंद्ििता आदि झो २ आएं प्रन्थ दँ 
उनको पढ़ें परन्तु भइवे बेश्या और विधयासक्तिफाश्क यैरागियों के पदेभशप्दयत्‌ व्यर्थ आलाप फभी न 
करें। अर्थवेद कि जिसको शिस्पविधा फट्दते थे उसको पदार्थ गुर विडान क्रियाकरौशल नातायिध 
पदार्थों का निर्माण प्चिष्री से लेके झाकाश परयेन्त की विधा को ययावत्‌ सीख के चर्थे अर्थात्‌ शो 
ऐश्वय को यगढ़ानेयात्रा दै उस विधा को सीख के दो धप्े में ज्योतिप्शास्त्र खुयेसिद्वास्तादि जिसमें 
बीजगणित, झइ, भूगोल, गोल ओर मूगर्भविद्या दे इसको पथापत्‌ सीखें। तत्पद्यात्‌ सर प्रकार 
की इस्तक्रिया, थन्‍्त्रकन्ना आदि को सीखें परम्तु जितने प्रष्ट, मकछ्तत्र, जन्मप्र, राशि, मुट्ठते आदि के 
फछ के विधायक प्रम्थ हैं. उनको झूठ समझ के कमी भ पढ़ें भौर पढ़ा ।ऐसा प्रयक्ष पढ़ने और 
पढ़ाने वाले कर्र कि जिससे धीस था इक्मोस ये के मोतर समप्र विद्या उत्तम शिक्षा प्राप्त दोके मलुष्प 
खोग छतृत्य दोकर सदा आनन्द में रहें। जितनी विद्या इस रीठि से बीस वा इश्कीस दर्षों में दो! सकती 
है उतनी अम्य प्रकार से शतयपे में भी नदों दो सकती ॥ 

आषिप्रणीत भ्रन्थों को इसलिये पढ़ना चाहिये कि दे दड़े दिद्वाद छद शास्त्रपित्‌ झोर धर्मास्मा 


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४२ सस्पायेंप्रकाशः 
थे और झनूपि अर्थात्‌ ज्ञो अर्प शास्त्र पढ़े दें भौर जिनका आत्मा पक्षपातसद्दित दे उसके बनाये हु 
प्रन्थ भी वैसे दी हैँ ॥ 


पूर्रेमीमांसा पर ब्यासमुनिकछत व्याण्या, वैशेषिक पर गौतममुनिकृत, न्‍्यायसूत्र पर यात्स्याप” 
मुनिछत भाष्य, पतश्वतिमुनिकृत छच पर व्याससुनिकृत भाष्य, फपिलमुनिकृत सास्यछत्न पर भा 
मुनिदत साध्य, ब्यासमुनिशत बेदान्तसूञ्न पर धात्स्यायनमुनिछझत भाष्य अथया बौधायनमुनिरुत हे 
घृक्तिसद्ित पढ़ें पढ़ावें। इत्यादि घूधों को ऋूटप झक्ठ में भी गिनना चाहिये जैसे ऋग्यजु, साम भी 
अधथर्प चारों थेद्‌ ईश्वरकृत दें पेस ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ चारों ध्राह्मण, शिक्धा। फहप मे 
करग, नियण्ट्र, नियक, छन्दर और ज्योतिप्‌ छः येदों के अक्छ, मीमांसादि छः शास्त्र येदों फे उपाग, आयु 
घतुर्येद, धासधववेद और अर्थवेद ये चार वेदों के उपनेद इत्यादि सब्र ऋषि मुनि के किये प्रग्ध हैं, एव 
भी शो २ वेदविदद्ध धतीत दो उप्त २ फो छोड़ देना। क्योंकि थेद ईश्यरफत दोने से निर्धान्त स्यत/पमाए 
अध्धाय्‌ बेद का प्रमाण पेद द्वी से द्ोता दे घाह्मणादि सए ग्रस्थ परत:प्रमाण भ्र्यात्‌ इनका प्रमाण वेद 
& । दे झती विस्प स्पारण फ्रग्येदादिमाध्यमूमिका में दैस लीजिय और इस प्रन्थ में भी झागे लिखेंगे। 
अइ हो परिध्वाग के योग्य प्रस्थ एँ उगफा परिगणन संच्तेप से किया जाता दै भर्षाद्‌ जो 
शीये धत्ए लिरेंगे दद् हे शागपरथ हामझता घादियें। व्याकरण में फातस्त्र, सारस्थत, पररिरश 
शुस्परेकत, कोमुरी, शेप, मतोसर्मारि। कोश में अमरकोशादि। छन्दोपन्ध में छ्तरदाकरादि। 
है रच दिए धपपपाम पादितीप मे यथा इत्पारि। ए्योनिष्‌ में शीक्रबोध, सुहनर्तथिन्तामणि भीरि 
दगाए दे हा दि दाह, इवशयावरद, ब्यु्वरा, माय, किराताजुनीयादि । मी्मासा में धर्मसिस्धु, मताशी 
हट्टीबिइ मे हइं सकता द। शरद में शागदशी भावि। योग दृठप्रदीपषिकादि। सांस्य में सांदपा५ 
बोहुदाह। गाल वे बरवामिष्ठ या शद्॒र्थारि । पैचक में शाईघरादि। स्मृतियों में मनुस्खति के प्र 
कपडे कोट इस्य सा स्मृति, सह र्हषप्रस्य, छाप पुराण, राब उप्पुराण, तुगंसीदासकृत मारता 
इ फिगारफ्रपअ धोश साई मापाध्त्प ये सर कपोक्कदियत मिच्या प्रस्ध हिं। (प्रह्मा ) क्‍या एके #् ; 
है शुद्ध शसार कह (उचर) थोड़ा सप्य तो दि परस्तु इस मे शाप वहुतसा भरारय भी दि हो, 
+नंददपरम्प तब दब कदाएपाए। बसे अस्पुक्तम अन्न विप से युक्त होने रो घोड़े योग्य बोता दे यैऐे' 
इनआ है; (ढप् ) ऋरा आप पुधाटा इलिद्वाप को मईदी मामत | (इसलर ) हैं मानते हैं. पएतु राख ६ 
दाह है निए्या कोई 4[ प्रश्न / झोत सर्व शीर कौन मिध्या दि ? ( वत्तर ):-- 
ब्ाप्मगाजी लि गाल दगणानि कस्बाने बाधा नागाशंगीरिति ॥ 
डक शाप पाशरि भा द कन है। हो वेदरेय, शवपयादि द्राद्यय सिश आये हसहों के ईतिईा' 
हुएह इफय शा अजय जब शाम हैं, ध्रीमद्भागववादि का माम पुराण मर्दों । | प्रध्)* 
मंदाजय इसरो है साथ है रिमइाअइश करों हुदी करते ? (इचर) जो २ इन शाव्य है सी रे पे 
कब शार्यों डा हैं झोर सिफ्य इररे शर छा? है। देवादि स्य शारपों के न्यीहार मैं बा करत हा पे 
हीफाओ है. हो काटे हक पिप्या इस्यों से खसय ना प्रदत करना थादे हो मिध्या भी उसहे गगे मिर 
के शेवाफिस ऑफ फमिद अब दुरकांपदाम्रिकी असत्य से यक्त फ्राचस्य राव्य को मर 3 
दुबे ईसा आए देव ओेचटड ऋष् ६: ६ ( व्रक्ष] शाइफाकन क्‍या दिए (इचत) वेद ऋषि हो 
देट है इध्ये कर ऑडरे डी ड्ि्ा को है धख + कट इन यदावस कहा धोवुही मामी है। हिरहि 
झट इप्फ के मय है इक कर इसका: बात कक टै। अेधत हे प्रसस हड हक क्पूप्यों को विशेष ऋष्धयों ई 
हक डा दे इ९ वदाण आटदिय 7 4 हक + डिसा कपासम्य घर ुसरे धत्धों का परल्वर विरोज दै ?े 





दवीयसमुन्नासः ध्टहे 





अन्य शा्रों में भी दे, जैसा एप विषय में छः शाजों वा विशेध टैः--मीमांसा करें, वैशेषिक काछ। 
ब्याय परमाणु, योग पुरुषार्थ, सांख्य प्रकृति और वेदान्त प्रह्म से एष्टि की उत्पत्ति मानता है, क्‍या यह 
विरोध नहीं है! (उत्तर ) प्रथम तो पिना सांख्य भोर येदान्त के दूसरे चार शाखों में र्टि की 
उत्पत्ति प्रस्तिद्ध नहीं लियी और इममें पिरोध मद्दों क्योंकि तुमको पिरोधायिरोध का ह्वान नहीं। मैं 
मुम्से पूछता ईं कि विरोध किस स्थल में द्वोता द ! क्‍या दक विषय में अथया भिन्न २ धिपयों में ! 
( प्रश्न ) एफ विषय में झनेकों का प्ररुपर पवियद कथन दी उसको विरोध कहते हैं, यहां मी रष्टि एक 
डी विषय दै। (उत्तर) क्‍या दिद्या एक दि था दो, एक दि, ज्ञो पक दे तो ध्याऋरण, पदक, एयोतिषप्‌ आदि 
का भिन्न रे विषय फ्ों दे जैसा एक विधा में अनेक विदा के अ्वययों का एक दूसरे से मिश्न प्रतिपा- 
दन द्लोता है थेसे थो एष्टिवेधा के भिन्त मित्त छः अवययों का शास्त्रों में मतिपादन करने से इनमें कुछ 
भी विरोध नद्दों। जैसे घड़े पे बनाने में कर्म, समय, मिट्टी, पिघयार, संयोग, पियोगादि का पुख्चार्थ, प्रह्ति 
के गुण ओर कुूँभार फारण है बैसे दी रष्टि का जो कर्म कारण दे उसकी प्यास्या मीमासा में, समय 
की व्याण्या पेशेषिक में, डपादाग फारण की थ्याय्या म्याय में, पुरुषार्थ की व्याण्या थीग में, सच्यों के 
अनुकम से परिगणन की प्याप्या सांण्य में और निमित्तकारण शो परमेशर टि उसकी प्याष्या देदारा- 
शास्त्र में दि इससे कुछ भी विरोध मद्दीं। जैसे पैद्यफशारत्र में गिदान, चिकित्सा, झोपधि, दाग ओर 
पच्य फे प्रकरण भिप्त २ कथित दें परन्तु सप फा सिद्धान्त रोग की निवृत्ति दे येसे ए एृष्टि ६ छः 
कारथ दे इनमें से एक २ कारण की ध्याय्य एक २ शाय्रकार ने परी दे इसलिये इसमें दद्ध भी विरोध 
गद्दी, इसकी विशेष ध्याण्य ए्टिप्फरण में फहेंगे ॥ 
शो विधा पढ़ने पढ़ाने के दिए दैँ उनको धोड़ देवे जसा कुर्संग अर्थात दुए विपरदोज्गों का 
संग, पुए्पप्सन जैसा मधादि सेवन भोर वेश्यायमनादि, प्राह्यावम्था में वियाद अर्थात पथेपाएं दर्ष 
से पूर्व पुषप चौर सोलद्यें ध्ष से पूर्ष पथी का वियाद्द द्वोज्ञाना, पूर्ण प्रहयर्प्प गद्ोगा, शाश, मात्रा 
विदा झोर विद्वानों का मेम -दैदादि शा्त्रों के प्रचार में न दोगा, अतिभोशवद, अतिशायरण बरता, पहने 
पढ़ाने परीक्षा हेने था देने में झालस्थ था कपट करमा, सर्वोपरि विद्या का शाम न समभना, धद्मायर्द रो 
पण, पुरि, पराक्रम, भझारोग्य, राज्य, धन फी शूद्धि म मामता, इईज्यर का ध्याग दोड़ अन्य पापा 
झह सूक्ति के दर्शन पूजन में ध्यर्थ काल सोना, माता पिता, चविधि और हायारदे, दिद्वार गसको 
सर्प मूर्सि मानकर सेवा राश्पय ने फरना, वर्णाधम के धर्म को दोग़ उर्ध्यपुणहू, तिक्षव, वतटी, 
माजाधाएण, एकादशी, चयोद्शी आदि घत करमा, काश्यादि तीर्ष और राम, हृथ्ण, गाराषट, छिच, 
भगवती, गणेशादि के सामस्मरण से पाए दूर दोने का विश्यास, एश्वणिशयों क इप्देश से विद्या पटटके 
में भ्रप्नदधां पा दोगा, पिया धर्म पोग परमेश्यर की डपासता के दिना मिध्या पुराशवामकह धागदच्यदि 
कते कथादि हे मुस्दि का मारता, छोर से धमादि में प्रदूस दोदर विदा में शीति म गहरा, इधर डथर 
ध्यधे घूमते रइना इस्‍्पादि मिथ्या ब्यपदारों में फैस के प्रहयरते ओर विदा के काम सेरट्टित होढर 
होगी भौर मूथे बने रइते दें ॥ 
अऋशाशइरह क ररेंप्ररायी ऋोर सवारी ध्राह्मण कगदि को दूसरों थो दिया सारेग से इटा झपर छाएगे 
शाल में पौँता हे; उनका शत, मग, धन गए वर देते दे झगोर याइते दे कि शो हर व्िएादि धरा एश्दर रिश्वार 
हो जायेगे शो हमारे पालएडडाल से छूट भगोर एमारे टल को शातबर इमारा! कपशाब ब रर। इच्दादि 
विषयों को राह और घ्रशा तूर करके अपने शूहटकों झरोर लटृवियों को दिट्टात्‌ चरने के लिए तन. मठ, 
चाह से प्रवह्ष किया करें।( प्रध ) क्या रच रोर शद भी देद पढ़ें ! शो ये पट ये लो शम फिर का क एए 
ओर इनके पहने में ममाण भी गएँ टै जता <इ दिपेध ऐैः- 


है. >कड०क+ + 





४४ घस्पाधेप्रकाशः 
8 5 82220 25 
सीशूद्री नाघीमातामिति श्रुवेः | 
ख्री और शद्ध न पढ़ें यह श्रुति दे। (उत्तर) सब ख्री और पुरप अर्थात मलुष्यमात्र को पटरेई 
अधिफार दे | तुम फुश्रा में पड़ो और यद श्रुति तुर्दारी कपोशकर्पना से हुई दे। किसी प्रामागिक हर, 
फी नहीं। और सब मलुष्यों के बैदादि शास््र पढ़ने खुनने के अधिकार का अमाय यजुयेंद के दर्तीसो 
अध्याय में दूसरा मन्त्र दैः-- 
ययेममा वार्च फल्याणीमावदानि णर्मेंस्पः। प्रद्यराजन्दाम्या७ शुद्राय चार्योय व छा 
चोरणाय ॥ [ यछु० थ्र० २६२ ] 
परमेश्वर फद्दता दे कि (यथा) जैसे मैं ( जनेम्यः ) सब मलुष्यों के लिये (इ्माम्‌)एँ 
( कर्याणीम्‌ ) कब्याण श्र्थात्‌ संसार भौर मुक्ति के सुख देनेद्दारी ( याचम्‌ ) ऋग्वेदादि चार्यों पेदों भे 
बाणी फा ( शा, बदानि ) उपदेश करता हैं चैसे तुम मी किया करो। यहां कोई देसा प्रश्न फरे कि है 
शब्द से द्विक्ों का अद्दश करना चादिये क्योंकि स्मृत्यादि प्रन्धों में आह्मण, क्षत्रिय, वैश्य डी के बेदों $ 
पढ़ने का अधिकार लिखा दे स्री ओर शद्भादि बर्णो का मदीं। (उत्तर)-(प्रह्मराजन्याभ्याम) शत्यादिरो 
परमेश्वर स्वयं फद्दता दे कि दमने आहझमण, क्प्रिय, ( अर्याय ) वैश्य, ( शूद्धाय ) श्र और (स्थाय) शरपोे 
सृत्य या स्रियादि ( अरणाय ) और अतिशद्वादि के किये भी बेदों का प्रकाश किया दे भ्र्थाव्‌ सब स्व 
घेदों को पढ़ पढ़ा और खुब छुनाकर विश्वान को यढ़ा के अ्रच्छी बातों का भ्रददण और बुरी बाठों का हा 
फरके दुःखों से छूट फर आनन्द को श्राप्त दों। कट्दिये अब तुम्दारी बात मारने था परमेश्वए की 
परमेश्वर की बात अवश्य माननीय दे। इतने पर भी ज्ञो कोई इसको न मानेगा थद्द नास्तिक कट्ठारेग। 
क्योंकि “नास्तिको वेदनिन्दकः” वेदों फा निम्दुक और न मानने वाला नास्विक फड्ठाता है।ि 
परमेश्वर शद्धों फा भला फरना नहीं चाहता! क्या ईश्वर पक्तपाती दे कि थेदों को पढ़ने छुतेग 
शर््रों के लिये निषेध और द्विज्ों के लिये विधि करे ! जो पस्मेश्वर का अभिप्राय शद्र आवि के की 
झुनाते फा न ट्वोता तो इनके शरीर में थाकू ओर भ्रोत्र इन्द्रिय क्‍यों रचता ! जैसे परमात्मा मे पृथिवी' 
जल, अग्नि, यायु, चन्द्र, सूप ओर अन्नादि पदार्थ खबर के लिये बनाये हैं. बैले दी पेद भी सभ के 
प्रकाशित किये हैं। ओर जा कह्दीं निषेध किया द्वे उसका अभिप्राय यद्द दे कि जिसकी पढ़ने पढ़े 
पे कुछ मी न आवे यद्द निदुदि और मूर्ख द्वोने से शुद्ध कट्दाता दि। इसका पढ़ना पढ़ाना व्यर्थ दे 
शो स्थियों के पढ़ने का निषेध फरते द्वो यद तुम्दारी मूर्खता, स्वार्थता और निदुद्धिता का प्रमार दवा 
देखो पेद में कम्यायों फे पढ़ने का श्रमाण:-- ., 
म्रश्नचर्य्येण कन्याई युयाने बिन्दते पर्िंध ॥ अपर्व  [कां० ११। प्र० २७। झ० ३ । मं० १०) 
असे खड़के प्रझचर्य सेवन से पूर्ण विधा ओर सुशिक्षा को प्राप्त द्ोके युवति, विदुपीः भपे 
झजुकूल प्रिय सहश स्थियों के साथ पियाद करते दें देसे ( कन्या ) कुमारी ( प्रद्मायरयेण ) प्रह्चर्थ लेदर 
से देदादि शास्त्रों को पढ़ पूर्ण विधा और उत्तम शिक्षा को प्राप्त युयति दोके पूर्ण युवाबस्था मैं अपरे 
शष्थ 22768 2२०4० युवावष्वायुक्त पुयप को ( बिन्दते ) श्राप्त दोवे। इसलिये रित्रयो 
॥ प्रह्म चः थे अभ्रपवश्य कर 
( उत्तर ) अपरय, देखो धौवयत्ादि 7४% 88 चादिये। (प््ञ) फ्या स्त्री लोग भी वेदों को पढ़ें 
पर सर इह इम सन्त पत्नी पठेद्‌ ॥ 
है मै इस मस्त्र को पढ़े ॥ डे बेदादि शास्त्रों को न गो यश में धवर 
रहित मस्त्री का डश्ासण ओर संस्टवमापण केस कर सके | सारतयर्प 20528 धंपयकप ग़ार्गी 





४ कद शतक, 5 हर दीपक, है, मत क, 
उ०) कोर श्र को गति 
कटा / दि जो हू मे फटे ही सर पथ कक क्कोकर, 
हि पक पक 7 सेब लोपा कक 
काश सा) ने स्पा 7भ्दि शक कः 
जे 07% पर 
7 जनक हू अकसे 
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चक्की 


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करन), दे जैक का करे सेफ दिये 

पान ३; चोर (४ स्कत 

 बोंग सक्ष 00240 ४ का हो 
कक अन्त, 3 केक ले 

स्थर- चोर जमे कक आजडे स्प्रे ते व 

हर हर सन्कको को 

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कनवाक, का शाशपण 
भम्स्क पैमयात, ५ कैश) 

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ते पिन मद तू, शक सा बा 

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बेदानधीत्प बेदी वा बेदं पापि यथाक्रमम्‌ | अ्रभिष्लुतश्चर्यों गृहस्पाभ्रममाविशेष्‌ | 


मनु" [३।१९) 
जा यपापत्‌ धरम [ में ] आयार्या नुकूल यर्त्तकर, धर्म से थारों पेद, सीन पा दो 
घक बे को साहीपाह पढ़ के मिसका प्रह्मचयये सगिडित न हुआ हो यद पुरुष था स्थ्री गुद्दाथम में गे! 
में प्रवीर्त स्पर्रमेण प्रश्नदायहरे पितुः । खम्बिण तस्प आसीनमहेगेत्ययर्म गया । | !' 
मनु [ ३।१, 
हो रपधम अर्पाद्‌ यवायत्‌ आचाये और शिष्य का धर्म दे उससे युक्त पिता अनफ थी परम 
पह्द मे धध्दाव भर्चाव्‌ विधारुप मांग फा प्रदण, माला का धारण फरनेयाला अपने पल में रे । 


कायाएं छो प्रथम गोदान मे सरकार फरे। पैसे लक्षययुक्त विधार्थी को भी कम्पा फा पिता गए 
दएबार कटे 8 





गुरयालुबतः इनास्या मरमायुत्तो यथाविधि । उद्धदेत दिनो पायो सपर्णी .. . . ५ ४ 
मनु ० [ ३ ॥ 


हुद छी झादा से स्‍तान ऋद गुगकुल से अनुक्रमपूरवेक आा के ब्राहण, दातिफ पेश 
शापंटशुक सुन्दर सश्णपुद्ध कन्‍्पा से वियाद करे ॥ गए! 
अपरिश्शा घ या मातुस्यगोया व या वितुः | था प्रशस्ता दिातीना दारकर्मणि मैरी 
| ॒ मजु० [ ३।! 
हे धस्ण माता दे कुस की हू; पीड़ियों में न दो चोर विता के योच की मो उस 
शा अरण: ट्रयित है। पसका यद प्वोडत है किः-- 
हि हर बे देया दे हि देवा; वस्यक्षद्ि: ॥ शतवप० ॥ ट 
है 230 लिंग ड है देश डेसी बरेक् बदादे में प्रीति होती दे धैसी पर्प्ता में हईी । सैर 
| धर प्र है कर कई जे हो यो डसडा मन पी मे क्गा रदता है, सैसे झिती परोए 
है हदल टिलिडर *5हते ॥। इल्स्ट एसड़ा इसनी दे देते ही दृष्तद अर्थाव्‌ ओ अपने गोद पा 
हुक विधट पम्कमक की # हो उसी कम्या से वर का वियाह दोगा चादिय ! विशद भौर 
अशिष्द् अकहब धइ दे है १)०४-ड़ों बलकद दान्यायश्या ही मिट शइते दि प्राशप हि 
कोई ह २ डय बहछ कक दुसरे के ८०, दूं च, दबपनाव, बारयादश्था रे वियाीत झाधरथ हरी 


३ घतुर्घसमुन्नासः घछ 





गे नहे भी एक दुसरे को देखते दें उनका परस्पर वियाद्द द्ोने से प्रेम फभी नहीं दो सफता, (२) 
सरा--जैसे पायी में पानी मित्राने से विलक्तण शुण गद्दी दोता वैसे एक गोज् पिठ था माठकुछ में 
दैयाह द्ोने,में घाठुओं में भदल बदल नहीं होने से उच्चति नहीं धोती, (३) तीसरा-जैसे द्वध में मिधी 
ग शुंध्धादि ओपधियों के योग दोने से उत्तमता होती दे यैसे दी भिन्न गोध मात्‌ पितकुल से पृथक 
त्तमान स्त्री पुरुषों फा दिषाद द्वोना उत्तम दे, (४) चौधा- जैसे एक देश में रोगी दो यद्द दूसरे देश में घायु 
गैर खान पान के बदलने से रोगरद्वित द्ोता दे वैसे दी दूर देशस्थों के विवाह द्वोने में उसमता है, 
४ ) पचिधें--निकट सम्बन्ध करने में एक दूसरे के निकट दोने में सुस्त दुःस का भाव भौर विरोध दोना 
वी सम्भव दे, दूर्देशस्थों में नद्दों, भर दूरस्यों फे विधाद में दूर २ प्रेम फी डोरी शम्प्री बढ़ जाती दै, 
पैकटस्थ विषाद् में नहीं, (६) छढे-दूर २ देश के वत्तेम्ात चोर पदार्थों की प्राप्ति भी दूर सम्बन्ध दोने 
* सइज्ता से दो सकती दे, निकट विवाद टोने में नहों । इसलिये:-- 
दुष्टिता दुर्िता द्रेहिता मवदीति ॥ निरु० [ ३। ४ ] 
कन्या फा नाम दुद्विता इस कारण से दै कि श्सफा विवाद्द दूर देश में दोने से द्वितकारी 
नेता दे गिकट रहने में मद्दों, ( ७) सातवें--फम्पा के पिदकुल में दारिद्रश्य होने का सी सम्भव दे, फ्योंकि 
व $ कन्या पिछकुल में आवेगी तश्र तब इसको कुछ मे कुद् देना दी द्ोगा, (८) आठबां--कोई निफट 
गने खे एक दूसरे को अपने २ पिदकुल फे सद्वाय का घमएड ओर झर कद भी दोनों में वेमनस्‍्य दोगा 
4 रर्री भट दी पिता के कुल में चली जायगी, एक दूसरे की निन्‍द्रा थधिक द्योगी और विरोध भी, 
योंकि प्राय; स्त्रियों का खमाय तीदण ओर झुदु द्योताद्दे इत्पादि फारणों से पिता के एक भोघर माता 
4 छुः पीढ़ी और समीप देश में विवाद करना अच्छा नहीं ॥ 
महान्त्पपि सदद्वानिं गोश्जाविधनधान्यतः । स्रीसम्बन्धे दशौतानि इुलानि परिवर्णयेत्‌ ॥ 
मठु० (३। ६) 
चाहें कितने ली धम, धान्य, गाय, अज्ा, द्वाथी, घोड़े, राज्य, थी भादि से समृद्ध ये फुल दों 
भी विदादसम्धन्ध में निम्नलिखित दश कुसों का त्याय कर देः-- 
हीनक्रिय॑ निष्पुरुष निशछन्दों रोमशारौसम्‌ । छ्य्पाम्याव्यपस्मारिथितृम॒ष्ठिउुसाने च ॥ 
मनु० [३॥७ ] 
” जो कुल सकत्किया से द्वीन, सत्पुय्षों से रद्दित, वेदाध्ययन से विमुप्, शरीर पर धड़े २ लोम 
-था बद्ासीर, क्षयी, दमा, खांसी, ग्रामाशय, मिर्गी, श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्टयुक्त हों, उन कुलों की 
त्या था थर के साथ विवाद धोना न चादिये, क्‍योंकि ये सब दुगुण और रोग दिधाद् करनेपाले दे कुल 
भी प्रविष्ट द्ोशते हैँ इसलिये उत्तम फुल फे खह्के ओर लड़कियों का झाएस में वियाद्द द्टोना धादिये॥ 
नोइद्ेल्कपिला क्या नाउपिकाओडी न रोगियीघ। नालोमिका नाविलोमां न वाचाटान्न पिड्लाम | 
मनु? [३।४८] 
मे पीछे येबाली, भ अधिकाड़ी अर्थात्‌ पुयप से छम्री, घोड्टी, भधिक बलदाली, म रोययुक्ता, 
घोमरद्वित, न पद्दुत लोमघाली, न यकधाद करनेद्दारी भोर भूरे नेद्रदाली ॥ 
नैहृधनदीनाओ्ली नाम्त्पपर्वतनामिकाम्‌ ) न पच्यहिपिप्यनाओी न च॑ मीपरानामिकराम्‌ ॥ 


मनु ० [ २३।६३॥) हा 


श्दर 

न आक्त अर्थात्‌ अश्यिनी, मरणी, रोडियीरेई, रेयतीयाई, चित्तरी आदि मात्र ७ 
सुतसिया, गेंदा, गुलारी, घम्पा, घमेली भादि शृद्ध नाम धाली, गड्ढा, यमुना झादि नदी 
अआडाती झादि अन्‍य मामदाक्ती, विन्प्या, दविमालया, पाती आदि पर्वत मामयाली, फोकिता, ; 
आदि पक्षी मामशली, मामी, भुझंगा आदि सर्प मामपाली, माधोदासी, मीरादासी आदि मेषय गारत 


सीमईैदरी, घंडिका, कानी आदि भीषण नामपाली फन्‍्पा के साथ विवाह म करना चादिये, कोर 
हाप्म हुत्सिद और इअन्प पदायो के भी है ॥ श 


अच्यद्टाडी सौम्पनाओ्ी इंसपारणगामिनीम । तलुलोमफ्रेशदशनां मृदरश्ीपुद्धेसिए 
मतु९ [ ३। १९ 
लिप साख धूपे भा दो पिशद न हों, जिसका गाम सुस्दर अर्थात्‌ यशोदा, राधा | 
है, इंस फोर श्री के शुल्य शिसकी सात दो, दम लोम केश ओर दातयुक्, भौर गिनो।! 
आफ भोदक हो दैसी मरी के साथ विपाद करगा घाहिये। ( प्रश्ण ) वियाद का रामप और प्रकार $ 
करण है | ( इचर ) सोच पर हे हो हे घोगीसायें बर् तक करवा और पथीरायें वर्ष से हे हे हा! 
अशाओे दव हंआ चुराप का विपाइ धमप उत्तम दे। इसमें जो सोलद और पश्चीस में विपाई 
हिदड, आर बच की सपी तीस बैंनीस या चालीश पर्ष के पुदप का मध्यम, चौरीरा दर है (॒ 
कफ ऋषु शादी रा दर्प के बुरुप का विषाई दोना उत्तम टे। जिस देश में इसी प्रकार वियाद कौ 
अं आल हट घई विधाणाएा भिर होता है यह देश रुथी और जि देश में प्रहयययें पर 
47० कककाहक एन कोर अपोशों का वियाइ दोतादि बह देश दुःख में हुवे शाता है, फ्योंहि ही 
किया के धर शापपेक विपाण थे गुधार दी हो सा बातों का सुधार और विगहने हे पि ॥ 


का है । ( अहक )-- 
कऋकएता शरर थोी जएवगों थे गोरिगी | दशयपी भरैरकरन्या तहत कर्ण रमछाता 
है हैं मिटा कहया कर! आता तयेद थे। बयस्ते नर पारित दया क्यों रगशताया 
$ की ६ ध४४टी ४४ मै प्ररोक में खिसे हैं । भर्व बद द|े कि कस्पा की आठ ढय हित 
कै चोटी औरत को *े ८९, वह कप डस्था झ४ उसे आगे रजस्वशा रंजा होती दि॥।। डी प 


आा। # अं ६६८ + ॥२६ रफहतइाहा छब्य को ब्राता विवा औट बढ़ा माई ये लीसों देश के अर 
हज हूं. #चज : 


सरयार्थभकाशः 





लि स्रद्योयाच 
दडइएा अरब इदेवसदूर हिसी। पिया वा मत्करया शव ऊच्चे ररशता | 
कद कक कतन आता बडे ही बये् सदमे नि नाई बात्वि हवा क्यो तन तन 
है बड़ संच्रोजिशित प्रद्मपुराद हा बर्षा के 
कई + वरिलज इजद हैं कराए बक ककर! कःड़ उससे समय के ५ 
हि 806 टू 2१ छः मव को दाग कइने हैं शा 
अष्ए रन | हुई ईं ४०, फूड ई २ हिएी (जपट मी ऋम्या चीफ गये से कम्वचा ही जाती है। 
कह एकलथक: के ६ हू ७०९ आला गिल्‍न आह प्रपया क्रीट कॉटक संत मरह की हे है 8 ६ 
सपा + डर ; ४ दरइतय बढ़ीं है सत्य अरे अधाडी के कोड 
६ सट्टा है धक्ड | सस्य ; वाह हें करादर इतेह झरना या का मी बन हैं ४ 


कक $ डाणाड अन्त बढ़ ५ 


ही 4 ००२०० ६-६४ 
कोरी ह शप्बराह डी अध्य 


ह्‌० सत्यार्थप्रकाशः 





जज जज जल 7४४ 

(अन्न ) विधाद करना माता पिता फे आधीन द्ोना चादिये वा लड़का तद़की के गा 
(उत्तर ) लड़का छड़फी के प्राधीन विवाद्द द्वोना उत्तम है । जो माता पिता विवाद करवा कमी .* 
तो भी लड़का लडकी फी प्रसन्नता के बिना न द्वोना चादिये, क्योंकि एफ दूसरे की प्रसव पे , 
ने में पिरोध बहुत कम दोता और सन्वान उत्तम द्ोते हैं। अप्रसन्नता के विवाइ में नित्य है 
रददता दै। वियाद में मुस्य प्रयोगन बर भर कन्या का दे माता पिता का नहीं, फ्योंकि जो 
प्रसन्नता रहे तो उन्हीं को सुख और विरोध में उन्हीं को दुःख द्वोठा। ओऔओर-- हर 

सन्तुष्टो भार्यया भत्ती मत्री मारय्या तथैय च । यस्मिल्षेत कुले निर्त्य॑- ह हा ड। 

जिस कुल में सी से पुरुष श्रोर पुरुष से ख्री सदा प्रसन्न रहती दि उसी कुछ में झागद, 
ओर फी्ि नियास फरती दे और जदां विरोध, कलद्द द्वीता दे वां दुख, दरिद्वता और: /। 
फरती दै | इसलिये सैसी स्वयंवर की टीति आर्यावर्त में परम्परा से चली आती दि चड्टी श 
है। जब रत्री पुरुष वियाद्ध फरना चाईँ तप विद्या, विनय, शील, रूप, श्रायु, पल, कुल! शरीर ह 
मारादि यथायोग्य धोना चाहिये, जव्॒तक इनका मेल नद्दों द्वोठा तश्रतक विशाद में कुछ भी उह 
दोता झोर मे याल्यायस्था में वियाद्द करने से खुख द्ोता । 


लिश्क ः 
युवा मुधासाः परिवीत धआगार्स उ शेयान्‍्मवाति जाय॑मानः । ते घीरांतः कप रा 
साध्यो३ मन॑सा देवयन्वः ॥ १ ॥ ऋ० ॥ मं० ३ | छ० ८। में० 9 ॥ 


भा पेन घुनयन्तामर्शियीः शर्ईयाः शशया अदु्घाः । नव्यानव्या युव॒दयों शा 
मेहदेबानोमसुरत्वमेर॑मू ॥ ३ ॥ ऋ० ॥ मं० ३ । सू० ५५ । में” १६ ॥ 


पु शरदः शधप्राणा दोपायस्तोॉस्प्ों जुरप॑न्दीः। मिनाति भिंय् जि हट 
नु पनीयूपयों जगम्यू३ ॥ ३ ॥ कऋ० ॥ में० १ | यू० १७६ | मं० १॥ ५ 

हो पुदव ( परिवीत: ) सब ओर से यद्योपयीत प्रह्चर्य रोयन से उत्तमशिक्षा 2 
आुरू ( सुवाता:) झुम्दर पम्त्र धारण किया छुआ धहायर्ययुक्त (युवा) पूर्ण ज्यान दोफे * 
इर एशापर में ( झागाव्‌) आता दे (रा, ड) वी दुसरे विधाजरम में ( आवमानः ) ( 
( बशर ) भटिशप शोमायुकत मझलकारी ( मयति ) दोता दै।( स्वाध्यः ) अच्छे प्रकार ध्यागवर्त 
सा ) दिदान से ( देवपसतः ) विधाएंदि की फाममायुक्त (थीरास:) प्र्वयुक्त (फाषा४)0/ 
६ शम्‌ ) इसी पुप छो ( इच्चनपरि ) उन्नतिशीक करके प्रतिष्ठित करते हैं, ओर जो प्रह्मययंधा 
इश्न शिक्षा का प्रदण दिये विना अथवा शत्यावम्था में वियाद करते हैं थे स्त्री दुदप गए भाई 
किड्ाडो हे धाटिष्टा को धात री डोते 6 २2 

डे ( अप्रदुश्था: ) दिसी मे दुद्दी नड्टीं इस ( घनवः ) गोओं के समाग ( अशिरवीः। 
दक्या से दवदित | शपरेंगा) सइव्रकार से उत्तम व्यवद्ारों को पूर्ण करने द्वारी (शशपाः)« 
दश्दा को उजदन आगने इसी (मव्यानम्या:) मयीम २ शिक्षा भोर अवह्था रों पूर्ण (मपरती/ 
झा! सुइदार यू यकावस्थास्य नदियां (देवागाम्‌ ) ब्रह्मथर्य सुजियमों से पूर्ण विधाणों के | 
कपित्ीर ( ल्डल )इढ ( अपुरादम्‌ ) बड़ा शान्त्र शिक्षायुक्र धरा मैं रमय के भावाय को 
इुई हदक पिया हो बराक इड (अवुरपस्ताम ) गय घारत करें। कमी मृत के भी बास्वार 
इुंदर ब्रा हक से मी ध्यान अ करें, क्‍्योरि यही करे इस शोद घोर परक्षोक के घुस फा तर्षि 
अपपसम्या है दियाइ मे दितशा तुरव का गाए इससे छा विद क्री का मार होता है ॥ 725 


चतुपैसमुद्नासः 





जैत ( नु ) शीम्र ( शधमाणाः ) अत्यम्त धम करनेद्वारे (दृषण:) थीर्य सोचने में समर्थ 
पपायस्थायुक्त पुयप ( पक्षी: ) युवावस्थास्य दृदयी को मप्र रिरर्षों को (झगस्थुः) शत होकर 
वर्ष था उससे अधिक आयु को आनन्द छ भोयते और पुत्र पीआादि से संयुक्त रइते हैं बैसे 
[एप सह पर्तें। जसे ( पूर्दों: ) पूरे वर्चमान (घग्द) शरद ऋत्॒धों भर ( शरयम्ती, ) घृद्धादस्ा को 5 
एराने थाली ( डप्सः ) प्रातःकाल की बेलाझों को (दोपा) राषी झोर ( दस्तोः ) दिन ( हमूना: 
प्रशरों की ( प्लियम्‌ ) शोमा को (क्रिया ) अतिशय पृद्पन दल चौर शोमा को द्र दर देटा हे 
अष्टम) मैं रट्ी था पुणर (ड) अच्छे प्रकार ( ऋषि) निश्यय वरक धद्धायये से विधा शिष्टा शे 
प्रौर झारमा के बल शोर युवाष्मया को प्रात द्वी ही फे वियाद् करूं, इससे विश्य कररा ब्रेइदि 
ऐने से खुपशपकत दियाद शद्दों होता ॥ ३ ॥ 

शपतक इसी प्रकार सब घऋषि मुनि राज्य मधराजा झआार्ष लोग ध्रद्घपें से दिया पढ़ 
है स्वर्पपर विधाद करते थे तश्तक इस देश की सदा इच्चति दीती थी। शव से धट धर्म दर्य रे (4 
का गे पढ़गा, दाज्पायस्था में पराधीन रूर्धात्‌ माता विता के ऋधीन दिप्व'द् हो कूगा हा हे हे 
सार्पावत्त देश को द्वानि द्वोरी घलीचाई दे। इससे इस हुए वाम को दोह के गझुन कप दूदे 
प्रहाए से स्थयंवर विधाद किया करें । सो पिदाइ पर्णनुरुम से बरें छर दर्रापदग्पा भरी र 
कर्म, स्वभाप के भगुसार होगी धादिये। । प्रक्ठ ) कया जिपके दाता विता धादप शो बह £फः 
व्राष्मप द्ोता है भौर जिसद माता पिता भस्य पर्णग्ध हों इसका समान कमी प्राद्माए हों सच है 
(इतर ) हा बहुत से होगये, धोते ऐं भोर होंगे भी, शसे द्वारदोग्प शपतिपद कै शापाक्त प्रति आइा 
चुख, मद्राधघारत में विश्यामिद्र शजिय बण छोर मातद़ चापि चांदात पु करे धाह्ूए होगे ७, 
भी शो इत्तम विधा ह्यभापदारा दे यद्दी धाह्मण के पोग्ध और मृ्ठ शद ८ दोग्प टोडाटि बोर 
ही झांगे भी द्ोगा। (प्रश्न ) भन्मा जो रक् धोये से शापोर शुशाटर दटट बदल दर दूरार ढऐे के एं। 
हेसे दो सकता दे! ( उत्तर ) रुक थीपे रु पोय से मपमण रारार चह्टी धोगा विस्‍्यु 
झाप्यापेन जपैदमेप्ैदियेनेश्यया सुतैः । महापईए यहँप प्राक्ौएं बिएवे हर ॥ म2९ [२।२४८ 
| इफका भझर्थे पूप ब: झादे हैं ऋूइ यथां भी रंऐप से द इते है | | क्दाध्प'दंचर ) पहके रए 
(जप!) पिदार करने कराने, मागादिध दोम छ अनुष्टाय राम्पृण बेरों को (पद, छएे श्पएरढ # 
रीदाररासद्ित पहने पहाने ( एश्पपा ) पौर्रमाली इए क्शदि रे धरने (हुई ) दर्षोष्त दिपु धर्म 
'र््तादोत्एत्ति ( भदपरेश ) पूर्षोरुत प्रह्यपह, देदपश, पिएुएष्, ऐश्य रेवएश $प ९. छिट्ट (दर ६? का“ 
होमादिएड, विद्वानों का संग, रफ्कार, सत्यमापणद, परोएकाराई सत्यदसे कप सग्पू् हिलस एटा 
सढ़ के दुएतदार छोड धेशायार में, र्ते से (शण्म )रइ (४जु ) शोर 485) ऋष्ाद 
( दिचार ) विःएा कापा है ६ क्‍या इस रुशेष वो हम बशों झागोे !प्ाजने हैं सदर कसर बा ४ | 
योग से दर्णेस्एबरपा सागते हो !ैं है ऋदला सायं झामपा दिम्जु बशुतत छोर एपम्शरा हो मेंस, 
धहागरे ह।( धन्न ) बया तुम पररपरा का भी ऋरएत बरोगे | ६ उत्तर ) शहर कामत मुगएपरी श्र स्पा 
! बोर महा स्वान थे; सापश्टन भरी बरते है । ( शश्त ) हमारी कहरों छोर शाशारों था सम्म है. इसने क 
।पशत । ( इचर ) दहे भा दि दिए को शुम पंच शाप एीहिए! के छरसंशनर दो शारामज शक 
(साले हो ओर दम देह हथा सुद्धि ह भारश्म से ऋाकए:स्व ९१ एराएपा मप्णके है।टेको फ्षिलुकर पद 
/पेए दइ दु दुए झतोर शिसिका पु ६० बदट रिक्ष दुष्ट हुथा करों इधो शोए दा हुए रेकमे नें का 
/एै, इसलिए तुम होग काम में पई हो देयो मत धारक के कया बड़ा -. 





| 


रे 
मर कर 


बैरे सत्यार्पप्रदशाः 


4 


शेबास्‍्प छिसे यादा येन पाता रिवामशाः । देन गायातमदों मार्ग पेन गच्दण रिप्यने | 
35.5६ ५ पतु* [४॥ १७८ ] 
डिस मा्ये से इसके पिता, पिउल्रइ चल्ले हो उसी मामे में सत्शव भी चले परन्‍-ुु (सवाम्‌ ) 


शो सतदुरुद पिता पिवारइ शो उन्हों के मार्य में घ्चे ऋण जो दिप्र, पिषामइ हुए हों तो उनके शर्म 
में ऋमी न उे। क्योंकि उसने घमरिया पुरुषों के माप में चहने से दुःझ कमी मदों होता, पसझो सुम 
म्मसते हो दा गह्टों ? दो २ मानते हैं | ऋरेए रेसो लो परमेकछश की प्रकाशित वेरोेझ....... छतना- 
ठत ओर उसके दिशद्ध दे धइ रूगाउन करी गए हो सझती। ऐसा दी खब ५7 जिया 
महाँ ! ऋषरुप छाहिये ॥ सो पेस्य रू माने उससे कटष्टो शि सिस्तीका 2 5 50 लुच 
घतादथ दोदे तो क्या ऋपते दिता के दुरिटाइस्था थे ऋमिदनम शी 


दिठा अन्धा शो उसझा पुत्र मी ऋषएनी ऊरों को फोइ सेवे ! * ग 
पुष्र भी कुकमे दी करे ! नह २किस्नु छो को पुरुपों छेइतम धर ल्‍ 
ऋष देगा सर को अत्यावश्यक दे । को कोर रख योदे दे ४ भा हि 
रूमों के पोग से म माने तो उससे पुद्धना घादिदे .. कि हि] 
अऋषणश छछोन, सुझपरयन दोगप हो उसझो मो ४. शा म2 ही नि 
बसदे प्राझय के रूमे युरेड शिये ससरिये दद मापा * 
प्राप्मरा दि उत्तर शर्म रूरते है दे इए शाह्यारि ऋरर ० 
होे हो उस को भी उतग पर्स में ओर जो उत्तर 
विद झशशए रात ! को 
ग्राइसो( 5 हि * हे 

ड़ घ्द ११ 
इाम्रिप दाह. देशर 
तमुर्होते दें . - 
का अर्थ को तुमने." 
है्ड्श्क्श थ 
इरघोव्‌ पपारच गशों 
रे दुए्प परो री 
छकता। रसरहिऐ 
सर मे मुक्य -.. 
अक्छ बोदे का सम 
अोेद शाजु के परिसर 
कत्दे श्श कटे बद (7 
पैच॑बचछत ड़ कइ एड हृ 


सकितक ३ 
है डेप इने £ 
* शुरछ्ेस्कर के , 





बहुर्चैसम॒न्लासः ३ 


असम्मय दै। जैक्षा कि बन्पपा स्त्री के पुध का विषाद होना | भौर जो शुणादि अडों से धाहययादि उत्पक्ष 
दोते तो उपादान कारण के सदश प्राह्णादि की चाकृति अवश्य द्ोती। मेले मुख का ऋाफार गोवमाल दे 
चैसे दी इमफे शरीर का भी गोलमराल मुखकूति के समान होता चादिये। क्षत्रियों के शरीर मुझ के सदस्य, 
पैश्पों के रू के तुस्य और शरदों फे शरीर पय के सम्रान आकार याले दोने चादियें पैसा नहों होता, भौर 
शो फोई तुम से पश्ष करेंगा कि झ्लो २ सुझ्ादि से उत्धश्न हुए थे उनकी शाहायादि संहा हो परन्तु तुम्दारी 
में, क्‍योंकि जैले और सब खोग गर्भाशय से उत्पन्न द्वोते हैं दैसे तुम मी होते दो। तुम मुखादि से उत्पज्न 
न होकर आपझ्यणादि[ सेडा का ] अभिमान करते दो इसलिये नुरद्वारा फट्टा अ्थे व्यर्थ दे और जो हमने 
अर्थ किया दे थद्र सथा दे। ऐसा दी भन्यत्र मी कट्दा दै लेसा:-- 

थूद्रों श्राप्नशवामेति प्रायय्ैति शूद्रवाम्‌ । एत्रियालातमेसन्तु विद्देश्याचयेत पे 

मन्‌० [ १०। ६५] 

औओ शद॒कूल में उत्पन्न होके प्राह्मण, कत्रिय भोर पैश्य के समान गुय बसे स्वमाद बाला हो सो 
बह शद धाह्मण, छात्रिय भौर येैशव दोजाप, वैसे दो जो आह्ण चात्रिय भोर परपपुख मे डापच दुप्मा दो 
और उसके गुय फर्म खबाव प्रद्ध के सदृश हों तो बद्द शद्द दोडाप, यैसे प्रिय दा परप के शत में 
राप्प्न होके शाह्यण शाही पा श्र फे सम्मान दोनें छे घ्राह्मण भर घद मी दोशतप है। ऋषांव्‌ बारों 
वर्षों में जिस २ ये के सरश हो २ पुयप था स्री हो धइ २ उसी धर्य में गिनी जाते । 


परमचर्यया जपन्पों ये: पूरे पूर्व धर्णमापयले जाहिपखिती ॥ १ ॥ 2 
अधर्मयर्यया पूर्वों पर्यो भपन्ये जपस्य बर्णमापयते जारिपखिती॥ २॥ ये भापरतम्ध ५ यत दें । 
अर्थे:- धर्मोयरय से निहए यणे भपने से उत्तम २ धर्णो को प्राप्त दोदा टि दौर थए उस 
दर्ए में गिना आवे कि मिस र के योग्य दोवे # ( ॥ 
पैसे अधर्मा चरण से पूर्व २ धर्थाद्‌ उत्तम २ व्णयाला मनुष्य भपने ऐे गीधे दाहे थी को शाप 
दोता दै भौर उसी थर्ण में गिना आये ॥ २॥ जैसे पुरुष जिस डिप वर्ण दे दोग्य होगा दि देते शी हियपों 
की भी व्यपस्था समभमी खादिये ! इससे क्‍या लिए शुसा कि इस धार होने से सर धरे ऋपने २ गुर 
कर्स खमाश्युक्त धोकर शुदधता के साथ रइते एै, भर्पाव्‌ ग्राप्नगकुल में कोर द्ारिय देशए कोर शद के 
सब्श म रदे ओर क्षत्रिय पैश्य तथा प्रद्ध वर्ण भी शद्ध रदते थे ऋर्थाद्‌ वर्ण संकरता ह्रात म होगी इससे 
दिसी वर्ष की निम्दा था ऋषोग्यरा भी हे होगी । (मच ) हो रिषरी रे एक ही पुज दा पुरी हो दट दू छरे 
यर्ष में प्रवि. दोहाय तो उसके मा दाप को सेदा कोन क रेया और थंशच्देंदन भी हो कापंगा घी 
फया व्यवक्पा होनी चादिये (उत्तर) न किसी की सेदा का भह धोोर मे दंशच्दरत होशा, क्रो 








'प्यषस्था से मिलेंगे, इसलिये दुद्ध भी भम्यदस्था न होगी । यद गुद रुमो से बरों री ब्यटस्थः ; 
(भी सोलइयें वर्ष झोर पुयप की पदच्चीसद दर्ष की परीक्षा में नियत रुटथी छाट्टियें; झोर । 
अर्थात्‌ धाह्मण दर्स वा प्राधलों, पत्रिए दर्श झा दरवदिश, धेश्य दर्ण रा देश्ण, शूट कल र 
साथ विवाइ दोगा चाटिये तभी अपने +े दर्सो छे कम झोर पररुपर प्रीति झी «%< 

इस चारों बर्षो के रत्तंडप कमे भोर इस ये हैं:-- ४ ह 

; अध्यापनरष्पयन यशर्न याजने हषा "बा 4२ 


द्द 


उसको अपने खड़के शइकियों के बदले स्पदर्य झूबोस्य दूसरे रन्तान विधासमा आर राज्यमा पर पा 


श्र सत्यार्थप्रकाशः 


जलता 








ग्रेनास्य पिवरों याता येन याता पितामह्ाः । लेन यायात्सवां मार्ग तेन गर्छन्न रिप्यते 
मनु० [ ४। १७८ 

जिस मार्ग से इसके पिता, पितामदइ चले द्वों उसी भागे में सन्‍्तान भी चलें परस्वु ( सताम्‌ 
ज्ञो सरपुरुष पिला पितामद्द हों उन्दों के मार्ग में चर्तें ओर जो पिता, पितामद दुए दोंतो उनके मा 
में कभी न चलें । क्‍योंकि उत्तम धर्मारमा पुरुषों के मार्ग में चलने से दुःश्य कभी मह्ीं दोता, इसको शुः 
मानते दो या नहीं ! हां २ मानते एेँ | झोर देखो ज्ञो परमेश्यर की प्रकाशित वेरोर शत दे वद्दी सभा 
तन भर उसहे यिरद्ध दे घद सनातन कमी नदों दो सझती | ऐसा दी सई लोगों को मानता थादिये या 
सही ! झअवरुप धादहिये । लो ऐसा न माने उससे कट्दो कि किसी का पिता द्रिद्र दो भोर उसका पुन 
घनादथ द्वोवे तो क्या भपने पिता की द्रिद्रापस्था के अभिमान से धन को फेंक देये | क्‍या किसका! 
दिया अर्था दो उसका पुत्र मी अपनी झांछों को फोड़ लेवे | शिप्तका पिता कुकर्मी हो क्‍या उसका 
चुच भी दुझम शी करे ) नहों २ किस्तु शो शो पुरपों के उराम कम हों उनका सेयन ओर दुए कर्मी का त्पाग 
कऋर देगे सइ को ऋप्याप्श्पक दे । जो कोई रज यीये के योग हे पर्षणाभम ब्ययध्या माने और गुण 
कामों छू पोग पे मे माने तो उससे पूथना धादिये कि ज्ञों फोई अपने पे फो खोड़ मीय, भररपत्र 
अः्धदा कृप्रीर, गुसशमात दोगपा दो उसभो मी प्राह्मण क्‍यों महों मानते ? यहां यदी फड्ोगे कि 
शगरे शापप के कम थोक रिये एसलिये धइ प्राएण गद।ं टै। इसमे यद भी सिद्ध होता दि कि शो 
क्र है इचन कम करते दे वे दी प्राह्यणादि और ज्ो नीय मी उत्तम यर्ण के गुय करे स्वपापत्राज्ञा 
ह३ हो) इस दो भी इक्तम वर्ष मै ओर जो उत्तम वर्णम्ध द्वोरे भीच काम फरे तो उसको शोस पर्ण मै 
(०७४ ऋइरप बट ६८१६ प्रश )-- 

हापगोर्य दर्रप'मीद पाई राजस्पः कुता | ऊछ तर्दस्प यदरप॑: पद्भया* शद्रों भजायत ॥ 

दइ बडहुरें६ « ३१ वें अध्याप का ११ थां मस्त्र दे । इशका यह अर्थ दे कि प्राहण ईश्वए के । 
किए ई हू बेशद ऋष और एट्र पर्ों से उमपन्न हुआ दे। इसलिये जैसे गुल न बाह आदि झौर बा भार 
& ऋक हज है दर्सा धइर अाध्यग के कवियादि और साजियादि न धराहण दो पते । ( बत्तर ) इस रख 
अ १ कार्ड घ 27 दिया बह टैंक मई, क्योकि यदी एुरप अर्थात्‌ निराकार ध्यापद् परमाश्यां की धतुपृ्ति 
है। क< इइ जिपाइाज हैंड इसद८ सुभादि भज् नहों हो सकते, ही सुकादि भरहपाला द्वो वइ पुणे 
अद्यई बाएं अदा छोर ओ ध्यापद बडी बह समेशक्तिमान हतव्‌ का सश्टा, घन्‍्तों, प्रशपकर्ता, शैरों 
के दुस्प झरे ४ शाप ८ धयवस्या छरतेइारा, सर्वे, अजस्मा, प्रस्युरदित आानि विशेषशवात्रा हशी हो 
स्का; इल्ज डरे इ०का पह ऋर्च है हि आी (झबय। पूल ध्यापक परसासमा की यूट्टि मै गुस | 
कब हैं हु आर 2 हो इढ € हाफ । हापन्य (बाड़) “डाएुए बर्ल बाहुई बीवैम्‌! शवपधश्य॥/! 
बह दरें डा बन हद है कह डिसयें ऋषि हो शा (हाहत्यः) कवरिय ( ऊझू ) कोटि दे झजोमाए 
87 अर ऊ अप / लय अप था उस शब है जो सब पहाचों और सब रेजों 2 ऊर के कक हे आरे 
कष ककट हुई बंद दंग | रब अं ड़ | बदब्याल ) हे गया दे अधात्‌ बचे आड़ दे दशा मूर्च वा 
दे इकाई घद डए है. अमराद शतपय हायानावि मे भी इस हब का देख ही इरचे दिया है हैते “ 

हे इप्माद 6 इुआवास्त प्सप्युसद! दमृज्यल इस्पादि । 

अक्ा ह ॥ ऋूचर है ह फाड़ हि दर 2, थ 
गरम या मा दशक वा कम इ चर व 
का पद दैं। इराक क किकज हज के प्रकाह धक ही अइप हि मे हज कुडी, के डर, डत 









अहुर्च प्मुप्ासः श्र 


अरग्मर है। शैसा हि; बरूपपा करी हे पुत्र का वियाद दोना | और शो यु खादि झट्ठों से प्राष्षणादि उरप्त 
होते शो इरादा कारण के पद प्राह्मणादि की आहति अवश्य दोती। औते मुख का आकार पोलमाल है 
से थे इनसे शरीर का भी घोलमाल गुधाकृति के समान होना चादिये। दत्रियों के शरीर भुजा फै सदश, 
दैरपों बे: ऋझू के मुझ्य और श्रों के शारीर एस के रामान आकार पाले दोने थादियें ऐसा मरी दीता, भोर 
ओो दोए तुम पे पद करेगा दि शो २ मुधादि पे उतपप्न हुए थे बगकी ध्राह्मणादि संशा हो परन्तु तुम्दारी 
भी, इयोंदि असे झोर सब शोग पर्भाशय ऐे इत्पप होते हैं यैसे तुम भी दोते दो। तुम मुस्यादि से उत्पन्न 
मे द्वोइर ध्राष्परादि [ संझा दग ] झभिमान करते दो इसलिये मुरद्वार कट्दा शर्थ ब्यर्थ है और को हमने 
अर्ष किए है वद् सदा टे। ऐसा टी भम्पत्र मी कद्दा दि जैसा:- 
शुद्रो म्राप्थवानेत्रि प्राथणभैति शूद्रतामु । ध्षप्रियाजातमेवन्तु पियद्वेश्यातपैय वे ॥। 
मनु० [१०।६५१] 
थे शद फूल में डरफ्प होझे प्राप्रण, छत्रिप भौर येश्य के समान धुण कर्म स्भाष याता द्वो तो 
घट घद प्राह्यण, कत्िय भोर येशप दोजाय, पैसे दी जो प्राह्यण क्षत्रिय झोर पैश्यकुछ में उत्पन्न दुआ दो 
झोर हसके गुए कर्म स्वधाप घद ले सरश हों तो वह ग्द्र दोशाय, पैसे छत्रिय या पैश्प के कुछ में 
डरफ्ध होदे प्राद्मण प्राप्तपी था शरद के समान दोने से प्राह्मण और शूद भी ट्लोजाता दै। अर्धोत्‌ चारों 
यर्षों में जिस २ यणण के सदश शो २ पुयप था रत्री दो धइ ३ उसी यणे में गिनी जावे। 
पर्मचर्यपा जपन्‍्यों बे: पूरे पूपे बणेमापथते जातिपखित्तों ॥ १ ॥ 
अपमैयर्यया पूर्षों पर्ो जपन्‍्य॑ जपन्यं बर्थेमापथवे णाविषखिती | २॥ पे आपस्तस्य के सूत्र दें । 
अर्थ:- धर्माथप्ण ऐे निहए यर्ण अपने से उत्तम २ यों को प्राप्त दोता है और यद उस 
दर्णे में गिहा शावे कि जिस २ के घोग्य दोवे ॥ १ ॥ 
देते अधर्माथरण ऐ पूर्व ५ चर्यात्‌ उत्तम २ वर्णवाहा प्रनुष्प अपने से गीये पाले यर्णी फो घाप्त 
दोता दे झोर उसी वर्ण में गिना शावे ॥ २॥ ससे पुयर जिस जिप्त बरणे फे योग्य द्वोता दि यैसे दी स्त्रियों 
की पी व्यवस्था सममनी धादिय | इससे फ्या लिद दुआ कि इस प्रकार दोने से सव थर्ण अपने २ गुण 
कर्म सम्रावयुक्त द्ोकण शुद्धता के साथ रदते हें, भर्थाद्‌ प्राप्रयकुल में फोई क्षत्रिय पैश्य भर शद्ध फे 
, सदश मे रहे भर क्षत्रिय धैश्य तथा शद्ध परे भी शद रहते दे भर्थात्‌ वर्यसंकरता प्रात न होगी। इससे 
, किसी वर्ण की निर्दा था अपोग्पता भी त होगी | ( प्रश्न ) शो किसी के एक दी पुध या पुत्री दो पद दूसरे 
दिए में प्रविष्ट दोशाप तो उसझे मा बाप की सेवा कौम करेगा भौर यंशब्देदन भी दो जायमा | इसफी 
इ्पदश्या होनी चादिये ! ( इत्तर) म किसी की पेया का भक्त और म पंशच्छेदन द्वोगा, फ्योकि 
डतफो अपने शहके शाइकियों के धद॒ले स्व के योग्प दूसरे सन्‍्तान विधासभा झौर राशसभा की 
प्यवश्था से मिलेंगे, इसलिये कुछ मी भ्रध्ययस्था न दोगी। पद्ध गुथ कर्मो से बर्णों को व्यवस्था फन्याओं 
की घोशइपें वर्ष झोर पुदप की पय्चीसयें यर्ष की परीक्षा में तियत करनी घादिये, और इसी क्रम से 
चर्धाद प्राह्मण दर्ण का ग्राह्यणी, चत्रिय थर्ण का चत्रिया, पैश्प पर्णे का वैश्या, शत्ष यर्ण का शद्रा के 
जाप विधा होता चादिये हभी अपने २ यर्णों के रूम ओर परस्पर प्रीति सी यचायोग्व सद्देणी। अप 
इन यादों धर्णों के कप्तेध्य कर्म थोर गुण ये दें :-- 
पु अध्यापनमध्ययन पशन॑ याजने ठया । दाम अतिग्रइथैव प्रादयानामफस्पयत्‌ ॥ १ ॥ 


न मनु० [१। ८८ 


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जप 





३ सदार्यप्रफाशः 





शो दमस्‍्तपः शौ् चान्तिराजबभेव च | शान विज्ञानमास्तियय अद्कर्म खमावजम्‌ ॥ २ वा 
म० मी? [ अध्याय १८ | छोक 2 
«.प्राह्मण के पढ़ना, पढ़ाना, यश करना, फराना, दान देना, लेना ये छः कर्म हैं परन्तु “प्रविः 
प्रत्ययार:” मलु० । अर्थात्‌ ( प्रतिप्रह ) लेना नीच कर्म दे॥ १॥ ( शमः ) मत से घुटे काम की इई 
भी न करनी और उसको अधर्म में फभी परवृत्त न दोने देना ( दमः ) थोश्र भौर चल आदि इस्दि 
को झन्यापाचस्ण से रोक कर धर्म में घरूपना ( तपः ) सदा दछ्चचारी जितेनिद्रय द्ोके यमन 
करना ( शोच )-- ब॒द्धितनिन हि 
अद्विगाग्राणि शुध्यन्ति मनः सत्पेन शुध्यवि । विद्यावपोभ्यां भूवात्मा बुद्धिन्नोनेन शुध्यति ॥ 
मनु० [१। १०६] 
जज से यादर के अंग, सत्याचार से मन, विद्या और धर्माठुष्ठान से जीवात्मा और शान 
घुदि पवित्र द्ोती दे। भीतर रागदेपादि दोष और बाइर के मल्ों फो दूर फर शुद्ध रदना श्र्थी 
सत्याउस्तत्य के विवेकपूर्वक सत्य के भ्रद्रश झोर अंसत्य के त्याग से निश्चय पविध दोता दे।( ५] 
अर्थात्‌ निन्‍्द्रा स्तुति खुख डुःघ शीतोष्ण छुधा ठ॒पा द्वानि ल्ञाभ मानापम्रान आदि दर्ष शोक छोड़ 
धर्म में दढ़॒ निश्चय रहना ( आजेयर ) कोमलता निशमिमान सरलता सशलखमाद रखना कुटिशवतात 
दोप छोड़ देना ( शात ) सब्र येदादि शास्त्रों को सांयोगंग पढ़के पढ़ाने का सामथ्ये विवेक सत्य 
निर्णेय जो चस्तु जैसी दो अर्थात्‌ जड़ को जद चेतन को चेतन जानना और मानता ( विड्ञान ) 
से ले के परमेश्वर पयन्त पदार्थों को विशेषता से जानकर डनले यथापोग्य उपयोग लेगा ( आते 
कमी वेद, इईंश्यर, मुक्ति, पूरे परजन्‍्म, धमे, विद्या, सर््संग, माता, पिठा, आचार और अतिथियों 
सेदा को म घोड़ना भौर निन्‍्द्रा कभी न करना ॥ २ ॥ ये पन्द्रद्न कर्म ओर गुण धाहाण पर्णत्प माप 
में अयश्य दोने चादियें ॥ धत्रिय:-- 
प्रानां रद दानमिश्याध्ययनमेत च | विपयेष्पप्रसडिय ज्त्रियस्प समासतः ॥ १ ॥ [ मनु० १। 
शौपे देगा घातेददयं युद्धे चाप्यपशायनप | दानपीखसभाषश् चात्त कप खमावजध ॥ २ ॥ 
5 भ० गी० [ अध्याप १८। छोक ४२ 
श्याय से धवा की रक्षा अर्थात्‌ पक्तपात घोड़ के थेघ्ठों का सरकार और दुष्टों का विरश्टी' 
झरना, सप ट्रद्यार से सर का पालत ( दान ) विद्या धर्म की प्रयूत्ति योर झुपातों की सेदा में धनी 
दद्ायों का स्वए करना ( हाय ) अस्निदोधादि यज्ञ करना था कराना (अध्ययन ) येदादि शादरों £ 
घड़गा तथा पद्दाता ओर ( विवदेशु० ) दिपयों में न फँस कर जशितेग्द्रिय रह फे सदा शरीर शौर भा 
से दक़ब्र'न शहना8 १४ (शौय) सेकड़ों सदक्षों से भी युद करने में झफेला भय च॒द्दोताई तेडट| 


सदा मेशहरी अर्थ देना हित प्रगज्म दृढ़ रइना ( घृति ) पैवेवान्‌ द्वोता( दादप) राजा हर 
अखखघसइस्जी इप्यद्ार चोर सा शास्त्रों में अति चतुर होगा (ये) यू हि बा 
इससे कमी मे इटना से माता ऋर्था हु ६ युझे ) युद्ध में भी टू गिशई 


मी मम यू इस प्रकार से लड़ना कि जिपसे निश्चित विजशप दोये आप 5 
व डा पदों को धचा ने से शत दोती दो तो वेसा दी करना ( दान ) दानशीलता रथ 
डछझते ) पक्ततादव दोद सके राय यधायोग्प वर्सगा, विचार के दया, भरिष्ठा पूरी कर 
डे कक: इम! मश् होने मे देशा । ये ग्यारद सवबिए दर्व के कम और एण दें ॥ २॥ पैरप३-- 
न पर 
् 


इड दाउदिसपाध्यपनमंर थे वशियपर्ष डुसीदं ये वैरपस्प रपिमेंय थे ॥ मजुर [१। ध्यो 













चतु॒र्धेसमुप्नासः श्र 








(पशुरक्षा ) याप थादि पश्श्रों का पालन, यर्दत पाश्ना ( दान ) विद्या धर्म की पूद्धि करमे 
फराने के लिये धतादि का ध्यय करना (इज्पा) अम्निदोत्रादि यश्ञों का करना। अध्ययन ) वेदादि 
शाररों का पदुना( परिफ्रथ) सद प्रकार के व्यागर छरना ( कुसीद ) पक सैझड़े में खार, छः, 
आठ, बारह, सोह्ृद् या बीस भानों से भ्रधिक ब्यात और घूस से दूना अ्र्धात्‌ ए[क रफ्या दियाडी 
सो सो वर्ष में सी दो रपये से च्धिक न लेना औए देना ( रृपि ) पेठी करना, ये पैश्य के श॒रा, कर्म 
है। घद:- 
एवम तु शूद्रस्य प्रद्धः कर्म समादिशत्‌ । एवेपरमेय बर्णातां शुश्रुप्रामनद्॒यया ॥ मञु* [१ । ६१] 

खुद्ध को पोग्य दै कि निनदा, ईर्था, झमिमान झआादि दोषों फो घोड़ के प्रा्मय, द्वात्रप और 

पैदपों की सेधा यधावत्‌ फरना भौर उसी से अपना जीवन करना, यद्दी पक श्द्र पा शुषा, कम है है ये 
संत्ेर से दर्णो के ण भोए ऋमे छिणे। मिस २ पुरुष मेंशजिप्त * यर्ण के भुप फर्म हों इस २ वर्ण का 
अधिकार देना | ऐसी व्पषस्पा रणने से सद ममुप्य उन्नतिशील इोते दें, क्योंकि रफ्तम धर्यो ७ भप 
दोगा कि थो इमारे सन्‍्ठान मूर्यस्पादि दोपयुछ दोगे तो झद्र द्ोशदेंग और सम्ताय मी डरते रहेंगे लि 
शो दम डक छाल चलन थयोए विधायुक्त न द्ोंग शो घद्ध होगा पढ़ेगा। शोर मी यर्णो को इच्तम 
वर्ण॑स्थ होने फे लिये उत्साइ पढ़ेगा। विधा भीर धर्म फे प्रधाए का घपिकार प्राह्मय थी देगा, क्‍्योंहि 
बे पूर्प विधापान्‌ भौर धार्मिक द्ोने से उस काम को परधापोग्प दर सकते टैं। क्त्रिपों को शागप के 
अधिहार देने से कभी राज्य की द्वानि था विप्र मद्दों दोता। पशुपाशगादि वा ऋषधिबाए वैश्पों ही बे 
दोगा पोर्य है, पयोंकि थे इस काम को अप्दे प्रकार कर सइते टें। श्र को सेपा बा ऋषधिभार 
इसलिये दे कि वद्र विधारद्दित मूर्ण होने से विष्ठामसग्प्स्धी काम कुष्ठ भी मह्ों कर सबता दिखु शरीर 
के काम सर पर सकता दै। इस प्रध्यार धर्णो को अपने अपने झअधिवार में प्रष्ठ चररा धाश्य 
आदि का दाम दे / हट 
विवाद फे छचण 
प्राद्यो देपस्तयैवापै: प्राजापत्यरतयाओसुरः । गान्धर्यो रादम्धेप पेशाबब्ाध्मोःएमः ॥ 
मनु" [६। ३१) 
विधाइ आठ प्रकार का दोता टैे एक प्राप्त, दूसरा देष, शीसरा आएं, खोदा पक्‍शापाप, पांढईा 
आपुर, दठा गान्पर्ष, सातपां रास, चाददां पैशाय। इसमें से: दिवाएों बी ८६ प्यदादा रे हि-इर 
इण्या दोनों यधापद्‌ प्रक्षययें से पूर्ण विद्यान धार्मिश भोर सुरयोल हों डगरा एरएर मसइतठा के दिशा 
दोगा "धाम" बड्ादा टै। पिरदत य्ष करने में ऋार्यि कर्म करते हुए शामादा बो छब ट। ट्‌ः कड़ा 
को देता “देव । धर से दुए लेकर वियाद होगा “झा” । दोगों वा विषाद शर्म इत दृटि हे ४र्द 
होगा "प्राशपत्य” । धए और क्या को गुए देशे विदा इोगा "शापुर" । झरिदप, इष्फर हि 
कारण से दोगों की इष्दापूर्वपः वर कम्पा बा परएपट हेंयोय होना “गान्डद” । कट दर हकत 4 7 
आर्पाय दीन भापट या शपट से कम्पा का भट्टटा करना “पाह्ास। शापतन था मटर हु कई दजर 
कमम्पा रो बलासइपर पेयोग करता “दैशाय'। इन सद दिदाों ें द्राप्रदिवाद गाहतरद 2४ डर 
भाशापरव मध्यम, घाप, ऋआाछुर झोर धारणदे निहिए, राएर भधन भोर देएएड ब्इकट है - टक्कर चारी। 
निधप रशना थादिये दिए कम्श! ओर यर बा दिषाइ दे पूरे एशाग्ज में है श इस शाइक, अरी॥ 
युशदरपा मै हरी पुष्प बा एरास्यदास दृषट शरद  । चााजु शइ इम्ला शा हल हे ईज्क्ड हि सह 
हो ररर्पाद्‌ कर पद घप दा एः मशैरे मदयरर्याधम झोट दिया दुर्ते हत्न >>क हट रू हे 


श्ध सत्या्गप्रदाश: 


और कुमारों का प्रतिदिश्द अ्य्‌ शिसकों कोटोप्राफ कइते हैं अधपा प्रतिकृति उतार के ह्म्पा 
की अध्यायिकाशों के पास कुमारों की, कुमारों के अध्यायकों के पास क्यों थी वतिशदि मेंनई 
जिस ३ का झूप मिस ज्ञाप इस रे के इतिइास अ्धोस जो हम से ले के इस , हित बरस हत्या 
का पुस्तक दो उनको अध्यापक लोग मंगया दे देगें, शव दोनों के गुथ पर्स सामाय ३2 हे 
मिस ३ के साथ मिस २ का पिवाह होता सोग्प समर्मे इस | पुदा और 'हुस्या का प्रतिवित के 
इतिट्ठास कम्पा भौर यर ऐ हाथ में दैपे भौर करें शि इसमें जो तुस्दारा श्रग्ियाप दो सो इसकी 6 
कर हैना। क्षव उन दोगों का मिश्यय परस्पर पियाद करने का होशाय तप उत दोनों ढग समापन पडा 
समय में दोपे। मो थे दोनों अध्यापकों फे सामने धियाई करना चाई तो यह; नदी तो फरया थे पता 
के घर में वियाद दोना योग्य दै। शव थे समदा हों तद उन अध्यापर्ों वा कन्या के माता पिठा £ 
भद्गपुरुषों के सामने उन दोनों की आपस में बाव थघीत, शाख्रा्य कराना और जो का गुत शा 
पूछें सो भी समा में लिखके एक दूसरे दे दवाय में देकर प्रश्ोशर कर लेयें। शा दोतों का (4 
वियाद् फरने में होजाय तप से उनके खानपान का उत्तम प्रवरध दोना चाहिये फि खिससे उतका 2 
जो पूर्व प्रह्मचवे और विद्याध्यपयमरुप तपश्यर्या भीर कष्ट से दुर्शल दोता दे पद चासद्रमा की का 
समान बढ़ के थोड़े दी दिनों में छुट द्ोजाप ) पश्मात्‌ जिस दिन कत्या रमस्ाला दोकर जाई हट 
तब बेदी और मणडप रचके अनेक सुगन्धादि दुग्य और घृतादि फा द्ोम ठया अनेक दिदादे कं 
और झ्ियों फा यथायोग्य सत्कार फरें। पद्माव्‌ जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझें उसी रे 
“सस्कासथिधि” पुस्तकस्य विधि के अशुसार सब कर्म करके मध्य रात्रि या दश यजे श्रति हक | 
सब के सामने पायिप्रददणपूर्वक विवाद की विधि की पूरा करके एकान्त सेब्न करें। पुरुष कर 
ओर स्त्री वीयोंकर्पण फी जो विधि दे उसी केः अजुसार दोनों करें। छट्टां तक बने यहां तक प्रह्मचर्य के 
को ध्यर्थ न जञाने दें, फ्योंफि उस थीये का रस से ज्ञो शरीर उत्पन्न द्लोता दे धद्द अपूर्य उत्तम हहिर 
द्वोवा दि । ज्ञव बीये का गर्माशय में गिरने का समय द्वो उस समय र्पी पुरष दोनों स्थिर ओर तीखे 
के सामने नासिका, नेश्न फे सामने नेत्र अर्थात्‌ खूधा शरीर ओर झत्यस्त प्रसन्नचित्त रहें, डिगें 
घुरप अपने शरीर को दौला घोड़े और स्त्री वीर्यप्राेति समय ऋपान बायु को ऊपर खाँखे। योर 
ऊपर संफोच फर थीये को ऊपर आकर्षण कर के गर्माशय में स्थिति करे #। पश्चात्‌ दोनों रा 
जल से खान करें। गर्भस्थिति दोने का परिक्ञात दिदुपी स्त्री को तो ढसी समय द्वोजाता दे ई५ 
इसका निश्चय एक मास के पश्चात्‌ रघखखला न टोने पर सब को दो जाता दे । सोंठ, वे सर, अत्षरी 
सफेद इलायची भोर सालममिथ्री डाल गर्से कर रखा हुआ ज्ञो ठण्ढा दूध दै उसको यधादवि दे. 
पी के अलग मे अपनी ३ शय्पा में शपन करें 4 यड्टी विधि छब २ गर्माधान क्रिया करें तथ २ करना गा 
दि।छब महीने भर में स्लखखा न दोने से गर्मस्थिति का निश्चय दोघ्ाय तब से एक दर्प पर्दा 
पुरुष का समांगम कसी न द्योना चादिये। क्योंकि ऐसा द्वोने से सन्‍्तान उत्तम और पुनः दूसरा हल 
मी चैसा दी द्वोता दे । अन्यथा वीये व्यर्य जाता, दोनों को झायु घट जाती और अनेक प्रकार के * | 


दोते दें परन्तु ऊपर से माषणादि प्रेमयुक ब्ययद्वार अथश्य रखना चादिये | पुरुष घी की स्पि 
ओर स्त्री गर्भ की रचा और मोशन छादन इस प्रकार का करे कि जिससे | ३ 
ने और गधे थे भय धादग इस प्रकार का करे कि जिससे पुरुष का घीये सम मै, 

शाम हो चोर रि में दालक का शरीर झत्युत्तम रुप, ल्ाघएप, पुष्टि, दल, पराक्रमयुक्त द्वोकर दरवें धई 

. + जन्‍म दो विख्वेष इसकी रचा घोथे मददीने से ओर अतिविशेष आठटयें महीने सेझागे 


क शहद बात रइत्य दी है इसछिये इतने थी से प्रमप्र बातें समझ छेना चाहिये विशेष क़िसता डदित 





घतुर्थसमुन्नासः रछ 


चादिये। फभी गर्भवती स्री रेघक, रूच्त, मादकद्॒ध्य, बुद्धि और दखनाशथक पदार्थों के भोजनादि का 
सेबम म करे किन्तु घी, दूध, उत्तम घापल्त, गेहं, मूंग, डर्द धयदि अध्न पान और देश काल का भी सेयन 
सुक्तिपर्षक करे । गर्ध में दो संस्कार एक चौथे मद्दीने में पुंसथन आर दूसरा आठवें मद्दीने में सौमस्तो- 
धपन विधि के अलुकूल करें | जए सन्‍्तान का झन्म दो तब स्त्री भौर लड़के के शरीर की रक्षों यडुत 
साधधानी से करे, अर्थात्‌ शुएटीपक अधवा सौभाग्यशुस्डीपाक प्रथम दी बनवा रक्से ! इस समय 
सुगानधयुछ् उष्णु जल जो कि किसित्‌ उष्ण रहा हो उसी से स्त्री स्नान फरे और बाल्षक को मी 
समान करावे | तत्पश्यात्‌ माइ्टीवेदन धालक की नाभि के जड़ में एक फोमल खत से बांध चार अंगुल 
द्ोड़ के ऊपर से फाट डाले ! उस्तको ऐसा बांधे कि जिससे शरीर से रुघिर फा पक बिन्दु भी मे जाने 
पाबे | पश्ात्‌ उस स्थान को शुद्ध करके उसके द्वार के भीतर सुगन्धादियुक्त घृवादि का द्वोम करे। 
तत्पश्धाद्‌ सम्तान के कान में पिता “वेदोसीति" दर्थात्‌ 'तेरा नाम बेहद दे' छुनाकर थी और सद्दत 
को लेफे सोने को शलाका से श्षीम एए “ओरश्म्‌” झत्तर लिखकर मधु ओर घृठ को उसी शत्राक्ा से 
खटधाबे । पश्चात्‌ इसकी माता फो दे देवे, घो दूध पीना चाद्दे तो उसकी माता पिलाबे, जो उसकी माता के 
दूध मद्दो तो किसी स्ष्री की परीक्षा करके डसका दूध पिलापे। पश्चात्‌ दूसरी खुद्ध कोठरी था कमरे में कि 
जहां.का वायु श॒द्ध दो उसमें खुगन्धित घी फा होम प्रातः ओर सायद्वाल किया करे और उसी मैं प्रखता 

स्थ्री तया धातक को रफ्ये | छः दिव तक माग का दूध पिये भर रुत्री भी ऋपने शरीर की पुष्टि फे 

अर्थ अनेक भ्रकार फे उत्तम भोजन करे ओर योनिसंकोचादि भी फरे | छठे दिन स्त्री पाइर निकले 

ओर सस्तान फे दूध पीने के लिये कोई थायी रफ्ले। उसको खान पान अच्छा कराये) यद्द सस्तान 

को दूध पिताया फरे और पाछन भी करे परन्तु उसकी माता लड़के पर पूर्शदष्टि रक्‍्छे, किसी प्रकार 

का अनुचित व्यध्ृद्वार उसके पालन में न दो। क्री दूध वन्‍द करने के झर्थ स्तन के अप्रभाग पर ऐसा 

खेप करे कि शिससे दूध ख्रदरित न धो । उसी प्रकार का खान पात का व्यवद्दार भी यधायोग्य रफये । 

प्रथात्‌ नामकरणादि खंस्कार “संस्क्ारधिधि” की रीति से यथाफाल फरता ज्ञाप | जब स्परी फिर 

रजस्यल्ा दो तब शुद्ध दोने के पथात्‌ उसी श्रकार घततुदान देवे 


ऋतुफालाभिगामी स्पात्स्यदारनिरतः सदा । ग्रक्षयाय्येव भवाति यत्र वत्राथमे वतन ॥ 
मतु० [३। ४० ] 


शो अपनी ही स्री से प्रसन्न और ऋतुगामी द्वोता दे बह गृदस्थ भी ग्रक्मचारी छे सदश दे ॥ 


सन्तुष्टी मायेया मची भत्री मायों तयेव च । यसिमिश्नेव कुले नित्य कस्पाये वग्र ये धुब्रम ॥ १ ॥ 
यदि हि स्ी न रोचेत पुमांसन्न प्रमोदयेत्‌ । भप्रमोदात्युनः पुंसः प्रनन॑ ने प्रव॑र्तते ॥ २॥। 
प्षियां तु रोचमानायां सर्वे तद्ोचते कुलम ! तस्पां त्वरोचमानायां सर्बमेव न रोचते | ३ ॥ 

दे मनु० [ ३। ६०-६२ ] 

जिप्त कुल में भाषा से भत्ता और पति से पत्नी थच्दे प्रकार प्रसप् रइती दे उसी कन्त में 
सब सौभाग्य झौर ऐश्वर्य निदास करते हैं। जझदां फलखइ दोता दे वर्धा दोर्माग्य ओर दारिदय स्थिर 
होता दे ॥ १॥ हो री पति से प्रीति ओर पति को प्रसध्त महों करतो तो पति के ऋप्वसध्न धोने से 
काम उत्पन्न नद्दों ोता ॥ ९२ ॥ दिस द्री की अ्सप्चता में सद कुछ प्रसत्च होता उसकी शूप्रसधता में 
सा अप्रसन्न भरयोद्‌ दुःखदायक इोशाता टै ४ ३ 2? 





श्प सत्यार्यप्रकाशः 








पिव्मिभ्रोतृभिश्नैता! पतिमिर्देवरेस्तया । पूज्या भूषपितव्याथ बहुकट्याणमीप्ुमि! ॥ | 
प्र ,5 आ शी क्रिया कं 
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते ठत्र देववाः । यत्रैतास्तु न पूज्यम्ते सवोस्तत्राउफलाः क्रियाः ॥ * 
शोचम्ति जामयो यत्र विनश्यस्पाशु वत्कुलम्‌ | न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्थदा | रे 
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनेः | भूतिकामैनेरोर्नि सत्कारेपृत्सबेषु च॥ १ 
मनु० [ ३। १५-५७ | १६] 

, पिता, भाई, पदवि और देवर इनको सत्कारपूर्वक मूपणादि से प्रसन्न रफसें, शितको 
कर्पाण की इच्छा द्वो वे ऐसे करें ॥ १ ॥ डिस घर में त्रियों का सत्कार द्वोता द्वि उसमें विदायुर्क ५ 
दोके देवसंशा धरा के झामन्द से फ्री करते दें झौर शिस घर में स्लियों फा सत्कार नहीं इोता 
सदर क्रिपा निष्फल द्वोआती हैँ ॥ २॥ जिस घर पा कुल में ख्री लोग शोकातुर_ दोकर दुः्स * 
पद कुल शीघ्र नष्ट भ्रष्ट द्यो्ाता है, और जिस घर या कुल में ख्री लोग आनन्द से उत्साद और प्र: 
से मरी दुई रइती रू पद्द कुल सर्यदा पढ़ता रहता दे॥ ३॥ इसलिये ऐश्वर्य की कामना सा 
मनुष्पों को योग्प दि कि सत्कार और उत्सय के समयों में भूषण, यल्ल और मोजनादि से दिए 
मिल्यप्रति सरकार करें ॥ ४॥ यह बाव सदा ध्यान में रखनी धादिये कि “पूजा” शम्द फा अर्थ साई 
दै चोर दिन रात में झप २ प्रथम मिलें वा पृथक्‌ दो तब २ प्रीतिपूर्ष “नमस्ते” एक दूसरे से करें। 


सदा प्रदृष्टया भाग्य गृएफरायेंपु दया । सुसंस्करतोपस्करपा व्यये चासुक्न हस्तया ॥ मनु" [ ४ । [४ 

ख्री को पोग्प दे कि झतिप्रसन्नता से घर के कामों में धतुराईयुद्त सम पदार्षो 
गररद्दार शया घर की शूदि रक्‍्से और व्यप में भस्यात उदार [ न] रदे झर्चात्‌ [ यधापोग्प एव 
चोर ] सह धरसे पदित्र और पाक इस प्रकार बनाये जो ओोपधिरूप दोकर शरीर था धाम मै 
को म झारे रेदे, शो हो प्पर दो इसका द्विसाद यथावदत्‌ रखके पति आदि को झुता दिया करे, घर 
डोहर धाइरों से दष्प्योगय काम क्षेते घर के किसी फाप्र को पिगढ़ने न देये ! 


धिए्यो एनप्रयपों दिद्या सत्य शौर्च सुमापरितम्‌ । वित्रिधानि थे दिस्पानि समादेयानि सरीः 


हे मनु० [२ | २१४० ] 
५. वचचर री, खाता धदार दे रदा, दिचा, राज्य, पवित्ता, श्रध्ठमापण झौर शाता प्रदार ४ 
(#_रप्रदिधर आह कार्रेगरी सफप देश तथा राद मनुष्यों से प्रदण करे ॥ 


हुई हरा थे शुयान मात सत्यमध्ियम्‌ । प्रिय घ साइन पयादेप घर्मः रमावनः 
झद झंडा अत मूपाजउसेस्देव वा जदेतू | शुप्कौर खाद च ने कुपौत्नेनयित्स॥ ! 
काल [४। १३८। १३६ ) है 
द्रव हारप अर्थात्‌ काले को क (4 पर 
3 हैं॥ झा ग्द अति सब क्लिप 


दिः पार दिसी दे साथ विरोध वा विवार ने कट शो २६ 
हरी म्ाजे दयायि इडे खा भे रे !। 


दुद्ग कही बणजज झदर्व प्रद्यादिनः 


अपन विप झतप हुसरे का टिकारक बले हा| 
परत रपट खुठ वुछरे को प्रतथ काने टेअर्द मदन 
इर है का १४ शूष्द इर अदालु 
हू टिवकज़ रे हो छोड़ शा 


| भधिपाय सु वध्यप्प वड़ा भोड़ा थ दर्भमः ॥ 
इदंगप ->विदृस्मीविन व 


चहुर्पसमुक्कलासः श्र 


दे ध्ृतरार | एस संसार में दूसरे को निरन्तर प्रसन्न करने के लिये विय बोलने बाल्ते म्रशंसक 
लोग पहुत दें परस्त सुनने में अग्रिय विदित हो और पद कल्याण फरनेयाता पचम द्वो उसफा फटने 
झोए झुननेयाला पुयप दुर्लभ टै। क्योंकि सम्पुरुषों को योग्य दै कि मुख के सामने दूसरे का दोष कदना 
ओर अपना दोष सुनना परोक्त में दूसरे फे गुण सदा फट्टना । और दुष्टों की यद्दी रीति दे कि सम्मुख 
में गुय कददना भोए परोष में दोपों का प्रकाश फरना । जव॒तक मलुष्प दूसरे से अपने दोष नहीं कट्टता 
तप्तक भनुष्प दोषों से छूटकर गुणी मद्दी दो सकता | कमी किसी की निरदा मे करे जैले:-- 
+गुणेषु दोषारोपणमसया” अर्थात्‌ “दोपेपु गुणारोपणमप्यधया” "गुणेघु गुणारोपणं दोपेषु 
दोपारोपयं थ स्तुतिः” जो पुणों में दोष दोपों में सुण खगाना बद्द निन्‍दा भौर पुरणों में गुण दोषों में दोषों 
का कथन दरना स्तुति कट्दाती दे अर्थात्‌ मिप्यामाषण का माम निन्‍दा भर सरपमाषण का नाम रतुति दे ॥ 
घुद्धिवृद्धिकराएयाशु घन्‍्याने व हितानि घे। नित्य शास्राए्यपेत्तेत निगमश्रेय बैदिफान ॥९॥॥ 
यथा यपा हि पुरुपः शास्त्र समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति विक्ञानं चास्य रोचते ॥२॥ 
मु० [१ । १६ । २० ] 
जो शीघ्र युद्धि धन भोर द्वित को एड करनेद्वारे शास्त्र भौर देद हैं उनको निप छुर्मे झौर 
पगायें, अद्यचर्योधम में पढ्ढे थों उदको रची पुरष नित्य विधारा झोर पढ़ाया फरें॥ १॥ क्योंकि जैसे २ 
मनुष्य शास्त्रों को यथावद््‌ आनता दे येसे २२स विदा का विश्ान बढ़ता ज्ञाता भोर उसी में रचि 
बढ़ती रइतों दे ॥ २।॥ 
क्रषियक्ञ देवगडआ भूतयप्म व सर्वदा । हुयई पितृयय च ययाशाक्रे न हपयेत्‌ ॥ १ ॥ 
मनु० [४। २! ] 
थध्पापन प्रक्षयाः पितृयश्ष तणेणम । होमों देवों पलिमोतों हयप्नोअतेपिपूजनम ॥ २ ॥ 
मनु० [३१७० ] 
स्वाध्यायेनार्थपेष्पीद्‌ होमैदेयाद यपाविधि । फ्िन्‌ थाद्वैय टृनमैभृताने पलिफ्मेया ॥ ३॥ 
४ मनु० [३।८१ ] 
दो यश घद्धाचपे में किय आये थे अर्थात्‌ एक येदादि शास्त्रों का पहना पढ़ाना संप्योपासत 
बीगाम्पास+ दूसरा देवपष्ठ यिद्वानों का संग सेथा पविश्ता दिव्य पुों का धारण दादत्थ विचा को 
हच्नति करना दे, ये दोनों पछ साय प्रातः करने दोते हैं ॥ | 
सायसापं ग॒पविनों अग्निः प्रातशतः सौममसरय दाता ॥ १॥ प्रातः आंवरएप॑विनों 
अग्नि! साय साय सोमनसरस् दाता ॥ २ ॥ झ० कां० १६ । भनु० ७। मं० ३१ ४ ॥ 
सस्मादष्ोसाप्रस्प संयोगे प्राक्षणः सन्ध्यादुपामीत | उपस्तमरस्त यास्तमादित्यममिध्यायन्‌ ॥ है || 
. ग्रा्षये [ पह्विशन्राशणे श्र० 2 | खं० ५] 
नतिष्टति तु यः पूर्वी नोपास्वे यस्‍्तु प्मेमाम। स शूद्रवद्‌ घाहिष्फादः सर्वैस्मादू दिनरमंयः | 9७ ॥ 
मनु० [ २। १०३ ] 
जो सम्ध्या २ काल में दोम दोता दे वद्द धुत द्वव्य प्रातःझाल तक धायुशद्धि* द्वारा सुखकारी 
होठा दे ।। १॥ जो झप्ति में थ्रावः २ काल में होम किया छाठा दे धइ २ दुव द्वव्प साएइद्ाल परपैरत 


शी 





६० सत्यार्थप्काशः 


पायु फी शुद्धि द्वारा यल्ल घुद्धि और आरोग्यकारक दोता दे ॥ २॥ इसीकिये दिन और यत्रि के «| 
में अर्थात्‌ सूयोइय झोर अस्त समय में परमेश्यर का ध्यान और अप्निद्रोत्न अवश्य करना चाहिये ॥ 
और ज्ञों ये 'दोमों काम्र साय और प्रात;काल में न फरे उसको सज्ञन लोग सभ द्वि्ों के 
ब्रादर निकाल देवें अर्थात्‌ उसे शद्र॒यत्‌ समझे ॥ ४॥ ( प्रश्न) त्रिकाल सम्ध्या फ्यों नहीं फलों 
( उत्तर ) तीन समय में सन्धि नहीं दोती, प्रकाश और अन्धकार फी सन्धि भी सायं प्रातः दो , 
में होती दे) जो इसफो न मानकर मध्याद्धकाल में त्तीसरी सन्ध्या माने धट्ट मध्यरात्रि में भी संघ 
पासन क्यों न करे ? ज्ञो मध्यरात्रि में भी करना चाद्दे तो प्रदर २ घड़ी २ पछ २और छथरेकी, 
सन्धि द्वोती हैं, उनमें भी सम्ध्योपासन फिया करे । ज्ञो पेसा मी करना चादे तो दो द्वी नहीं सकता ' 
किसी शास्त्र का मध्याद््सध्या में प्रमाण भी नहीं इसलिये दोनों कालों में संध्या और अग्निद्दोप्त फत 
समुचित दे, तीसरे काल में नद्टीं । ओर जो तीन काल द्वोते दें ये भूत, मविष्यद्‌ और थर्चमात के पं 
से हैं, संध्योपासम के भेद से नहों। तीसरा “पिठ्यश्” नर्थाद्‌ झिसमें देव जो विद्वान, ऋषि जो पके रा 
पढ़ाने द्वारे, पितर ज्ञो माठा पिता आदि बृद्ध छानी और परम योगियों की सेवा फरमी। पिठुयर 
दो भेद हैं, एक भाद्ध और दूसरा तर्पण। थाद्ध अर्थात्‌ “थत्‌"” सत्य का नाम दै “थत्सत्यं द्धोति पा 
क्रियया सा श्रद्धा भ्रद्या यत्‌ क्रियते तच्छाद्म"” जिस क्रिया से सत्य का प्रदण फिया जाप इसी 
भ्रद्धा और जो भ्रद्धा से कर्म किया जञाप उसका नाम धाद दे। और “तृप्यन्ति तर्पयन्ति येव 
तत्तपंणम्‌” ज्ञिप्त जिस कर्म से ठृप्त अर्थात्‌ विद्यमान माता पितादि पितर पसन्न हों झर प्रसन्न 
ज्ञाय उसफा नाम ठपैण है, परन्तु यद्द भीवितों के लिये द्वै द्वतकों के लिये नहीं ॥ 


रो भ्रक्मादयों देयास्तृप्यन्ताम्‌ । ब्रह्मादिदेषपत्यस्तृप्यन्ताम्‌ । अज्लादिदेयसुतास्तप्यन्ताई। 
प्रश्नादिदेवगणास्वृप्यन्ताम्‌ ॥ ५ 
इति देवतर्पणम्‌ ट 


*विद्वाएेसो दि देया:” यद्द शतपथ प्राह्मण का यचन दै--ज्ञो विद्वान्‌ हैं, उन्हों को देव का 
हैं, जो लांगोपांग चाए वेदों के जानने यात्ते दो उनका नाम प्रह्मा और ज्ञो उनसे न्यून पढ़ें वो उमफा 


- शाम देव अर्थात्‌ विद्वान दे। उनके सदश उनकी विदुपी स्त्री श्राह्मणी देवी और उनके-तुल्य पुष्ठ ४ 


शिष्प तथा उन सदश उनके गण अर्थात्‌ सेवक हों उनफी सेवा करना दे, उसका नाम भार 
और तर्पण दे । 


अथर्पितर्पणम्‌ 
भों मरीब्यादय ऋषयस्तृप्यस्तामु । मरीच्यायूपिपल्यस्तृष्यन्त ह 
भें मरीष्य ् ल्यस्तृप्पन्ताम । मरीच्याधापिछतास्द 
स्वाम्‌ । मरगच्याएृपिगणास्वृष्यस्तामू ॥ दि ० 
मत पं इति ऋषितर्षणम्‌ 
मध्य के प्रपोध मरीखियत्‌ विद्वान दोकर पढ़ायें और ज्ञो उनके सद्श विधायुक्त ग्यरै 


लिया ऋम्पाओं को दि द्वें 
| विद्यादात देतें इसके मुझ्य पुत्र और रि ऐेवक 
ही डशके हक 
इंब डा सेशन ओर स॒त्दार करता ऋषितपण दै । कप मल डर 


है अध विदृतर्पयम्‌ 
मिस दे प्विरस्त्प्यस्तायू । भग्निषात्ताः विवास्तृष्यन्तामू +पर्टिपिद: पिवर्दृष्पस्ताई 


१६ 


ओह 


ड़ 


धत॒घेसम॒न्नासः ध् 


0050 0: 0 मा २ 
प्तोमपाः पिवरस्तृप्यन्ताम्‌ । हविश्वुनः पिवरस्त॒प्यन्ताम्‌ । आज्यपाः दिवसस्तृप्पन्तामू | [ सुका- 
लिन पितरस्तृप्यन्ताम्‌ | ] यम्रादिम्यों नमः यमार्दीस्तपैयामि। परे स्थघा नमः पिवर तर्षयाने । 
पिवामहाय स्वृधा नमः दिवामई तर्षयामि । [ प्रपितामहाय स्वया नमः प्रपिदामई तर्पयामि । ] 
माग्रे स्वधा नमो मातरं तप्पयानि । पतामधी स्वधा नमः पिठामर्दी तर्पयामि । [ अपितामशे स्वधा 
नमः प्रपिवामद्दी तर्ष्पपामि । ] स्पपत्स्ये स्वधा नमः स्पपत्नी तर्ष्पयामरि । सम्बन्धिम्/ सवघा 
नम; सम्पन्धिनस्तप्पयामि । सग्ोग्रेम्य! स्वधा नमः संग्रोत्रांसस्पैयामि ॥ 





इति पिहतप्पणम्‌। 


“ये स्ीमे अमदीश्परे पद्मर्थ विद्यायां थ सीड़न्ति ते सोमसदः” जो परमात्मा और वदार्थ दिया 
में निपुण दों वे सोमसद्‌। “बैर्नेयियुती विधा गशद्दीता ते अप्रिप्वाक्ता:” शो श्रप्ति श्र्धांव्‌ विधुशादि 
पदाधों के शामनेद्वाए हों ये अरप्मिष्पास | “ये ए्धिति उततमे स्थवद्वारे सीदग्ति से बद्धिंददः” जो इक्तम 
वियाबूद्धियुक्त व्यवद्वार में म्थित हों थे पर्टिपदू । “ये सोममैश्वर्यमोषधीरर्स था पारित पिएरित था ते 
सीमपा:” हो देश्वर्य के रएक भौर मद्दोषधि रस का पान कर ने से रोगरदित और झग्य के पेश्दर्ष छः 
रक्षक भोषधों फो देके रोगनाशक दों पे सोमपा। "ये इथिद्दोतमत्तुमएँ भुअते भोजपरित था ते दविगेझ ० 
औओ मादफ और दिसाकारक दष्यों को छोड़ के भोजन करनेट्रार द्वीप एविययुज+ “य चारप॑ दर्ज शाप्जू 
या योप्य रह्तन्ति या पिपर्ति ते भाज्यपा: जो झामने के योग्य धातु के रक्षक शीर पूत दुश्घादि कमने 
ओर पौनेद्वार हों ये भाज्यपा । “शोमनः काजो दिचते येपास्ते सुकालिग:" जितबा हथ्छा धर्म करने बाय 
शसुलकूप समय दो ये पुकालिन। “ये दुएान्‌ पच्दरित निशद्टम्ति ते दम्मा स्पायाधीशा:" हो हुए ढो 
दण्ड ओए धेष्ठों का एालग करनेद्वारे स्यापकारी दो थे थम । "यः पाति से पिता” हो सगतानों बाधक 
झौर सरकार से रत्तक था कमक द्वो थद्द पिता | “पितुः पिता पिधामइः विताप्टरण पिला प्ितामह:" 
जो पिता का पिता दो थद्द पितामद झोणए शो पितामद का पिता दो थइ मपितामाद | “वा झागपति सा 
माता" जो झप्त झीर सरकारों से राग्तानों का मास्प करें थद्द माता। “था पितुर्माता शा विषामऐी 
पिवामदर्प माता प्रपितामददी" जो पिता वी माता दो बह पितामणी ओर पितामद थी हआरावा हो ८ए 
प्रवितामद्री । झपमी शमी तथा भगिषी समदस्थी झोर एक गोद के तथा हास्य कोई अभद्र पुरुष दा दृद्ध 
हों इन सबको झरयरत धरा से उत्तम अप, थरम, एुर्दर याग आदि देकर हष्दे श्चार झौ हरत दरपणा 
झर्षात्‌ जिम ९ फर्म से इतफी भारमा हम और शरीर श्पस्थ रहे इस ९ बर्म से शीवियरंबः शगइपे 
पेंदा बररती वह धाद भोर तप्पय कट्टावा टै 

सोचा वैरवरेद--भर्पात्‌ जर भोशन सिर ही तद जो बढ़ भोकमार्ष बगे इसमें से ब्या 
जपणाप्त और धार को छोह दे पूत मिए्युताः अत लेकर यूरदे से ऋषि झाशय घार मिम्टहिकिप 
मतों से भाहुति ओर भाय करें । 

वैश्देवस्प तिद्धस्प एटेम्पौ विधिपरेरम्‌। आरपः दुष्पोएदताम्पों शाइटों पम्मसथटए 

मनु [१। घ८४ ॥ 
हो चुद पाकशारा में भोशगार्थ तिद्ध शो उपरा दिष्प शुट्ों के झर्प इस्ती पाचन दिक्‍्म- 
दिखित मां से दिधिपूर्ष होम मिश्प रःऐ-- 
री 


इ३ सचापदकाए: * 








होम करने फे सन्त 
के अप्रपे सबापा। सोमाय शांत । अप्रीयोगाम्याँ 
प्रदन्दरदे झा इड्टे स्ाश। भनु्त्ये स्ताह। 
कप | धिखकोी सा शी 
हस्त से दक २दश ऋआाईनि - 










ड़ 3 अनुसार पददाफश शव 
टल नर । मसुगाय है 

हाई - ॥ झाम्गे ही 
डापप रे 08 | 
हक ५ 

श्र. 
कफलकत आफ 

ढुयो 

च भडे 

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हुनर कन्‍ पु _ दो 
कह जप आरे आप $ आदि की 
कड़े है३, ऋढ २०३ २ , 447एुष्रा 
हु ह इध्ता कोड दे 9 

का डर लत थे हो 
ऋ १ाई कब व कट मे, परभ्पोश५ 4 





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लिप चुत कहे 
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कफ शरद अद &ू $ईा: 
पड हू $ झूड इब छत 
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की इताई इक द.ए हाफ दमन » अबरे सतुपेशायुसार 
_फके , फजई आय आुइकाड की + सु ज+ ! 
अकोपिदस पे४४ ०० ।डकाव कार ताप११॥ | + 
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इ्छुऋही आदी खिआ 4 क भी पपतथर॥ | !ँ 

कट ऋ छा है, कया उापव तर + जहर | छम्पमर $  छपर से हू 






/ 2 क ) २ झूठ 3 अचल है 
प्थआा, ऋतप शत कई कर्ज इंफरेडओ है 

उकह के के बनमक हद के हैं। कोड ईडकर मी कटि। 
2४ दु छापफर हक अेद्ाओ $्र॒ढ काम्त4 इडिर बट 


जलन न 


चतुधे समुन्नातः श्३ 


प्रष्दी के प्राण दरके ऋपने रदायें सिद्ध करता पै पैसे ऋाशझूल के पैरागी भोर स्ाक्ती आदि इटी 
इुराप्रदी देशविरोधी हैं देसों का सरकाए दायीशद से भी लू करता घादिये। क्‍योंकि इनफा सरकार 
करने से दे दृदि को पाकर संसार को झधमेयुक्त करते हैं। छाप तो अपनति हे काम फरते हो हैं 
परम्तु साथ मे सेषऋ को भी धविधादपी महासागर में डुददो देते हैं। इस पाँच महायज्ञों का फल यह दे 
कि प्रम्पष्ठ छ करने से दिया, शिषता, धममें, सघ्घता आदि शुभ पुर्ों को धृद्धि। अमिदोत्र से बादु, 
धृष्टि, छल की शुद्धि दोकए दुष्टि दाए संसार को सुख माप्त दोना अर्थाद्‌ शुद्ध पायु फा शपासस्प्े 
खान पान से ऋाशोग्प, युद्धि, एल, एराग्म यदू के धर्म, अर्थ, काम हर मोछ का अमुष्ठाम पूरा होता, 
इसलिये इसको देदपढ़ बदते हैं | पिदुण्् से शुर भाव! पिता और छाती मधात्माश्नों की सेषा करेगा 
हद रुपका झाद बेया । उससे सत्यासत्य का नि्ेष कर सत्य का प्रद/ ओर असत्य का त्याग करफे 
शुझ्ती रऐगा ३ दूसरा हमइता अर्पात जसी सेचा माता पिता और आयाये ले सन्‍्तात झौर शिरष्यों को 
की है बसका यदता देगा डचित ऐी दे । वलिपेश्वरेव का भी फल शो पूर्ष कद आये बद्दी दे । अश्तक 
उत्तम झहिति कगत्‌ में मदों पोते शशतषझ उप्नति भी सद्दी होती, उनके सब देशों में घूमने भर सत्यो- 
परेश करने से एएसएड की धूद्धि लर्टों दोती कोर सर्देत्र शुद्श्थों को सइज से सत्य विशान की प्राप्ति 
दोती रहनी दे और भतुष्पमाद में एक दी धर्म स्थिर रइता दे) पिया अतिथियों ऐे सम्देशनिश्नत्ति नह्दों 
शोती, सम्देइनिष्ठुति के: पिता दृढ़ निम्यप मी गदों होता | निश्यप के दिना सुख कहां ! 
प्रापे दवएलें एृध्येत मर्भापीं पालुदिन्तयेत्‌ । फायरलेशोश पन्‍्यूलान वेदतत्त्या्यमेष वे ॥ 
; मतु+ [४३ ६२ ) 
शर्त थे सोपे प्रशर ऋणया घाए घट्टी शद से उठे, आपयश्पक कापे करके धर्म झोर अर्प, 
आए दे; सेगों का निदान झौर परमात्मा का ध्यान करे। कमी झधमे का आचरण न करें, क्‍योंकि: 
नाधमंत्रारदो लोके सधः फुलाति गौरिय । शनेरावसेमानस्त ता नाव | 
मनु० | ४। ७ 
किया हुआ भधर्म निष्फण कमी मद्दी दोता परम्तु मिस समप् भथमे फरता ऐ बसी समप 
पल मी मद्दी होता इसलिये अरड्ठामी खोग अधम से महीं डरते तथापि निथय जानो कि घह अधरमो- 
चरए धोौरे भौरे शुम्दाऐ सुख के मू्यों को फाटता चला चला जाता दे । इस बम से-- 
अर्थर्भदिघते हाइतरो मद्रायि परणति | हव३ सपद्याज्षपति समूलस्‍्तु पिनश्पदि ॥ 
०“ ध मु 48 ( १७४ ] 
जब अधमोत्मा मनुष्य धर्म की मर्यादा घोड़ ( सेसे दालाव के बन्ध को तोड़ जब चारों ओर 
फैच् शक दे पैसे ) मिध्यामाशण; रपट, पायएड अर्थाद्‌ रक्षा करनेवाले देदों का सए्डव भोर विश्यास- 
प्रादादि कर्मों से पताये पदायों को लेदर प्रधम बढ़ता दै, पश्याद्‌ घनादि पेम्वरय से खान, पान, बस, 
आमूरण, यान, स्थान, मान, भवतिष्ठा को प्रार् दोता दे भन्याय से शत्रुधों को भी ज्ञीतता दे पध्यात्‌ 
: शीघ्र नए दो शाता दे भेसे जड़ कादा शुधा इृच् गए दो जाता दे बेसे अधमी मए भष्ट दोजठा दे ॥ 
सत्यधमोयेवृतेप्‌ शोचे चैपारमेसदा । शिप्योय शिष्पादमेंय बाग्पाहृदरसंपतः ॥ 
मजु* [ ४। १७५ १ 
ओ [ विद्वान ] बेरोक सन्य धर्म चर्याद्‌ पक्षणातरहित दोकर सत्य के पइण और ऋसत्य 
के चरिन्याव स्यायरूप बेदोऋ धर्मादे आये अर्थात्‌ धर्म में खछते शुप के समान शर्म से छिप्यों को 
। शिक्षा किया कर ॥ ध ट 
व्रत ह 


पु हि 





3 धत्पायैप्रकाशः 





:+००+4४०४२२:२२०६२३-२- ०२०४० 
होम करने के सन्त्र 
ओ अम्नये स्वाहा । सोमाय स्त्राहा। अप्रीपोमास्यों स्वाह्य । विश्वेम्पों देवेम्यः स्वाहा । 
८: ० , है 
धन्वन्तरये स्तवराइ | इड्ढे स्तराह् | अमुमृत्ये स्वाहा । प्रजापतये स्थाद्दा | सह ध्यावाएयिषीरपाँ 
स्थाह् | लिश्कृते स्वाहा ॥ 

इन प्रत्येक मम्च्रों से एक ९ यार आहुति प्रज्यलित अ्ि में छोड़े पश्चात्‌ थाली अथपा भूमि 
में पता रख के पूर्व दिशादि क्रमामुसार यथाक्रम इन मन्‍्त्रों से भाग रफ्खे:-- 

ओ सालुगरायेन्द्राय नम्रः | सालुगाय यमाय नमः । साझुगाय यरुणाय नमः । सानुगाय 
सोमाय नमः । मरुदूस्यों नमः । अदुस्यों नमः। बनस्पतिम्पों नमः | श्रिये नमः । भद्रकास्यै नमः । 
ब्रह्मपतये नम) । बास्तुपदये नमः । विश्वेम्यों देवेम्यो नमः । दिवाचरेभ्यों भूतेम्यो नमा | नक्त- 
ध्चारिम्पो भूतेस्पो नम । स्वोत्मभूतये नमः ॥| . 

इन भागों को ज्ञो कोई अतिथि द्वो तो उसको जिमा देवे अथवा भप्लनि में छोड़ देवे। इसके 
अनम्तर सघणान् अर्थात्‌ दाल, भाग, शाऋ, रोटी आदि छेकर छू. भाण सूत्ति में छरे। इसमें प्रभाए-- 

शुनां च पतितानों च श्यप्ां पापरोगिणाय्‌ । वायसानां कृमीर्णा च शनझैर्नितपेद्धवि ॥ 

/. मनु" [३।६२] 

इसे प्रकार "शयम्यो नमन, पतितेम्थों नमः, श्यपगृम्पों नम, पापरोगिस्यों मम, वायसेभ्यों मम 
क्मिम्यों नमः” घधरकर पश्चात्‌ फिसी दुखी, युभुक्तित प्राणी अथवा कु््ते कौपे आदि को देवे | यदों गमः 
शब्द का अर्थ श्रन्त अर्थात्‌ कुत्ते, पारी, चाएडाल, पापरोगी, फौवे भोर कृति अर्धात्‌ चौंटी आदि को 
अश्न देना, यद्द मजुस्मृति आदि फी विधि दे । इबन करने का प्रयोधन यदद दे कि पाकशालास्थ यादु का 
झद दोना ओर ज्ञो अशाद अदृए ज्ञीयों की इत्या द्वोदी दे उसका प्रत्युपकार कर देना। 

अय पांचवों अ्रतिथिसेबा--अतिथि उसको कद्दते हैं कि शिसकी कोई तिथि निश्चित मं हो 
झर्धात्‌ अकूस्मात्‌ धार्मिक, सत्योपेशक, सब के उपकाराये सर्वेत्र घूमने बाला पूर्ण॑विद्वाद, परमयोगी, , 
संम्पासी एदस्थ के यहां आवे तो उसको प्रथम पाधथ अर्घध और आचमनीय तीन प्रकार फा जत्र देशर 
पश्यात्‌ आसन पर सरकारपृर्वक विठाल कर खान पान आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से सेया शथूरा करके 
इसरो प्रस्ष करे । पत्यात्‌ सरसंग कर उनसे शान विदान आदि जिनसे धर्म, अर्थ काम भय मोश 
की भापति द्वोवे ऐसे पेले उपदेशों का भ्धण करे भ्रौर अपना चाल चलन मी उनके सदुपेणशवुत्ार 
रक्स । समय पाके गृहस्थ भर राजादि मो अतिथियत्‌ सरकार फरने योग्य हैं परस्तु-- * 

पापणिडनों पिकर्मस्पान वैडालबृतिकान्‌ शठान्‌ | दैठुकान्‌ वकशचींय बादमाग्रेयापिनार्यपेह ॥ 

( पापतडी ) अथोत्‌ वेद नि: कक 

५ ५4...  सर्यात्‌ वेइनिश्द्‌क, वेदविरुद आचरण करनेद्दारा (विकर्मेस्य) जो पेइविदद 
ओर हल पक ४ प्रिच्यामापणाशियुक, सैसे विद्याला छिप और स्थिर ग्द्रकर ताकता २ मापट सी 

4 नदियों को धार अपना पद भरता दे पैसे जगा वैड्ञालयर्रि रात ईंट, 
कुराप्ही: अधिमानी, ऋाप झाने मद थे पैसे जनों का नाम ( वैड्ालयूक्तिक ) ( शद ) अर्थात, ६ 
हि झआाश्इल दे देशसती बचने है एम | या पद माने नदी ( दैतुक) छतकों ध्यर्य पकरेयाओो 


रह शपोड़ा! सा भेबाके परम घोर शगव्‌ मिच्या दे वेदादि शाद्र धोर ईश्वट भी करिए ३५ 
है एदारि गपोबू। इाचिरेवात ( दच्शुरस ) कैसे वच् पक देर झंडा ध्यासतवाहियंत के समान दोडर कं | किए 


चतुर्घसमुन्नासः ६३ 


4 पदक 205 मम अप 80 दम 223 50000 0:22 
प्रदधी के प्राण हरके अपने स्थादें सिद्ध करता है पैसे आशकल के पैरगी झोर धाक्ी भादे इटी 
दुशप्रद्टी वेइपितेधी हैं ऐसों का सरशार दाणीमाच्र से भी म करता धादिये। फ्योंकि इसका सत्कार 
करने से ये छृद्धि को पाकर संसार को अधमेयुक करते हैं श्यए तो अपनति हे काम करते हो) हैं 
परन्तु साथ में सेपऋ को सी अविधारूपी मदृासायर में डुबो देते हैं । इन पांच मद्ायड्ों का फश् यद् दे 
कि धरष्पक्ष हे करने से विधा; शिक्षा, धर्म, सम्घठां आदि हम गुणों की ध्ृद्धि। अप्निशेत्र से दायु, 
हुए, जल की शुद्धि होकर घूरि द्वारा संसार को सुल प्राप्त दोना अर्थाद शुद्ध यायु का श्यासस्पर्श 
घान पात से आरोग्य, युद्धि, दण, पराव्म बढ़ के धर्म, अर्थ, काम और मोद्ध का अनुष्ठान पृण होगा, 
एस्ीलिये इसको देवपश् कट्टते हैं। पिठ्यए से जब सादा पिता और छाती मदार्माप्नों की सेवा करेगा 
तय बस का शान एढ्रेगा । उससे सत्यासत्य का निर्णय ऋर सत्य का प्दण और असत्य का ध्याग फरदे 
छुख्ी रहेगा । दूसरा फतइता अर्थात्‌ जैसी सेवा माता दिठा और आया ने सम्तान और छिप्पों की 
की दे उसका यदला देता उसित दी है । धलियैश्वरेष का भी फल जो पृ कद आये यटी डे । शरतकः 
उत्तम अतिधि जगत्‌ में मद्दीं द्ोते सइतवः उन्नति भी गद्दी दोती, उसके सब देशों में पुमने भोर साथो- 
परेश करने से पायएंड की पूद्धि भश्टों दोती और सर्वेत्र शदस्थों को सदञ से सत्य विडान की पाति 
द्ोती रइनी दे चोर मनुष्पम/त्र में एक दी धमे सिर रहता है। गिरा अठिधियों के स्देहनिवृत्ति शी 
होती, सरदेएनिएसि ऐे; यिना दृढ़ निश्चय भी मह्दों होता। निश्यय वे: पिता शुधध कहाँ ? 
प्राण हर्ट पुध्येत भर्मादी घानुदिन्तयेत्‌ । फापकलेशोत् हन्मूलाद येददष्पार्यमेदर थ ॥ 
हे मनु" [४। ६३२ ) 
शत्ि के घोपे श्र झपदा धार घड्गी राद से उठे, झायश्यढ कार्य कापदे धर्म ओर अर, 
शसेए के शोषों का निदान और परभारमा का ध्यान करे, कभी अधमे का श्याघरश ग करे, क्‍यों कि:- 
भाधमंश्ररितों लोफे सघः फलति गौरिय । शनेरापरेप्रानस्तु बर्सुयूलानि हम्तति ॥ 
पममु० [४॥ १७३ 
किए दुसा धरधमे निष्फण कभी भष्टीं दोता परम्तु जिस समय पा दरता है गा समए 
फल सी मद्दीं दो इसलिये धनी लोग भधमे से महों शर्त तथापि मिग्यय जागो दि बह ऋषमो- 
चरण धारे धीरे तुर्दां पुु के मूर्ों को काटवा चला चला झाता दि १ इस दम से 
अपर्मेणेयते शाइतचो मद्राणि परयति । तगः सपह्ाइरति समृलतस्तु दिनरणत ॥ 
रे , भनु० [४ | १७४ ] 
ज्ञप अधमोमा मगुध्य धर्मे दी मर्यादा पोद ६ ऊसे शालाइ ये. बम्पर रत कोह शुरु चारों झरेर 
फैल शादा दे दैसे ) मिध्याणावण, कपट, पाथदइ अर्थात्‌ रत्ता करनेदाले देरों क! लएडश अप दिकशात 
घातादि करो रेस पाये पापों को लेबर प्रघय बदता दे, पशच्याव्‌ घराएि पेभ्डदे रे लार, पाच, इत्ट, 
चमूरत, गाज, रचाव, मात, मवतिष्टा को ग्रार होश दे ध्स्थाय रे शपुकों को मी शकता है इधाच 
शीप्र हए दो शाता है जते शहर छाटा टुधा वृष गो जाओ टे पैसे कपपी रष्ट घाट दोषबा दि ? 
सत्यपमोदधद शीप पैशरमेत्सदा । शिष्पौष परीप्पाइमेंद दाग्डा[दरमएदाः ॥ 
मु | ४१ र७श ल 
हो [ दिस ] बेरोक शप्य धर्म कर्षात्‌ पश्षपातरट्वित ह्ोषर रूपय के प्रदृए कोश ऋषाप्द 
मै चतितयाग स्पायशुप देदाक घमादि छापे अर्पात्‌ भमे में सकते हुए के समा धरम से शिष्य बे 
शिक्षा किए झऐ ॥ 


कं हे की 


च्छ सत्यार्थप्रकाशः 


ऋत्विवपुरोश्ताचार्प्यमानुलतातिपिसंथितेः । बालवद्वातुरेंधश्विमम्पन्धिपास्थते! ॥ !! 
मात्तापिदृरम्याँ यामीमिशओ्रत्रा पुश्रेण मार्यया। दुहित्रा दासवर्गेय विवाद ने समाचरेत्‌ ॥ 


मनु० [9 | १७६ | १८० ] 
( ऋत्यिकू ) यज्ञ का फरनेद्दारा (पुरोदित) सदा उत्तम चाल चलन की “ ७७ 
( आयाये ) विद्या पढ़ानेद्वारा (सातुल ) मामा (अतिथि) अर्थात्‌ जिसकी कोई श्राने उतने 
निश्चित तिथि न हो ( संधित ) अपने आरधित (याल ) पालक (थूद्ध) घुड़ढा (आहठुर) 
( वैद्य ) आयुर्वेद का शाता (ज्ञाति) स्वगोत्र या स्पयर्गृम्य ( सम्बन्धी ) शशुर आदि ( 
मिन्न ॥ १॥ (माता ) माता (पिता ) पिता (यामी ) बद्दिन (श्राता) भाई ( भार्या ) स्री( 
पुत्री और सेवक लोगों से वियाद अर्थात्‌ विरद्ध लड़ाई बसेड़ा कमी न करे ॥ २॥। 
अतपास्त्यनधीयान। प्रतिग्रहरुचिर्द्धिजः | अम्मस्यश्मसमेनेय सह तेनेष मज्जति | मनु? [7 
एक ( अतपा: ) ब्रह्मचर्य सत्यमापणादि तपरद्दित दूसरा ( अ्नधीयानः ) पिना पढ़ा 
तीखरा ( प्रतिप्रददरुचि: ) अत्यन्त धर्मार्थ दूसरों से दान लेनेबाला ये तीनों पत्थर की नौका से १६ 
में तरने के समान अपने दुष्ट कर्मो के साथ दी डुःखसागर में ट्ूबते देँ । ये तो ड्ूबते ६ी दें ए४ 
दाताओों फो साथ डुब। छेते हें:-- 
है त्रिष्यप्पेतेपु दत्त हि विधिनाप्यर्मित घनम्‌ । दातुर्भवस्यनयाय परत्रादातुरेप च॥ मनु० [ ?। १४४ 
ज्ञो धर्म से प्राप्त हुए धन का उक्त तीनों को देना है' यद्द दान दाता का नाश इसी जत्म 
लेनेवाले का नाश परणनन्म में करता दि ॥ जो ऐसे हों तो क्या द्ो:-- 


यथा सपेनौपलेन निमज्नत्युदफे तरन्‌ | तथा निमज्नतो5्घस्तादज्ञौ दाहप्रतीच्छकों | 
मनु० [9। १६१ ] 


जैसे पत्थर की नौका में बेठ के जल में तेरनेवाला डूब जाता दे वैसे अशानी दाता ४४ 
भ्रद्देता दोनों अधोगति अर्थात्‌ दुःख फो प्राप्त द्वोते हैं ॥ 


पाखरिड्यों के लक्षण । 
धर्मध्यजी सदालुब्धरदापिफो लोकदम्मकः । बैडालब्रतिको ज्यों हिंखः सबोमिसन्धकः | ' 
अधोदर्टनैंप्छतिकः स्थार्यत्राधनतत्परः । शठो मिथ्याविनीतश्॒ बकब्रतचरों दिजा ॥ * 


मनु० [ ४। १६५ । १६६ || 

( धर्मध्यज्ी ) धर्म कुछ भी न करे परन्तु धर्म के नाम से लोगों को ठगे ( सदालुग्धः ) 

लोम से युक्त ( घाह्मिक: ) कपटी ( लोकदम्भकः ) संसारी ममुष्य के सामने अपनी बड़ाई के गो 
मारा करे ( द्विल्लः ) प्राणियों फा घातक अन्य से बेरबुद्धि रखनेयाला ( सर्वाभिसन्धफः ) सब 

ओर युरों से भी मेल रक्रे उसको (वेडालम्तिक) अर्थात्‌ विडाले के समान धूर्त और नीच समझो || 

( अधोदृष्टि: ) फीति के लिये मीचे दृष्टि रफ्ले ( नैष्छृतिकः ) इर्प्यक किसी मे उसका पैसा मर 

शध किया दो तो उसका यदला प्राण तक लेने को तत्पर रदे (स्वार्थसाधन० ) चाहे फपट “ ध 

विश्वासधात क्‍यों में दो अपना प्रयोजन साधने में घतुर ( शठः ) चाईँ अपनी बात कटी फ्यों शी 
पस्स्तु दृद कमी मे छोड़े ( मिध्यायिनीतः) भूठ मूठ ऊपर से शील संतोष साधुता दिखलावे 














चतुर्थसमुन्नासः चर 





( थकशत ) बगुणे के समान मौच समभो, ऐसे २ शर्तों धाले पायएडी दोते हैं उनका दिजवाल या 
 सेदा कर्मी भकरें॥ 
धर्म शनेः सम्घिसुयाद्‌ पन्‍्मीकमिद पुचिकाः। परलोकसहायाये सर्वभूतास्यपीडयन्‌ ॥ १ ॥ 
प्ामुत्र हि सहाययायें पिता माता थे विष्ठत) । न पुत्रदारं न ज्ञातिधेमस्तिप्ठति फेवलः ॥ रे ॥ 
।. ऐकः प्रमायते जन्तुरेक एप प्रसीयते | एफोनुएदुस्के सुकृतमेर एवं घ दुष्कृतम्‌ ॥ ३ ॥ 
मनु० [ ४ । २३८-२४० ] 
।... एए: पापानि हुरुते फल ध्ुद़फे मशननः। भोशारो पिप्रमुच्यन्ते कत्तो दोपेश लिप्यते ॥ ४ ॥ 
[ भहममारत उद्योगप० प्रजागरप० | झ० द२] 
मृत शररीसस॒त्मृज्य कापलोप्टसम दितौ। पिमुस्ता पान्थया याम्ति धर्मस्तमलुगच्छति ॥ ५ ॥ 
महु० [५। २४१ ] 
५... एरी ओर पुरुष को चाहिये कि जैसे पुत्तिका अर्थात्‌ दीमऋ' बल्मीक अर्थात्‌ घांमी को दनाती 
दै दैसे सप भूतों को पीह़ा मं देकर परलोक भर्पाद्‌ परशस्म के सुखाये धीरे २ धर्म का संचप फरे॥!१॥ 
क्योंकि परलोक में भ माता म पिठा म पुत्र म स्त्री न छाति सहाय कर सकते हैं किन्तु पक धर्म दी 
सद्दापक द्ोता टि ॥ २॥ देछिये अरेखा दी ज्ञीय कन्‍्म भर मरण को प्राप्त द्ोता, एक दी धर्म का फल 
जो घुख भर अधर्म का जो दुःखरूप फल इसको भोगता दे ॥ ३॥ यह भी समझणों कि कुट्म्य में 
| एक पुराष पाप करके पदार्थ लाता दे और मद्दाघन अर्थात्‌ सद कुड्ठम्य उसको भोगता दि भोगनेषाले 
दोष्मागी नहों दोते किस्तु अधर्म का कर्त्ता डी दोप का भागी दोता दै॥ ४॥ श्य फोई किसी का 
सम्बन्धी मर ज्ञाता दि इसफो मट्टी के ढेले के समान भूमि में छोड़कर पीठ दे पस्धुषर्ग विमुख दोकर 
चले जाते हैं कोई उसके साथ काने याला मह्टीं द्वोता किन्तु एक धर्म दी उसका सह्ठी द्ोता है ॥ ५॥ 
सस्माद्व सहायाये नित्य सम्पिहुपाच्छनैः । धर्म्मेण हिः सहायेन तमस्तरति दुस्तरम ॥ १ ॥ 
धर्मप्रधाने पुरुष तपसा एताकेल्थिपस्स । परलोफ नयत्याश भाखन्त खशरीरिणम्‌ ॥ २ ॥ 
मनु० [४। २४२। २४३ ] 
जध्त द्ेतु से परलोक झर्थाद्‌ परणन्म में सुख और जन्म फे सद्दाणर्थ नित्य धर्म का सञ्यय 
धीरे २ करता जाय, क्‍योंकि धर्म दी फे सद्दाय से बड़े २ दुस्तर दुःखसागर को ज्ञीव तर सकता दै ॥ १॥ 
किस्तु ज्ञो पुरुष धर्म दी फो प्रधान समभता, शिसका धर्म के चशुष्ठान से कर्तव्य पाप दूर हो गया, उसको 
मरकाशस्यकूप झौर झाकाश मिसका शरीरधत्‌ दे उस परलोक झर्थात्‌ परमदर्शनीय परमार्मा को धर्म 
डी शीघ्र भासत कराता दे ॥ २॥ इसलिये!-- 
इठफारी मृदुर्दान्तः कऋ्राचारैरसंवसन्‌। भर्दिसों दमदानाम्यां जयेत्यगे तथाव्रतः ॥ १ ॥ 
वाच्ययो नियताः सर्वे याइमूला पागियानिःसृताः । सान्तु यः स्वेनयेद्वाच स सर्वेस्तेयक्न्नरः ॥ २ ॥ 
आधाराष््रमते श्वापुराचारादीसिता! प्रजा; भादाराद्दनमदय्यमाचारो हनत्पलदणम ॥| ३ ॥ 
ह मनु० [४ | २४६। १५६ ] 
सदा दृढुकारी, फोमल स्पभाष, जितेम्द्रिय, द्विसक, श्र दुष्टाचारी चुरुपों से पृथक रइनेड्टारा, 


धर्मात्या मन को ज्ञीव झोर विधादि दान से छुख को प्राप्त दोवे ॥ १॥ परन्तु यह सी ध्यान में रफ्से 


8 


है 
के बज 


घ्द्‌ सत्यार्य प्रकाश: 


कि जिस यासी में सब अर्थ धर्थात्‌ ब्ययदार निश्चित इते हैं यद्द बाणी ही उतका मूल 
याणी ही से सर व्यवद्वार सिद्ध होते हैं उस घाणी को ज्ञो चोश्ता अर्थात्‌ मिध्याप्राषण फग्वा 
छद चोरी झादि पापों का करनेयाला दे ॥ २० इसलिये मिथ्यामाषणादिरूप अधर्म को छोड़ जो 
चार अर्थात्‌ प्रह्मचर झितेम्द्रियता से पूर्ण झायु और धर्माचार से उत्तम प्रजा तथा अद्यय धव कक 
दोोता दे तथा झो धर्माचार में य्तंकर दुए शध्दाणों का नाश फरता दे उसहे सायरण को 
किया करं॥ ३॥ क्योंकि:-- 
दुराचाते हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सतसे ज्याधितोष्तपायुरेध थे ॥ 
* मछु० [9 । १५७] 
शी दुशयारी पुर॒ष दे यद्द संसार में सद्धमों के मध्य में निन्‍्दा फो प्रात दुःखमागी 
जिरस्दर स्याधियुक्त डोकर अस्पायु फा सी भोगनेद्दाया इोता है ॥ इसलिये ऐसा अयक्ष फरेः-” 
यपसयार्शं कमे दवपत्नेन बजेयेद । यददार्मप्श तु स्पाचत्तत्सेपेत यतनतः ॥ है 
सर्वे दरइश हर स्बमास्मंपश सुखम्‌ । एतद्रियास्समासेन लचणण सुखदुःखयो£ || रे ॥ 
ह मनु० [४। १४६ । १६० | 
हो २ पराधीग रूमे दो इस २ का प्रपदा रे स्याग ओर ज्ञो २ स्थाधीग कर्म दो रप' 
प्रषक्त ८े शाप रेत करे ॥ १॥ क्‍योंकि जो २ पराधीमता है बद २ सप शुःख और जो २ सवार 
हैं दइ २ राश शुच, पदी रॉशएप शे छा ओर दुःथ फा लक्षण जानता चाहिये ॥ २॥ परस्तु को एक' 
दे छाए काम दे वइ + भाषीरता हे दी करता चाहिये शेसा कि हरी और पुशंष एक इस 
आऋाधीश दददइार अध्याय श्री वुध्द का और पुरुष ट्री का परस्पर प्रियायरण अगुफूल शएता भ 
चार दा दिरेय ऋमी मे करता पुर की आदइानुफूल प्रए के काम प्री और यादर के काम १: 
टीन रहसा दुए ध्यसन के पौसने रे एक दूसरे को रोकता शर्थाद्‌ वही निशध्यप जञातगा। जप 
दो हर हरी दे शा पुरुष भोर दुदप र साथ स्त्री विक चुकी भर्थात्‌ शो मरी और पुदप के 
इतर, मान, बच्चटशावपरईस्त हे चुच दें बइ थीपादि एक दूसरे के आधीन द्ोशाता है।सप्री पा ' 
असतक्ष+" दे. दिशा आई मरी प्यवदरर मे ऋर्ट | इनमें दे अध्रियकार क स्यवियार, वेश्या, परपुदशणर 
भाव हैं। इश्डो शक « अपने पति *े साथ प्री ओर हरी के साथ पति रादा प्रसक्ष रहें के! 
हटषएकए इसे ८ रुरप अं को पड़ाते कथा सुफिकिता क्री शड़कियों को पढ़ाये, शागाविध 2 
आर इक डग्द इनक) विडप्त करें (क्री का वृश्तप वेष पति और घुरुप की पूतगीए अ 
झम्दुप करडे बोडर बैदी हर है। खत गृद कुल में रहें लवतका माता दिता के हामान शरध्या 
आर फे ओफज अप्यापर आपसे उस्वानों ८ समःग फिन्यों को शमकें॥ चढ़ागैडारे , भध्वष्यक 
ऋष्दा रकट ६ के हज खत ये -- 
कटलशाई शपपस्न लिया घरदेजित्यदा ) यप्॒थी नापकर्तरित थे है परेडत उच्योे ॥ ! 
झररर दाइनतएओ सिक्दकर्यन ने मरते | शनालियः भ्रहपान एजल्यरिदलधंशम ॥ १ 
कवि रिहज ने लिए खुदा, विजय चाय मजते में कामात ! 
_ असन्दण दुापूपके पाये, सस्थदा्त पद परिदगस्य ॥ है ॥ 
शपधपक पाप ब्टू।ल नई केस्क लिए शरिवुयू। अष्ात्तु थ ने हृपत्ति गया! दपिडगरुदवा 


घतुर्पसमुन्नासः 








खूचवारू चित्ररप ऊदवान्‌ प्रतिमानवान्‌ । झआाश ग्रन्यस्थ वक्ता च यः स पणिडत उच्यते ॥४॥ 
पुर प्रज्ञानुगग यस्‍्य प्रह्मा सैष थुवामुगा | असंभिन्ापमर्यादः पणिडिताख्यां लमेत सः ॥ ६ ॥ 
ये सब महाभारत उद्योगप विदुरप्रजागर [ अध्याय ३२ ] के छोफ हैं । 
अर्ध- जिश्को झात्मशान, सम्यक भारस्म भर्धात्‌ ज्ञो निकम्मा आलसी कमी म ग्हे, सुख, 
(एस, हानि, छान. मानापमान, निम्दा, स्तुति में इ्ध शोक कभी मे करे, धर्म ६ में नित्य निश्चित रहै, 
जैक्षके मन को उत्तम २ पदार्थ अर्थात्‌ विषय सम्यन्धी पस्तु आकर्षण मं कर सके यद्दी परिडत कद्दाता 
)ै॥ १॥ सदा धर्मेयुक्त को का सेवन, अधर्मयुक्त फा्मी का स्पाग, ईश्वर, बेद, सत्याचार की निम्श 
॥ करनेद्वारा, ईएपर आदि में भत्यस्त भदालु दो यद्दी पएिडत का कर्व्याकर्त्तत्य कर्म दे ॥२॥ जो 
डंढितन विषय को मी शौघ्र ज्ञान सके, बहुत कालपर्यस्त शात्मों को पढ़े, छुने और पिचारे, हो 
(प ज्ञाने उसको परोपकार में प्रयुक्त करे, भपने स्थार्य के लिये कोई काम म करे, दिना पृद्दे या दिना 
ऐग्प समय जाने दूसऐे के अर्थ में सम्मति न दे यद्दी प्रथम प्रश्ञान पणिदत दोना धादिये ॥ ३॥ जो प्राति 
है भयोग्य री इच्चा कमी त करे, मष्ट हुए पदार्थ पर शोक मे करें, आपरकाल में मोह को मे प्राप्त 
प्र्धाद्‌.ध्पाकुल न द्वो यदी बुद्धिमान पण्िधत दे ॥! ४ जिसकी थाणी सप विद्याप्ों ओर प्रश्मोत्तरों थे 
हरने मे झतिनिषुण, विचित्र, शास्त्रों के प्रकरणों का थक्ता, पथायोग्य तर्ष ओर स्मृतिमान प्रस्धों के 
प्यारे अर्थ का शीघ्र पका हो पड्दी पगिइव कद्दावा दे ॥ ५ ॥ जिसकी प्रद्मा एने हुए सर्प अर्थ के हमु- 
हण झोर जिसका भ्रपण दुद्धि के अनुसार है, जो कभी आये भर्थात्‌ भे्ठ धामिक पुरुषों की मर्यादा 
हा छेदन मे करे घटी परिष्टत संछ! को प्राए दोषे ॥ ६॥ जद ऐसे ऐस श्री पुयर पढ़ानेदाले होने टे 
पद्दां पिया धर्म और इक्तमाचार की घृद्धि दोफर प्रतिदिम झमम्द दी बढ़ता रहता टै ॥ पहने मैं ऋषोग्य 
भोर मूर्ष पे लक्तण:-- 
अशुवभ समुषतद्वों दरिद्रथ महमनाः । भर्थीयाउफर्मणा प्रेप्मु्पूद इन्युघ्यते पुरे) ॥ १ ॥ 
अनाहृतः प्रविशति धष्ष्टी पहु भाषते | भविश्वस्ते दिश्वत्तिति मूदचेता नराधमः ॥ २ ॥ 
(१ ये होक भी मशभारंत उधोगपर् विदृरप्रजागर [ भध्याय शेर ] के है। 
2 अर्प--शिपने कोई शारर मे पढ़ा म एुना, भोर हझतीद घमएडी दरिद्र दोरए बढ़ २ प्रगोग्य 
है करनेद्वारा, बिता कर्म से पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा करनेयाधा दो उसी को शुद्धिमाद कोग मूह कश्ते 
॥हैं॥ १॥ जो विना युणावे समा य किसी के घर में प्रविष्ठ हो, उध झआलद एर बना रियर दि दे 
सवा में बहुनसा बरे, विश्वास के भषोग्य पस्तु या मदुष्प में विश्वाल करे दई। मूड छोर सब मनुष्यों है 
+ भोच मनुष्य रद्वाता दे॥ ९॥ ज्यों ऐसे पुयर भ्रप्यापक, डपरेश क, गुद झोर मागतीय होते हैं द्ां ऋदिएा, 
(चर्म, असम्पता, फल, विशेध झोर फूट बढ़के दुःछ शी वढ़ जाता दे ॥ झर विधाधिएं के रक्षा +- 
!. आलपस्य मदमोए्ती प चापले गोहिरेष घ । स्तग्पता दाभिमानित्य तयाशत्यागित्दवमंश थ॑। 


#ऐवे पे सप्त दोपाः स्पृ+ सदा विधार्षनों दाग ॥ ९ ॥ है 
( छुखार्पिनः इतो पिया हुतो दिध्ार्पनः मुखर । सुखाएँ दा त्जेद्ियाँ विधार्दी दा स्पनेस्सुरर ॥२॥| 
ये भी रिदृरजागर [ अध्याय ३६ ) के झोए हैं । 
अर्थे--( आालहय ) अर्थात्‌ शरीर झौर दुद्धि मे जडुता, शशा, मोइ दिसी द्तु ूें पैस्ताइट, 
,भपल्षता झौए इधर इधर बी ब्यर्थ कथा करमा शुसता, पहले पढ़ाने रक् झाझा, ऋमिमाएी, अष्यप्टी 
है 


ड ग 





द्दैद सत्पाधप्रकाशः 





" द्वोमा ये सात दोष धिद्यार्थियों में धोते दें ॥ १॥ जो ऐसे हैँ उनको विद्या कमी नहीं आती। सुस्र 
की इच्छा फरने याज़े को विद्या फट्दां ! और, विद्या पढ़ने वाले को छुख का ? क्‍योंकि 7 +७ 
विद्या को और विद्यार्थी विषयसुश्त को छोड़ दे ॥ २॥ ऐसे किये ब्रिना विद्या कमी नहीं दो सकती। 
पैसे को विद्या होती दैः-- 

सत्पे रतानां सतर्द दान्तानामूर्ध्रेतससामु । ब्रह्मचये दहेद्राजन्‌ सरवेपापान्युपासितम॥॥ 

जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जिनेन्द्रिय श्र ज्ञिकका थीये अधःस्खलित कभी न दो 
का ब्रह्मचये सच्चा और वे द्वी विद्वान दोते दें ॥ १॥ इसलिये शुभ लक्षणयुक्त अध्यापक और ४ 
दियों को दोना चादिये। अध्यापक लोग ऐसा यत्न किया फरें जिससे विद्यार्थी लोग सत्यवादी, 
मानी, सत्यकारी, सम्यता, जितेन्द्रियता, खुशीलतादि शुमगुणयुक्त शरीर और आत्मा का पूर्ण वह 
के समग्र वेदादि शास्रों में विद्वान्‌ दो, सदा उनकी फुचेष्टा छुड़ाने में और विद्या पढ़ाने में चेण रि 
करें। और विद्यार्थी लोग सदा जितेन्द्रिय, शान्त, पढ़ने द्वारों में प्रेम, विच्ारशील परिथ्रमी द्ोकर रे 
धुरुपार्थ फरें शिससे पूर्ण विद्या, पूर्ण श्रायु, परिपूर्ण धर्म और पुरुषार्थ फरना आज्ञाय इत्यादि हर 
बर्णों फे फाम दें। क्त्रियों फा कर्म राजधर्म में कहेंगे। [ वेश्यों के फर्म प्रह्मचर्यादि से वेदादि वि 
पढ़ [ विवाद फण्के ] देशों की भाषा, नाना प्रकार के व्यापार की रीति, उनके भाव ज्ञानता) मेवे 
खरीदना, द्वीपद्दीपान्तर में ज्ञना आना, लामार्थ काम का आरम्म करता, पशुपालन और सेती * 
अन्नति चतुगई से फरनी फरानी, धन फा यढ़ाना, विद्या और धर्म फी उन्नति में व्यय करना, सर 
निष्कपटी दोकर सत्यता से सय व्यवद्दाए करना, सब यस्तुओं की रक्षा ऐसी करनी जिससे कोर * 
न दोने पाये । शद्र सब सेवाओं में चतुर, पाऋषिदया में निषुण, अतिप्रेम से द्विजों की सेवा शोर २ 
से अपनी ठपज्ीविका करे और द्िक्ष छोग इसके खान, पान, यस्छ, स्थान, यिवाद्ादि में शो कु में 
दो सए कुछ देयें। अथवा मासिक कर देवें। चारों घर्यो को पररुपर प्रीति, उपकार, सद्धनता, सै 
दुःख, दानि, लाप में ऐक्पमत रदकर राज्य और प्रज्ञा की उच्चति में तन, प्त, धन का व्यय हा 
रदना | स्री भर पुझप का यियोग कमी न द्वोना चादिये, क्योंहि-- ह 

पाने दुजनसंसर्गः पत्पा च विरहोष्टनम । स्वप्लोन्यगेधवांसथ सारीसन्दृपणानि पद! 

! है मजु० [£। १३) , 

मथ मांग आदि मादक द्रृष्यों का पीना, दुए पुरुषों का सह्ठ, पतिविषोग, श्रकेशी कई है. 
ब्व्ये पाथयटी आदि के दर्शन के मिस से फिरती रदना और पराये घर में ज्ञाके शायन फरना वा 
ये छः दरी को दूषित करने याले दुयुण दें। और ये पुयषों के भी हैं। पति और खझी को पिपोग | 
प्रकार छा होता दे रद कार्पर्थ देशास्तर में शाना ओर दूसरा मृत्यु से विधोग द्योमा इनमें से #! 
का दपाए यद्दी दे कि दुर देश में यात्रार्द जावे तो स्त्री को मी साथ रफ्से, इसका भ्योशन यह दै | 
दहुव झमद तझू दिधोग मे रहना घादिये। (वन सी और पुप का बहु वियाद दोने योग्य दे पा हा, 
६ इचर ) युगरत्‌ ने भर्याव्‌ एच समय में मद । ( प्रश्ष ) फ्या समपास्तर में अनेक वियाइ दोने 
६ टूर ) हां, आते: 

मा देदददयोनिः स्पाद्‌ गरप्रस्यागवादे था। पीनरभवेन मरी सा पुनः सेश्काएमति 


०६१७६], 
_डिख 5 या पुरुष का पायिप्रदयपात्र सस्कार शुभ दो और हि इुआ हो भर: 
अइदरोरि करी और ऋष्वई्द युदव दो उनका अस्प श्री था पुयप के साथ पघुमर्दियाई द्वोता रण 


चतुर्थैश्ममुद्ञासः हह 


7 किम्तु धाह्मण क्षत्रिय और चैश्य पर्यो में छतपोमि स्त्री श्तवीये पुरुष फा पुनर्वियाद म दोना चादिये । 
(एन ) पुनथियाई में फ्या दोष दे ? ( उत्तर )( पद्विला ) करी पु में प्रेम स्यून होना, फ्योंकि जब 
खादे तय पुरप को स्त्री भर त्रो को पुम्ष छोड़ कर दूसरे के साध सम्पन्ध करले। (दूसरा) जब 
ईदी पा पुरप पत्ति या त्मो फे मस्ने फे पश्चात्‌ दूसग धष्ाइ करना चाहे तद प्रथम स््रीया पूर्ष पति के 
पदार्थों का उड़ा लेशना और उनके कुद्धम्श बातों फा उनसे कपड़ा करना। ( तीसरा ) यहुत से भद्रकुल 
“पका नाश वा चिट्र भी न रद कर उसके पदार्य द्विप्त परिन्न द्ोजाना । ( चौथा ) पतिघत और ख्रीयत धर्म 
पणए होना, इत्यादि रोपों के भर्य दिपफ्रों मे पुतर्दियाइ था अनेक दिया कभी म द्वोना चाहिये। (प्रश्न ) 
श्र बंशमदेदन हो जाय तर भी उछहा कुल नए द्ोज्ायगा और रत्री पुरुष ब्यभिचारादि कर्म फरके गर्भ- 
पातनादि बहुत दुए कर्म करेंगे इसलिये पुनर्वियाद होना अच्द्ा है। ( उत्तर ) नहीं २, क्योंकि जो स्त्री 
पुरएप धहायचरद में स्थित रहना चाहें तो कोई भो उपद्य न द्ोगा झौर ज्ञो कुल की परम्परा रखने के 
लिय किसी झपने स्वक्षात का लटका गोद ले लेंगे उससे कुल चलेगा ओर ध्यभियार भी न द्ोगा 
और छो प्रह्मचई न रप सकें तो मियोग करके सन्‍वानोत्पष्ति करलें। ( प्रश्न) पुनर्विधाह भर नियोग 

पें क्या भेद दे ! (उत्तर ) ( पदिला) जैसे विधाइ करने में कनश अपने पिता फा घर छोड़ पति के 
घर को पात द्ोगो है ओर पिता से विशेष सम्बन्ध महीं रहता ओर विधवा रही उस्ली विद्याद्वित पति 

के मर में र्षतो दे । ( दूध ) उसी पिददिता खो के लड़के उसी विद्यादित पति के दायभागी दूवोते 
हैं। भर विधया ररी ६ लइके यीवैदाता के न पुश्र॒कद्ल्ााते ले उसका गोत्र होता न उसका स्वत्य 
हिन लहकों पर रदता डिन्‍्तु वे सुतपति के पुश्र यजते, उसी का गोश्र रद्दता और उसी के पदार्थों के 
दियभागी द्वोफर उसी घर में रहते हैं। ( तीखरा ) विशवाद्वित स्री पुरुष को परस्पर सेश झोर पालन 
'करना अवश्य दे ओर नियुक्त स्त्री पुयप का कुछ भी सम्बस्ध नहीं रइता। (थोथा ) विवादित स्त्री 
पैसा का सम्बन्ध मसणु््येन्त रहता और नियुद्ध तत्रीपुरुष का कापे के पश्चात्‌ छूट ज्यता दे। 
(पंख ) दिशद्ित हरी पुयप आपस में गृद्द के कार्यो फी सिद्धि करने में यज्ञ किया करते और 
(नियुक्त र्री पुरुष अपने*२ घर के छाम किया करते हैं| ( भ्रश्त ) विधाइ झोर नियोग ऐे; नियम एक से 

हैं वा एथर २! (उत्तर ) कुद्द धोड़ासा भेर दे जितने पूर्व कद झाये भोर पद कि वियाद्ित स्री पुरुष 
शझ पति और एक दी स्पो मिश्र के दश सस्तान उम्पेष्न कर सकते हैं झोर नियुक्त स्त्री पुरुष दो वा 
जार से भधिक ससातोरयत्ति नहीं कर सहते अर्थाव्‌ जैसा कुमार कुमारी दी का विय्राद धोता थे धेसे 
जिप्नफी रत्री वा पुयर मर ज्ञाता दि उन्दीं का नियोग द्ोता दे कुमार कुमारी का महीं। जेसे विवादित 
| पुरुष सदा संग में रदते हैं देते निषुक ख्री पुदप का ब्यत्रद्वार नहों हिन्तु पिना ऋरतुदान के समय 
(पक न हों, ज्ञो खी श्रपने लिये निषोग करे तो भी दूसरा गर्म रद्दे उसी दिन से र्री पुयप का सम्बन्ध 
किट ज्ञाप | और ज्ञो! पुथप अपने लिये करे तो मी दूसरा गये रइने से सम्बन्ध छूट ज्ञाप। परन्तु 
दो नियुक्त क्री दो तीत यर्ष पर्दन्‍्त उन छड़कों का पालन फरके मियुक्त पुरुष को दे देदे । ऐसे एक 
विधवा स्त्री दो अपने लिये और दो २ भनन्‍्प चार तियुक्त पुरुषों के लिये सन्‍्तान कर सदती ओर एक 
वितखीक पुरुष भी दो अपने लिये ओर दो २ अन्य २ खाए विधवाओं के लिये पुत्र उत्पन्न कर सकता 

9 ऐसे मिलकर दश * सम्तानक्पलि की आाडा वेद में दे ४ पार पर्वियेपादर्श 
इस स्वा्मेन््र मीदवः सुपुर्ता सुमर्गों छूण । दर्शास्यां पुत्रानायेदि पर्विमेराद्श छाथे ॥ 
चा० में० १० | छू० ८४ । में० ४४ ॥ 
है ( मीदव, एंद ) यौपे सिंचते में समर्थ ऐम्वर्ययुक्त पुयप ! यू इस विवादित हही था दिधदा 
) टैप को थेष्ठपुत्र और सीमाग्पयुद्ध कर विदादित हरी मैं दश पुत्र उत्पन्न कर चोर स्पारइयों सरी 
ः कर न 


आने: हा 
ह हे है 





भ्ड 


छ० सत्याधप्रकाश+ 





फो मान । दे खत्री ! तू भी वियाद्दित पुरुष था नियुक्त पुरुषों से दश सन्तान उत्पन्न कर - 
पति फो सम । इस बेद की आशा से प्राह्मण क्षत्रिय और वेश्यवर्णस्य स्री और पुर देश: 
सम्तान से अधिक उत्पन्न न फरें। क्योंकि अधिक करने से सन्तान निर्यल, निर्दुद्धि, - 3९ 
है श्रोर त्वी तथा पुरुष भी नियेल, अरुपायु और रोगी होकर बृद्धावस्‍्था में यहुत से दुःख पाते | 
( प्रश्न ) यद्द नियोग की यात व्यतिचार के समान दीखती द्वे। (उत्तर) जसे विना विदाद्वितों का. 
दोता दे वैसे बिना नियुक्तों का ब्यधियार कट्दाता दि।इससे यद्द सिद्ध हुआ कि जैसा निया 
विवाद द्ोने पर व्यभिचार नद्ीीं कद्दाता तो नियमपूर्वक नियोग दोने से व्यप्ियाए न फद्दावेगा। 
दूसरे की कन्या फा दूसरे के कुमार के साथ शास्रोक्त विधिपूवेक विवाद दोने पर समागम में. : 
था पाप लज्जा नहीं द्ोती वेसे ह्टी वेदशाओक्त नियोग में व्यभिचाए पाप लज्ञा न मानना चा-, 
( प्रश्न) दे तो ठीक, परग्तु यद्द वेश्या के सदश कर्म दीखता दे। ( उत्तर ) नहीं. क्योंकि 
सम्रागम में किसी निश्चित पुरुष वा कोई नियम नह्दों दे ओर नियोग में विधाद फे ._ ० * 
जैसे दूसरे को लड़ की देने दूसरे के साथ समागम करने में विवाइपूर्वक लज्या नहीं दोवी पते ! 
नियोग में भी न दोनी चादिये | फ्या छो व्यभिचारी पुरुष या र््री दोोते दें वे दिया होते पर भी ढु 
से दचते हैं ! ( प्श्न ) इमको मियोग की थात में पाप मालूम पढ़ता दे । ( उत्तर ) जो नियोग की 
में पाप मानते द्वो तो विवाद में पाप फयों नहीं मानते र पाप तो नियोग के रोफने में दे. क्योंकि पवार | 
सष्टिकमासु कूल स्री पुरपत फा स्वामाविफ व्यवद्वार रुक द्वी नहीं सकता, सियाय वैराग्यवान्‌ 
घोगियों के ! क्‍या गर्मपातनरूप खूणदइत्या ओर विधवा स्त्री ओर मतकत्मी पुरुषों के मद्दापत्ताप 
पाप सद्दों मिनते द्वो ! क्‍योंकि जएतक बे युवावस्था में हैं मन में सस्तानोश्पत्ति और दिपय फी पर्श 
द्वोनेषालों फो किसी राजव्यपद्दाए या ज्ञातिव्ययद्दार से रफाबट होने से गुप्त २ फुकर्म बुरी धार | 
पोते रदते दें इस ब्यभिचार झौर कुकर्म के रोकने का एक यही श्रेष्ठ उपाय दे कि ज्ञो शितेन्दिय 7| 
सकें ये विधाद् था नियोग भी न फरें तो ठीक दे । परन्तु जो ऐसे नद्दी है उनक। वियाद और आप!!! 
में निषोग अवरश्प द्ोना चाहिये। इससे ध्यभिचार का न्यून द्वोना, प्रेम से उत्तम सन्‍तान द्ोऋर मदर 
की पृद्धि दोना सम्मय दि ओर गर्मइत्या सर्वधा छूट ज्ञाी दे, नीच पुरुषों से उत्तम छरी और वे! | 
भीय ह्ियों से उत्तम पुयपों का व्यशरिचाररूप कुकर्म, उत्तम कुल में कलंक, धंश का उच्चेद 
चुण्षों को सस्ताप और गर्मस्पादि कुकर्म विदाद और नियोग से निवृत्त द्वोते दें इसलिये नियोग का 
चादिये। ( प्रश्त ) नियोग में क्या २ वात दोनी घादिये ! (उत्तर) जैसे प्रसिद्धि से विश, पैसे ( 
पसिद्धि से निरोग, निप ध्रद्यार वियाद में मदर पुरुषों की चमुमति और कन्या यर की प्रसन्नता है| 
दे देते नियोग में मी अर्थात्‌ जब दी चुप का नियोग द्वोना दो तव अपने कुटुम्प में पुरुष हिों 
सामने [ प्रशूट फरें कवि ] दम दोनों नियोग सन्तानोरस्पत्ति के लिये करते हैं | जप तियोग का हि 
पूण होगा तइ इम संयोग न करेंगे । ज्ञो चम्यथा करें तो पापी भर ज्ञाति था राज्य के दएइतीय । 
महीने २ में दरूषार गर्माधान का फाप्र करेंगे, गर्म रद्दे परचात्‌ एक धर्ष पर्यन्‍्त पथ २हेंगे। ( हा 
लिपोग ऋषने यर्य मे डोना चादिये था अस्य वर्षों के साथ भी | ( उत्तर) अपने थर्ण में था भपने 
2 दस्म्य पुयप के साथ अर्थात्‌ येश्ा स्त्रीचैरव, छत्रिय और पाहाण के साथ, दत्रिया 
४ रप्नप्टय थे साथ, धाइयो प्रादयण॒ के साथ नियोग कर सच्ती | | इघका ता्पवे यद दि हि 
रण दा छत या का घादिये अपने सो जीये के यर्ण का शहों । सी और पुरुष की एडिंका शं 
अषोडव दे पा धर्म मे चर्चाव्‌ बेशक रीति से विवाह दा मियोग से सम्तानोस्वोत्त करता । (# 
डप की हप गे झरने कर कया झध्वर॒प रता दे क्योंकि वह दूसरा दिवाद करेगा  (उत्तर। 










5 2 


धतुर्घसमुन्नासः ७१ 











लिख आये हैं द्विऑों में सती और पुरुष का पक द्वी धार वियाह द्वोना पेदादि शात्रों में लिखा है, द्धितीययार 
॥ही। कुपार और कुषारों का ही विदाई होने में न्‍्याप और विधया सत्री फे साथ कुमार पुयष और 
कुमारी रत्री के साथ सझुतास्रौक चुरुप के यिष्वाइ द्ोने में अन्याय अर्थात्‌ अधर्म दे। जैसे विधया ख्री के 
साध पुर वियाद नहीं किया चाइता बैसे द्वी विधाइ और ख्री से समागम किये हुए पुरुष के साथ 
पिधाइ करने की इख्द्वा कुमारी भी म करेगी। ज्ञप वियाद्द किये हुए पुरुष को फोई कुमारी कन्या 
घोर विधया स्त्री का प्रददण कोई कुमार पुरुष न फरेगा तब पुयाप और स्त्री को नियोग फरने की 
भावएपकाा होगी । शोर यही धर्म दे कि जैसे के साथ यैसे दी का सम्बन्ध होना चादििये। (प्रश्न ) 
जैसे विश्वाद में बेशदि शास्त्रों का प्रमाण दे वैसे नियोग में प्रमाण दे दा नहीं ! (उत्तर ) इस विषय में 
गदुत प्रमाण हैं देखो और सुनो;-- 
' « इसिश्ोपा हु वलॉएरिसना शुहभिवि्े फैसः कुददोपतुः । को वा शयुत्रा विधर्ेंत देखई 
मय ने योपों कणुते सघस्थ भा ॥ ऋ० में० १० | छू० ४० | मं० २॥ 
। _ उदी्स नायमिजीलो# गतासुमेतमुप॑ शेप एहिं । इस्तग्रामस्‍्प॑ दिधिपोस्तवेदं पत्युंगेनित्व- 
मम से बंधूय ॥ ऋण में० १० | छू १८। मे० ८] 
॥ दे (अश्विना ) स्री पुझषो ! जैसे (देवरं विधवेव ) देवर को दिधया और (योपा मर्यक्न ) 
विवाहिता स्त्री अपने पति को ( सधस्थे ) समान स्थान शरपा में एकत्र द्योकए सम्तानोरपत्ति को 
| झा, छणुते ) सप प्रकार से उत्पन्न फरती दे चैसे तुम दोनों क्री पुरुष ( कुद्म्विद्वोपा ) फटा राधि 
शोर (कूद यरत: ) क्दां दिन में यमे थे ( कुद्दामिपिस्थम्‌ ) कड्टां पदार्थों फी प्राप्ति ( करतः ) की 
भोर ( कुद्दोपतु;) किस समय फहां घास करते थे! ( को यां शयुत्रा ) तुम्पारा शपनम्धान कई है | 
कया कोन था किस देश फे रइने याले दो | इससे यद्द सिद्ध दुआ कि देश विदेश में ख्री पुरुष संग दी 
मं रहें। और विद्ाद्ित पति के समान नियुक्त पति को प्रदण करके विधया ख्री भी सम्तानोरपति कर 
गवे। ( प्रश्न) थदि किसी का छोटा भाई दे मे दो तो विधवा तियपोग किस फे साथ करे ! (उत्तर) देयर 
ह साथ, परन्तु देवर शद का अध जैसा तुम समभते दो पैसा नद्दों, देयो नियक में-- 
,.. देवर; कस्माद्‌ दितीयो यर उच्पते || निरु० झअ० ३। खं० १५॥ 
| देशर उसको कहते हैं ज्ञो कि विधवा का दूसरा पति द्वोता दे घाद्दे छोटा भाई था यद्टा भाई 
#थया अपने यर्ण वा अपने से उत्तम वर्ण बाला दो जिससे नियोग करे उसी का नाम देयर दि ॥ 
पु हे हे (नारी ) विधये तू (पतं गताछुम्‌) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ थे। (शेप ) बाफ़ी 
यों में ले (अभि, जीयन्ोकम्‌ ) जीते दुए दूसरे पति को ( ड्पैद्दि ) प्राप्त दो और (उदाष्य) इस 
शत का विद्या: भर निश्चय रख छि ज्ञो ( दस्तप्रामस्य दिधिपो: ) तुझे विधवा के पुनः पािप्रटण 
ह ऊरनेधाले मियुक्त पति के सम्पन्ध हे; लिये नियोग दोगा तो (इदम्‌ ) यदद ( जनिरवम्‌ ) झना हुआ बालक 
ट्रंसी नियुक्त ( पस्युः ) पति का द्ोगा और ज्ञो सू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सम्तान (व ) हेरा 
शीया । ऐसे निश्ययपुक्त ( अभि, सम, यभूष ) दो ओर नियुक्त पुरुष भी इसी निवम का प लत करें ॥ 
। , भवदेवृष्मयपंतिप्ती हें शिवा पम्प सुण्मीः सुबचाः । प्जारैदी वीर्देवृकमा स्पोनेममग्न 
;पाईपर्पं सपये | अथई० को ० १४ । अबु० र | मं० श८ वां 
| दे ( अपतिष्त्परे्ठ प्र ) पति और देवर फो डुःघ न देने पाली सर | तृ (हट) इस गृह्यथम में 


/ पशचभ्यः ) पशुच्ों ऐे लिये ( शिया ) फल्पाय करनेद्वारी ( छुप्मा:) ऋच्छे मकर धर्म वियम में घहने. ०४००, 


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७२ सत्या्येप्रकाशः 


( खुबर्माः ) रूप और सर्वे शाख्र विद्यायुक्त ( प्रज्ञावती ) उत्तम पुत्र पौषादि से सहित (बीगरम)+ 
घीर पुत्रों को जनने ( देवकामा ) देवर की कामना करने घाली ( स्थोना ) और संख देनेद्वारी र्फ 
देवर फो ( एथि ) प्राप्त दोके (इमम ) इस ( गाईपत्यम्‌) शद्दस्थसम्बन्धी (अग्रिम) अग्निदोत्र 
(सपर्य ) सेवत किया कर ॥ 
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ मलु० [६ । 5£ ] 
ज्ञो अच्षतपोनि ख्री विधवा हो जाय तो पति का निज दोटा माई भी उससे विवाह कर 
9 ( प्रक्ष) एक स्त्री वा पुरुष कितने नियोग कर सकते हैं. ओर विवाद्दित नियुक्त पवियों का 
द्वोता है ! ( उत्तर )-- हि + 
भोम; प्रथमों विंविदे रथ पतों अपन पर्निस्तरीय॑स्ते मनप्यना 
सोमः प्रयमो दिंविदे गन्ध॒वों विंविद उत्त॑रः । तृतीयों अग्नि पर्तिंललुरीय॑स्ते मनुप्यणा! 
ऋ० मं० १० | सू० ८५ | मं? ४०॥ क्‍ 
दे स्ति!ज्ञो(ते) तेरा (प्रथम ) पद्दिला विवादित ( पति: ) पति तुकको ( विविदे ) प्रात | 
है उसका नाम ( सोमः ) सुकुमास्तादि णुणयुक्त द्वोने से सोम, ज्ञो दूसरा नियोग से ( दिविदे ) प्रा" 
वद्द ( गन्धवे:) एक स्री से संभोग करने से गन्धवे, जो ( तृतीय उत्तर; ) दो के पश्चात्‌ ते 
पति दोता दे यद (अ्रप्निः) अत्युप्णतायुक्त होने से अग्निसंछक, ओर ज्ञो (ते) तेरे ( हु 
घौधे से लेके ग्यागइवें तक नियोग से पति दोते दें. ये ( मलुप्पजाः) मदु'्य वाम से फद्दाते हं॥आ 
( इमां त्यमिस्द्र० ) इस मन्त्र से ग्यारइयें पुदप तफ झ्री नियोग कर सकती है बेसे पुरुष भी ५५ 
स्त्री तक्त नियोग फर सकता दै। (श्रक्ष) एकादश शब'इ से दश पुत्र ओर ग्याग्डे पति को को 
गिरने! (उत्तर) जो ऐसा अर्थ करोगे तो “विधवे३ देवस्म” “देवर: कस्माद द्वितीयों घर उ्, 
“अरैधृधि” और “गन्धर्यों विधिद उ्तरः” इत्यादि बेदप्रमाणों से विरुद्धार्थ दोगा, फ्योकि बुग्दारें 
दूसरा भी पति प्राप्त नद्दी दो सऋता। 
देवराद्वा सपिएडाद्ा थ्लिया सम्यद् नियुक्रया । प्रजेप्सिताधिगन्तब्या सन्तानस्प परिहये ॥' 
हयेप्टो यत्रीपस्तों माय्पों यवीयान्वाग्रनद्धियम्‌ | पतितों भव्तों गला नियुक्ावप्पनापदि ॥ 
ओरमः चेत्रमग्रैव | ३ ॥ मनु० [६ ५६ । ५८ | १५६ ] 
इत्यादि मतुजी ने लिछा दै कि (सपिए्ड) अर्थात्‌ पति की छः पीढ़ियों में पति कीं (0 
या यहा माई अथवा स्वशातीय ठथा अपने से उत्तम ज्ञातिस्थ पुरुष से विधयार्री फा नियम 
चाय हा चर्स्तु जोक सूतखीक पुझर और विधया स्री सस्तातातर्पत्त की इच्छा करती दी हो गि 
डोना डचित द|। और जइ सन्‍्तान का सर्वेथा चाय द्वो तव नियोग दोवे। शो आपस्काल ऋधर्वि 
रे पोते की इष्दान दोने में बढ़े माई की स्री से छोटे का ओर छोड़े की री से व मां का 
कक हि 4043४ दोडाने पर मी युनः वे नियुक्त ऋापस में सप्रागम करें तो पहित दोजाये £६| 
एच मिदश मे दूसरे पुच्र के गर्म रहते तक नियोग की अयधि दे उसके पश्य तू समागमम करें। 
हो दोनो कै थिये यम दुष्पादों तो घोये गर्द तक अर्थात्‌ पूर्वोक्त रीति से दश ससतान त* ड्ोह 
पक दिली डाती दे, इससे ये पतिक मिने शाते हैं। ओर भो विवादित 
भीडशवें गम से अधिक गबागम करें तो वानी घोर निरिदय होते हैं चर्चात्‌ विष शा लिये गे हे 


दी डे अऋद €द जाते हैं वटवत्‌ कामझीढुा र लिय मद! निषोग मरे पाए बा छै दा 
ली कट मक्तीढु ले लिये मह्दों देगा 
दंड दे थी ह ( इच्र ) ईजे मी होता दै-> ट्ट( धन्न ) निषोग मर पीछे शी दवीठा 

















चत॒र्थे समुन्लासः ए्३ 





झअन्पामेच्डस्प सुभगे पति मत्‌ ॥ ऋ० में० १० । ० १० ॥ 

जग पति सन्‍्तानोग्पत्ति में असमर्य द्ोवे तर अपनी ख्री को आझा दैये कि है सुमगे। 
सौमाग्य की इच्चा करनेद्वारी स्त्री तू (मत्‌ ) मुझ से ( अन्यम्‌ ) दूसरे पति की ( इच्छस्थ ) इच्चा फर, 
फरोंकि अप मुझ से सस्वानोःपतति न हो सकेगी | तर रत्री दूसरे से मियोग करके सम्तानोत्गसि करे। 
परणु उच्त विवादित मद्दाशप पति की सेवा में तत्पग रहे बैपे द्वी से भी ज्ञर रोगादि दोषों से प्रसव 
ट्ोफर सस्वामोर्पत्ति मे अमप्रय्े दो तर अपने पति को झांशा देवे कि द्वे स्वामी आप सस्तातोश्पत्ति की 
इच्ड्ठा मुमसे दोह फे किसो दूधऐ शिधदा रत से नियोग करवेः सम्तानात्पत्ति कीजिये ) जैसा कि 
पाडु राजा को स्त्री कुम्तो झोर माद्रो भादि ने किया झौर जैसा ब्वायञ्री ने घित्राक्षर शोर विवित्रपीर्य 
के मर ज्ञाने के पधाव्‌ उन अपने भादयों को स्तिपों से नियोग करके अशिका में घवधए भोर अम्शलिका 
में पाएडु और दासी में बिद्रर की उन्पति की, इत्यादि इतिद्ास भी इस णात में पमाए थें ॥ 
प्रोगिष्ठा धमेकार्याय प्रवीद्षयोंप्टी नरेश समाः । रिद्याये पड यशोये था कामाय प्रीस्तु यत्सरानू ॥१॥ 
यन्ध्यश्मेधपिवेधारद दशमे तु झुतप्रजा । एकादरो स्लोनननी सदस्त्यश्रियवादिनी ॥ २ ॥ 

ममु० [ & ]७६ | ८१] 

विवादित स््री ज्ञो विशद्वित पति धर्म ऐे अर्थ परदेश गया ध्टी तो झाठ यर्ष, विधा भौर 
फौधि के लिए गया हो तो छः भोर धनादि कामना के लिये गया दो तो तीन पर्ष तक बाट देख के 
पश्चात्‌ निपोग करे सम्तानोस्पत्ति करले, ज्र विद्ादित पति भात्रे तर नियुक्त पति छूट जब ॥ १॥ 
चैते दी पुयप के लिये भी निमम दे दि यरघ्पा दो तो झाउये ( विवाद से आठ वर्ष तक री को गर्म मं 
रहे), सखान द्ोरए मरहावे तो दशये शयर २ ट्टो तब २ कम्प द्वी धोवे पुत्र नदोंतोग्वारदवें वर्ष तर 
ओोए जो चाय दोसने वाली द्वो तो सघः उस ररी फो छोड़ के सरी परी से नियोग फरह सम्तानों- 
रे ऋर ले३े ॥ २ यैपे दवा जो पुर प्रस्यन्त दुःपद्मापक्र द्वो तो स्त्री को उचित दे रि उसको धोड़ फे 
दुधरे पुयप्र से निषोग कर समस्तानोखयत्ति करके उसी विधादित पति के दायभागी सम्तान कर लेगे। 
इहदादि प्रमाण और युक्तियों से स्पयंय्र विवाह और नियोग से अपने २ कुल की उप्यति करें। ज्ञत्ता 
“ओऔोरस" ध्र्चात्‌ विधादित पति से उरपन्न दुआ पुत्र पिता के पदार्थों का स्‍्थाम्री होता दे बैते शी 
“के है अर्थात्‌ मिंपोस से डत्पत्त दुए पुद्द भी खुबपिता के दापमागी होने हैं। शब इस पर शी 
और पुरुष को ध्यान रखना धादिये कि थीपेी और रज्ञ को अमूल्य समझें, ओ कोई इस झमूरप पदार्द 
को परद्षी, वेश्या वा दुए पुथपों के सह में पोते दें दे मदमूर्य दोते हैं। फ्योशि किसान व माली मूर्ख 
दोशर भा झपते रोत वा वाटिका के विना अस्य्ध बीज नद्दों इते | जो कि साधारण बीघ और मूर्स का 
ऐजा प्रतेनान दे तो ज्ञा सर्वोत्तम मनुप्पशरीर रूप पृष्ठ के यौज को कुत्तेच्र वे पोता टै थद मधामूपे + दावा 
है, फ्योंफि उसका फल उस्तको नहों मिलता भोर "झारना ये जाएते पुष्र:" यद प्राझण धरधों का बयन ऐ ॥ 

भड्ञरकरासम्मंगरे हृदादपिजायसे । झात्मा वै धरयनामाम स जींय शरदः शतम || हि 
निरुण ३4 ४ ॥) 

दे पृष्त दू भक २ से उत्पन्न हुए योर से घोर हदय से इउत्पच दोता है इसलिये सू मेरा चाय 
है मुझ से पूर्व मत मर शिखु सो यर्ष तश ज्ञी । जिसे देये २ प्रदश्या और मद्दाशयों छे शरीर साय 
दोते ऐँ उस हो वश्णदि युएसेत्र में पोमा था दुप्ररेश् भज्दे सेत्र में बुशना मद्ापार वा बाम टै। 
(प्ररत ) दियाद फ्यों करना ? फ्रोंकि इससे स्वी पुर को बम्धन में एड़दे बहुद रुंटोय करण आर 





लग: 


ग टी 





३४ सत्यायय प्रकाश! 





दुःस्र भोगना पहता दै इसलिये जिप्ते साथ शिसकी प्रीति दो तकतक ये मिले रहें हुए प्रीति 
आप तो छोड़ देये। ( उत्तर ) पद पशु पश्चियों का इपवद्ार दे मनुष्यों का नही।जओं मनुष्यों मे शि। 
फा नियम से रहे तो सर गृदाअम के अच्छे २ स्यवह्र सत्र नष्ट ख्रष्ट दो शाये। कोई किसी की हेश 
भी मे करें और महा ध्यभियार बढ़ ऋर सब रोगी निरंत और अल्पायु इोफर शीध २ मए जायें। ४ 
किसी से मद या लज्ञा न करे | धृदायस्या:में कोई शिसी की सैया मी नहों करे और मइायद्रिवा 
बढ़कर सप रोगी मिर्रंत्त और अद्यायु दोकर कूलों के कुछ नए दोजायें। कोई किसी के पदाथों श 
स्व्राप्ती वा दाप भागी भी न दो सके ओर न किसी का दिसो पदार्य पर दीवहालपर्ष्त सात ये 
इत्यादि दोषों के निवाग्णार्थ पियाई दी दोना सर्वेधा योग्य दे ५ ( प्रश्न ) जर पक वियाद होगा .०५० 
को प+ छो और एक स्त्री फो प% पुरुष रददेगा तब स्री गर्मदती शिररोगियणी अ्रथया पुरुप दीइगेए 
हो और दोनों की युपारध्या दी, रद्दा न ज्ञाय, सो फिर कया करें! ( उत्तर ) इसझा प्रत्युशः ५ 
विषय में दे चुडे हैं। और गर्भधतो स्रो से एके वर्ष समागम ने करने के सम्य में पुरुष से बाई 
रोगी पुरुष की ख्रो से व रद्दा झा तो किसी से नियोग फरके उसके किये पुत्रोात्ति करके *' 
पेश्यागमन वा व्यपियार फभी न करें। जद्यंतक द्वो यद्दांतक अप्रात वस्तु की इच्छा, प्राप्त को ९९) 
ओर रक्तित की वृद्धि, यढ़े हुए घत फा व्यय देशो पकार करने में क्रिया करें। सब प्रकार के अपर 
पूर्षोत्त रीति से अपने २ वर्णाथम!के व्यवद्भारों को भत्युत्साइपूर्यक प्रयक्ष से तन, मन, धत से सा 
परमार किया करें। अपने माठा, पिता, शाझ्ु, श्यशुर की अत्यन्त शुश्रणा करें। मिश्र ओर भटोस* 
पढ़ोसी, राजा, विद्वान, वैध भीर सत्पुयपों से प्रीति रख के भर जो दुए अ्रधर्मा ईं उतसे उपेद्ा मे 
द्रोद छोड़ कर उनके सुधारने का यत्ष किया करें । जद्धांतक बने बहांतक प्रेम से अपने सत्ता 
विद्वान शरीर खुशिक्षा करने कराने में धनादि पदार्थों का व्यय करके उनको पूर्ण विद्वान उशिवई 
करदें ओर धर्मयुक्त व्यवदार करके मोच्त का भी साधत किया करें कि फिसकी प्राप्ति खे परमातन्द म 
और ऐसे ऐसे ख्छो+ ३ का न मानें जे लेः-- तिल, 
पतितोपि द्विजः श्रेष्ठो न च शूद्रो जितेन्द्रियः | निईग्घा चापि गौः पूज्या न च दृग्धवतती खरी | ! | 
अश्वालम्म॑ .गवालम्मं संन्यास पलपैजिकम्‌ | देवगच्च सुतोत्प्तिं कलौ पहुच विवर्मयेत्‌ | | 
नहौटे मृते प्रवजिते क्लीबे च पतिते पतौ । पब्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यों विधीयते ॥ ३॥ 
ये कपोलऋष्पित पागशरी के स्छोक दें। ज्ञो दुए फर्मकारी द्विज् को श्रेष्ठ और भेछठ का 
कारी शुद्ध फो नीच मानें तो इससे परे पच्चपात, अन्याय, अधरमम दूसरा अधिक फ्या दवोगाँ भ्थाई, 
देदेबालो या न देनेवाली गाय गोपालों को पाननीय दोती हैं वैसे कुम्दार आदि को गधदी पालनीय 
दोोती ! ओर यद्द दृष्टान्त मी ग्रिप्त दे क्योंकि द्विव और शुद्र मनुष्यज्ञाति, गाय और गधदी कि 
जाति हैं कथशित्‌ पशु ज्ञाति ले दाम्त का एकरेश दाएन्त पे मिल भी जावे तो भी इसका आय 
अयुक्त द्ोने से यद्द शछोक विद्वानों के माननीय कप्री नहों हो सकते ॥ १॥ 
जब अशालम्म अर्थात्‌ घोड़े को मार के अथवा [ सवालम्भ ] गाय को मार के दोोम करत, 
दी बेद्रिद्वित नहीं दे तो उसहा कलियुप में नियेध करना वेदवियद्ध क्यों नहों ! जो कलियुय में पृ 
सीव कम का निषेध माना ज्ञय तो चेता आदि में विधि आजह्यय तो इसवें ऐसे दुष्ट काम का 
युग में दोना सर्वधा अर्स पद द|े। और संन्‍्पास को पेदादि शाह्तों मे विधि दे) उक्तका नियेष कर 
निर्मूंल दे। जब मांस का निषेध दै तो स्वेदा ही निषेध दै। आय देवर से पुधोत्षचि करना बेर ् 
डिखा दे तो यइ खोककर्ा क्यों मूसठा दे १ ॥ २॥ 


चतुर्थसमुश्नासः ज्र्‌ 








यदि ( भष्टे ) अर्थात्‌ पति किसी देश देशान्तर को चला गया हो घर में ख्री नियोग फर छैये 
सी समय विदादित पादि आजाय तो बद किसकी रत्री दो । कोई कद्दे कि विवादित पति की, हमने 
गना परन्तु ऐसो व्यवस्था पाराशरी में तो मद्दों लिखी। क्‍या रही के पांच ही आपत्काह्न हैं ज्ञो रोगी 
डड्वाह्ो या लट्टाई दागई दो इत्यादि भापत्काल पांच से भी अधिक हैं इसलिये ऐय ऐसे श्लोकों को 
हमी मे मानता चाद्दिये ॥ ३॥ ( प्रश्न) फ्योंहो तुम पराशर सुलि के बन को भी नहीं मानते ? (उत्तर ) 
ब्राहें किसो का बचने हो परन्तु देदविरुद्ध दोने से नहीं मानते और यड तो पराशर का यबम भी नहीं 
ईै। फर्योंकि जैसे "प्रद्मोधाच, चशिएठ डघाच, शिव अशच राम उदाच, विष्णु्याच, देग्युबाच” इस्यादि स्रघ्ठो 
का भाम लिख हे प्रत्य पचना इसलिये करते हैँ कि स्वेमास्प के नाम से इन ग्रन्थों को सब संसार मान लेवे 
प्रौर दमारो पुप्कल धोदिका भो दो | इसलिये अनयथे गायापुक्त प्रस्ष पनाते हैं। कुछ २ प्रक्षिप्त एल को को 
बड़ के मनुम्मृति दी वेदानुकूद है अम्य स्मृति नहों। ऐसे दो भन्‍्प शालप्रस्थों की व्यवस्था सममलो। 
, मश्न ) गद्दाधम सर से छाटा था बद्ा दे! ( उत्तर) अरने २ कत्त-्पकर्मो में सब पढ़े दें परस्तु:-- 


यथा नदीनदा; सर्वे सागरे यान्दि संस्पितिम) तयैद्याभमियः सर्वे शड्स्पे यान्ति संस्पिविम ॥ १ ॥ 
[ मनु० ६ | ६० ] 


यथा दायूं समाश्ित्य पत्तेन्ते सईजनन्‍्तवः | तथा शहस्थमात्य वर्चस्ते सर्व आाश्रमाः ॥ २ ॥ 

यर्मात्नयोप्पाथ्रमियों दानेनास्ेन चान्वाम्‌ । एहस्पेनेव घार्य्यन्ते तस्माज््येष्टाथमों गे ॥ ३॥ 

पे संधार्यः प्रयस्तेन स्वर्गमक्षपारिस्छवा । सुर चेहेच्छवा नित्य योम्पायों दुर्यलेख्धिये: ॥ ४ ॥ 
[ मु? हे । ७७-७६ ] 


लैसे भदी और बड़े १ नई सदतक भ्रमते ही रद्दते दैँ क्पतक समुद्र को प्राप्त मद दोते, 
पैसे शद्ृश्प दो के भाधभव से सश भाथम स्थिर रहते हैं दिना इस झाधम के किसी आधम का कोई 
श्ययद्दार सिद नद्दों दोता | जिससे प्रहमयारी, वानप्रस्थ भोर संन्पासी तीन झाधमों फो दान भौर 
अन्नादि दे के पतिदिन एृएस्घ ही धारय करता दे इससे गृइस्य ज्येप्ठाधम है भर्थात्‌ सब स्यढद्टाएों में 
घुप्न्धर कट्दाता दै, इसलिये ज्ोमोए भौर संधार के सुख को इच्चा करता दो थट्द प्रयक्ष से एृह्याधम 
का धारण करे | शो गद्राधम दुपलेम्द्रिव भर्थात्‌ सीय भोर निर्यत् पुरपों से धारण करने अय'ग्व है, 
उसको भच्छे पार घारण करे | इसलिये जितना कुछ इ्श्बद्वार संधार में दे उत्तका झाधार ग्ृदाधम 
दै। जो पद गृद्ाधम म द्ोवा तो सम्तानोपति फेम टोने से ग्रह्मचये, यातप्रभ्थ भोर संस्याताधम 
कहां से दो सफते ? शो फोई गूृद्दाधम की निम्दा करता दे धद्दी निम्भ्गोय दे भोर जो प्रशंघा करता 
दे यदी मैशंसनोय दे । पसस्तु तबी गृह्ाथम में सुख होता दि झुव सती भोर पुरुष दोगों परझपर प्रसच्र, 
विद्वान, पुरषार्थी कौर सब प्रकार के स्पष्दटारों के डाता दो। इसलिये एटद्माधम ८ सुस का मुण्य कारए 
प्रद्मर्यें घोर पूर्रो्त स्यपर॒र विजाइ है। पद संछ्तेप से समाइर्तन, विषाद ओर शूट्राधम के विषय में शिक्ठा 
जि दी । इसझे भागे बानपरुष और रंन्‍्पास के दिपयै में लिखा जायगा वा 


इठि धीमदयानस्द्सरस्वतीस्वामिशते सम्यार्थ शत्राशे 
खुभाषाविभूदिते समावत्तंगविदाइ एटाधमदिदये 
चतुर्थ: समुझासः रूम्पूर्य: # ४ ॥ 
नि 


० '&#%2> 058४2 58 22०5७ 


, अर क पञ्चमसमुल्ठासारस्मः 
पी 25 कप्य्व््य्य्डछ्स्ख्््य्य्ड्क्स््िय्टड 


अथ धानप्रस्यप्न्यासवियिं धह्याम 
<>चध्त्य्ज््थ्टा> के 
प्रश्षचस्पोश्रमं समाष्य शी भवेत्‌ शह्दी भूला बनी मरेदनी भूला प्रत्रजेत्‌ ॥ शत« कां० ऐ/ 


मनष्यों को डचित दे कि प्रह्मचर्याथ्रम को सम्राप्त करके शदस्थ द्योऋर धानप्रस्य भौर4 
प्रश्ष द्वोके संस्यासी द्वायें अर्थात्‌ यद् अनुक्रम से श्राथम का विधान दे ॥ 


एसे सहाश्रमे स्थिस्वा विधिवत्स्नातकों दिनः । बने बमेनु नियतो यथावद्धिमितेस्द्रियः ॥ 

शहस्थास्तु यदा परयद्रत्ीपज्ञितमात्मनः । अपत्पस्यैव चापत्यं तदारएग समाभ्रयेत्‌ ॥ * 

सेस्पस्प ग्राम्पमाहारं से चैय परिच्छदम । पृश्रेप भाषा निःविष्प बन गच्छेन्सरैय पा | रे | 

अग्नि समादाप ह॒प्े चार्निपरिच्छदम । ग्रामादरणंय निःशुत्य नियसेक्रियतेस्दियः ॥ है 

एन्पपिपमध्येः शाइमूलफलेन दा । एतानेब महायज्ञाम्िवेपेद्धितरिपूपक्म्‌ ॥ ५॥ 
मनु० [ ६। १-५ ) 


एप प्रशार ब्तातऋ अर्थात्‌ ध्रक्षयर्यपूर्वक शुद्दाधम का कर्ता द्विज्ञ भर्थात्‌ ग्राह्मप (00 
झोर चैशव ग्दाथप मे 2३२ कर निश्चिवासमा और प्पावत्‌ इन्द्रियों को जैतत के धग में पे ॥! 
परम भर गृ (सय छिर के इरेत चेश और स्यघा दीलो हो जाय भौर लड़के का छड़का भी शे हा 
शो तब दड मैं ४, दे बसे / २॥ साई प्राप्त के आधार और यत्यादि सह उस्तमोत्तम पदार्थों को है | 
पुर के पार कप को रख दा अपने साथ से के यम मे नियास करें॥ ३॥ साइ्ोपाक भगिरोई 
लेछआयले विश ददृग्द्वित दोश्र अस्गय में जाडे यपे॥ ५॥ माता प्रद्याए के सामा आदि ४ 
सुन्र ४ शाए, मूज' कर, फूब कंदादे से पूरक वश्च मदायरों को करें और डसीरों अतिपिएे! 
ऋष छोर झाप मे निदं इ कर। ४) 


पिन्पपज थ ' द्ःम्डे कक + नि 
हुए 4 जित्पपुक्त साइना झषे समाहित: । दादा निस्यमगदावा सरैभूतातुइस्पकक | हि 


अयरानः सुसादेद्‌ प्रशदःगी पगशप+ । शागेघपरपेर बुलधूजनिद्वन! ॥ २ ॥। 

मनु० [६।८। २६ ] 
ुवु्द, खिकरमा, सका मित्र, इश्ट्रियों का कि 
तु दिसी से कृछ भी यदाव॑ रे की हरा प्रदाण है 
विद्रपक्ष न कई शितु अप्मबारी [ रदे ] झर्पोद, ही 


इरिलयाप अल बड़ते दाने है नि स्व 
शीअ विदा डे ह। हज रेस दफर झोर झद यर दवा 
इड्ञेर ब६ ॥ ११ हर के तुब दे [डिर आए 


द्मंसमुन्नासः ह 7] 


ली साथ दो तथापि उससे विष्यवेष्टा कुछ न करे, भूमि में सोवे, अपने आशित था स्वक्षीय पदार्थों में 
ममता न फरे, चूत ये; सूल में घले ॥ २ ॥ 
तफभद्धे ये धुपवसन्त्यरण्ये शाल्ता पिद्वांमो मैज्चचस्पों चरन्‍्तः। छ.्येदरेथ वे बिरजाः 
प्रयान्ति यत्राइश्तः स्‌ पुरुपो ध्ज्ययात्मा ॥ है ॥ घुएड० ॥ खं० २। मं० ११ ॥ 
ज्ञो शान्‍्त विद्वान लोय षप में तप धर्मानुष्ठान और सत्य की श्रद्धा करके भिक्ताचरण करते 
हुए जड़ल में एसते हैं थे जददां माशरद्दित पूर्ण पुरुष इानि लामरद्दित परमात्मा है, यहाँ निर्मल द्ोकर 
प्राणद्वार से उस परमात्मा को प्राप्त दोके झानन्दित हो जाते हैं ॥ १॥ दि 
अम्पाश्थामि सुमिधुमग्नें परवपते त्वायें । धरृतच्च॑ थद्धां घोपेंमीन्धे त्या दीवितों भष्म्‌ ॥ १ ॥ 
. यउुवेंद ॥ अध्याय २० । में २४ ॥ 
यानप्रस्थ को उचित दे कि-मैं भप्मि में होम कर दीज्षित द्ोकर ग्रत, सरपाघरण भौर धदधा 
को प्राप्त दो ऊ--ऐसी इध्दां फरफे धानप्रध्थ दो । भाना प्रकार की तपथ्र्या, सांग, पोगाम्यास, सुवि- 
'घार से झान और पवित्रता प्राप्त करें। पद्चाव्‌ जय संस्पासप्रदण की इण्छा दी तरश्मी को पुत्रों छे 
पा भेज देवे फिर संम्पास प्रशण करे । इति संक्तेपेण पानप्रस्थविधिः ॥ 
। 
| अथ संन्यासांवधिः 
पनेषु च पिहृत्वैद छृतीप मागमायुप । चतुर्थमायुपरो भागं स्पकत्वा सद्भाव पफिनेद्‌ ॥ 
हद मनु" [६। ३३ ] 
इस प्रकार धन में भायु का तीतय भाग झर्थात्‌ पचासपें दर ते पधाइत्तरवें ढर्ष परपेस्त 
'पानप्रस्ष हो झायु के घौधे भाग में संगों को छोड़ के परिधाद भर्थात्‌ संग्पापी हो हझावे । (प्रष्त ) 
श॒द्टाधम और यांतप्रस्थाधम तन करके संभ्यासाधम करे उसको पाप दोता टे था नदों ! ( बत्तर ) होता 
'है झौर नहों भी दोवा। ( प्रक् ) पद दो मकार की धात क्‍यों कट्टते दो ! ( उत्तर ) दो सार की शहों, 
क्योंदिः शो धाल्पापस्था मैं विप्कत दोकर विषयों मे फंसे पद्द मद्रापापी ओर शो ने पंसे बह अशा- 
'घुणपारमा सरपुयष दि ॥| 2 28 
यदहरेय पिरनेतदरेप प्रमनमेद्रनादा गृहद्धा प्र्नचयोदेष प्रयभ्‌ ॥ 
वे प्राध्यय भगद र धचन है । 
जिस दिन चैराग्य भाप हो उसी दिन घर था दन से संन्यास ध्ददण करलेबे। पटल इॉल्दास 
का पहुकप का भर इसमें पिकरर अर्थात्‌ दागप्रस्थ न करे, एंटस्पाशम दी से सेप्यास प्र छरे। 
ओर दतीप पतत यह है कि भो पूर्ण विद्वाद मितेम्ट्रिप विषपभोग की कामता से रंद्ित प्ररोषकार 
| चरने की इब्धा से युक्त पुणप दो प्रह्म्दर्षाधम ही पे सेस्पाल लेवे। शोर वेदों में भरी ( पतए: धाफ्ाटसव, 
' विशागतः ) इत्यादि पदों से संस्यास का विधान है, परस्तुप _ हु 
नारिरतो-दुधरितापाशान्तों नासमाणितः । नाशान्तमानसों दापि पष्टानेनिनमप्लुपाद ॥ 
हठ९ | धष्टी २। ४० ३३ ॥| 
शो दुराघार रे एृपश्‌ गहों, शिसको शांति शरों, झिसबा छाया ढोयी भहँ छोर शिसबा 
।/ मद शांत गद्दों दे वइ संस्यात ले के भो प्रशान से परमात्मा छो घाप बहों होठा, इस मिट: 
। फ्त््‌ 








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छ्ड खत्यावैप्रकाशः 


यच्छेदास्सनसी प्राइस्तयच्छेद ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महांते नियच्छेत्तवच्छेच्छान्त भाठ 
के कृठ० । पद्धी हे | में० १३ ॥_ 
संन्‍्यासी चुद्धिमान्‌ घायी और मत को अधर्म से रोक के उनको घ्वान और झात्तमां में 
भर उस छानस्वात्मा को परमात्मा में लगावे श्र उस विशान को शान्तस्थरूप भात्मा में स्पिए के 
परीसय लोकाब्‌ कर्मचिताद्‌ ब्राक्षणों निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृपेन । वदिद्वानाय स 
परिपच्छेत्‌ समित्पाणि: श्रोषिय ग्रक्षानिष्ठण्‌ ॥ छुएड० | खं० २। सं० १२ ॥ 

सब लोकिक मोगों फो फर्म से संचित हुए देखकर प्राप्तण अर्थात्‌ संन्‍्यासी वैरग्प % 
दोवे, क्योंकि अकृत अर्थात्‌ न किया हुआ परमात्मा छूत अर्थात्‌ केवल कर्म से प्राप्त नहीं दा 
लिये कुछ भर्पण के अर्थ द्वाय में ले के पेदवित्‌ और परसेभ्यर को ज्ञानलेधाले श॒ुद के पास पिः 
छिये हावे, जाके सद सररेध्दों फी निवुत्ति करे परन्तु सदा इनका संग छोड़ देवे कि जो: 

अग्िधायामन्तरे पचेमानाः स्पयं घीराः पण्िडसम्मन्यमानाः । जदपम्पमामा: परियनि 
अन्येनैद भीयमाना ययान्धा। ॥ १ ॥ अविद्यार्यां पहुघा वच्चेमाना यय॑ कुवायों इल्ममरि 
बाला: । यक्तर्मिणों न प्रवेदयन्ति रागात्‌ तेनातुराः चीणलोकारच्यबन्ते || २ ॥॥ 
मुणड० । खें० २। मूं० ६।६॥ 

को भविधा द भीतर सेल रद्दे अपने फो धीए और पयिडत मानते हैं वे नीय गति की 
दार मद सेसे भस्पे के पीछे अस्पे दुर्दशा को.प्रास द्ोते दें येसे दुःखों को पाते हैं ॥॥ जो बहुधा ४ 
है रमण करते वाले वाक्षबुरि इस हठाय्थ दें ऐसा मानते हैं. जिसको केधल कर्मकांडी शोग ये 
मोहित इोइर रहो ज्ञाग ओर झता सकते ये आतुर दोके फन्‍्म प्रणरूप दुःल में पिरे रइते हैं ॥ ९ 
इसहिये:-- 

बैदान्तदिशनसुनिधितायी सेन्यासयोगायवयः शुद्धसत्याः । से प्रद्मलेफेष् पराम्वशते 
मद: परम्पिष्यान्दि संदें ॥| मुण्ड० ६ सं० २। मं० ६॥ 

ओ देदास्त अर्थाद्‌ परमेश्वर मविषादक येदमस्त्रों के अर्थज्ञान ओर झाचार में भष्दें / 
शिधत सेन्दसपोग से श॒द्धास्तः रण सन्‍्पासी दोने हैं वे परमेश्वर में मुक्तिपुल को प्राह दो प्रो 
इच्याहु डर सुदि में सुथ वी अव्रधि पूरी हो शाती दे तब यहां से छूट संसार में झाते दें, ग| 
हिरा दु छ का २:श गई होता, क्यों कि: 

जे दे सशरशीरूय सतः श्रियात्रिदपोरपशतिरस्पपशारीर बाय सस्ते ने श्रिया्रिये छूरावः । 
दस . छान्दा* [ ग्र० ८ | खं० १२ ] 
को देशघएरी है बा सुच दुःख सी प्राति से पृथक कपी नहीं रइ सकता झौद मो 


क्प्वि के की 8 मकर 
इंडित हशक्य मुख्ि हे सरेस्यापइ पर्मेरदर के साय शुद्ध होदर रहता टैे तह इसझो रास 
झाछ हुआ बल छटों इप्टा, इसकिये:-- ०७ 





द्रेरदापच्य धिरेषशायाद लोकेतयायाय स्यृस्यापाद मिधाचर्प थरम्ति ॥ 
शव बा १४।१ [मर ० ४ ब्रा० २१६०१] 


॒ 


चञ्चमसमुन्नासः छा 





लोक में प्रतिष्ठा था लाभ धन से मोग पा मान्य चुत्रादि के भोद से अलग दो के संन्‍्यासी 
ज्ोग म्रिज्क होकर रत दिन मोद्ध के साधनों में दत्पर रहते दें ॥ 
प्रामापत्पां निरूष्ये्टि तस्यां सर्पेवेदर्स इत्वा प्राक्षणः अ्बजेद ॥ है ॥ महवेंदआश्षणे ॥ 
प्रानापर्त्या निरूप्ये्टि सबेपेदसदणिणाम्‌ । झत्मन्यप्रीन्समारोप्य प्राप्नणः प्रतनेद्‌ गदाद ॥ २ ॥ 
यो दत्या स्वैभूवेम्यः प्रश्नजत्यभयं गृहात्‌ । तस्य तवेजोमया लोझा मग्न्ति प्रश्नबादिनः ॥ ३॥ 
मठु* [ ६। 3८ / ३६ ] 
प्रह्मपति अर्थात्‌ परमेश्यर की प्रामि के अर्थ इष्टि झथोव्‌ यश्ञ करके इसमें यश्ोपधीत 
शिल्ादि थिद्दों को छोड़ आाइयनीयादि पांच अप्मियों को धरा, अपाम, ध्यान, ढदाब और समान इस 
पंश्व प्राणों में झारोपण करके प्राह्मण प्रमवित्‌ घर से मिकल कर संस्यासी दो हावे॥ १॥ २॥ हो 
पं मूठ प्राणिमाद को भमपदान देकर धर से निकछत के संग्पासी द्वोता दै उस प्रह्मबादी पांव 
परमेश्यर प्रकाशित वेदोकत धर्मादि विध्ाश्रों के डपरेश करनेवाले रम्यासी के लिये धर दाशमय अर्धात्‌ 
मुक्ति का भानन्द्स्ररूप लोक प्राम दोता दे । ( श्रश्न ) संस्पासियों का क्‍या धर्म दे ! ( इतर ) चर्म शो 
पक्तपातरद्दित स्पायाघरण, समय का प्रदण, झसह्य का परिस्याय, वेदोक्त ईइदर की झाएा था पालन, 
परोपकार, सरयमापणादि शत्तण सप चाधमियों का ध्र्थात्‌ सर भनुष्पमात्र का एक ही दे पर्स्तु 
पंस्पासी का विशेष धर्म यद्द दे वि/-- 
धृष्टिपूत न्यसेत्पादं यस्रपू्त जल पियरेत्‌। सस्यपूर्ता पेद्वा्च मन।पूतें समाचरेद्‌ ॥ १ ॥ 
पुद्धपन्त न प्रतिरुष्येदाक॒ुएः कुशल पदेत्‌ । सप्तद्वारावदीयों घ न पाचमनूर्ता परेव ॥ २ ॥ 
अध्पास्मरतिरासीनो निरपेधों निरामिपए । झारमनैय सहायेन सुखापी शिषरादिध ॥ १ ॥। 
पलमरेशनसश्मथु: पाप्री दण्डी फुमुस्मयान्‌ । विधगेक्षियठों निस्यं सदेभूवास्पप्रीटयन ॥ ४ ॥ 
'रद्दियायां निगेषेन रागद्रपत्येण घ । भर्िंयया घ भूतानामशृतत्थाय करपते ॥ ४ ॥॥ 
दूपिवोधपि घोद्धर्म य्र तत्राधमे रत: । सभः पर्पेदु भूतेषु ने लिये पमफास्थम्‌ ॥ ६ ॥ 
पर्स फतकृतस्प यथप्यम्यश्रमादकम । मे नामग्रदणादेव तस्य दारि प्रददादति ॥ ७ ॥ 
प्राणायाम ग्राद्मणस्प ब्रयोपि विधियर्क्ता। । ध्याहतिप्रणवर्युक्षा विहेय एरमस्वप१ ॥ ८ 
द्चन्ते ध्यायमानानां धातूनों हि यथा मला। | तपोसद्रियाण। दष्चम्ते दोष: प्राए्टएश निशा ॥६॥ 
प्राणोपामैद्ऐेऐपान्‌ पारणानिध विरिपिप॒ । प्रत्पाह्रेण संसगोन्‌ ध्यानेनानीशछराव गुण «॥ 
उपायधेपू भूतेपू दृर्शेपामडगात्मामेः । ध्यानयोगेन संपरपेद्‌ गविमस्यान्तरास्मगर ॥ ११ ॥ 
आिमिपेमग्द्रिपास ही पदिकधद इम्मीनिः । तप्सधरणेपोप्रैरसाधयम्तीर सतपदस ॥ १२ ॥ 
धदा भोयेन मदति सरभारेपु निस्पृद। । हदा ससमदाप्नोवि प्रेत्थ रह च शार्तए ॥ १३ ॥| 
चतुर्मिरति मैदेदैविस्पमाधविमिर्दि मे: । दशलदणकों घमः सेदिवस्थः इपत्लहर 4 १४ ॥॥ 
भृति। समा दमोस्ऐेएं शौषमिरिद्रसनिग्रएः। धीर्दिया सत्यम्तोधों दशाई दर्मतश्टश ॥ १४ ३ 
अनेग रिपेना सर्वास्पररश संगारशने। शने। । सईदग्ट्दिनिर) प्रशएदेशरारिएन ॥ १६ ॥। 
मजुन् छ० ६। [ ४६। ४८१४९3३३६ ६०१ ६६ ! ६७ । ७०-७३  उे ।#० ३६२ । 2२३ २२ है| 





छत्यादेप्रकाशः 





जब संन्‍्यासी मार्ग में चले तथ इधर उधर न देखकर नीये पृथिंयी पर दृष्टि रख के घते। - 

घस््र से छान के जल पिये, निरन्तर सत्य दी पोले सर्वदा मन से विचार के सत्य का ग्रहण करे 
को छोड़ देवे ॥ १ ॥ जब कट्दी उपदेश या संवादादि में कोई संन्‍्यासी पर क्रोध फरे अथवा बिता 
तो संम्पासी फो उचित दे फि उस पर आप क्रोध न करे किन्तु सदा उसके फल्याणार्थ उपदेश 
आर एक मुख फा, दो नासिका के, दो आंख के ओर दो कान के छिद्रों में वि्नरी हुई बाणी -॥. 
कारण से मिथ्या कभी न बोले ॥ २॥ अपने आत्मा और परमात्मा में स्थिर अपेच्तारद्धित मद 
पर्नित द्ोकर आत्मा दी के सद्दाय से सुखार्थी होकर इस संसार में धर्म भर विद्या के पढ़ाने , 
देश के लिये सदा विचरता रददे ॥ ३॥ केश, नख, डाढ़ी, मूल को छेंदन करवावे, खुन्दर पात्र ..२ 
फुसुम्भ आदि से रंगे हुए बस्नों को प्रदण फरके निश्चितात्मा सर्व भूतों फो पीड़ा न देकर स्वत +- 
॥ ४ ॥ इन्द्रियों को अधर्मांचरण से रोक, यागद्वेष फो छोड़, सब प्रारियों से निर्येर पत्तंकर / 
लिये सामथ्ये बढ़ाया करे ॥ ५॥ कोई संसार में ढसको दूषित वा भूषित करे तो मी जिस * 
आधम में पक्तेता हुआ पुरुष अर्थात्‌ संन्यासी सइ प्राणियों में पक्तपातरदित द्वोकर स्थय॑ धर्माता 
अन्यों को धर्मात्मा करने में प्रयल्ल फिया करे | और यदद अपने मन में निश्चित जाने कि दएड, का 
और कापाययस्त आदि चिद्ध धारण धर्म का कारण नहीं हैं, सब मत॒ष्यादि आणियों के स्योपरेश श 
दिधादान से उच्नति करना सेन्यासी का मुख्य कर्म है ॥ ६ ॥ क्योंकि यद्यपि निर्मली दुष्दा का फह फ़ 
के गदरे जल में डालने से जज का शोधक द्वोता दे तद॒पि चिना [ उसके ] डाले उसके गामकप१ 
थयणमाध्र से शत्र शुद्ध नहीं दो सकता ॥ ७॥ इसलिये प्राह्मण अर्थात्‌ मरह्मवित्‌ संन्पासी को के 
टेक झोकारपूर्वेऋ सपब्पाहतियों ले दिधिपूर्वेक प्राणायाम जितनी शक्ति हो उतने करे परमस्तु श 
हो म्यून प्राणायाम फमी ने फरे यद्दी संन्‍्यासी का परमतप दे ॥ ८॥ फ्योंकि जैसे अप्ति में तपरे भर 
' गहने से धातुच्ों के मल नए द्योशते दें यैसे दी पाणों के निप्रद्द से मन आदि इन्द्रियों के दोष मे, 
भूत दोते हैं ॥ ६॥ इसलिये संन्‍्यासी लोग मित्यप्रति प्राणायामों से आत्मा, अन्‍्तःफरण भौर पका 
ह दोष, धारणा्ों से पाप, प्रत्पादार से संगदोप, ध्याव से अनीश्यर के गुणों अर्थात्‌ दर्प रो* 
अदियादि शव के दोषों फो मस्मीमूत करें॥ १०॥ इसी घ्यानपोग से ओ अयोगी अधिद्वानों को है 
से झातने योग्य छोटे पड़े पदार्थों में परमात्मा की व्याप्ति उसको ओर अपने आत्मा ओर भी अगर 
परमेश्वर की गति को देखे ॥ ११॥ ज्ञद भूतों में निध॑र, इम्द्रियों के विषयों का त्याग, वेदोक रा. श 
अस्युप्त तपधरण से इस संसार में मोक्षपद को पृर्षोक्त संस्यासी दी सिद्ध फर भोर करा सकते हैं 
कोई गए ॥ १२ 8 जब संन्‍्पासी सद सारयों में अर्थात्‌ पदायों में निःस्ट८ कांछारदित और सर 
मठ रू प्यवशारों में माव से पवित्र होता दे तमी इस देद मे और मरण पाके निरस्तर छशय को” 
दोठा दे ॥ १३ ॥ इसलिये प्रझचारी, शुइस्थ, वानप्स्थ भौर संम्यासियों को योग्प है कि प्रषत 
श्रचाशयुद्ध विश्किलित धर्म का सेवन करें॥ १४॥ पद्िता लक्षण--(घृति) सदा पैये रखता, 7 
६ छझ्ा ) जो दि निल्दा स्तुति मानापमान दानिक्षाम आदि दुःलों में सी सहनशील रहगा। तीर 
(६म ) सब को सदा धर्म वे धशूस कर अधर्म से रोक देता अरधांव्‌ अधर्ग फरने की इच्छा मी रह 
बोर अस्लेय ) खोरीत्याग आर्याद्‌ दिता आदा वा छत कपट पिश्वासवात था किसी व्यवद्ा' 
देइदिष्य पपरेश से परपरार्य को भ्रश्य करात चोरी और उसको छोड देता साइकारी कद्ठाटी 
अडरर-ाई शो च ) रागदद पछपात छोड के मीवर भोर शल्त सुलिका मार्जत आदि सो बाइए की 
अतः रखती | शुदा-६ इग्ट्रिवनिप्रइ ) अधर्माचरयों से शोक के इम्द्रियों को धम्रद्दीमे सदा दंत 
सावशे एन थी: ) माइक्द्रप्व बुडिशाशक इम्प पदार्दे जुष्दों का रंग ऋालएय प्रमाई झादि को दी 


चञ्ममसमुद्द्ता चर 








रेए धदायों डग सेदतश शाध्पुरुधों बा राग पोगाभ्पास से थुरि को पढ़ाना। आटपाँ--( विद्या ) परृथियी 
। हेड; पत्मेत्यण परेस्त धधार्थेएवग और इसे पयापोगप दपचार लेता सन्‍य जैसा आामा में वैसा मन 
» जरा भन मैं पैसा थाएँ है, सैसा वाणी मैं पैशा कर्म में दर्सना दिधां, इससे विपरीत अविचा दि। 
दर्दा-( शा ) शो पदार्द जैसा हो रपको देगा एी समममा, दैसा ही बोलता और पैसा दी करता 
॥] शत्ता दृशापा- ऋषोतेध ) धौधादि दोषों को ऐह़ के शासयादि गुणों को प्रदण कर्ता धर्म का 
'तणथ है। एस दृश लघछतरपुक्त पएपावर दित स्थापाघर थे धर्म का सेवन धारों भाधम पाले करें और इसी 
दोक्त चरम दो मैं आप चलगा और दूसरों को समझा कर चलाना पस्पासियों का विशेष धर्म दै॥१॥ 
पो धक्तर से धीरे ४ रद गेंगदोषों को दोड़ दर्ष शोकावि.सर हस्दों से विमुक्त दोऋर संम्पासी प्रह्म 
। मैं अदग्थित होता टै, रंस्यातिपों का सुरुष कर्म यही है कि सए शृहस्थादि आधर्मों को सप प्रकार 
प्वथदारों दा साप गिशयय करा अधर्म ध्यवद्दारों से छुड्टा सर संशपों का ऐश कर सत्य धर्मयुक्त 
एयट्टारों में प्रपत्र चराण करे। १६ ॥ 

( प्रश् ) रस्पासप्रदण करता प्राष्मग दी का धर्म दि था दाजियादि का भी ! ( उत्तर ) भ्राहण 
) दो अधिकार टै क्‍योंदिः जो सद दर्णो में पूर्ण विद्वान धार्मिक परोपकारप्रिय मनुष्य दे उसी का 
यह भाम ए विना पूर्ण पिचा फे धर्म, परमेश्वर की निष्ठा भर पैराग्प के संन्यास प्रइण करने में संसार 
ते विशेदर डपकार ग्दी दो सकता इसलिये खोकथुति दे कि प्राप्तण फो सं॑न्‍्पास का झ्धिकफार दे अन्य 
ने मह्ों, वद्द मनु का प्रमाए भी ऐः-- 


एए पो5मिएियों धर्मों प्राध्णस्प घतुर्दरिधः । पुएयोध्दयफलः प्रेत्म रामधमौन्‌ निषोधत | 
मनु? ६। &७॥ 

यट मझुजी मदरात बसे हैं कि ऐ प्रषियो ! यड घार प्रकार अर्थात्‌ प्रफ्नचस्ये, [ गृदस्थ ] 

एरवस्व और रम्यासाधम फरना प्राप्तण का धर्म दे पदां वत्तमान में पुएप्स्यरूप और शरीर घोड़े 
शथात्‌ मुक्तिरुष भत्तय भागम्द का देनेयाला संस्पास धर्म दे इसफे आगे राशाझों का धर्म मुझ से 
पुनो । इससे यट् सिद्ध दुआ कि संम्पासप्रदय वा अधिकार मुच्य करके प्राह्मण का दै और क्षत्रियादि 
गए प्रद्मचर्याथम दै। ( प्रश्ष) संस्पासप्दण की थादश्यकता क्या दे! ( उत्तर ) जैसे शरीर में शिर फी 
राषश्पकता चैसे टी चराधमों में संम्यासाधम की शझ्ायर्यकता टै फ्योंकि इसके बिना दिद्या धर्म कमी 
दो बढ़ सकता झोर दूसरे भाधमों को विदा प्रदण शृदझत्य और तपरश्चर्पादि का सम्यन्ध होने से अष- 
गश बहुद कम्म मित्रता दि। पह्षणत धोड़ कर पत्तेगा दूसरे आभमों को दुष्कर दे जेसा संन्‍्यासी 
विगोमुक्त होकर अगव्‌ का उपशार करता है पैसा शब्प भाधमी नहीं कर सकता क्योंकि संनन्‍्यासी 
मे सस्पविधा से पदाययों के विज्ञान की उच्चनति का मितता अवकाश मिखता दे उतना अन्‍य आशमी 
गे शद्दों प्रिल सकता । परन्तु जी घाद्मयर्य से संस्यासी द्ोकर ज़गत्‌ को सत्य शिष्ता करके जितमी 
जति कर सकता दे, ढतनी गृदस्थ या पानप्रस्थ आधम करके संस्पासाधमी महों फर सकता। ( प्रक् ) 
ईन्‍्यास प्रदण करना ईश्वर के अभिप्राय से विद दे क्‍योंकि इंश्वर का अभिप्राय मनुष्यों की बढ़ती 
गएरने में दे जा गृद्याभ्रम नहीं करेगा तो उससे सम्तान द्वी म दोोगे। जद संन्वासाधम दी मुख्य है ओर 
रब मलुच्य करें तो मनुष्यों का मूलच्छेदन दो ज्ञापगा। ( उत्तर ) अच्छा, विषाद करके भी यहुतों के 
उन्‍्दान महों दोते अथवा शोर शीघ्र मष्ट द्वो जाते हैं किए यद्द भी इंश्वर के अभिप्राय से विदद्ध करने 
पा हुथा, जो तुम्र कट्दों कि “दस्ने छते यदि न सिध्यति को5त्र दोष:” यड किसी कवि का बचने दे, झर्थ-- 
ते पक्ष करने से भी कार्य्य सिद्ध भद्दो तो इसमें क्‍या दोष | अर्थात्‌ कोई भी मह्दी । तो इम सुम से 





चरे सत्वाथवकाश: 


पूछते हैं कि शद्दाश्मम से बहुत सम्तान दोफर आपस में विग्याचरण कर शह मरें हो इाति /... ५ 
पड़ी दोती दे, समझ फे विशोध से लड़ाई यहुत होती दे, जद संस्वासी पक वेदोकथमे के दगग । 
परस्पर प्रीति उत्पध्ष करायेगा तो ज्ञास्मों मनुष्यों को पया देगा, सइस्खों शहस्थ के समान मतु्धों « 
पढ़ती करेगा, और सग मनुष्य संनन्‍्यासप्रदण कर ही मईी सकते क्‍योंकि सब की दिपपासलि - प्‌ 
नही छूट सकेगी, जो २ संन्यासियों के उपदेश से धार्मिक मनुष्य होंगे ये सब ज्ञानो संन्‍्यास्ती ५ ५ 
लुल्प है ।( प्रश्न ) संन्पासी लोग कट्दते दें कि इमको कुछ फर्त्तत्य नहीं अधप्य वश लेकर * 
रहना, अविदयारूप संसार से माथापच्ची क्यों करना? झपने को प्रह्म मानकर सन्‍्तु््ट 
कोई आफर पूछे तो ठसको भी येसा ही उपरेश करना कि छू मी ग्रञ्न दि तुमरे पु 
पुण्य नहीं लगता फ्योंकि शीतोष्ण शरीर, छुधा ढपा प्राण, और सखुख्र दुःख मन का धर्म दवा 
मिथ्या और जगत्‌ के व्यवद्वार मी सब कल्पित अर्थात्‌ कूठे हैं इसलिये इसमें फँसना बुद्धिमारों पे 
काम नहीं | जो कुछ पाप पुण्य द्ोता दे यद देद और इन्द्रिपों का धर्म दै आत्मा का नहीं; ७, 
देश करते हैं और आपने कुछ पिलक्चाण संन्धास फा धर्म कट्ठा दे अब दम किसकी बात सभी भ्न 
किसकी भूठो मानें! ( उत्तर ) क्या उनको अच्छे कमे मी कर्तव्य नहीं देखो “वैदिकेरचेव कम 
मलुजी ने वैदिक कर्म, जो धर्मयुक्त सत्य कम दें, संन्यासियों को मी अयश्य फरना लिखा दे । कण, 
छादनादि कर्म वे छोड़ सकेंगे ? जो ये कर्म नहीं छूट सकते तो उत्तम कर्म छोड़ने से वे प्रतित 
पापभागी नहीं होंगे ! जब गृदस्थों से श्रन्न बस्ादि लेते हैं. और उनका प्रत्युपकार नहीं करते ोपु 
दे पापी नहीं|ोंगे ! जैसे आँख से देखना कान से सुनना न दो तो आंख और कान का दोनों, हे 
दै चैसे द्वी जो संन्यासी सत्योपदेश और वेदादि सन्‍्यशास्रों का विचार, प्रचार नहीं फरते तो अं 
जात में व्यर्थ भाररूप हैं। ओर जो अविद्यारूप संसार से माथापच्ची फ्यों करना आदि लिए ) 
फहइते दें वैसे उपदेश करनेयाले दी मिथ्यारूप और पाप के यढ़ानेद्वारे पापी दें।ज्जो कुछ शरीर 
कर्म किया जाता हे यद सण आत्मा ही का और उसके फल का भोगने थाला भी आत्मा दै। हो 
फो प्रह्म घतलाते हैं पे अविद्या निद्रा में सोते देँ। क्योंकि जीव अल्प, अप और मह्म सता 
सर्च दै, ग्रह्म नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त भावयुक्त दे और जीव कमी वद्ध कभी मुक्त रइता दे | प्र 
सर्वेव्धापक सर्वक्ञ द्वोने से श्रम था अविद्या कभी नदीं हो सकती और जीव को कमी विंधा श्रोर 
अविया द्वोती दे, ध्रह्म जन्ममरण दुःख को फभी नहीं प्राप्त होता और जीब प्राप्त द्ोता द॑ इसलिये ४ 
उनका डपदेश मिथ्या दे । ( प्रश्ष ) सन्‍्यासी सर्व कर्मविनाशी और अझि तथा धातु को स्पर्श नहीं 
पद्द बात सच्ची दे या नहीं ! ( उत्तर ) नदों “सम्यडर नित्यमास्ते यस्मिन्‌ यद्धा सम्यड् न्‍्यस्यन्ति 
कर्माणि येन स संन्यास: स प्रशस्‍्तो विद्यते यस्य स संन्‍्यासी” ज्ञो ब्रह्म और जिससे दुष्ट 
त्याग किया ज्ञाय बद्द उत्तम स्थमाद जिप्तमें दो बद संन्‍्यासी फट्दाता दे इसमें सुकर्म का कर्चा *, 
डुए कर्मो का नाश फरनेबाला संन्‍्यासी कद्ाता दे । ( प्रश्ष) अध्यापन और उपदेश शह्दस्थ किया * 
हैं पुनः संन्यासी का क्या प्रयोजन दे ! ( उत्तर ) सत्योपदेश सब आध्मी करें और सुने परन्तु 
अवकाश ओर विष्पछ्ठपातता खंन्‍्यासी को द्वोती दै.डतनी गहस्थों को नहीं। हां, ज्ञो प्राह्मण ह् | 
यही काम दै कि पुरुष पुरुषों को ओर रही स्वियों को सत्योपदेश और पढ़ाया करें। शितना अमर 
अवकाश संन्‍्यासी को मिलता दै उतना गुदस्थ घाह्णणादि को कमी नहीं मिल सकता । जा 
>पेदवियद्ध आचरण करें सव उनका नियस्ता संन्यासी दोता दे । इसलिये संन्यास फा द्वोनां उचित है 
(६ प्रक्ष ) “एकराि दसेदु ग्राम” इत्यादि ययनों से संन्‍्यासी को एकन्न एक राज्िमात्र गहना 
निवास न करना धादिय । ( उत्तर ) यट दात थोड़े से अंश में तो अच्छी दे कि एकथयास करने से 


27 २ <च. सन 2+ पर. चर 2४ 


2.» 


अं + ३5 ४ 





पश्चैमसमुन्नांसः दर 








पेगा दे परन्तु शो विशेष उपकार एकत्र रदने से द्वोता दो दो रदे जेसे शतक राजा के यहां चार घार 
उद्दीने तक पंचशिखादि और अन्य संन्‍्यासी कितने द्वी वर्षो तक नियास फरते थे। और “एकत्र न 
इतना यद् दात आजकल के पासणडी सम्प्रदायियों ने दनाई दे। क्योंकि जो संन्‍्यासी एक अधिक 
एद्ेया तो इमारा पाखएड् खण्डित द्वोफर अधिक न यदू सकेगा । ( मन्ष )-- 


यतीनां काम्चन दघ्ाधाम्बूलं अक्षचारिणाम्‌ । चौराणाममर्य दधात्स नरो नरक बजेत्‌ ॥ 


इत्यादि बघनों का अमिप्राय यद्द दै कि संन्‍्यासियों को जो सुयर्ण दान दे तो दाता मप्क को 
प्राप्त होगे । ( उत्तर ) यद्ट पात भी बर्याधमविरोधी सम्प्दापी शोर स्वार्ये सिन्‍्धुयाले पोराणिक्रों की कह्पी 
हुए है, क्‍योंकि संन्यात्ियों को धन मिलेगा तो ये धमारा खएडन बहुत कर सकेंगे और द्वम्ाटी दानि 
होगी तथा पे इमारे झाधीन भी न रहेंगे और जब भिन्तादि ध्यवद्दार इमारे झ्ाधीन रद्देया तो डरते रहेंगे 
जप मूझख और स्वाधियों को दान देने में भच्छा समझते हैं तो विद्वान भर परोपकारी संन्धासियों को 
ते में कुछ भी दोप नईों दो सकता, देखो मजु०-- 
ह पविषिधानि व रत्नानि विविक्रेदूपपादयेत्‌ |! 
२ 
माना प्रकार के रक्ष सुवर्यादि धन ( विविक्त ) भर्थाव्‌ संन्‍्यासियों को देवे, भर धर शोक 
॥ अमर्थक दे क्‍योंकि संन्‍्यासी को सुदर्ण देने से यश्ममान मरक को जावे तो थांदी, मोती, टीय आहि 
ने से स्थर्म की जायगा। ( प्रश्ष ) पद पश्िडतजी इसका पाठ पोज़ते भूल थये यट्ट देता दि कि “चति- 
सते धर दयाद्‌” भर्धात्‌ जो संन्‍्यासियों के द्वाथ में धन देता दि पद हरक में जाता टि । (इत्तर। वह 
हि पच्चन अविद्वान, ने फपोशकरपना से रखा दे | क्‍योंकि जो द्वाथ में धत देने से दावा गरक को हाए 
 पय पर धरने था गठरी बांधकर देने से स्थ्ग को ज्ञायगा इसलिये ऐसी करपना मानने दोग्प गहों। 
, यद्द वात तो दे कि जो संन्पासी योगचेम से शधिक शक्‍पेगा तो चोरादि से पीड़ित भौर घोधदित 
ग दो शायगा परस्तु जो विद्वान ऐै थद अयुक्त व्यपद्दार कभी मे करेगा, मे मोद्द में पँसेगा क्‍्ऐोंशि क्र 
पिम शदाथम में मथवा एहयचर्य में सर भोग फर था सब देख चुका टै होर जो प्रह्मचर्प थे होता दि 
दर पूर्ण वैराभ्ययुक्त द्ोने से कभी मद्दों फैसता | (प्रक्ष) लोग कदते दें कि थाद में संम्पासों छागे 
॥ जिमावे तो उसके वितर भाग जायें ओर मरक में गिरें। ( डत्तर ) प्रधम तो मरे हुए पिवरों छा धारा 
प्रौर किया हुआ थाद मरे हुए पितरों को पहुंचना हो असम्भप देइ ओर युक्तिविश्य होने से मिच्चा है। 
प्रोर जब आते दो महों तो भाग फोन शर्येग, जप अपने पाए पुएय के अगुसार ईश्वर करों व्यदरथा से 
परण के पद्यात्‌ जीव झन्म लेते हैं तो इनका झागा कैसे दो सकता दे । इसलिए एद भो दात देशाद्ी 
[एणी भर दैरामियों की मिथ्या कल्पी दूं दे। बद्द तो ढीफ दि कि झुदां रंन्यासी जाएंगे दशा दद 
इतक भाद् करना वेदादि शात्मों स्रे दिएय दोने से पाथएड दूर भाग शायेगा। (प्रा ) सो अदाखर्द से 
पंस्यास लेवैगा उसका निर्वाह फठिमता ऐे होगा और काम का रोकता भी ऋदि करित टि दसग्हए 
पध्ाधम यागपाथ दोकर शव दूद दो शाप तभी संस्पास लेगा भष्दा टि । ( उत्तर ) शो निया मे कर 
बिके, इन्द्रिपों को न रोक सके वद महाचर्य से संम्पास न लेबे, परातु जो रोझ सद् व सपों भ छेब्े! 
'कैस पुयप ने विषय के दोष और दीवेसंरच्ाण के गुण जाने हैं दद दिपपासक कमी गहों होगा बतेः 
सका दीयें दिचाराधि बा एम है अर्थात्‌ उसी में स्पए शोशाता टे। असे देश झगेर इोदथों रा 
अहापश्यकता शोगी दे; लिये होती दे देसी तीरोगी रू लिये बहों। इसी मदर जिस पुरर दा कर 


चर सत्यार्थप्रकाशः 


को विद्या धर्मवृद्धि ओर सदर संसार फा उपकार करना दी प्रयोजन ट्वो थद विवाइ न करे।- 
“पश्चशिक्षादि, पुरष और गार्यो आदि स्त्रियां हुईं थीं, इसलिये संन्यासी का दोना ; ४०६ 
डचित दे ओर जो अनधिकारी संन्यासप्रदरण करेगा तो आप डूबेगा औरों को भी डुबापेगा। 
“प्नन्नाद” चक्रवर्ती राजा द्वोता दे वैसे “परिवाद” संन्यासी द्लोता दे पत्युत राजा अपने देश : 


स्वसम्बन्धियों में सत्कार पाता दि और संन्यासरी सर्वेत्र पूजित्र द्वोता दै। ५ 
विदत्वं,च नृपत्व व नैध तुल्य कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते ॥ !॥ 


[यह ] चाणक्य नीतिशास््र का ब्छोक दै--विद्वान्‌ और राज़ा को कमी तुल्यता गईं 
सकती क्योंकि राजा अपने राज्य दी में मान और सत्कार पाता दे भौर विद्वान सर्वक्ष मान भोर , 
को प्राप्त होता दै। इसलिये विद्या पढ़ने, सुशिक्षालेने और यलवचान्‌ होने आदि के लिये 
सप प्रकार के उत्तम ब्यवदद्वार सिद्ध करने के अर्थ गृददस्थ, विचार ध्यान और विश्ञान बढ़ाने 
करने के लिये थानप्रस्थ झोर पेशदि सत्यशास्त्रों का प्रचार, धर्म ब्यवद्वार का प्रदण भौर दुए 
क स्पाग, सरपोपरेश भोर सदको निःसंदेह करने आदि के लिये संन्‍्यासाधम दे । पस्नु हे, 
संम्पास के मुख्य धर्म सत्योपरेशादि मो करते थे पतित और नरकगामी दैँ। इससे संन्याप्तियो 
डवचित दि दि सरयोपरेश शद्ाप्तमाधात, बेदादि सत्यशाह्ओं का भ्र्यापन और पेदोक्त धर्म की «, 
प्रदक्ष मे चारके सइ सरेसार फी उश्नति किया करें। ( प्रश्न ) जो संन्‍्पासी से अन्य साधु, वैयंगी, » 
छाथी झादि हैं वे भी संस्पासाभम में गिने जायेंगे या मद्दी ! ( उत्तर ) नदी, क्‍योंकि उनमें संग्यात 
दम भी शत्तय नह, ये वेइवियद मार्ग में प्रपूष्त द्ोकर येद से [ अधिक ] अपने संप्रदाय के 
हे दम प्राठते ओर अपने शी मत की प्रशंसा करते मिद्या प्रप॑य में फंसकर अपने श्यार्थ 
दूसरों छो ऋषने २ मत में पैसाते हैं, छुधार करता तो दूर रहा उसके बदले में संसार को बहा 
अषोगति को धात करते ओर अपना प्रयोशन सिर करते दें इसलिये इनको संस्यासाधम 
विन शाबते डिस्तु ये स्वार्या भमी तो पक्के दें । इसमें कुछ संदेह नदहों । जो स्वयं धर्म में घहकए , 
इॉसार को धबाने दें हिसले भाप झोर सत्र संसार को इस लोक अर्थात्‌ पर्तमान असम में » 
ऋषदाश्‌ दूसरे झम्म में स्वर्ग अर्याश्‌ सुछ का मोग करते कराते हैं ये द्वी धर्मामा जन संस्पापी 
मह्दात्मः है । यह गा छेप से सस्वासाथम की शिक्षा किसी 3 भद इसके झागे राजप्रहा्भा * 
हिआए हइपा है 


न 


इसि श्रीमइयानन्दसर हवतीस्थामि झते सस्पार्थ प्रकार 
सुमापरादिमूदिते दानप्रम्ध्वस्वासाथमदिदये 
पंयप्र: समुन्नासः सापूर्ण: ॥ ४ है 





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7 अप पटष्टससुज्ञा सारस्म; था 


७७ 
ध्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्च्ह्ध्ध्च्ध्ह्ध्ह्ध्€्धध - 
अय राजपर्मान्‌ ध्याक््यास्यामः 
2 <्>ख्ा३ 
रामधमांनू प्रददयाति ग्रयावूचों भपरेष्षपः । संमयथ् यथा तस्प सिद्धिय परमा यथा ॥ १ ॥ 


प्राप्त प्राप्तेन संसार पत्रेयेण ययादिधि । सर्वेस्यास्प ययास्पाय॑ फर्चब्य परिरततणम्‌ ॥ २ ॥ 
(महु० ७ | २] 
| अपर मतुशी मद्दारात क्रूषियों से कहते हें कि घारों बणे ओर चारों आश्रर्मों के ब्यपद्ार 
कथन के पथात्‌ शाजधर्मों को कहेंगे कि किस प्रकार का राजा होना घादिये भोर जैसे इसके द्वोने 
[ा सम्मय शथा अते इसको परमसिद्धि प्राप दोवे उसको सब प्रकार कइते हैं ॥ १॥ कि जैसा परम 
,विद्वान्‌ प्राह्मण दोता दि वैसा विदान छुशिलित होकर दाथिय को योग्प दे कि इस सप राज्य की रफ्ता 
/प्याप से पधादत्‌ करें ॥ २॥ इसका प्रकार यद दै-- 
श्रीर्णि राजाना दिदयें एरूणि परि दिश्वानि भूषयः सदांसि ॥ ऋ?० में० ३। सू० ३८ । मं० ६॥ 
इऐंश्यर उपदेश करता दे कि ( राजाना ) राज्ञा भौर प्रज्ञा के पुरप मिलके ( दिदये ) सुखप्राप्त 
/भोए विडानयू झिकारक राजा प्रज्ञा के सम्परधरुप ध्यवद्टार में ( चीणि सदांसि ) तीन समा अर्थात्‌ विधारय: 
(समा, धर्मायेसमा, राजापेसमा नियत करके ( पुरुणि ) बहुत प्रकार के ( पिश्यानि ) समप्र प्रशासम्बन्धी 
'मजुष्पादि धाणियों को ( परिभूषधः ) सद भोर से विधा स्पतम्प्प धर्म सुशिक्षा भोर धनादि से भलंक्षत करें ॥ 
/ ते समा घ सर्मेतिश सेना चु ॥ १॥| अपरई० का? १४ । अलु० २। व० ६ | मं० २॥ 
सम्प॑ समा में पाहि ये च सम्याः समायद: ॥ २॥ अयर्व० का० १६ । झनु० ७। ब० १५५।मं० ६॥ 
(तम्‌) दस राजपधर्म फो (समाथ ) तीनों समा ( समितिश्थ ) संप्रामादि की ध्यवस्था 
/भोर ( सेना थे) सेना मिलकर पालन करें ॥ १॥ समासद्‌ ओर राजा को योग्य दे कि राजा सथ 
सभासदों को झाष्ठा देवे कि दे ( सभ्य ) सभा के पोग्य मुख्य सभासद्‌ सू (में) मेरे ( सभाम्‌ ) सभा 
की धर्मयुक्त व्यपस्था का ( पादि ) पालन कर भोर (ये थ ) जो ( सम्या: ) सभा के योग्य ( समासदः ) 
समासद्‌ दें वे भी समा की व्यवस्था का पालन किया करें ॥ २॥ इसका अभिप्राप यद् दे कि एफ को 
स्दतन्त्र राज्य का अधिकार न देता चादिये किन्तु राजा जो समापति तदाधीन सभा, समाधीन राजा, 
राजा झोर सभा प्रज्ञा पे झाधीन और प्रजा राशसभा के झाधीन रहे, यदि ऐसा म करोगे तो; 


|. राष्ट्मव विश्याइन्ति सस्माद्राष्टी दिशं घातुऋ:। विशमेव राष्ट्रापार्धा करोति तस्माद्राएी विशमति 


४ 

ने पुष्ट पशुं मन्यत् इति || शत० कां० १३ | श्र० २ | ब्रा० ३ | [ कं० ७। ८॥ ] 

है जो पञञा से स्वठम्त्र स्थराधीन राजवर्य रद्दे तो ( रामेएय विश्याइन्ति ) राज्य में प्रवेश करके 

मजा का माश किया करें, शिसलिये झरेला राजा स्थाधीन था उन्मत्त द्ोोडे ( राष्ट्री विशं घातुकः ) प्रज्ञा 

का माशक दवीता दे अर्थात्‌ ( विशमेव राप्ट्रावार्धा करोति ) यद्द राजा प्रजा फो खाये ज्ञाता ( अत्यन्त 

पीड़ित करता ) द|े इसलिये किसी एक को राज्य में स्थाधीन म करना चाद्िये, जैसे सिंदद था मांसाहारो 

दृष्टपु्ट पश्च को मारकर खालेते दें येसे ( राष्ट्री विशमत्ति ) स्वतन्च्र राज मजा का नाश करता दे अर्थात्‌... 
“श्र ला है, 


५; 


क्‍ 


द्ै सत्यार्थ प्रकाश: 


किसी को अपने से अधिक न होने देता, ्रीमान्‌ को लुट खूट अन्याय से दएड होके अपरा «- 
पूरा करेगा, इसलियेः-- (बेर 
इन्द्रे। जयाति न परा जयाता अधिरानों राज॑सु राजयावै। चरुत्य ईंडथों प्रेत 
नम॒स्‍्यें। मतेह ॥ अयने० कां० ६ । झनु० १० | व० ह८ | मं? १॥ 
दे मनुभ्यो ! जो ( इद ) इस मलुष्प के समुदाय में ( इन्द्र: ) परम ऐश्यस्ये का कर्ता शपुएे रु 
( जयाति ) जोत सझे ( म पराजपातै ) जो शत्रुओं से पराजित न दो ( राजसु ) राज्ा्ों में । भविए 
सर्वोपरि विराजमान ( राहपातै ) प्रकाशमान दो ( घहस्यः ) सभापति होने को अत्यस्त योग्य (£ 
प्रयंधनीय युद कम स्वमाययुक्त ( वस्य: ) सरकरणीय ( घोपसधः ) समीप ज्ञाने और शप्ण हैरेऐ 
( शमरप्ः ) सह को माननी २ ( मंत्र ) होते उसी को सभापति राज्य करे ॥ कप! 
इमस्देंदा भसपत्र 0 सुंवध्य महुते छुत्राय मह॒ते श्यैध्ठपांय महुते जान॑राग्यायेस्ट्रस्पेश्रिएा | 
यतुण भ० ६&।| मं श्र 
है ( रेष:) दिदानों राजपजाजनों | तुम ( इमम्‌ ) इस प्रकार के पुर को (मे ए९ 
ले धर्शन रापप ( मत ज्वै्ययाय ) राव से बढ़े होने ( महते जञानराज्याप ) बढ़े ३ विश 
दुरू रारप चाबरे ओर ( एदड्रश्वेर्दरपाप ) पत्म पेश्स्युक्त राज्य और घन के पाकने के शंे|, 
शष् ते शुरण्श्म ) शम्मति ऋरदे शपेत्र पचावातरदित पूर्ण विधा विनययुक्त सप के मित्र प्री 
शाकत को शरहाचीश माग दे शर सूपोत शत्रुर दित करो, और-- 
लिए ई; सल्यापूँघा पगुणुरे बीछ उत प्रतिष्फमें । युष्माईमस्तु तर्िवी पर्नीयतती गा री 
डर । छब मन १। प० ३६ | मं० २॥ 
रैंकर बपरेश छरवा है दि दे राजपुदषो | ( व: ) तग्दारे ( आयुधा) झागेषाद भा 
शा जड़ आज कह मुएव्री अर्थात्‌ बलूक घनुष्‌ बाण तत़वार झादि शब्म शत्रुभों के (१४4 
इहाडर छापने | 25 व तपइ मे ) घर गोफने के शिय ( बीए ) प्रशंसित और ( रियर) र$ कि 
हो (शुच्एइन्‌। झोर डुस्हारी (सवित्री) सेना ( पजोवसी) प्रशंशनीय ( भरत ) होते दिए, 
हुए कए। विडर हो रे वरएतु ( था मस्वैस्प मायित ) जो सिखित अस्थायहृप काम करता हे 
हे पुरे बेस्ट ऋूत हो, झषात्‌ अपवद मतुष्प धार्िक रइने दे तथी लक राख बढ़ता रहता है 
कर हुए्आाह) इन हैँ झव गए घर होशतवा है। प्रशाविद्वानों को विधासमाःधिकारी, धार्मि हि 
के इरुक ८ डे द जी, उशावनीय चार्यिद पुरुषों को गाहतामा के साबाराद और मो गम है | 
ऋूर श4 2३ वे कादावएच्द मदन, ुदप हा डा शो वाजपता का पतिदप मान के हार प्रधा( मे 
करें ६ कोओो केस हरे छा सससावि से राजबीति दे उत्तर वियम झोर वियमों के भ्राधीय हार लोग 7 
हे कइए ढक बारें दें झरनगीद करें, स्ेट्िक छाने रू जिद परततद और घर्मयुक्त कामों मै भर्षद 
ईैँढक $ का हैं उस २ हैं इठन्‍क रह । बुक: कल सनापति डे शुद ह॒ते होने चादियें - 
कद भव पाप इझ्दत पडरुच्य थे । बत्र दिनेशयोरेव मात्रा निरृं्ष शाप ॥ है 
दस्परटसाप रेप करते थे मत ब। ने पैसे दे शडोंति इविदनिरीदेव॒रु आ 
है विदएड हपूद मो८ई: कपः के भवराट,। मे डा: मे बदय। मे बोखा प्रगावदा 
मजु+ [०।५।६।०] 


हि 


पहसमुन्नासर घ् 


४ शरद सगेश दाह शाह अर्थाद दिधुत्‌ के समान शी ऐश्यरपेकर्सो, बायु के समात सब के 
माशदू व्रिए और हृदय की बात शातनेद्दाए, पम्र पर्तपालर्द्वित भ्यायाधीश के समान पर्श्नेपात्ा, 
शर्ते के समात ध्याय धर्म विधा का धक शक, भ्रस्धकार अर्थात्‌ अविया अम्पाप का निरोधक, अप्रि 
है; समान घूपों को परम करमनेट्रारा, घ८ण अर्थात्‌ बांधनेषाणे के सह दुप्नों को झनेक प्रकार से दांधते 
हाला, श्र दे: भुरव घेए् पुप्पों को आगस्दता, धराध्यण दे समान क्ोोशों का पूर्ण फरने बाज, 
राधा पते होई ॥ १॥ जो गूपेदत्‌ प्रतापी सर थे; दाइर ओर सीतए मनों को अपने लेश से तपानेद्दार 
जिपको दूचियी में दरहो दाए से देशने को कोर भी समर्थ हू हो॥२॥ भोर ज्ञो अपने प्रभाय से 
अप्ि, धापु, पे, श्रोम, धरे, प्रदाशक, धतवरेक, दुऐँ का इन्धनकर्सो, बढ़े पेभ्ययेदाशा वे बद्दी 
गरभाप्यत्त सभेश होने के पोग्प दोपे | दे ह रचा राजा कोन दैः-- 
स्‌ राजा पुर्षों दण्ड: स नेता शामिता च छः । चतुर्थापाषपाणां घ घर्मस्प प्रतिभू३ स्वत: ॥ १॥ 
दणढः शाम्ति प्रमा: सदी दंड एशमिरदति। दण्ढः सुप्तेपु जागर्ति दण्ड घमें रिदु्रंषा।॥ २॥। 
समोरय मे घृत) सब्परू सपरो रध्जयति प्रभा:। अममोक्तय प्रणीतस्तु रिनाशपति सपेदा ॥ के ॥ 
जि €ृ #' ः के म्स ईसेर: इलोइप्रसोपध ७ /5 
दुष्पेपु) सरेयणाध म्रियेग्न्सेसेवः । सरैलोक्षप्रसोपथ मवेशएडस्प पिश्रमात्‌ ॥ ९ ॥ 
यह श्पामों छोइतादी दण्ड धराते पापहा | प्रजास्‍्तप्र मं झृप्तान्ति नेता चेत्साघु परयति || ५ ॥ 
शस्पाहुः संप्रणेशारं रामाने सत्यरादिनम्‌ ) समीरय कारियं प्राईं घमकामार्यकादिदश ॥ ६ ॥ 
हैं राजा प्रधपस्सम्पर प्रिपेणामिपर्टते | फराणास्मा पिपप छुट्रों दएडेनेव निईन्यते ॥ ७ ॥ 
दण्डो हि सुयध्णेजों दुर्परदाइतात्ममिः । यमीद्वियलित इम्ति मृपमेय समान्धवम्‌ ॥ ८ ॥ 
प्ोध्मएपेन शदेन छुब्पेनाकषपुद्धिता । न शवपों स्पापतो नेतुं सक्रेन विषपेषु थे ॥ &॥ 
शुद्धिना सस्यग्रग्पेन यपाशाश्वाजुमारिया । प्रणेतु शरयदे दण्ड: सुसहायेन घीमता ॥ १० ॥ 
भतु० [७। १७-१६ । २४-२८। ३० । ३१] 
जो दपष्ट टै थद्दी पुयप, राजा, यददी स्याप का प्रयाएकर्शा और सइ का शासनकर्ों, वद्दी घार 
दर्से और थार आधमों बे: धर्म का पतिभू अधोत्‌ जामिन दे? ॥ यही प्रश् का शासनकर्ता संद 
प्रश् का रछक सोते हुए पशाह्य मनुष्यों में शागता दे, श्सीलिये चुद्धिमाव्‌ छोग दएडड दी को धर्म कहते 
हैं ॥२॥ जो दण्ड अच्दे प्रकार पिचार से घारए किया ज्ञाय तो घट्ट सब धज्ञा को आनन्दित कर देता 
दै झयोर जो विगा दिचारे खाया जाय तो सप ओर से राजा का पिताश कर देता दे ४ ॥ विना दाड 
दे सद धर्णु दुपित और सब मर्षादा दिल्त मिश्र दोशावें। ददढ के यथावत्‌ न दोने से सर कोगों का प्रकोप 
दोडादे ! ४ ४ कद्ों हृष्यश्ण रफमेत्र भण्शर पुरुष के पाऐों का नाश करनेड्वारा दरशड विघग्ता 
है व धजा मोइ को प्राप्त न ोछे शानस्दित होती दे परम्तु जो दएड का चल्तानेषाप्ता पक्पात 
रदित विद्वान दो तो ॥ ५) को उस दण्ड का ष्वष्ठानेधाला सापवादी दिचार के करनेहारा तुदिमान्‌ धर्म 
अर्थ और काम की लिि करने में पशिइत राजा है उस्ती को उस दंड का खह्ानेद्वारा विद्वान छोग व इसे 
हैं। ५॥ जो दुप ६ को अच्छे कार राहा चलाता दे बह धर भर्य और काम की सिद्धि को बढ़ाता है 
ेर जो दिव्य में हम्पट, टेढ़ा, ईप्प करनेदारा सुद्र मीचयुद्धि स्यापाधीश राजा होता है, पु दण्ड से 
ही मार ज्ञान) डे ॥ ७ 0 जब दएइ णहा सेशोमय टे उसको धदिदान्‌ अधर्तेर्मा धारण नहों कर सहझता 
रब चुद दुए ३ धरम से -द्वित कुटम्ण्सदित दाह दी का नाश कर देवा दे॥ ८॥ क्‍योंकि को आत परथ्षों 











ध्ड सत्यार्थप्रकाशः 


है है. 
& हपर. दिया. सुशिता से श्द्वित, विषयों में भासक मृद दे पद स्पाय से दपश को कक ॥ 
ढाधी मय हो सझठा ॥ £+॥ और जो पवित्र आत्मा सत्यायार भोर सरदुरुपों का स्यापइरी ऐश हे हे 
शा के अनु हुत घतनेशारा शेष पुरषों के सद्टाप से युक्त युद्धिमान दे डी भ्पापड! 
डे हरे डा दे । १० ॥ इसमियेः-- पति । 
दैसापत्ये च साम्पें च दश्डनेद्लमेत चे। सर्वलोकाधिपत्यं व वेदशा् 
दस्परग दा प्रिय घर परिहस्पयेत्‌। र्ययरा यापि दृरास्पा ते धरे न पिषात ॥१ 
$ दे हैशुइस्तही मैसक़ों घमपाठकः । ग्यरसाभमिणः पूर्े 304 हे 
ऋमेप तप दिषि सममरेएनिरेव ल। ध्यवरा परिषशेया धर्मसंशयतिशेये 6 
इपोोदे वेशविदर्द द॑ स्यरस्पेर रिनोधमः । से गिश्ेयः परो धर्मो ३ 
ध्वशधाइसलपम्यों भातिमायोपमीरेनाम्‌ | सहसशः समेतानां परिे नं गा 
हे इपत्ति जफेयुता मची परमेमगदिए! । हत्पाप शतधा भूटां तदुननुगप्य 
> मु? [ ११। १० वी 
हे 
कफ कपः कर मेगा रियो के ऋपर राज्याधिकार, बंद देने की स्यपधपा हि गो है 
के ट_क कक बल के हैएश कर्वाप्तर कमा शा, राफ्याथिकार इस चारों अधिकार (५ 
करा है #शील दूर्ण फिचानापें पवतित जितेरियय शुच्ीक शर्गों को श्यातवित अरता या बा 
कु ब-जअक #कड हाफ डारी, शुल्व पतागाचीश, प्रधान और राजा ये थार हब हि | 
रैक से है के का हित + १ । ब्यू| से ल्यूज वध विवार्सों आचता दुत रदूत वो तो तीत विद्या 
कैब ऋश्कलला के कनश फर्े ऋतरीत स्पतष्था का उर्जयत कोई बी ते फतह शा 
कै. शाडकपाओ फिलक अरेटाकफ झर्ते के बेचा वियास सामाशद हो परहशु नें श्री । 
& 7 ऋऋज«६ $ कक कद खां? ६' ] फि जिसमे कया विदातों ही ह्युगस होते सादिय # 
बैझक इछ ड कह आर अं रु केद शहर स्क के आतजेता के वीद जात द। के स्पपरणा पर बह 
के कर अनाथ % जे“ कड़े कम वह मे कट 3 ७ । वि एक झटका शक सेरों का शत 
हे छक आय फिम करें डॉ खाफमया ऋर वहीं धत अर्त है, कि गह्दातियाँ कै सप्ध 
के है (कक है को उपसथा कर #्रयाणा अमी म॑ मतता चादिवे ४व आओ प्रह्मल'ये गा 
डक हक अं अकक व 5६ ऋष्यत से घट पर पर्भजास हिंजस सदी अतृर्तों हैं 
की हा बरएों कह, औी ५ के | #६ ऋतफदापू द मुख कैदी के थे. आजशेतास पूरब जिस शमी 
अश्य कई 4 अप्तजण के एक ऋण डा ऑुनों के ड़ हुए पर्म के झतुसार खंबती हु४ा 
है कप #छट है के ० #त &:र हैं. + + दाकिय बीज ऋअषाय विधसता, आती ससा आए (78४ 
अत के धओब्त ले बड« किल्मू बरद विड़ # और कप रू चुदवा घी व्यापक # 7 भौर सर श्र 








"पं दंइटआ रे के हु करलीयू / # ५ परी चण्त/ वा बात स्विच सींएग: 


अल इथन्ट वेश कियक | कि: ० हि शद 6 बसे ह्वापहि्त कर। ॥ 
#के के बकरे त४ ५० केवयों #0म४वि के + सवार सतत दृएनदएन ब्ररछत हि हब |! 





बम मा वी वे अलफण आए पर... कधाधिबन अपफ कया अं ई उप्वाधरटी 4 बू॥४ 7 


चष्ठसमुन्लासः दाह 


प्यादी दियासमः परीवादः स्लियो मंद: । तौय्पत्रिकं बृयाट्या च कामनो दशकों गएः ॥ २५ ॥ 
सयं साहस द्रोह ईप्याश्वयायंदूषणम्‌ । बाग्दएड्ज च परुष्यं कोघजोशपे गयोष्ट:: ॥ ६ ॥ 
पस्पेतयोपूल ये सर्वे कबयो बिदुः । ते यद्वेन जयेश्नो्म तज्जावेदाबुरौ गो ॥ ७ ॥ 

वरमताः ख्ियरचैय घृगया च ययाक्रमम्‌ | एतल्कटटतर्म विद्याचनुष्क कामने गये ॥ ८ ॥ 

डस्प पातन चैय पारुपारुष्यायदूपणे । क्रोधमेजपि गणे विधाक्ृषमेतालिक सदा ॥ ६ ॥ 
फिस्पास्प पर्गस्प सर्वश्रैयालुपाद्नैणः । पूर्व पूर्व गुरुतर विधादयसनमात्मबाद्‌ ॥ १० ॥ 

सनस्य च एृत्पोश्व घ्यसन कष्टमुच्यते । ध्यसन्यधो5घो प्रजाति खर्पात्यव्यसनी झतः ॥ ११ ॥ 
ह। * मनु० [ ७। ४३-४३ | 
राशा और राजसभा के समासद्‌ तप हो सकते हूँ कि ज्य बे धारों थेरों की कर्मोप्रासना 
॥ विधाहं के आननेयालों से तीनों विधा सनातन दएडनीति न्‍्यायविद्या आत्मविधा अर्थात्‌ पस्मात्मा 
गुण फर्म स्थप्तायरूप को यथाबस्‌ क्वाननेरुप ग्रह्मविधा और खोक से धार्त्ताओं का भझारम्म ( कट्टना 
ए पूधना ) सीलकर समासद्‌ था सभापति द्वोसर्के ॥ १॥ सब सभासद् और समापति इम्दियों को 
ने अर्थात्‌ अपने यश में रख के सदा धर्म में दते और अधर्म से इटे इटाये रदें। इसलिये रात दिण 
गत समय में योगाभ्यास भी करते रहें, क्‍योंकि ओ झितेन्द्रिय कि अपनी इन्द्रियों जो मन, प्राण 
र शरीर प्रजा दि इस)को जीते पिमा पावर की प्रज्ञा फो अपने थश में स्थापन करने को शम्र्ध 
मी नहीं हो सकता ॥ २॥ दृद्टोत्सा्टी होकर जो काम से दश और क्रोध से झाठ धुए्ट व्यसत कि 
भें फसा हुआ ममुष्प कठिनता से निकल सके उनको प्रयक्त से घोष और हुद्ठा देवे॥ ३॥ क्पोंछि 
राजा काम से उत्पाप् हुए दश दुए ब्यसमों में फँसता दै वद् अर्थ अर्थात्‌ राज्य धनादि झोर धर्म 
रहित होजाता दे भौर जो क्रोध से उत्पन्त हुए आठ थुरे व्यसनों मैपॉसता दि पट शरीर से भी 
बैत ऐ जाता दे ॥ ४॥ काम से उत्पप्त दुए व्यसन मिनाते हैं देशो--सुंगया पेलना, ( अ्त्त ) धर्थात्‌ 
पह़ खेलना, जुझा रोलनादि, दिन में सोना, कामफथा था दूसरे की निम्दा किया करता र््रियों बा ऋति 
ह#; मादक द्वष्प अर्थात्‌ मध, अफीम, भांग, गांजा, घरस आदि का सेवन, गाता, पाना, नाथना 4 मा 
गया सुनना भौर देखना, शुधा इधर उधर घूमते ग्शमा, ये दश कामोस्पप्त ध्यसभ हैं॥ »॥ शोध से 
दच्च स्पसनों को गिताते एँ--“पैशुस्पम”” अर्थाद्‌ धुगली करता, विमा विघारें दल्वात्कार से किसी बी 
3 से घुसा काम करना, द्रोद रखता, "इष्या” झर्थात्‌ दूसरे की दड़ाई य उच्तति देशकर क्या चरना, 
#यूषा" दोषों में गुण, एुणों में दोषारोएण करना, “भर्थदृदण"” हर्थात्‌ अधर्मयुक्त धरे बामोंओ 
हादि का ब्यय करता, कठोर यचन बोलना ओर दिना ऋफए्गाण कड्टा दघत था विशेष दण्ड देराये 
ड दुर्गुष क्रोध से उत्पत्त द्ोते हैं ॥ ६॥ जोसब विदान लोग कामज और क्रोधजों का मृत सात 
'कि सिससे ये सब दुगेण मजुष्प को प्राप्त डोते दें उस खोम को प्रयक्ष से छोई।॥७॥ काम के 
समों में बड़े दुर्शुण पक मधादि ध्र्थाद्‌ मद्कारक द्वप्यों का सेवन, दूसरा पासों आदिखे जुधा 
हता, तीसए दियों का विशेष सह, घोपा सूगपा रोछभा थे खाए पइ्ाचुए प्यसन हैं॥८ा ओर बोघचरों 
विगा अपराध दर देता, कटोए वचन बोलना ओर घनादि का अम्याप में सच करता ये तौर बच 
(रस्पन्न हुए बड़े दुःछद्ापकः दोए ह॥ ६॥ जो ये ७ दुगयु दोनों कारमत झोोर बोधज दोोों में यिने हें इवमे 
(पे २ अर्धात्‌ व्यर्थ घ्यय से ऋढोर बघन, कठोर दचत हो [ अम्याप ), अम्याप से दएड देगा, इससे _ 
शया लेना, इससे दिएों का असत्यात सह, इससे शुरू शर्चाद्‌ पूत ररवा झोोर इससे ही मक््र 


का 
का रा 





हैँ 


३० सत्याथ प्रकाश: 





सेवन करना बड़ा दुष्ट व्यसन है॥ १०॥ इस में यद्ट निश्चय है कि दुष्ट च्यसन में फँसने से 
अच्छा दै, क्योंकि जो दुष्टाचारी पुरुष दै व अधिक जियेगा तो अधिक २ पाप करके नीच २ 
अर्थात्‌ अधिक - हुःख फो प्राप्त दोता ज्ञायगा और ज्ञो किसी व्यसन में नद्दीं फँसा यह मर 
तो मी खुल को प्राप्त द्वोता ज्ञायगा | इसलिये -विशेष राजा और“सब मनुष्यों को उचित ७।* , 
मूगया और मद्यपानादि दुष्ट कामों में न फसें और दुए व्यसनों से पृथक दोकर धर्मयुक्त गए हा 
स्पमावों में सदा यर्त के अच्छे २ काम किया करें ॥ ११॥ राजसमासद और मन्त्री कैसे होने चाल” 
मौलान शास्रविदः शरत्रन्धलक्षान्‌ कुलोद्वतान्‌ | सचिवान्सप्त चाष्टी वा अ्रहुबीत परीकषितान | | 
अपि यत्सुकरें कम तदप्पेकेन दुष्करम | विशेषतोब्सहायेन किन्तु राज्य महोदयम ॥ रह. 
५, ग्रेश्नित्यं | + सन्धिवि/ &्‌ ० कक 5, 
है; सादे चिन्तपेन्षित्यं सामान्य सन्धिविग्रहम्‌ । स्थान सम्ुंदय गुप्ति लब्धप्रशमनानि घ | है! 
हेपां स्वें खप्रमिप्रापप्ुपलम्प पृषकू प्रथरू। समस्तानाह्च कार्येपु विदध्याद्वितमात्मनः ॥ है॥ 
शड हे 3 
अन्यानप्रि प्रकुर्वीत शुचीन्‌ भ्रज्ञानवस्पितान्‌ । सम्पगयममाहतुनमात्पान्सुपरीदधिताद्‌ ॥ १॥| 
निषर्ेतास्य यातद्धिरितिकरतैब्यता नुभिः । सावतोतन्द्रितान्‌ दक्षान्‌ अकुर्वीत विचत्तणाव ॥ 
जपामर्ये नियुस्मीत शुगन्‌ दध्षान्‌ कलोद्वतान्‌ | शुचीनाकरफर्मास्ते भीरूनन्तर्निवेशने ॥ ७॥ 
03 3 ० 5 52205 “एज 
दूते खेद प्रडुदोंत सर्वशास्रविशारदम्‌ । इद्चिताकारनेष्टई शुचि दर्च छुलोद्वतम ॥ ८ ॥ 
ँआ हि. 5. रे 
भनुरा। शुविर्दतः स्पृतिमान्‌ देशकालागित्‌ । पपुष्मान्वीतमीर्यास्मी दूतो राह्ः प्रशस्पते ॥| ६।| 
मनु० [७। १४-५७ ६०-६४ 
स्वराउय स्परेश में उस्पन्न हुए, वेदादिशाद्यों फे ज्ञाननेधाले, शरदीर, जिनका मपयं 
दिधार निच्फाल भ दो और कुलीस, अच्छे प्रलार सुपरीक्षित सात था झाठ उत्तम धार्मिक 
*सणिवान” भर्थाव्‌ मस्त्री करे ॥ १॥ क्योंकि विशेष सटद्टाय के पिना जो सुगम कर्म ऐैपई प्री 
ले करने मे छटित इोडाता दि जप ऐसा दे तो मशन्‌ राज्यकरम्म पक से कैसे हो सकता दे 
दुझ को राष्टा भौर एक की युद्धि पर राज्य के कार्य का निर्मर रखना बहुत दी छुरा काम दि ॥ ९। 
समागति को इखित दि दि निःयंत्रति डन राज्यकर्मों में बुशल विद्वान, मरित्रषों के साथ सामाय कह 
दिसी से ( सम्धि ) मित्रता किसी से ( विप्रद्द ) विरोध ( स्थान ) रिथिति समप को देखे शुप्पां 
ऋषते राम्य ले रचा करदे देदे रहरा ( समुदयम्‌) शव अपना डद्य अर्थात्‌ घूटधि दो तर 00» 
आड्टाई छरका | रुमिम्‌ ) मूख राजसतना कोश आदि की रचा ( शब्धप्रशमतामि ) जो दे देश प्रात ६ 
है हागम्टिस्घापन डपट्रवर दिल करना इत छः गु्यों का विचार नित्यप्रति किया करें॥ ३ ॥ हि 
अरणा हि इन सम'सद्ों का पृथक २ झवता २ वियार ओर अप्रिदाय को खुतकर 88% 
दाद में हो छापे पता झोद अस्य का टितह्ास्क दो बह करने लगता ॥ ४ ॥ असर्य भी 
अदिकान डिशिव्ददि, पदायों छू संप्रद्द ऋरने में अतियतुण शुपरीकित मस्त्री करे॥र के 
झजुभओें से राफ्द इार्य सिद इोसदे इतने आब्स्पादित बलवान और वढ़ेशचरतुरप्रधात १. 
अतीक छाए! झारापंण्‌ शो डर करे कह ६ ।॥ इसे चाधीन शूरदीर बलवान कशोरपद्ा पदिद शू्पों के 
दर्यों दे कौर मीद करवे गढों छो मीतर के कप में मियुक्त करे। ७॥ जो टरएशित हल 
खत, चइविक, इचचनाद आर खेकर से मोतर इदप बट मे दध्वत्‌ मै दोरेयाली दाव को ज्ञागरेहीं 
श्र है दिशरद ऋषर है, इस दूत को भी रफ् ८॥ वह ऐसा हो दि राज दाम 















चछसमुश्लासः । 
उत्साह प्रीतियुक्त, निष्कपटी, चविच्ञास्मा, चतुर, पट्दुत समप की बात को भी म॑ मूखनेयाज्ञा, देश और 
कालानुफूल वर्तमान का कर्ता, सुन्दर रूपयुक्त, निर्भव और बढ़ा यक्ता द्वो धद्दी राह्मा का दूत इोने में 
प्रशस्त दे ॥ ६॥ किस २ को फ्या २ अधिकार देना योग्य दैः-- ल्‍ 


'भमात्पे दएड आयत्तो दणडे वैनयिक्री किया | नृपदौ फोशराड़े च दूते सम्धिविपषयेयों ॥ १ ॥ 
दूत एवं हि संघते मिमच्येद च संहतान्‌ । दूवस्तस्कुरुते कर्म मियन्ते यन या न वा ॥ रे ॥| 
दृद्वा च मये त्येन पररानाचिकीर्पिठम्‌ । हा प्रयक्षमाविष्ठेधयान्मानं न पीडयेत्‌ ॥ ३ ॥ 
घनुदृंग महीदुरगभन्‍्दुगे बाछमेव वा । हूदृगें गिरिदृन या समाभित्य पर्लयुगम्‌ ॥ ४ ॥। 

शक शर्ते योधयाति आ्राकारस्थों घनुभरः । शर्त दशसदस्राणि तस्मादृदुग विधीपते ॥ ४ ॥ 
उत्सादायुघसम्पन्न घनघास्पेन बाहनेः । प्राक्षणेः शिस्पिमियन्त्रेयबसेनोदकेन च ॥ ६ ॥ 

हस्प मध्ये सुपयीर्त कारयेदू गृहमार्मानः । गुप्त सरेशुऊ शुभ जलपृदसमन्वितम ॥ ७ ॥ 
हदध्याएणेद्देद्धा्य सदणों लक्तणान्विताम्‌ | फुले महावि सम्भृतां हर्था रूपगुणान्विताम ॥| ८ ॥ 
'घुरोदिवं प्री वृज॒पादेव चर्सिजम्‌ । वेहस्प गृश्षाणि फर्माण कु्देवे तानिकानि च॥ ६ ॥ 
। मनु? [ ७। ६५ । ६६। ६८। ७० | ७४-७५ ] 


| अमात्य को दश्डाधिक'र, दुएड में विनय विया अर्थात्‌ शिससे अम्यापरूप दुंड॒ श होने पाये, 
राजा के झाधीन कोश और राजकार््य तथा समा के श्राधीन सइ काय्ये झौर दूत के झाधीन दिएरी 
सि मेन । विरोध करना झधिकार देवे ॥ १॥ दूत इसको बहते दें जो फूट में मेल भोर मिले हुए 
(वींटों को फोड़ तोड़ देबे। दूत पद्द कर्म करे शिससे शत्रुओं में फूट पढ़े ॥ २॥ धदट समापति और बाई 
/लमासद्‌ वा दूद भादि पयार्थ से दूसरे विरोधी जा के राज्य का अभिणप ज्ञान के थेशा प्रय्त करे 
(कि जिससे अपने को पीड़ा म हो ॥३॥ इसलिये छुम्दर शाल धन धास्पपुक्त देश मै ( धनु (गम ) 
|ण्युर्धारी पुरुषों से गद्न ( मधीदुर्गम्‌ ) मद्टी से किया हुआः आप्दुरगेम्‌ ) अल से घिरा हुआ (दाम) 
[भर्थाद्‌ चारों ओर बन (सदु्गम्‌) घारों ओर तेगा रद्दे ( गिगिदुर्गम्‌ ) अर्थात्‌ चाएें झोर ८श/१ं छ 
कीच में कोट घना के इसके मध्य में शगर बनावे॥ ४ ॥ ओर मगर के थारों ओर (आाशार )भषोट 
ठमाये, फ्योंविए डसामे श्धित हुआ पर यीर धनुर्धारी शस्युक्त पुर सो छ साथ झोर शो एश इज्ार 
के साथ युद्ध कर सकते दें इसलिये भवश्प डुगे का एगाना इखिव टि 0 ४॥ बट दुर्ग शर्याकर, भ्रर, 
>चारप, थाम, प्राष्मण को पढ़ाने उपरेश करनेद्वारे हों, ( शिहिप ) कारीगर, दरज, शागा प्रकार की व #, 
हैं पश्तेन ) घारा घास और जल झादि से सम्प्त धर्थात्‌ परिपूर्ण इो ॥ ६» उसबे मध्य में जऋू दृक्त 
सष्पादिश सब प्रकार से रहित, सब ऋआतुझों में सुखकारक, अवगवर्श झपने लिए शर शिक्षपरे सर 
हर हिकाप्प का निर्याद्द दो पेसा एनवावे ॥ ७ ॥ इतता अर्थात्‌ प्रद्मचरद से दिधा पहु के: यहांतर शाजकाण 
(करे पश्चात्‌ सौस्दपे कप गुणपुक्त अपने इृदप को धतिग्रिय बढ़े उप पुख में शरपन्न सुन्दर कएदुक्त 
/भपते चाजिय कुछ की क्या जो दिएः अपने सदश वियादि शुरू दर्स सूमाद में हो बल एक हो शी दे 
नाप विद्वाह फरे दूसरी सइ [्रपों को ऋगम्प समझ कर हाए से भी न देख प८8 पुरते'्टत आर 
(्िस्विश्‌ का छवीकार इसलिय कर कि दे ऋषिदोत् ओर एऐडेए ऊर्दि सब राशइर दे रुमे किया करें 
आर झाए सर्वेदा राजराये में तत्पर रदे अर्थात्‌ यही राजा दा सम्ध्योपासभाईद करे टै शे राई दिए 
[परशकाध्े मे प्रदत्त रइवा झोोए कोई राजा दिगईमे ले देखा ॥ ६ 








४ 
। 


हे 


डर सत्यायैप्रकाशः 


साँवतसरिकमाग्मैश रा्ट्रदाहास्येदलिम्‌ । स्पाच्ाम्नापपरो लोके वर्तेत पिठृनन्ूपु | १ ॥ 
अध्यचान्‌ विविधान्‌ कुर्यात्‌ तत्र सत्र विपयितः । तेउस्प सर्वाययवेश्ेस्त्रणां का्याय कुवताम |! 
आवृत्तानां गुरुकुलादिप्राणां पूजक्ो मवेत्‌ | उपाणामच्यों छेप निधिन्रोह्ों विधीयते ॥ र ॥ 
समोत्तमाधमै राजा स्वाहृतः पालयन्‌ प्रजा! | न निवर्चेत संग्रामात्‌ पात्र घमेमनुस्मस्त्‌ ॥ | 
आहवेधु पियोड्स्योन्य निर्धांसन्तों महीदितः | युध्यमानाः पर शकत्या खगे यान्त्यपरादसुसाः ॥ !| 
न च हन्यात्स्थलारूढ न क्लीयं न कृतान्‍जलिम्‌ । न मुक़केश नासीन न तवास्मीति वादिनर ॥ 
न सुप्त न पिसन्नाई न न न निरायुधम्‌ । नायुध्यमा्न पर्यन्तं न परेश समागतम॥ ७ ॥ 
नायुष्यसन प्राप्त नाते नातिपरिद्तम्‌ । न भीत न परावृत्त सता ध्ममझुस्मरत्‌ ॥ ८ 
यरतु भीतः परावृत्तः सझामे हन्यते परेः । भक्तै्यद्दुष्कृर्त क्रिब्चित्तस्सवे प्रतिपय्ते ॥ & ॥ 
यचास्‍्य सुकूत किचिदमुत्रायमुपार्नितम्‌ । भत्ता तत्स्वमादत्ते परावृत्तइतस्य तु ॥ ९० ॥ 
रपाथ॑ हस्तिन छत्र धन घास्ये पशून्‌ स्लियः । सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो बज्जयति तस्य तत्‌॥ [ 
राह्षथ दुरुद्वारमित्येपा वैदिकी श्रुवि । राज्ठा च सर्वयोधेम्यों दातव्यमपथाग्नितम्‌ ॥ १९ ॥ ५ 
[ मनु० ७ । ८१-८२ | ८७ | ८६ । ६-६ 
घार्षिक कर आप्त पुरुषों के द्वारा ग्रद्दण करे और ज्ञो सभापतिरूप राजा आदि प्रधान 3 
हैं थे सब सभा वेदामुकूल द्वोकर प्रजा के साथ पिता के समान यत्तें ॥ १॥ उस राज्यकार्य्य ७ 
प्रकार के अध्यक्तों को सभा नियत करे, इनका यद्दी काम दे जितने २ जिस २ काम में गाब्पुए , 
थे निपमानुसार बर्च कर यथावत्‌ फाम करते हैं या नद्दीं, ज्ञो यथावत्‌ करें तो उनका सत्काए . 
पियद करें तो उनको यथावत्‌ दएड किया करें ॥ २॥ सदा जो राजाओं का वेद्प्रचाररूप भष4 
है इसके प्रचार के लिये जो कोई यथावत्‌ प्रह्मचय से घेदादि शास्पों फो पढ़कर ग़ुरुकुत 
डसका सरकार राजा और सभा यथावत्‌ करें तथा उनका भी जिनके पढ़ाये हुए विद्वान हो ।* 
इस दात के करने से राज्य में विद्या की उन्नति द्वोकर अत्यस्त उन्नति द्वोती दे, जब कमी मर 
पाक्षन करने बाले राजा फो फोई अपने से छोटा, तुल्य और उत्तम संप्राम में झाद्ान करे तो 
के धर्म का स्मरण करके सप्राम में ज्ञाने से कभी निबृत्त न द्वो अर्थात्‌ यड़ी चहुराई के साध 
युद्ध करें जिससे अपना द्वी विज्ञप दो ॥ ४॥। ज्ञो संप्रामों में ए[क दूसरे को इनन फरने की ४ .. 
दुफए राजा लोग शितना अपना सामथ्ये डो विना डर पीठ न दिखा युद्ध करते हैं थे सुख को म्राप्त 
हैं इससे विमुख कमी म दो, किन्तु कमी २ शपरु को जीतने के लिय उनफे सामने से घिए जाना 
£, क्पोंदि जिस प्रकार से शत्रु को जीत सके यैसे काम करें, जैसा सिंद क्रोध से सामने 
शब्पाप्नि में शीघ्र भस्म द्ोडाता दि बेसे मूर्थता से मए भ्रष्ट न द्वो जायें॥ ५॥ युद्ध समय में रा 
ड्घर शड़े, म गषुत्क, मदाथ झोड़े हुए, न जिसके शिर के या खुल्त गये दो, म येठे हुए, ग 95% 
झरल हू” देसे को ६ ॥म सोते हुए, म मथां को प्राप्त हुए, न नप्त हुए, मे आयुध से रहित) 
शुद्ध करते शुझों को देख यातों, मशत्रु के साथी ॥ ७॥ न आशुध के प्रद्दार से पीड़ा कोम्मा 
मे दु्ी, न ऋग्यस्त घायल, ग डरे हुए और म पक्तायन करते हुए पुयष को; सत्पुय्षों के धर्म: * 
करण करते शुए, छोदा लोग कमी मारे शिग्तु इनको पकड़ के जो अच्छे हों बस्दीणद में रखे 
सोम आास्दादव वयादत्‌ देवे और जे घायल हुए हों उतफी झपधादि विधिपृर्षक करे। में 


पष्टसमुन्नासः पु 





चेड़वे न दुःख देवे | जो उनके योग्य काम दो कराये । विशेष इस पर ध्यान रफ़्से कि स्त्री, यालक, 
[द्ध भौर आतुर तथा शोकयुक्त पुरुषों पर शस््र कमी न घलाबे। उनके लड़के बालों को अपने 
उन्तानधत्‌ पाले और स्त्रियों फोलमी पाले। उनको अपनी धटद्दिन और कन्या के समान समझे, कमी 
देषयाशक्ति की दृष्टि से भी म देसे। जब राज्य अच्छे प्रकार जम जाय और झिनमें पुनः २ युद्ध करने की 
ग्ड्ा न दो उनको सत्कारपूर्वक छोड़कर झपने २ घर या देश को भेज देगे चोर शिनसे मविष्यत्‌ काल 
 विष्त होना सम्मय हो उनको सदा कारागार में रफ्ये ॥ ८॥ और जो पक्ठायन अर्थात्‌ मार और 
घर हुआ भृत्य शघुओों में मारा जाय यद्ट दस स्थामी के अपराध को प्राम होकर दणडमीय होवे॥ ६ ॥ 
प्रोर ज्ञो उसकी प्रतिष्ठा दे जिससे इस शोक और परलोक में छुण होने पाला था इसको उसका स्थादी 
हे लेता है जो भागा हुआ मारा ज्ञाय उसफो कुछ भी खुछ नहीं दोता उसपा पुगपफ्रण सत्र श्र हो 
हुता और उस ग्रविष्ठा की यद ग्ास दो जिसने धर्म से यथादद्‌ यु किया ही ॥ १० ॥ इस स्यवसथा 
को कभी न तोड़े कि जो २ श््टाएई में शिस जिस भृन्य था भष्यध ने रथ, घोड़े, हाथी, दष्छ धन घास्प, 
गष भादि पशु और र््रियां सथा अस्य प्रकार के सह द्रष्य और घी, तेश आदि के बुरे हते हों 
वद्दी उसका भ्रदण फरे ॥ ११ ॥ परन्तु सेनास्‍थ जन सी डग जीते हुए पदार्थों में ले सोलटचा मागे शाह 
को देव ओर शाजा भी सेमास्थ योदाझों को इस धन में से, शो सप ने मिल पर शोता हो, सोकएवा 
पराग देके । और जो शोएं युद्ध में मर यया दो उसकी क्री चीर सरताग को रसका भाय देबे ससढी हरी 
वा असमर्थ लड़कों का पधापत्‌ पालन पर | शब्र उसके लाइके समर्थ हो हाये शश शइगढी ध्यायोग्ए 
भ्धिकार देये। ज्ञो कोई झपते राज्य फी धृद्धि, प्रतिष्ठा, विश और झआाहरदपृद्धि वी चढ़ा रच्त हो 
पद्द इस मषोंदा का इल्ंपन कभी ते करे ॥ १९॥ ” * 
भलब्ध थैद लिप्सेत लब्ध॑ रपेस्यत्तः । रातित पर्टयेपैष पृद्धं पाप्रेप निःदिणत ॥ १॥ 
भलम्धमिस्देएएडेन सन्ध रपेदवेणपा । रपितं पर्द्ययेद्‌ पृद्धपा एृद्धं दानेन निःदिपत्‌ ॥ ६ ॥ 
अमाययैय पर्ेत म कर्यचन मायया । पुष्पेदारिप्रयुश/ थे मायाधित्य सयगंदृतः ॥ है ॥ 
नाश्य छिद्गे परो विधान्दिद्धं विधात्परर्प मु । गृहेलामे हषाह्वानि गछेड्िबर्गास्मनः ॥ ४ ॥| 
इरयबिम्तयेदर्थान्‌ सिंहयथ पराक्मेद्‌ ! एकबरयाद लुग्पेत शशप विनिष्पयरेत ॥ ४ ॥। 
एपं विजयमानस्प येड्स्‍्प रधृ। परिपन्थिन: | तानानपेद्रशं सर्वादे सामादिभिरिषतरओ। ॥ ६ !ै 
गयोद्धरति निदोता कं धार्य ये रदति । तथा रफस्टूपे शएं एन्याद परिपषान्एनः ॥ ७ ॥। 
मोहद्रामा स्पराष्ट्र य। फर्षपत्यनपेद्या । सोझविरार भरपते राष्याजश्ीयविा द सइशए५ ॥ ८३ 
शरीरर्पशात्राणाः दीप ध्राणिनों बथा | दपा राष्ट्रामाप प्राण होपस्द राएपईट्टान ॥ ६ ॥। 
राष्ट्प्प संग्रदे गित्य॑ शिधानतिदमाघरेत्‌ । सु्ेएगीवराऐं है पार्पिरः गुरमेपते ॥ १७ 8 
दयोश्वराणं पंचानों मध्ये सुस्ममाविष्टिकस। तपा ग्रामशहानां च हुगर्ट्राफप शंएर ॥ १ 4 
[प्रामस्पाधिएर्ति दुष्पौदशप्रामपति तथा । दिशर्वो्श शरण च्ध सिर इ॥ ६५ 
(ग्रोगे दोषान्सदुसपपान्‌ ब्रामिका शनहे रश्यप्‌। शेमेद्‌ ग्रामइशेशाय दशेशों विशशोदिन्दु ! १३7५ 
(विशतोशस्तु हस्पई श्ेशाव निदेदरेद । शेमेद द्रामशवेशसतु स्पधरतपरे सइणर # १४४ 
लि ब्राग्पादि पायोदि पृषशर्पादि पद हि। राहोभपः रूदिएः दिसएस्दाने इस्पेड्टीडरल: २ १२7 
२१ ह 


६४ खत्यार्थप्रकाशः 





हम २८ /४४२२ ६८ अमन क मे मय 
नगरे नगरे चैऊे झुयोत्मवीर्यविन्तरंम । उच्चेः स्थान घोररूप नक्षत्राणामितर ग्रहम ॥ १६॥ 
स दाननुपरिकरमेस्स्निव सदा स्वयं । तेपां बृच् परिणयेस्सम्यग्रा्टप तचरै! ॥ १७॥ | 
राशे हि रताधिकृता: परस्यादायिनः शठाः | भृत्या मयन्ति प्रायेश वैम्यो रचेदिमा। पगा। 


ये कार्यकेस्यो:येमेव शछ्दीयु पापचेतसः । तेपां सर्वस्थमादाय राजा कुर्यात्मबासनम ॥ ६ | 
मनु० [७ ॥ 8६ । १०१। १०४-१०७। ११०-११७ | रैरे्न 
राजा और राशसमा अलब्ध की प्राप्ति की इच्छा, प्राप्त की प्रयत्ष से रक्षा के पर 
दड़ावे ओर बढ़े हुए धन को वेदबियया, धर्म फा प्रचार, विद्यार्थी, वेदमा्गोंपरेशक तथा असम 
पालन में लगावे॥ १॥ इस चार प्रकार के पुरुषार्थ के श्रयोधन को आञने। आलस्य घइश 
मश्रीमांति नित्य अजुष्ठान करे। दएद से अप्राप्त फी प्राप्ति की इच्छा, नित्य देखने से प्राप्त की एए/" 
की पृद्ि भर्धात्‌ व्याशादि से पढ़ावे और थढ़े हुए धन को पूर्षोक्त मार्ग में नित्य ब्यय करे ॥ ४०] 
किसी & साथ दक्ष से न यर्ते किन्तु निषक्रपट दोकर सब से यर्साव रफ्से भौर निः्यप्रति धप' 
कर के शभ्ु के किये हुए घुछ को आन के नियृत्त करे ॥ ३॥ कोई शबु अपने घिंद्र अर 
को न शान रे भोर स्पय॑ शत्रु के घिद्रों को झानता रददे जैसे कछुआ अपने भक्कों फो गत हट 
केसे शत्रु के प्रयेण करमे के दिद को गुप्त रफ्ये ॥ ४॥ सैसे पयुज्ा प्यानायश्ित दोईए प 
पड़ने को ताकता दे पेसे अर्थ संप्रद का विचार किया करे, द्रव्यादि पदार्थ और घज को 
शत्रु को जीतने के मिये सिंद के सामाग पराक्रम करे, थीता के समान घिपकर शपुओों को १६ 
राजीय में: आप दक्षवान्‌ शत्रुश्नों से सस्सा के*समान दुए भाग ज्ञाप और पश्चात्‌ * 
पचई | २ ॥ इस ध्रकाए विशय करनेयारो समापति के राज्य मे ओ परिपन्‍्थी अर्पात्‌ डा । 
शहद) ( गान । मित्रा छेरा ( दाम ) कुध दैकर ( भेद ) फोड़ तोड़ करके यश में करे भोए हो ६ 
हे बह ती अजिशटित दंद से वश में करें ॥६॥ सैसे घाग्य का निकाणने याण! पिंसकों फो पं 
इम्प झी रचा करता अर्थात्‌ टूटने शह्दी देता दै यैसे राजा डाकू थोरों को मारे और राग ड़ 
इरे ४ 3 ४ शो गड़ा भोइ से, अविधार से अपने राज्य को शुर्षक्ष करता है बद् राग्य भर का हे 
सहित शोदग से पूर्व दी शीत मए घर दोजाता दे ८॥ औैते प्रादियों के प्राण शरीरों * 
इडरे मे दथ इोडने ई देते दी प्रमाओं को शु्पश्त करने से राजाओं के माए भर्षा/, 
छोट्वितव शर दो शतने हैं ॥ €॥ इसलिये राश और राजसपा राज्यकाय्ये की सिद्धि के लिए के 
करें [८ डिससे गज दाद बयावत्‌ मिक् हो झो राजा राज्यपालन में सब प्रकार तापर रहती 
मु सतत बहु है ॥2०॥ इसलिय दो, तीन, पांच और सो प्रामों के बीच में पश पाह/ 
खिलये बाद शोड्य शुष्ध अर्थात्‌ कासदार आदि राजपुदपों को रुचकर राद रास्य के कार्यों को !, 
8 १३ ८ रुक + झा में तक २ प्रदान दुदघ को रफख डरहों दश ध्रामों के उपर दूत, जल्दी रा 
थे फ्पर शीसरा, करों की बातों के ऊपर सोया झोर इन्हीं सइस प्रामों के ऊपर बरतिँ पु । 
५330 कहाति ऋजइक वक प्रा में ऋश पटवारी, उसी दशा धामों है दक धागा भोए् दो शा | 
ईयर धर इन पाख यार वर पंच सहमीजों झोर इश तहसीशों दर दर क़ित्रा तिव। 
हे बह गई हें इंटर से पह्ीति छा बचाए लिया है॥ १३३ इसी प्रकार हर 
कड़े अाघा दा के कह इह अतयों का वरि धाम है लिख्यचति भी २ कोच डत्पश्ा दो इत ६ 
लक धुत के इन साई छोर कह बर। बरापत वात डगी प््टार बीस धाम है शा 
कर कमा का बटेज सिल्क कमा इक ३ १३॥ झट इस धामों का अधिपति बीस कप * 


चहसमुछ्ासः धर 


न्कतो शनप्रामाधिषति को निश्यपति निषेशन करे पैसे सौ २ प्रामों के पति आप सदस्ताधिपति 
चात इज्नार प्रामों के ब्यामी को सो २ ध्रामों के यर्त्तमान को प्रतिदिन शनाया फरें। झौर बीस २ ध्राप्त के 
च अधिपति सो सो ध्राम के भ्ष्यक्त को और पे सहस्र २ के दश अधिषएति दशसइस्र के अधिपति 
 झोर ल्षधामों की राजसभा फो मतिदिन का पर्तमान जताया करें। और थे सप राजसभा महाराज- 
मा भर्थात्‌ सायमोम्रक्रपक्ति मद्ाशज्समा में सप भूगोल फा पर्ततममन जनाया करें ॥ २४७ ॥ और 
ह १ दश २ सदस्र प्रा्मों पर दो समापति यैसे करें शिनमें एक राजसमा में दूसरा अध्यक्ष आालस्य 
'हृकर सद स्थायाधीशादि राजपुयपों के कामों को सदा घूमकर देखते रहें ॥१४॥ बड़े २ नगरों में पक २ 
छोर चरनेबाली सभा का झुन्दर उच्च और विशाल असा कि सन्द्वमा दे येसा एक २ घर यनावें 
में बड़े ९ विधायुद कि जिन्होंने विधा से सप प्रकार की परीक्षा की दो थे पैठकर विचार फिया 
हैं जिन नियमों से राजा झौर भजा की इच्चति दो वेसे २ नियम झौर विधा प्रकाशित किया करें ॥१६॥ 
जिस्प घूमनेयाह्मा सभापति दो उसके झाथीन सप गुप्नचर अर्थात्‌ दूतों को रफ्रे जो राज़पुरप और 
'घर | जाति थे; रहें उससे सब राज़ और प्रजापुरुषों फे सब दोष और गुण गुमरीति से ज्ञाना करे 
सदा झपराध दो उसको दण्ड झोर जिनका गुण दो उनकी प्रतिष्ठा सदा किया करे ॥ १७॥ राज्य 
गछो प्रजा की रचा का अशिकार देवे ये धार्मिक सुपरीक्षित विद्वान कुछीन द्वों उनके 
धीन प्रायः शठ भोर परपदार्ष दसनेधाले घोर डाकुओं को भी भोकर रख के उनफो डुष्ट फर्म से 
गाने क लिये राजा के मौकर करके उन्हों रक्षा फरनेयाले विद्वानों के स्थाधीन फरपेः उनसे इस 
ग की रक्षा यधावत्‌ करें ॥ १८ ॥ जो राजपुयप अन्याय से यादी प्रतियादी से गुप्त धन 
है पक्तपात से अस्याप फरे उसका सर्येस्य इरण करके यथायोग्य दण्ड वेकर पेसे देश में 
खि छि श्टा से पुनः छोटकर न भासके क्‍योंकि यदि उसफो दंड न दिया ज्ञाय तो उसको देख के 
सय राशपुयप भी ऐसे दुट काम करें शोर दएड दिया ज्ञाय तो ये रहें, परन्तु जितने से उन शाशपुरुषों 
। घोगछेम भलीमौति द्वो भोर वे मलीमाँति धनादथ भी द्वों उतना धन वा भूमि राज्य की ओर 
मासिक था धार्विक क्रथया एक यार मिला करे और ज्ञो घृद्ध धो उनको भी आधा मिलता करे परन्तु 
; ध्शन प्ें रक्‍्ये कि जशतक वे जियें अशतक यदद जीविका वी रदे पश्चात्‌ नदी, परन्तु इसके सरतानों 
। सम्कार था मौकरी उनहे गुण के अनुसार झयश्य देवे । ओर जिसपर यालफ अदतक समर्थ 
ओर ढनकी हरी ज्ञीती द्वो तो उन सब फे निर्वाद्वार्थ शक्ष की झोर से यथायोग्य धन मिला करे परन्तु 
इसकी रही था लड़देः कुकर्मो द्ोशायें दो कुछ भ मिले ऐसी नीति राजा बराबर रफ़्पे ॥ १६ ॥ 
था गसेन सुश्येव राजा फचो च कर्मेणाम्‌ । तथावेत्य नृषो राष्ट्र कल्पयेत्सतत करान्‌ ॥ १ ॥ 
पात्पाभ्ट्पमदन्त्या55घं यारय्योकरोवत्सपदपदाः । दयास्ल्पास्टयों ग्रहववष्या राद्राज्ञान्दिक: कर: ॥ २॥ 
।ड्डिन्धादात्मनो मूल परेषां चानिदृष्णया । उच्छिन्दन्धात्मनों मूलमास्मान सांस पीडयेत्‌ ॥ ३ ॥ 
रिणाोैब मदुआ स्पात्का वीजप महीपतिः | तीचणयैब सुदुब्ेद राजा भवति सम्मतः ॥ ४ ॥ 
पं सई पिधायेदमिति कर्तेव्यमात्मना । युह्षसैयाप्रमत्तथ परिरधेदिमाः प्रजा ॥ १ ॥। 
कोशनतों यस्‍्प रा्रादूम्रियन्ते दस्यामि प्रजा: | सम्परयतः सथृत्यस्प घृवः स मं तु णीयति ॥ ६ ॥ 
डियस्य पंरो घमः प्रभानामेय पालनम । निर्दिष्षछलभोष्टा हि राजा धर्मेण युश्यत |! ७ ॥ 
मनु० [७॥ १२८। १२६ । १३६ । १४०। १४२-१४४ ] 


जैसे राह और कर्मो का कर्सा राजपुरप या प्रशाजन सुसकए फल से युक्त दोबे पैसे दिचार 











ध्दद सत्यार्थप्रकाशः 





फरके राजा तथा राजसभा राज्य में कर स्थापन करे ॥ १॥ जैसे ज्ञॉक बह्चंढ्ा और मैंगर्५ 
भोग्य पदार्थ को भ्द्दण करते दें वैसे शजा प्रजा से थोढ़ा २ धार्षिक कर लेवे ॥ ३॥ श्रतितोम है *” 
या दूसरों के खुस के सूल को उच्दिन्न अर्थात्‌ नष्ट कदापि न करे क्योंकि जो व्यवद्दार झोर 
मूल का छेदन करता दे यद्द अपने [ को ] और उनको पीड़ा ही देता दे ॥ ३॥ जो मद्दीपति_*, 
देख के तीदण और कोमल भी द्वोवे घद् दुष्टों पर तीदण और श्रेष्टों पए कोमल रददने से राग _ 
होता दे ॥४॥ इस प्रकार सब राज्य का प्रवनन्‍्ध करके सदा इसमैंयुक्त ५ ० 
अपनी प्रज्ञा का पालन निरन्तर फरे ॥ ५॥ ज्ञिस भृत्य सद्दित देखते हुए शज्ञा केयन्य , 
लोग रोती बिलाप करती प्रजा के पदार्थ और प्राणों को इसते रद्दते हैं घद्द जातो रत्य ५" 
खतक दे जीता नहीं और मद्दादुःख का पानेवाला दे ॥ ६॥ इसलिये राजाओं फा प्रजापाढन करता 
परमधर्स दे और जो मनुस्म॒ति के सप्तमाध्याय में कर लेना लिखा दे और जैसा समा तिपत $:* 
का भोक्ता राजा धर्म से युक्त दोकर सुख पाता दे इससे विपरीत ढुःस्त को प्राप्त दोता दै॥५। 
उत्पाय पश्चिमे यामे रृतशौयः समाहितः । हताम्रिमराद्म्याँधारच्य प्रविशेत्स शुमां सभा | 
तत्र स्थिताः प्रजा; सर्वो; प्रतिनन्‍्य विस्जयेत्‌ | पिसृज्य च प्रजा: सवा? मन्त्रयेत्मह मलिक! 
गिरिशए समारष् प्रासादं था रहोगतः । अरपये निःशलाके वा मन्त्रयेदविमायित! ॥ »ै | 
यस्य मर्न्ध न जानस्ति समागम्य पृयग्जनाः | स कृत्तनां एयित्रीं झद्के कोशहीनोपि पाक 
मनु० [७। (शत 
ज्ञर पिछली प्रदर राधि रद्द तर उठ शीच भौर सावधान द्वोकर परमेश्वर का 
छार्मिद्र विद्वानों का सरकार और भोशन फरफे मीतर सभा में प्रवेश करे ॥ १॥ यहां करी 
को प्रशाशन उपस्थित दों उनको मान्य दे और उनको छोड़फर मुख्य मन्त्री के साथ ५५ 
का पियार फर॥ २॥ पश्यात्‌ इसके साथ घूमने फो घन्ना ज्ञाय पर्चत की शिखर अथवा पका! 
वा जल जिसमें एच शखाका भी न दो चैसे एफान्त स्थान में वैठफर पिझद भाषता फो पे 
छे साथ वियार करे ॥ ३॥ शिस राजा के गूढ़ विचार को झम्य ज्ञग प्रिलकर नदीं जान सकते 
डिसका दियार गम्मीर शुद्ध परोपकाराद सदा ग॒ग रददे वद्द धनइीन भी राजा सपर पृथियी ४४५ 
मैं समर्थ धोता दे इपतिये अपने मन से पक मी फाम न करे कि अश्तक समासदों फी झत॒मतिर है 
पाममें थेव याने थे सन्धि विग्रतमेत्र थे । काये बीक्‍प प्रयुजीत दैधे संभ्यमेय थे ॥ है || 
मथि तु दिविय विद्याद्ाजा विग्रस्मेय थे । उसे यानासने चैव द्िगरधः संभयः स्मृता ॥ * ॥ 
मप्तातयान इ्ो च्‌ विपगीतस्‍्तगरैव च्‌ | तया त्वायतिमंयृक्तः संधिर्देधो दिलयणः | रे ॥ 
सदयंहृदथ का्ार्थयटाले काल पव वा । मिग्रस्य चैवापफते दिपियों विग्रष स्मृतः ॥ है |! 
६ एश्निग्राल्यदिए दावे थाने यहच्चया । संहवस्प च मिग्रेण दिविर्ध यानघुच्यते ॥ 3 ॥ 
दा्टग्र चैंर इनशो देवर हलेन वा । विशस्य चालुगघन द्िविर्ध स्पृतमासनम ॥ $ ॥| 
द्तक्प स्वादिल्येद म्थिडिः का्यविद्धये । दिवेप कीत्यते 2घ परादगुपय्गुणवेदिति। ॥ ७ ॥ 
ऋर्ष इपदताई च ईडप्रातः से शाहनिः | साथुद्‌ व्यपरेशायय दिविधः सभ्य स्मृतः ॥ ८! 
इद लग ब्छेटाइ स्पाना दिवद घुदमात्मनः: | रदास्पे चारिपद पीड़ी हदा सरर्यि सम्रामयेदु / 





धष्ठसमुद्दासः ] 





दा प्रदृष्ट मन्येत सर्मास्तु प्रकृतीह॑शम । अत्युच्छितं तयात्मान तदा इर्वीत विग्रप्‌ ॥ १० ॥। 
ददा मनन्‍्येत भाषेन हुए पु ये स्वकृम्‌ | परस्प विपरीर्त व दा यायाद्रिपूं प्रति ॥॥ ११ ॥ 
दा हु स्पात्परिषीयों बाहनेन बसेन थ। तदासीव प्रयप्नेन शनरैः साँच्यप्तरीव्‌ ॥ १९॥ 
न्‍न्पेतारिं यदा राजा सर्वया बलपत्रम्‌ । ददा दिधा बल रृत्या साधेत्काय्यमास्मन: ॥ १३ ॥ 
दा परबलानां तु गमनीयतमो मवेत्‌ । ददा तु संथयेद्‌ दिप्ने घार्मिकं बनिन नृपम ॥ १४ ॥ 
नेग्रई प्रकृतीनां व छुर्याधोरिबलस्प चं। उपग्रेयेत ते नित्य सर्वयत्नेंगुड यथा॥ १४ ॥ 
दि तम्रापि संपरयेदोप संथयकारितम । सुयुद्धमेद तत्राईपि निर्विशेकः समाचरेत्‌ ॥ १६ ॥ 
॒ मनु० [७॥ १६१-१७६ ] 
... सब राजादि राजपुराए को यद्द यात छद्य में रखने घोग्य टैडशो (झासमन ) ग्थिर्ता ( दाग ) 
तु से लड़ने के लिये जाना ( सम्धि ) उनसे मेल कर छेमा ( दिप्रद्ट ) दुए्ट शत्रुधों से लद्वाई ब्रा 
प्रंध० ) दो प्रशार की सेना फरवे स्वदिनप कर सेना और ( संथय ) निषकता में दुसरे प्रदत्त बा 
ग आधप लेगा ये छः प्रकार के कर्म ध्रधायोग्प कार्य को पिधार कर इसमें युक्त चरणा घादिय । १ वा 
ञा जो संधि, पिप्रद, यान, झासने, द्रधीमाय भौर संधप दो २ अकार के होते टें इनबो दयावत्‌ 
ने ॥ २॥ (संधि ) शप्तु से मेल अथवा शपसे विपरीशता करे परस्तु दर्भमान झोपर सदिच्यच मै 
रमे के काम बराएर करता ज्ञाप पद दो प्रकार का ग्रेल क्टाता दे ॥३॥ ( दिप्रट ) दाएंसिटि ० 
लेये डचित समय था झजुचित समय में स्वयं किया या मिश्र के झऋपशाध बर्ने याहे हाहु दे: साथ दिरोध 
) भ्रकार से करमा धाहिये॥४॥ (पाग) अषस्मात्‌ कोई कापे प्रात होश हैं एक्ताबत था मच 
: घाप मिल के शचु की भोर जाना यह दो प्रदार का रमन बद्दधाता टै॥2२॥ कद विरी धंचार 
मम से 'क्षीण ध्ोशाय धार्थात्‌ नि्ेल ह्ोशाप अथवा मित्र के रोकते से अपने बएान हैं टेट गइ हा थइ 
ही भषतर का झासम कद्दाता टै ॥ ६॥ फार्यसिश्ि के लिये सेगापति छोर सेशाके हो दिमाग कर. 
बेहप करना दो प्रकार का ऐध फट्टाता टै । ७ ॥| पद किसी झर्ध थी गिर थे लिए रिशपी बलरप्व 
जा था किसी मदार्मा की शरण लेगा शिससे शतु से पीड़ित न शो दो प्रचार का धाभप लेगा कट्टाना 
4 ॥ ८।। जद पद्द जाम ले दिः इस समय युद्ध करने से धोड़ी पीड़ा घर होगी कोर पश्यान्‌ बर»े 
 भ्रपगी धूद्धि भौर पिजशप चयश्प होगी तब शत्रु से सेक्ष बरबः डाथत सप्रप शव धीरज करे ॥ ४ 
व भ्रपती हाप प्रज्ञा या रोेगा झरयरत प्रसध्च डचतिशील झोर शेष शाहे, देसे कप कोर हमे 
भी शत्रु ऐे विभ्रद् ( युद्ध) करतेदे ॥ १० । जश इपने दह हार्थात्‌ रोेसा णो इए छोर पुएच्त बस 
पाप से जाने औौर शत्रु घग दल हपने ऐे विएरीन मिवेल् दोश'दे तब शत्रु बगी छोर शट्ध करके के लिए 
"ये ॥११॥| श३ पेगा दशवादण ते क्षीय दोशप तद शचुों को घीए ६ घएक्ष रे शव रह! शुछूा कपरे 
पान में थेटा रदे ।! १५॥ हुए राश शत्रु को भत्यप्त दखदानू जमे लद ट्विएट छा ६! हच भर ७१ बह! 
7र९% झपना रूप पिस दरें ॥(श॥ जर ऋाप समभ लेदे दिए ऋब शी शइआों «१ शहर" मथ एर होश 
मी छिसी धार्मिद इलदाम्‌ राह बा राधप शीप ले लेदे । १४।! हु प्रश' छोर ६:एएी सेब न्‍ा् दे इक 
ध। मिभ्द्द करे अर्थात्‌ शोरे इसबरो सेदा राद यक्षों से शुर दे सररा मिल्‍्ए शिया कर १-४४ सिमिइ: 
राधव लेवे इस पुरुष दे कर्मों मे दोष देंगे तो घटा +री ऋच्टे प्रदपर घुद्ध से ढो हिएड गोद रे बरे 
| १६ ॥ जो धार्मिक शाक्षा शो इससे श्शिद् बस्ती म करे दिग्जु अछसे सदा मेक रहे आज 
गे चुए प्रदत्त हो इसी दे; शौते दे: लिये प पूल प्रयोग करना इक है ।। 


स्वार्थ पकाशः 





जज अली 











सवोपादेस्दपा इयाप्रीविड्ः पृषिद्रीरतिः | ग्रयास्‍्याभ्यपरिका न स्यु्िशोदामीनशतर ॥ 
क्नि सरेकायादां ददाले व पिचारपेत्‌ | भवीतानों यू सर्वेपों गुगदोपो प्‌ तखझ॥ 
अत गुबदोगसददात्े दिप्रनियप:। भतीते कार्यशेषरः शजुमरिनोमिभूफते॥| 
इईने नानिपदश्युलिधरोदासीनसजत्रः | ठया सर्प संपिदष्यादेष स्ामात्तिशों नए 
_.. मनु० [७॥ ७०७ 
जी जि का शततेबाला पूृथिदीपति राजा जिस प्रकार इसके मित्र डपासीन | मणस । 
अर दिक के हो देसे सा रपये से बसे ॥ १॥ सइ कार्यी का परमाग मैं करेग्य भौर शविधदद 
अगझा चादर झरीौर सो रेकाम फर शुके उन सत के पया्ता से गुण दोपों को पिधाए " 
या बन के विवम्ध भोर गुण की सिपरता से यद्ञ करे जो राजा मविष्यत धर्घाते भागे 
कड़ी $ू हद रत का धत्त वर्तेमात में सुरस्त निशप का कर्ता और किये दवुए कार्यों मै है 
*। %०+- है वह होटुओं से पारित ऋभी वें होता । ३॥ सादे प्रकार से राजपुदव हि 
हर रतन हैसत क्षण कहे (हि जिए प्रकार दाजाति शर्तों के प्रिच उदासीग और शचु को ६ 
काना के अर ने रै३ होइ मै कप के के वशी हा शेष को विगय अर्थात्‌ राजनीति कहती 
कण विष! झुक हु बंपर वे पषानिधि । उपएश्नाएपर गैष भारानू सम्पयिधाय ५ ॥ 
कहा है विप३ अप पर वे बसे प्इुए। गांपरापिफस्पेत यापदारि श॥ी ॥ 
कर हद ब हुई पुकार मे बसप्रधायते थे सो हि ब्सगें ॥ 
रह३ आह हब ते बताओ शहट4 वा | दराइग्कारय था पूच्या था हहदेने वो ।) 
हकक कप-ए३क 7 शिस्कलाऱ बज | वर्षेन भैत ब्यूरेन नीशेश का शाप ॥ 
बह आफफरण पक! मई 2 हु विशाज़।थतण मंगमाशयेत धरा्णी तो कशगेदिगा[ ॥ 
(चत 8 कक ५ पद झा है है शतत ससस्जता। (ह्यान यू थे इशलानभीरनीकारिण। ॥ 
बगक ३६ ३०४क 4 कार विस्तफ पर करत । दच्णा वकए सैजान स्यूरन ूष पोष्‌ ॥ 
कैड न दे क« दुपिटदप नपरिस्नया ।जुनधुल्मातुत बिंदु स्वन्ीती 
४१६६ इह बटय हाख मब्पर वर भेड़ । भेदारितव विजानीयोददीन प्राथयगाएवि ॥ * 
ईीलपय लत | ते डी एकोडपेड जुपस श्वास सर्व गंगा ओोदवम्धना॥ओं 
चलन धहेंड कल कल हक बम जाडनवा | वन्रप्स्दनद 4+ 4 हभी वविशयेचगा ॥ 5 
हेड थे जे हु दे पल अस्योजर्य दिल सुपेन बृजत र्टर्त ब्रयातपूी: बा 
काकध पक दिन डस्पफ्रर ; अत सककनाओसनी बर्ज बुर्ड धशाहवव ॥ है 
अतृन | >य रैदध 2३३ + १३५ ११६॥ ३७४ । २ 


है "जा डफुप के आाद दुद्न ऋ+क कण कज २ड़ ऋपड गराजय की #ख का हैं 
कै के केक यथा 


#ूथा राज अरब मोड धरा, काल कक हरदा ट2 कि यूतरो औहर 
ऊंट के ? ऋर के कजओरट हुए 4०पफू जुूं+५+ के  ऋक दा एन ऋहर दपुधा का आए हैं 
डे क्भ ८५ *झ इकाज 5 बट कमाए पूछ #फफ * खशय : के हरा कैच है सदुक़ क 





/सेर सेता के साथ शा 
हद सता का सुल दूसरी 
होता दि ५ ६) हो णुर्म अर्पात्‌ थ् स्त्म्मों 
कझो८ जितरे मत 


त्ती औओए 
हु जी घाव दोगेचा लक 
! इृशिधित न्वा्मिक लत जी युद छू 
धारक उस धार भर पैसा के सफये ४० ज्ञो थोडे से पुछप 
छ्लेलकर छद्ठापे भोर पढ़े तो उसहों पो हये जप जग हुगे 
कप्ता ऐो तथ ९ ख्ीव्यूष ) अपया धद्षम्यूध ) झैसे दुधाण 
जाये और प्रषिष् मी होते घर्ले दैसे अनेफ घ्यूद अर्पार. 
भुझेडी इह्दूक ) शद्दी दो तो 


ता में प्रविण् 
# ्षेए काट [ ऋप्ता पसे ] युदद क्र 
ने शतप्की (पोए शव गप्ू 
चाछ हप 
घेड्नश' को मारे अथवा चुष्पों कक 


! 
जा 
पे डस्साइ 
दा इसे ध्यूद दिला साई मे 
(दिला करे किंटीक 30207 00 
झोर से पैप् फर रो ओर इस 'द्क्य को, पी थ शत्रु के चारा, हल ओर इस्धः 
ऋर्दे ७ ६६ शत्रु ताखाई के प्रो और खाई दो तोइ फोीई दे, रात्रि 
(चाल) मपदे १ वा करे उप कर उन । 
हैेपे औप को हो ड्सी कसी धार्मि चुप चो शा अं: 
ली 


पक मलिजम कि लत मा 2. आर. उमं:४4:0/3043 0४७३ कण 


डससे लिखा लैवे कि तुमको दमारी आशा के अनुकूल अर्थात्‌ वैसी शुक्र रण विद 


१०० सत्यार्थप्रकाशः 


बढ 


चल के न्याय से प्रज्ञा का पालन करना द्वोगा ऐसे उपदेश करे और ऐसे पुयप उनके पति स्रे 
जिससे पुमः उपद्रव न द्वो और जो द्वाप््ाय डसका सत्कार प्रधान चुरपों केसाधथ _, 
उत्तम पदार्थों के दान से करे और ऐसा न करें कि जिससे उस्तका योगचैम मीन 
बन्‍्दीशुद फरे तो भी उसका सत्कार यथायोग्य रफ्खे जिससे यद्द द्वारने के शोक से रहित दोकर 
में रद्दे ॥ १३ ॥ क्योंकि संसार में दूसरे का पदार्थ प्रहण करना श्रप्रीति और देना प्रीतिका  , 
ओर विशेष करके समय पर डचित क्रिया करना और उस पराजित के मनोबाब्बित ५ '' 
बहुत उत्तम है और कभी उसको चिढ़ावे नहीं न हँसी और [न] ठट्ठा फरे, ने उसके 
घुकको पराजित किया दै ऐसा भी फद्दे, किन्तु आप दमारे भाई हैं इत्यादि मान्य 7 2७५ 


दिरिण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवों न तवैधते । यथा मित्र ध्रुव लब्ध्या कशमप्यायतिवमम ॥ १ 
धर्म थे कृतई च तुश्परक्तिमेष च। अलुरक्क स्थिरारम्म लघुमित्रं मशस्यते !|' । 
पराई छुलीन शरं च दर दातारमेथ च। कतई पृतिमन्तल्च कष्टमाहुर्तर बुधाः॥ रे! 
अआर्य्यता पुरुषश्ानं शोय्य करुणवेदिता । स्थौललर्र्य च सततमुदासीनगुगोदयः ॥| हा 

मनु० [ ७॥ २०८“) 


हु 


म्रित्र का लक्षण यद दे कि राजा छुवण और भूमि की प्राहि लेवैसा नदों .. ५ ५ ' 
प्रेमयुक्त मयिष्यत्‌ की यातों को सोचने ओर कार्य सिद्ध करने वाले समर्थ मित्र अथवा > 
प्राप्त दोके पढ़ाता दे ॥ १॥ धर्म को ज्ञानने भर कृतश् अर्थात्‌ किये हुए उपफार फी सदी 
प्रसक्ष भाव अचुरागी स्थिरास्म्मी कु छोटे भी मित्र को प्राप्त दोफर प्रशंलित दोता दै |. 
इस दात को दृढ़ रफ्ये कि फभी धुद्धिमान्‌, कुलीन, श्र, यीर, चतुर, शाता, किये हुए » 
उवैवान्‌ पुदप को शघु म यनावे क्‍योंकि ज्ञो ऐसे को शघ्रु बनावेगा बद्द दुःख पावेगा ॥ ३ |! 
शक्तद-श्सर्मे प्रशंसित गुणयुछ भच्छे घुरे भनुष्यों फा शान, शरबीरता और फणा भे “* 
अधोद्‌ ऊपर ३ की बातों की निरन्तर खुनाया फरे बद्द उदासीन कट्दाता दै ! ४७॥ ५ । 
दे सरेमिद राजा सह संमन्ठय सन्त्रिमिः | व्यायाम्याप्हुत्य मध्याद्दे मोकतुमस्ताकवर विरेर! 

मनु? [७। श्‌ई 


बृर्षेक भात:काल समय उठ शोचादि सन्ध्योपासन अग्मिद्ोश्न कर था फरो सेब मन 
वियार ऋर समा में झा सद भृत्य और सनाध्यक्तों के साथ मित्र, उनको दवर्पित कर, नाता प्रकी 
स्यूइरिणा अ्थाव, छवायद कर करा, सद थोड़े, हाथी, गाव आदि [ का ] स्थान शत भी 
कोश तथा वेधालय, धन के कोषों को देख सब पर दृष्टि नित्यप्रति देकर ओ कुछ उनमें थोद ६ 
रिकाल ध्यायामशाला में था व्यायाम करके [भरध्याद्ष समय ] भोजन के लिये “अख:पुए 
दक्षी आदि र जिवःसल्थान में प्रवेश करे और भोजन रुपरीक्षित, शुद्धिवक्षपराक्मप्रक, रोग, 
झतेझ प्रचार के अश्व स्यधत पान आदि शुशगिध्रत म्रिशादि अनेक रसयुक्त उत्तम फरे हि 
कद हूुसी शष्टे, इस धच्चार सब गामय के कार्यो की डक्यति किया करे ॥ प्रज्ञा से कर होने को /* 
इस्दायद्वाग आाईपो गडद्ा पशुद्दिएययोः । घास्पानामद्मों माः पष्ठों द्वादश एव मी! 


गु मनु० [७। ४ ३*] 


पष्ठप्मुन्नास- १०१ 





ओो ध्यापार करनेधाले या शिएपी को खुषर्ण भोर घांदी का मितना शाम हो दसमे से पद्चासवा 
ही चावल भादि झप्नों में छूढा, आठपां या वारइयां माय लिया करें, और हो घन लेबे तो भरी इस 
शीर से लेदे कि शिसले किसान आदि थाने पीने और धन से रद्ित द्ोशर दुःख नपायें॥! ॥ 
तक प्रज्ञा के धनादथ झारोग्य छान पाम आदि से सम्पन्न रहने पर राह की धड़ी रच्रति इश्ती दे, 
/ को अपने सम्तान के सदश झुख देवे और पडा अपने पिता सथश राता और राहपुरुषों को हमे | 
६ पाते ठीक दे कि राजाों के राह किसान भादि परिश्रम करने धाले हैं और राह उनबा रक्चक दे 
, हज में दो हो राजा किसका और राजा म हो तो प्रका किसकी वाद्ावे | दोगों अपने अपने छाम में 
तात्र और मिल्ले दृए प्रीतियुक्त काम में परतम्त्र रहें। प्रजा की साधारण सम्मति के विग्य राजा दा 
पुर मे हों, राजा की झाशा के विष्य राजपुयप या प्रशा म चले । यह शजशा बता राहट्रीयप गिल काम 
प्रति विवको “पोलिटिकल" कइते टें संध्प से कट दिपा, धर भो पिशेष दैंपना बाद बट दारों लेद 
बस्म्र्ति शुद्रनीति महाभारतादि में देख ऋर निध्यप फरे झोर जो घा का स्पाय कर भा टे यट प्यश्टार झनु 
८वि के अष्टम भौर सषमाष्याप थादि करी रीति से करना घादिये, परस्तु यदाँ मी हैत्ेतेप से शिकते है.-- 
तय देशच्टैत शाप्रच्टअ हेवुनि! । भ्रष्टादशसु मार्गेप निषद्धानि प्रृथई प्थर ॥ १॥ 
तैपमाधएइणादान निधेपोइ्थामिविकपः । संभूय थे सद्यत्याने दत्तस्पानव्त्म थे ।! २ ॥ 
/ँिनस्पैय चादान संविदश ब्यतिक्रमः। फ्रथविकय नुशयों वियादा। स्यामिषालपोः ॥ है ॥ 
पीमारियादधमश पारुष्पे दए्डयाथिके | स्वेएं घ साहम सेव श्ीसट्प्रणमेष थ ॥ ४ ॥ 
प्रीपपर्मों विभागरव धृतमाद्यय एप च। परदास्यशदशेतानि प्यवद्ररयहामिह॥ ४ ॥ 
के पिएं ई 6 हि: 8० # 
एपू स्पानेपु भूपिष्ठ प्रिपाद चरता शणाय्‌ । धर्म शासवमाधिस्य इयिवदिनिर्ट एम ॥ 
“धर्मों विद्वस्त्वपर्मेण समा यप्रोपतिष्ठने | शर्पं चास्प में कुन्तर्ति रिद्धास्तत्र सेभावद३ ॥। 
'प््मा था ने प्रवेष्टस्पं वक़प्पं पाप्तमजसध्‌ । झटुयस्विप्मुपस्पानि मरो भवन हिल्थि्ी ॥ 
(पत्र धर्मो धर्षेण सत्य यत्राउतेन च। इस्पते प्रेषमाणाना एताएवग्र समापहा॥ ६ | 
धर्म एय इतो हग्ति धर्मो रचति रतितः । तसमाद्धमों ने ह्तस्पों मा ना धर्मों हहीःएधी३ ॥ १६ ॥ 
(पूपों हि मगपान्‌ पर्मेएस्प य। इरते धलम्‌ | पूपल॑ हैं रिदृदेषाततामादमें न छोषपेह ॥ ११ ॥ 
एक एप सुरद्धतं निधनेप्पनुपाति यः। शर्रीरंण रामझाश सदमम्पदि एष्छति॥ १६॥ 
पादों धर्मप्प कार पादः साविशएप्थति । पद समासदः सबीन पायो राजानए धुत ॥ १३ ॥ 
/रामा मदस्पनेनास्तु छृप्पस्ते च समासद।। एनो पष्डाति कत्तार निरदाएँ यत्र निन्‍दह ॥ ६४ ॥ 
मु मगु* [ + ॥ १-८ । १९-१६ ) 
हि सत्ता रश और गाजपुएद दाद रोग देशाबार झोर शार्श्यदरार ऐटओोंस हिप्टाक कप 
“शाप विदाद्रपद मार्गों ये विदादपुकः कामों क! नि्देप धतिदिक दिया बरे को झा न्एम ही) व े 
(पे और इस रे होने बी झऋारश्पकाता शागे तो कत्तपोत्तम मिपम दाछे दि किससे बाश छ.प इक छत 
"पति हो ॥ १8) अद्ारद मा पे थे इसे ले १-( आदाइान ) दिसो से ऋर हेहे हैंड ब। दिशाद । 
/ - (नित्तु३) पराषट झर्थाद्‌ किसी के बिश्री के एस पदुर्थ धरा हो कपोर सारे दर कदर ) ६ ० (४३६४६ 
तविशय ) दूसरे के पदार्थ को दूसरा देख एऐऐे। ४-( होदुप ख सपमुशयानत्‌ ) मलिक लिक्ा के दिलते 
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११ रतन है धर कभी बचाकत टिक कर # बैंची कल [कर कह करे के पन्भद हल 
दम दरशाहर किक है रैक ६ क३, किल्नु बल इंकार आन्‍्पे कै हलक हालत मूह दूत ₹ 
दिपपधूरिषतरतटदा पर्षवर मे हपेर)। दकक फिई पूरे बलक हधाहकावतियरए ३ ? 
प्रमढ थे हझके वे हराहॉनिेत च। अनाज शिव #हम आपुीन बकरग) ।! * 
मय इससे शो बच दाहगरेर क। इन बृलिकराओ कश्पादृ्दी बृषण ! ३ 
4 ७ के जआ बढ बे ६, ५ 
भागा पुलाइन शोष्य प्शवद्िक। ध्यनिननन थे बजगगुदशी वहुतो दवा ॥ ४ 
हु [ 4॥ १०८4-३६ 
्ि ँ ५ हर 
पद का शव पद दे दि? गता धुत और मृधा ही कर से वैन! कदर बदूता कि ने! 
मरेमपुप्ट मविष्यण्‌  दःतों को शोर कफ काने दथक कहे घाले शमच 4 अथवा दुवण हि 
भाग हद दाता टै ॥? ॥ चर्म को ऋरके ४१ डतश अधोद डिक हु हयकार को हाय मा 
प्रषध्न लपार घगुरंगी विवश छूटे थी (च का कान कपर वरशविलत होता है । 
इस ढात को हए सफर हि कथी बुदध्धियाग, कृशन, घर, दौर, चतुर, इतता, दि (० को शगसे। 
पैपंवानु पुरुष को शत न दगाओे क्योडि हे! क्षय शो शरर्‌ बहावेगा दह दु'ख वखगा ॥ 3॥ शी४ 
शत्तप- जिसे प्रशंतित गरलपुक्त अध्ये ६? मनुणां का झाक, शुश्दीरता और कडागा में हे 
अरपोत्‌ ऊपर ९ को बातों को निफ्लए छुकग हर बद इवाधौग दाना दे ॥ ४५ 
एवं सेम्िद राजा सह समय मखियिः । स्यापास्पाध्तुस्य मध्याद्ध मीस्तुमलतणुर गिगिर | 
म्गु ० || ७। २१३. 


पूरे प्रातःकाल सम्रप डद शोथादि सरप्योपासन अगप्निदोत् कल वा करा सा मरा 
वियार फर समा में ज्ञ सव मृत्य शोर सेनाच्यों दे साथ प्रिक्र, इगको इर्यित कर, ताहा पका 
ध्यूदशित्षा अर्थोद्‌ हयापद्‌ कर करा, सर थोड़े, हाथी, गाप आदि [दा ] स्थान शात्र भर भरे 
फोश तथा वैधालय, घन के कोषों को देख सद पर दृष्टि क्रिदश्रति देकर जो कुछ उनमे छोट हों २ 

फ पा व्यायाम करके समय ] मोजन के लिये “अन्तापुए भ 
पल झादि के नियासस्थान में पेश करे और मोहन छुपरीक्षित, बुद्धिरलपराक्रमबर्दक, रोगबिर 
अनेफ प्रकार के अन्न स्यथन प्रात झरि सुरन्धित प्रिशदि झनेझ रसयुक्त उत्तम करें दि 
सदा छुछी रदे, इस मकार सपर राज्य के कार्यों की उच्मति किया करे ॥ प्रजा से कर लेने का प्रका 

परब्चाशन्नाग आदेयो राजा प्रशाहिरएययोः ) पान्यानामश्मो भाग३ पष्ठो द्वादइश एवं वा 


* मनु० [ ७छ]। १३० ) 


कन्‍्लरे 4७ रूस काम सम झँे के ही. । 


पष्ठेसमुज्ञास: १०१ 
धर जो व्यापार करनेधाले था शिल्पी को खुबर्ण और चांदी का मितना छाम हो उसमे से पचासपों 
* घाश्त आदि झर्चों में छृठा, झाठपां था धारदयां माय लिया करे, भौर हो घन लेने तो मी इस 
पमकार से छेवे कि जिससे किसान आदि झाने पीने और धन से रहित द्ोफर दुघ म पायें ॥ १ ॥ 
।हपोकि मजा के धनादथ भारोग्य खान पान आदि से सम्पन्न रहने पर राजा की पढ़ी उच्कति इंती है, 
' ॥ . सन्तान के सदश सुख देवे और भजा अपने पिता सदश राजा और राजपुरुषों को जाते । 
(सह षात ठीक दे कि राजाओं के राश किसान आदि परिधम करने घाले हैं और शाजा बनता रक्षक दि 
,.। ने द्दोयों राजा किसका और राजा न हो तो पता किसकी कड्ावे ? दोगों आपने अपने काम में 
पितन्ध्र और मिले हुए प्रीतियुक्त काम में परतम्त्र रहें। प्रज्ञा की साधारए सम्मति के वितद्ध गा था 
,परपुरुष न हों, राजा की आशय के विरुद्ध राजपुयप था प्रजा न चले। यह राज्ञा का राजकीय निश चाम 
अर्थात्‌ अिवको “पोलिटिकल” कहते हैं संच्तेप से कद्द दिया, भथ ज्ञो विशेष (ना घादे यद घारों खेद 
मंजुम्मति शुकनीति मद्दाभारतादि में देखऋर निश्चय करे और जो भज्ञा का स्याय कर मा दे यह प्यपधार भजु- 
स्टृति के अष्टम ओर मदमाध्याप थादि की रीति से करना घाहिये, परस्तु यहाँ भी संक्षेप से छिसते है;-- 
प्रत्यं देशस्ट्रेथ शास्रस्टेथ हेवुमिः । अथ्टादशसु मार्गेप निवद्वानि प्रथश एप ॥ है ॥ 
वैषमायएणादान निदेपोइस्थामिदिक्रप: | संभूय थे समुत्यानं दर्तस्पानपकु्म थ॥ रै ॥| 
पेतनस्पैष चादानं संविदश ब्यतिक्रमः | फ्रयविक्रय लुशयो विवाद! स्थामिपालयो। ॥ ३ ॥ 
सीमावियादधर्मथ पारुष्ये दए्डबाचिके। स्वेपं घ साइम॑ चैए स्रीमद्पगमेत थे ॥ ४ ॥ 
स्ीपृपरमों दिभागश्व चुतमाह्यय एप थ। पदान्यशदशैदाने प्यवहार्यितायि्र ॥ ४ ॥ 
एपृ स्थानेपु भूपि्ठ॑ विधाद चरवा इशाम्‌ | घमें शासतमाश्रिन्य इपत्कायेविनिर्ण एम ॥ ६ ॥ 
धर्मों विद्वस्वधर्मेश समा यप्रोपतिष्ठने | श॒र्पं चास्‍्प न कृम्दम्ति विद्वास्सत्र समामदश॥ी ७ ॥ 
सभा या ने प्रवेष्टध्यं बकृब्यं यासमजसम । भद्दुवशिधुरन्यापि नरो मएति विल्यिष्री ॥ ८ ॥| 
यप्र धर्मो ध्रर्षण सस्पे यपत्रादतेन च। हन्पते प्रेत्षमाणानां इतास्तप्र समासद३॥ ६ ॥ 
घम एव इतो हम्ति धर्मो रतति रदित) । तस्माद्धमों न इन्तस्पो मा ना घर्मो हतोठयपीद ॥ १०॥ 
वृषों है मगयान्‌ धर्मैस्‍्तस्प थे इुरुते धलम्‌ । पृपल॑ ते दिदुर्देशाप्तप्माद मं न लोपयंद्‌ ॥ ११ ॥ 
एक एय मुहृद्वपो निभ्ननेप्पलपाति यः॥ शरोरंण समझाश सपमन्पद्धि गर्धति॥ १९॥ 
पादो घमस्प कर्तीर पादः साविणप्रष्धति । पाद। समामदः सर्वान्‌ पारो राजानएष्छति ॥ १३॥ 
राजा मदस्पनेनारतु मुच्यस्ते व समासद। | एनो गरडाते कर्तोर निम्दाहं पत्र जिग्दवे ॥ १४ ॥ 
मञु" [ ८ ॥ ३-८१ १२-१६ ) 
सभा शह्य भोर राफपुरुप सब छोग देशायार और शाक्मम्पद वार धेवधो ते डिप्लि हैं] 
अठाएद पिवाद्ाध्पद मार्गों मे विदादयुक्त कर्मों का गिणेय प्रतिदिन किया बरें कोर को < शिपम शाहरीद: न 
पायें और इसके होने की आवश्यकता जानें तो उत्तमोत्तम विफम दांधें कि शिसले गाड़र झपरेर डा बरी 
इचति दो ७६७ अदाएद मार्ग थे दे डययें से १--( ऋझादान ) जियो से ऋण है देशे दा दिए । 
२-( निशेद ) घरावट अर्थात्‌ विसी ने किसी हैः एस पदार्थ धरा हो हरोर मांग पर म रेरा4३- ( अल्या- 
मिविक्प ) दूसरे के पदार्प को दूसरा देय लेवे। ४-- संभूप थ समुः्यमम ) लत क्रिश्षा वे. विश्ते 


घ दि 
रे न 











१०२ सत्यार्थप्रकाशः 





पर अत्याचार करना। ५- द्तस्पानपकम्मं थे ) दिये हुए पदाथे का से देगा ॥ है ॥ ६- पेप्सी 
दानम्‌ ) वेतन अर्थात्‌ किसी की “नीकरी” में से ले लेना था कम देता अधया म देता। ७ हक 
प्रतिया से विरुद्ध वत्तेना। ८ क्रयविकपालुशय ) अर्थात्‌ खेन देन में कगड़ा डोतना। धन्‍्यह्ष 
ओर पाचनेयाले का झगड़ा ॥ ३॥ १०-सीमा का विधाद। ११-किसी को कठोर दया देना। १२ 
बारी का घोलतना | १३-थोरी डांका मारना । १४-किसी फाम को बलात्कार से करता। रै२० 
सपी था पुरुष का स्यमिचार होना ॥ ४ ॥ १६-स््री भौर पुरुष फे धर्म में ब्यतिकम होना। रैक रिफ 
अ्ाय्‌ दाएमाग में बाद उठना। शैष्न्चूत अर्थात्‌ जअहपदार्थ और समाह्ठय अर्थात्‌ घेवन को अर 
श डे सुझा रेलना। ये झटारद प्रकार के परस्पर विश्य व्यवरद्ार के स्थान हु॥र॥ इन सर 
में बहुलसे विद्ाद करनेयाले पुराणों के स्थाय को समातनधम के आधय करके किया करें शेप 
किसी का पद्चरात कमी मे करे॥ ६॥ जिस समा में अधर्म से घायल द्वोकर धर्म उपशित हो पे 
डसका शस्प अर्धाद्‌ सीरपस्‌ धर्म के कलंक को निकालना और भधर्म का ऐेदग मद्दों करते भी 
झसे मन अधर्मी को दएइ मद मिलता उस समा में जितने समासद्‌ हैँ ये सपइ घापत के समान हक 
शे हिं। 3 ॥ धार्मिक मनुष्य को पोरप दे कि सभा में कभी प्रवेश स करे भर शो मरेश डिए 
सादर दी बोे, हे कोई समा में भ्रस्याप दोते हुए को देखकर मौन रदे भधवा सर्प हाए हरे 
इक बह 2इारारी इोगा दै।८॥ जिप साथा में अधमे से धर्म, अरास्य रोसात्य सश समा 
केक हुए महा शारा है. रस समा मैं सब खुतक के समास दें. जानो उतमें फोई भी गईं भीता ॥ ९ 
केश हुएए चामे हारमेदाने का मारा और रदित किया हुआ धर्म रदाक की रद्या करता है, इसके 
इ)ह₹४ छ ८ ४ छ रजः हरा डर हों दि मारा हुथा धरम कभी इमकों समार डाहो ॥ ६० ॥ 
३७७ है ३५ अप गुर को दवा करनेवाला धर्म दि उस्तहा लोप करता दै झसी को प्रियायं क्यो 
इष्टाबू टू अप अप्च हःर * हैं, दगलिय किसी म्रगुष्य को धर्म का लोप ऋरगा डयित गई ॥ (१४ 
ही प/ऋू+ है रु चर्7े है) शुरद दे मो गुरु के पशचाल्‌ मी साथ चलता है ओर साप पदार्थ पा 
हज के कण के बाप ही बका को मा होते दें अर्थात सब का संग घृट जाता है ॥ १२३ पएग 
औतकाए झती पुर हू टकर्य हब राजसमा मैं पद्चयात हो अ्रस्याय किया शाता दे पदों भधाई है 
पैआक हैं: क मे है. फढदे से बच अचर्म है कर्चा, दूसगा साक्षी, तीसरा शमाधतों भीर गोवा | 
औफमी आरा के स्टथावति हज को शत दोता ह॥ १३॥ जिस हाथा मै सिखा के बोर कौ हि 
१८ के दोडर डे कर टह, बहड़ है धफ्य को दगद और प्रास्य के पोर्प का मात्यदोवाड़े वा ॥8॥ 
हज #_|४ड आ 4 पल हक कुष्च के बदन छह पक इहाते ६, चाप दे कर्ता ही को पा प्रात होता है ॥4४ 
९ $ #०% मे | ४ का इ रन 

५ आह: रद इंटर इहयी:; इन्तेतु स्टदियः । मर्बधवविदो:लुस्पा रिफ्रोलोस्तु बेन 
हय आहई किए इ 7 हाव मद झा देजाड। शूट्राब सरल शूद्राथामसथानागसप पौनया 
अपर ई हरेर सेप्टददइदेनु थ। जऱदबदणोश्न गाछ्ये में पीचेत गादिंग॥ शा 

ई॥ कणप:। समपू है गुबस्डइल गूटदयें दिनोन'न॥ ४ 

+ झषड कई डिव्यति । हब मर््य अप्याबी घमे्यों मदीवो कर! 

कई हर इक इपदायानयाद 2 ऋदादनम्ककसति पेर्य इर्गोद. हित ह! ३३४ 


णड ् कह | हू] 
बड़ अत एईु हुटृसाय डध असजड खक्यू $ बजा पदस्थ दिदृदूधवरधि 28 6 824 










५9%] 
हे 





कपाइमशार 


इहसमुप्तासः १७०३ 





हैमान्दश्यादिणः प्रापरानर्पिप्रत्यर्थयप्तियौ। प्राइवियाक्रोब्लुयुष्जीत विधिनाओ्नेन सान््वपत्‌ ॥ ८॥| 
हद दपोस्नपोदेन्ध फार्मे$स्मिय चरे्टित प्रिय: । सदू परत सर्य स्पेन युप्माऊं प्रत्र सालिता ॥ ६॥ 
रत्ये मादये हसन्सापी लोरानाप्नोति पुफलान । $६ घालुत्तमां कीर्चि बागेपा प्रक्षपूनिता ॥१०॥ 
सम्पेन पूपते साद्ी घ्मेः सस्पेन यर्द्त । तस्मास्मत्यं हि पक्तम्य सर्वेर्गेष्र साक्षिमि! ॥११॥ 
आहतौय धात्मनः साधी गतिरात्मा मथात्मन३ । नावमेस्पा: रम्मास्मान उगां सादिणयुत्तमम्‌ ॥१२॥ 
पम्प दिएान हि पदुत; सेघरझ़ा मामिशइले | तस्माप्न देवाः थ्रेयाम लोके3स्यं पुरुष दिंदुए ॥१३॥ 
' ७ २७०५ 4. “न यरदे बस्याण मन्पसे । नित्य स्थिरस्ते हृधेप+ पुएयपापाणिता पुनि। ॥१४॥ 
। मनु० [८॥ ६३ । ६५। ७२-७५- ७८-८१ | ८२ । ८४ । ६६ । ६१] 
सदए दर्णों & धामिक, विद्वान, निष्कपटी, सद प्रकार धर्म को शाननेदाले, लोभरदित सस्य* 
दादी को स्यापम्पवस्धा में साक्ती करे, इससे दिपरीतों को कमी  करे॥ १॥ रि्रियों की साक्षी परी, 
. के द्वित, शर्तों थे श्र ओर अम्त्पजों पे: झन्‍्त्यज साएी द्वों॥ २॥ जितने पल्तात्कार काप्त चोरी, 
प्पभियार, पठोर घचन, दएडमिपात रूए अपराध दें उनमें साक्षी की परोच्ता भ करे ओर झत्पायश्यक् 
भी समके क्योकि ये काम सए गुम होते हैं 2 ३॥ दोनों भोर के साप्तियों में से पहुफ्ताशुसार, तुत्य 
साकिषों में रक्तम एुएी पुयप की स्राण्ती पे भगुफुलः झोर दोनों फे साक्षी उत्तम गुणी भर तुल्य दो तो 
डिशोशम भर्पात्‌ आदि महरयि चर पतियों की साप्ती फे अनुसार स्याप करे॥ ४॥ दो प्रकार के साक्षी 
ऐोना सिद्ध होता है एक सापात्‌ दैशने भर दूसरा खुनने;छे, जर सभा में पूछें तय शो सास सत्य योलें 
थे धर्मपरीम भौर दण्ड के योग्प म द्ोवें और जो साक्षी मिथ्या पो्े वे वधापोग्य दए्डनीपए दो॥ ५॥ जो 
राज्समा दा किसी उत्तम पुरुषों की सभा में साथी रैपने भोर सुनने से विद पोले तो वह ( भवाद- 
नरक ) अर्थात्‌ जि्टा के देदन से दु रूप भरक को धर्समान समय में प्राप्त होवे भोए मरें पश्वात्‌ खुल 
से ट्टीत होशाप ॥ ६॥ साछी के इस घबन को मानभा कि जो स्पमाव डी से प्ययष्गाए सम्पन्धी धोल्े, 
शोर इससे प्रिप्न सियाये हुए शो २ पचन बोले उस २ को म्पायाधीश व्यर्थ समझे ॥७॥ ज्प अर्थी 
( थादी ) झौर प्रशयर्थी ( प्रतिधादी ) पे सामने समा के समीप प्राप्त ुए साप्तियों को शान्तिपूर्षक 
न्यायाधीश भोर भाइविधाद अथोंत्‌ वफील दा गैरिस्टर इस प्रशार से पूछे ॥ ८॥ दे सादि छोगो 
एस काय॑ में इन दोनों के परस्पर करम्मो में जो तुम जानते दो उसको सत्य थे; साथ पोलो, क्‍योंकि 
ज*«४४। इस काये में.राक्ती दि ॥ ६ ॥ ज्ञो सापी सत्य योलता दे चद्द जन्मास्तर में उत्तम जन्म ओर उत्तम 
छोकास्वरों में कम को प्राप्त दोके छुख भोगता दि, इस हन्म पा परकन्म में उसम कीर्ति को प्राप्त होता दे 
फ्योंकि ज्ञो पह याएं) दै एश्टी केशें 9 सरकार और तिरस्करार का कारण लिखी है। जो सत्य पोलता दे 
पद परतिष्ठि भौए मिच्यायादी मिम्दिल दोता दे ॥ १० ॥ सरप बोलने से साक्षी पवित्र दोता और सत्य दी 
पोलने से धम्म पढ़ता दि इससे सर वर्ण में सालियों को सत्य डी बोलना पोग्य दे ॥११॥ झआर्मा का साछी 
चारमा झोर आत्मा की गति झाव्मा ै इसको झान के है पुरुष | छू सड मलुष्यों का उत्तम साप्ती अपने 
का अपमान घन कर अर्पोल्‌ सत्य माप जो कि तेरे भारमा मन याणी में दि यद सत्य ओर जो इससे 
विपरीद दि बद्द मिव्याघाषण दि॥ १९॥ जिस दोलते हुए पुयप का विदान चेश्श अर्धाद्‌ शरीर का 
झानने दारा चात्पा भीठर शद्दा को प्रास मर्दों दवीता उससे भिन्न विद्वान. छोग किसी को उत्तम पुरुष 
नहीं जानते ॥ १३॥ दे कल्याण की इच्दा फरनेद्ारे पुदप | जो यू “मैं अकेला द” ऐसा अपने चांप्मा में 
जानकर मिश्यां बोलता है सो ठीक नहीं है किन्तु शो दूसरा तेरे हृदप में अम्तर्यामोरूप से परमेन्दर चुणय 
पाए का देख्तेदाला मुनि स्थित दे उस परमात्मा से डरकर सदा सत्य बोला कर ॥! १४ ॥ हा 





ली 
रे 





१०४ स्वार्थ बकागः 


लोगान्मोहारूयासीव्रात्कामाक्तोघानयेय थे । अज्ञानाद ब्रालमावाग साह्य खिय्स्यी ॥। 
एपामस्यतमे स्थाने यः साक््यमन्रत बदेव । तस्य दणडविशेषपाग्सु प्रवक्याम्पतुत्यरी र्‌, 
लोभात्सहसदणउ्यस्तु मोहान्यूस्तु साहसम्‌ । मयाद्‌ द्वी मध्यमी दण्डयी मत्स्य चतुर्गुगर ॥ रे 
फामाइशगुर्ण पूर्व धार त्रिगुर्ण परम्‌ | भद्गनाद दे शने पूर्ण ब्रानिरपासद्नमेत्र मु 
उपम्थम्रुदर निह्ठा हस्तो पादी च पच्चमम्‌ | चतुनामा थे कर्ता च ध्न' देहलवे वे 
अलुपनधे परिशय द्वेशझ्ाली च तक््यतः | साराउपराघी चालोकय दयई दण्ड पातयेव्‌ ॥ 5 
अधर्मदणडन लोक यशोरं फीर्िनाशनम्‌_। अस्वर्मभच परव्रापि तस्मातापसिनेयेत्‌ | 
अदण्डथाम्दएडयन्‌ राजा दण्डबांगरैदाप्यदरडयन। अपशो महददाप्ताति नरहवबैर गच्छति ॥ 
पारदणड प्रथम कुयोद्विग्दएड तदनन्तरम्‌ | दतीय॑ घनदणड तु पथदृण्डमतः परम 
मनु" [८ ॥ ११८-१२१ । १९४+-१९६ ] 


जो लोभ, मोह, भय, मित्रता, काम, क्रोध, अशान और वालकपन से साज्ञी दे। 
मिथ्या समझी जाये ॥ १॥ इनमें से किसी स्थान में सादाँ भूठ बोले उसकी धद्यमाण अनेशदिय ५ 
दिया करे ॥ २॥ जो लोभ से भूड़ी सात्ती देवे तो उससे १५॥०) ( परदुद रुपये दश झते ) देर 
जो मोद्द से भूटी साक्षी देवे उससे ३०) / तीन रुपये दो आने ) दएड लेके, शो मय से मिप्या # 
देवे उससे ६)) | सवा थः रुपये ) दएड लेवे और जो पुरुष मित्रता से झूठी साक्षी देये उनमे + 
( साढ़े थरद रुपये ) दरड लेबे ॥ ३ ॥ जो पुरुष कामना से मिध्या साक्षी देवे उससे २४) ( पच्ीतर 
दणड लेबे, जो पुरुण क्रोध से भूठी सात्ती देवे उससे ४६॥८) ( छुपालीस रुपये चोदइ झा | 
लेबे, जो पुरुष श्रद्ानता से भूदी साज्ञी देवे उससे ६) ( छः रुपये ) दंड लेबे और जो वालकार 
म्रिथ्या साक्षी देवे तो उससे १॥०) ( एक रुपया नो आने ) दण्ड लेवे ॥४॥ दएड फे उसे 
डदुर, जिद्ा, हाथ पग, आंख, नाक, कान, धन और देह ये दशा स्थान हैं कि जित पर वर्ष ॥ 
ज्ञाता है ॥ ५॥ परन्तु जो २ दएड लिखा दे और लिखेंगे जैसे लोग से साक्षी दैने में परदई 
आने दगड लिश्ा दे परन्तु जो अस्यन्त निर्धव दो तो उससे कम और धनादय द्वो तो उससे दूत, 
और चोगुना तक भी ले लेबे अर्थात्‌ जैसा देश. जैस्श काल और पुरुष द्वो उसका जैसा अपराध हा 
दी दएड करे ॥६॥ क्योंकि इस संधार में जो अधर्म से दएड करना दे यह पूर्व प्रतिष्ठा यर्तमार झोर ' 
च्यत्‌ में भोर परजन्म में दोने बाली कीर्ति का नांश करनेदारा दै भर परजत्म में सी दुःखदायक 7 
इसलिये अधर्मयुक्त दंड किसी पर न करे ॥आ जो राज्ञा दंडनीपों को न दएड शौर अदणडनीयों री) 
देता दे अर्थात्‌ दृंड देने योग्य को छोड़ देवा भोर जिसको दएड देना न चाहिये उधक्ों दंइ दा 
पद का पक निन्‍्द्मा को और मरे पीछे बड़े दुख को पघराप्त दोता है इसलिये शो अपराध करे 
सदा दंड देवे चर अनपराधी को दशड कभी न देये  ८॥ प्रथम याणी का दर॒ड अर्थात्‌ उस्तकी, रे 
दूसरा "घिऋ" दयड श्र्थाव्‌ तुभको घिकार है तुने ऐसा घुरा काम क्‍यों किया, तीक्षरा इससे 
लेगा और चोधा “वध” दएड थर्थात्‌ उसको फोड़ा वा बेंत से मारना या शिर काट देना ॥ £ ॥ 
येन येन ययाज्ञेन स्वेनो द्रपु विचेश्ते । दत्तदेव हरेदस्य अ्रत्यादेशाय पार्यिता ॥ ' 
विवाचाय्य: सुदन्म/वा मुर्य्या धुतरः पुरोहित: । नादगब्यो नाम रागोडस्वि यः स्वघर्मे न तिष्ठति ॥ " 
कार्पोतर्ण मवेरेए्यों यत्रान्य: श्राइदो जनः ) तम्र राजा मवेइएड्यः सहस्रमिति धारणा ॥ * 





वहमातुश्यातः श्ष्ड 


किक पर म 


(22% 5. 80 2 0 ऐड 
हप्रशाशपन्द शहर क्षय मपति शिन्विपण ३ पोडरीय मे दैश्यस्प दर्िशर्य, सत्रियस्प ये ॥ ४ ॥|] 
कप ५ 


न्शश्यस बल पथ पति या था चतुः किले सा ॥ २ | 
प्णन् इपानपामि्रपप पशभाय शधाधपणध्पप्म नोफेदेव पणर्भाप राजा साइसिक: नरम ॥ ९ ।) 
>बग्दूषापस्परापे गगैप दुपडनेत च हिमत) साप्सध्य नर कली विशिया वापकतणा | ७ 


>साएवे पर्णमातस्व हि. पार्यिप:) से पिनाश पनत्पाश दद्वेप॑ घाधिगस्ति ॥ ८ ॥| 
नन मिश्रशरगादरा पिपुलादा चना ॥ सघत्मृगंद पाएमिफान्सपभतमणा ॥६७0 
>शुरे पा पालपृदी था ४ छ। पदुएुत्म आवतापिनमायास्ते इस्पादेवा देचारपन ४६९) 
>नाहवापिद्ध दोपो एस क्श्च (| न्पन्पुए+छति 0११) 
(परप स्तेनः पूरे नास्ति नास्यणीगों ने दुष्गा न साइसिपदण्डरी स राजा शब्लोफमी श्र 
भतु” [८ इ३३४-रेरे८ । ३४४-३ै४७ । ३४० । रे१र ॥ ३८६ ) 


रे ओर शित प्रशाः फ़स रे अप के मल॒प्यों मे विधा छा करता 

"झरगुप्यों भी शिषा के लिये राजा धग्ण अधीत छेएल करदे0 १ घाह्े पिता+ आचाये, 
और दुरोदित करों रू पो को, स्व में स्थि। दी रदता पद राम दुएदय न! 

$ शाह स्यापासन_ पर छठ स्पाय करे. ती। (किसी का पदापात जल 

ई किस अपराध खाधाप्ण ९ दर घ दैला दयद इसी अपर मै शा फो सास दण्ड 
4 होदे अर्पो, साधाप्य मझुष्य से राजा दो; सदस्य गुणा दण्ड घोनां ल्यादिये, मस््री 

॥ दीवार को धादसों ग्रुप ५, उससे म्यून चते सातधों पा ओर उसके मी स्यून फो 


सदन करता प्र 

(हर) पुष्कल घने बी प्रातिसे भी शक सब भा दुआ देते यह 

दष्धद छेंदल किये सिका कभी घोर | शव 

चादे प्रष्षण भर चादे पदेत शा्ों का धोता क्यो नदी धमकी घोर 

को विना अपराध मारते वाले दें इसको पिना पिया रे डालता भथ (रजे: पश्या्, विधा 
चर्ददव ॥६०॥ दु० द॑ के मापने में इर्ती को पाप नहीं ऐोता यदि प्रतिझ मा ५ चादे 


भ्् 





१०६ सत्यार्थप्रकाशः 


कोघी को फ्रोध से मारना ज्ञानो फ्रोध से क्रोध की लड़ाई दि ॥ ११॥ जिस राजा के र्यर र 
न परस््रीगामी, न दुष्ट यंचत को योलनेड्वारा, न साइसिक डाकू और न दृएडमझ अर्थाद्‌ राज 
का भक्ग करने बाला दे यद्द राजा अंतीय थेष्ठ है ॥ १२ ॥ 
भत्तार लंधयरेया स्री खज्ञातिगुणदर्पिता ! तां श्राम्रिः खादयरेद्राजा तेस्थाने बहुसंस्थिते ॥ ! है 
पुर्मा्त दाहयेत्पाप॑ शयने तप्त आयसे। श्रभ्यादश्युश्च क्राष्टानि तब्र दह्षेत पापकृद [| ९) 
दीर्पाध जप] 5 है 8, 
'बनि ययादेश ययाकालड्डूरो भवेत्‌ । नदीवीरेषु तद्रि्यासयम॒द्रे नास्ति लकषयम्‌ || 
अहन्यहन्यपेतेत कर्मास्तान्याइनानि च। आयव्ययो च॑ नियताबाकगत्कोप्रेव च॥ 
निधि पथ तोक्ष रिल्थिएं प्राप्नोति $ | 
एवं स्वोनिमान्राना व्यवहरा्समापयन्‌ । व्यपोक्ष डिल्थिएं सर्व प्राप्ति परमां गतिए ॥ 
मन्ु० [ 5॥ ३७१-३७२ | ४०६ । ४१६ | १९० ] हे 
बर जो ख्री अपनी ज्ञाति गुण के घमएड से पति को दोड़ व्यभियार करे उसको बहुत हो 
धुदपों के सामने जीती हुई कुत्तों से राज्ञा फटया फर मरा डाले! १॥ उसी प्रकार 5 
को छोड़ के परणी या पेश्यागमन करे उस पापी को छोदे के पलक को अप सेतपा के हा 
उस पर सुल्ता ऐे जीते को बहुत पुरुषों के सम्मुस्र भस्म कर देवे ॥ ६॥ ( प्रश्ष) जो यहा हक 
अथपा सगयाधीश था उसकी स्त्री व्यभिखारादि कुकर्म करे तो उसको कौन दर्ड देते! ( के 
समा अर्थात्‌ उनको सो प्रजापुरुषों से भी अधिक दण्ड दवोना चादिये। (प्रक्ष )* वि रा कह 
क्यों प्रदण करेंगे । ( उत्तर) राजा भी एक पुगयात्मा साग्यशाली मनुष्य दे जब उसी को दर पा 
डाप घोर थह दगद प्रदय मे करे तो दूसरे मजुष्य दएंड को क्यों मानेंत ? झोर जब सय प्र! कं ४" 
राज्य!धिदारी भौर समा धार्मिकता से दगड देगा चाहें तो झफेला राजा कया कर सकता दे *े 
स्परस्पा मे दो हो शा प्रधान और सदर समर्थ पुप अस्पाय में द्ूूब कर स्पायधर्म को ३ हि 
परक्ट को माश कर आप मी गए होगाएं झर्धात्‌ इस गटोक ऐेः अर्थ को स्मरण फरो कि स्थायपुर्क 
शी दा गान राज और थर्मे दे ज्ञो इसफा लोप फरता दे उससे नीच पुदप दूसरा फौन द्ोगा | भर 
कल कब हट के होगा उचित मर्दी क्योंकि तुष्प किसी अगर का दंगाने।. 
झिकफेदादा हईों दि इसलिये सा दयध्ट म देगा थादिये। (डत्तर ) जो इसफों कहां दगढ़ खाती 
राहर:वि को बई। शममते, क्योंकि एक पुदष को इस प्रकार दगर् होने हे सब लोग गुरे कक 
से रषय रहेंगे भौर बुर काम को धडकर धर्म मार्ग में स्थित रहेंगे। सथ पूछों तो गदी द्वैहि है 
वाई झर भी बह दयद सइ र आग में न थ्रादेगा और जो सुगम दगठ दिया ज्ञाप वो शुष्ट हक है 
88 इतने छयें। बह शितझो तुम्र सुगम दयद कदते दो थइ फ्रोड़ों गुणा अधिक होने से होती 2 
डिक होठ दे, करों श हर बहुत मतुष्य दुष्ट कमें करेगे तइल्‍्थोड़ा * दपड माँ देता परेंगा £ 





» डैसे इछ छो छरवर दपइ हुआ ओर दूसर को पावमर तो पावश्ए अधिक एफ मत दवाई होपँ 





दल्देड मदुच्य हके माय मे ब्राथपाव वससेर दगइ पढ़ा सो देसे खुग़म दंग को दु्े होग हा 
छेटके हैं ! इसे एच को मन ऋपर महतद्य मनुष्यों को पाव २दएड हुआ सो दा (सार ( 

अजभ्र शत का डटाड दोडे से अधिक अर बद्ी कड़ातथा वद दक मस दगइ स्पून भर हुगम रा 
है। के बने नार्य दे समद दी सदियों बा मादा तथा बह मर्दों मे कियता खब्या देश दो री | 
कद्ाशव करे ओर शडास्टसट् दें निवियत कर स्थान हुईं हो साइता किरतु आसा भयुदत देर 
सिठते टू शोर बड़ ६ बोडाओों के मद में सजाजेबाते दोगों लामयुर् हो. बैती ध्यवाएा हे 


चष्टसमुन्नासः हैण्७ 





“रस्तु यद्द ध्यान में रखना चाहिये कि झो कहते हैं कि प्रधम शद्माज नहीं घलते थे थे भूठे दें और 
“ए-रैशान्तर द्वीप-द्ीपान्तरों में मोका से ज्ञानेबाले अपने प्रज्ञास्थ पुरुरों की सर्वेश् श्ष्ठा कर उनको 
कैसी प्रकार का दुःख म होने देवे ॥ ३ ॥ [ राह्या प्रतिदिन कर्मो क्षी समाप्तियों को, इाथी घोड़े झऋादि 
गइनों को, नियत खाम भौर खण्य, “झाकर” रक्षादिकों की खानें और कोप (खज़ाने) को देखा 
$रे ॥ ४॥ ) राजा इस प्रकार सब ध्यवदारों को यथाइत्‌ सम्राप्त करता कराता हुआ सब पापों को 
पुड़ा के परमगति मोछ्ठ खुख को भाप्त होता दि॥ १ ॥ (प्रश्न ) संस्हतविधा में पूरी २ राजनीति दै 
। अध्ृरी ! ( उत्तर ) पूरा है, क्‍योंकि जो २ भूगोल में राशनीति चली भोर घलेगी धह सत संस्दत 
पा से थी है और जिनका घत्पदा खेध नहीं दे उनके लिये:-- 


ह प्रत्यई लोऋरष्टेप शासच्टैय हेतुमिः ॥ मनु० ८। ३ ॥ 


झो नियम राधा और प्रप्मा के सुघकारक और धर्मयुद्त समभें डत २ निएमों को प्रर्ण विद्वानों 
फी राजप्तमा षांधा करे। परन्तु इस पर नित्य ध्यान रफ्यो कि कृद्दां तक यम सके दर्द तक दास्पा- 
ईसा में विदाद से करने देवें। सुवारस्था में भी विया प्रसन्नता के विधाध्ट म ऋरमा कराना और से करने 
(ग । प्रह्मचरस्य का यधावत्‌ सेशन ऋणता कराना। ब्यमियार भौर बहुविदा को बम्द करें छि डिससे 
धरीर झौर झारमा में पूर्ण दल सदा रहे । फ्योंकि जो फेयल झातमा का बल भर्धात्‌ विदा डात बढ़ाये 
डाये और शरीर का पल मे यदायवें सो एक दी पलवान्‌ पुर छानी झौर सकड़ों दिद्वारों छो शीत 
सकता दै। और शो ऐेयल शरीर दी का या पढ़ाया ज्ञाय झात्मा का भद्दों शो भी राज्य पाछ्म बी 
वत्तम व्यवस्था पिता विधा के कभी महों दो सकती। विगा स्यवस्था & सब झाएस मेँ री पृट इट 
विरोध लड़ाई फगड़ा करये नए धष्ट दोशायें । इसलिये सयेदा शरीर और धारमा के इत को बढ़ाने 
एइना चादिये। जैसा दल और धुद्धि का ताशक स्पवृध्ार व्यभियार और अति दिष्पासक्ति है कैसा 
भोर कोई गए है। विशेषतः छत्रियों को दृढ्आांग भोर बलयुक्त घोना घाहिये | कयोंबि कर के ही 
(पिषयासक होगे सो राज्यधर्म दी लए दोज्ञायगा । और इस पर भी भ्पाग रखना शादहिये दिख रुएा रहा 
जया प्रज्ञा" मैसा राजा होता दे वैसी दी उसकी प्रजा होती दे इसलिद राजा झोर शाहपुरप्रों को ऋण 
इंचत दे कि रूमी दुष्टाघार म करें, किग्तु सर दिन घर्मे स्थप से वर्लेषए सद के छुघार दा रशरत बनें! 


दइ संक्तेप से राजधम का पर्यन यहां किया दे विशेष देइ, मदुस्दुति के समम, अएम, बरम 
भण्याप में और शुहुमीति तथा विदुरभक्ञागर और मद्दामारत शालिपये ७ दाजघर्र कोर $पटमें ऋण 
पुस्वशों में देखकर पूर्ण राजनीति को धारण करके माएशलिकः ऋधदा श्ादेमोम खश्द्ो २ 2. अरे छत 
पद समझें कि "चर्य प्रशापते: प्रजा अमूम १८। २६ ( यढ यशुर्देह का बयन टे। दम शापति अर्पाहू 
परमेयर छी घशा और परक्ताश्मा इमारा राज्य हम उसदे क्िपर भायदल्‌ हैं चद हटा बारे ऋपश कह 
में हमको शक्‍्याधिकारी फरे भौर इमारे दाथ रो भपने सत्य स्याव को प्रति बरादे। ऋूश ऊाये ईशइर 
भोर वेइदिषप में छिणा झापगा ॥ 

इति भरीमदपामत्ट्सरस स्तीस्थामिहने सब्यार्थघदारो एभाइादिशूरिते 
शाजधर्म दिएऐ पहः समुन्नारा रूगूूए ४६४ 


ग अप सप्तमसमृझ्नासारस्मः 


सिद्च्सदइ ६ हा इ ६६६८ दाद द 4८4 4 दी 


अयथधघएोेदीविपर्य व्यासयाध्यामः 


8 अक्रककक् क्ेजक सेल लि तक 32237: श्र 
हु 


(६२5२८: 
हित ] 4७ 
क्यों अर्धरे परमे ब्योमन्परिंमन्‌ देवा अधि विश निरेदु! ) यम्तन् येद झट्रेता « 
इत्तदिदुस्त इमे सम|सते ॥ १ ॥ ऋ, में० १। सू० १६४ । मं" ३६ ॥ 
! 


ईशा बरास्यामिद ७ सर्व यक्तिब्च जग॑स्यास्जगंत्‌ । तने स्प॒करेन घुत्मीया का ०७ | 
नम ॥ २॥ यज्ञु० झ्र० ४० | मं० १॥ 


अहम्धुई वर्छुनः पव्मै्पा्तिरई घनानि से ज॑यामि शर्यतः । मां इंवन्ते फिगर ने ४, 
दाशुपे दिमैजामि मोननम्‌ ॥ ३ ॥ श्रहनिन्द्रों न परा जिग्य झून न मुत्यवे शव हि 
सोमपिर्मा मुन्बस्तों याचतता बहु न में पूरचः सुख्ये स्यन ॥ ४ ॥ शछ० में” १९ | ४९ 
मं० १।१५॥ 


(ऋतचो अक्षरे० ) इस मन्त्र का श्र्थ ब्रह्मचर्स्याथम की शिक्ता मैं लिखे चुद दें: 
सब दिव्य गुए फर्म स्वभाव पिधायुक्त ओर जिसमें पृथियों सूब्यादि क्लोक श्थित हैं. और थो | 
के सम्तान व्यापक सब देबों का देव परमेश्वर दै उसको जो ममुष्प मे ज्ञातते न मानते और 
ध्यान नहीं फरते वे नास्तिक मन्दुमति सदा दु'खसागर में डूबे द्वी रद्दते हैँ इसलिये स्वेदर 
जानकर सब मनुष्य खुली द्ोने दे । ( प्रश्ष ) वेद में ईश्वर अनेक हैं इस वात को तुम मानते द्दोवा 
( उत्तर ) नद्दों मानते, क्योंकि चारों थेदों में ऐसा करों नहों लिखा मिससे अनेक रत! 
किन्तु यद्द तो लिक्षा दे कि ईश्वर एक दे । (प्रश्न ) चेदों में ओो अनेक देवता लिखें दें उसका 
प्राय दे ! ( उत्तर ) देवता दिग्यपुणों से युक्त दोने के कारण काने हैं सेसी कि प्रणिवरी, पर्व, 
कददों ईश्वर या उपासघनीय नहीं माता है। देखो ) इसी मसस्व में कि जिसने साई देवता * 
जानने और उपासना करने योग्य इंश्यर दे ।' यह उनकी भूल दे जो देवता-थबद से ईशर 


फरने हैं। परमेश्वर देयों का देव दोने से मदादेद इसोलिये कद्दाता दे कि यही सब जग की. 
स्थिति, प्रलपर्तो स्वायाधीश 


ता न्याया्ी: दि। “भरयप्धिशन्ध्रिशता०” इत्यादि वेदों में प्रमाण * 
स्यास्या शतपथ में की दे, तेंतीस देर अथास्‌ पृचिद्यी, जल, अग्नि, बायु, आकाश, चर 
ओए नक्षत्र सब एृष्टि के नियाक्षस्थान द्ोने से [थे] आठ बसु । थाण, अपान) ब्याह 
समान, माग, कूम्मे, कुकल, देवदत्त, धनञ्ञय और ज्ञीवात्मा ये ग्यारदद रुद् इसलिये कइ्ति हैं . 
शरीर को छीडते हैं स्व रोदन करानेवाले इोते हैं। लंबत्सर के बारद मदध्दीने बारह आदित 
हैं कि ये सब की आयु को लेते ज्ञात हैँ । रिज्ुल्ञी का नाम इन्द्र इस देव दे कि परम पेश 


सामसमुप्तासः १०६ 





+/] है। पद को धक्ापति कहते का घारए पद दै कि जिससे यायु घृष्ठि जल झोपधी की शझथि, 
ामों छा रग्बपर ओर घाना प्रकार बरी शिएप्विया से प्रशा का पालन द्वाता है।ये सेतीस पूर्षोक्त 
यो दे दोग से देप रूदाते टें। इसका स्वामी और सद से शा द्वोने से परमात्मा धाँतीसर्या डपा- 
फैद शतपथ दे; घौदधयें दगएद् थे रपए लिणा है। इसी प्रकार भम्पत्र भी लिया दै। जो ये इन शा्ों 
. + देखते हो वेदों में अमेद्म रंश्यर मागनेरूप ध्रम्रजाल में गिरकर क्‍यों द्कते !॥ १ ॥ दे भनष्य ! जो 
हू इस धंसार में शगत्‌ दे श्स सप में व्याए होऋर नियस्ता है यह ईश्वर कद्माता है, उससे डर कर 
+भस्पाप से किसी दे; धन की झाकाणा मत कर, उस झम्पाय का स्थाग और स्यायासरणरूप धर्म से 
अपने आत्मा से आमस्द को भोग ॥ २॥ ईश्वर सप को डप्देश करता दै कि दे मुप्यो ! मैं ईंश्यर 
'इ के पूरे दिधवात सप जगर्‌ का पति है, मैं सनातन अगाकारण और सप धनों का यिज्ञप करनेयाला 
,औए दाता ईं, शुभ एी को सब कीय जैसे पिता को सम्तान पुकारते हैं यैसे पुकारें, मैं सब्र को सुछ देभे- 
रे शयत्‌ के लिये शागा मकर के सोकनों का विभाग पालन के; लिये फरताई ॥ ३॥ मैं परमेश्वस्थे- 
पद एुर्प $ रद सद जगत्‌ का प्रकाशक हैं, कभी पराशय को प्राप्त मद्ीं होता भौर मे कभी सत्यु 
/गी प्राप्त होता ईं. मैं एी क्गव्‌कूप धन का निर्माता ई सब शगत्‌ की उरपत्ति करने पाले मुझद्दी को 
गगो, ऐ जीदो ! देश्यय प्राप्ति. पत्र करसे टूए मुम् लोग पिशानादि धन को मुझ से मांगों और 
एम लोग मेरी मित्रता से अक्षय मत शोझो, दे ममुष्पो ! मैं सत्यमापणरूप स्तुति फरनेधाले 
जुष्प को समातन ह्वामादि धन देता हूं, मैं प्रह्म च्र्थात्‌ थेद का प्रकाश करनेद्ारा ओर मुझको यह 
तहैद पधादत्‌ कद्ता इससे सप के धान को मैं बढ़ाता, मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ फरमेध्वार को फलः 
(दाता और इस विश्य में जो कुद् है इस सप कायये को बनाने भौर धारण फरनेवाला हैं, इसलिये 
बुम छोग मुझ को दोड़ किस दूसरे को मेरे स्थाम में मत पूजो, मत मानो और मत जानो ॥ ४॥ 
टिरएय्गर्मः समंय्ताग्रे मूनस्प॑ जावः पतिरेफ भासीत्‌ । स दौधार प्रथिवी दापरुतेमां फर्समेँ 
'देवाय॑ हविषा विधेम ॥ [ भ० १३।४ ] 
४ चद्द पजुवेद का मन्त्र दि-दे मनुष्पो ! जो सृष्टि के पूरे सप सूर्य्यादि तेजबाले लोकों का 
डपपत्ति स्थान झाधार ओर जो पुःछ उत्पष्त दुआ था, दि भौर द्वोगा उसका स्वामी था। दै और दोगा 
(व पृचियी से लेके सुर्येलोक पस्येम्त स्टि को दना के धारण कर रद्दा दि । इस खुखस्थरूप परमात्मा 
शी दी भक्ति सैसे दम करें दैसे तुम ोग मी करो ॥ १॥ (प्रश्न) भाप इंशवर २ कद्दते दो परन्तु उसकी 
सिद्धि किस प्रकार करते द्वो | ( उत्तर ) सप प्रत्यक्षादि प्रमायों से । ( प्रश्न ) ईश्वर में प्रत्यक्षादि प्रमाण 
कभी भईटीं घट सकते ! ( उत्तर )-- 
'ईश्द्रियार्पससिकर्पोत्प्त द्वानमब्यपरेश्यमध्यमिचारिव्यवसायात्मऊ प्रत्यक्तम्‌ ॥ ( थर० १ | सू० 9 ] 
| यद गोतम मह्विषत स्पायदर्शन का सूत्र टै--जो थोत, त्वचा, चछु, ,भिद्धा, प्राण और मन 
का शब्द, स्पर्श, रूप, रस, यरध, खुख, दुःएप, सत्यासस्य विषयों के साथ सम्बन्ध दोने से छान उत्पन्न 
होठा दे उसको प्रत्यक्ष कद्दते हैं परन्तु यह निर्धम दो । अप विचारना चादिये कि इन्द्रियों और मन से 
गुणों का प्रत्यक्ष दोता दे गुणी का मर्दों । जैसे चारों त्वचा आदि इन्द्रियों से स्पर्श)! रुप, रस ओर गन्ध 
'का शान द्वोने से पुणी शो पूथिबी उसका चझारमयुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता दि येसे इस प्रत्यक्ष झट 
में रचना विशेष आदि छामादि पुण्णों के भत्यक्ष धोने से परमेश्वर का मी प्रत्यक्त दि। और जब आत्मा 
मन झोर मन इन्द्रिपों को किसी विषय में लगाता था घोरी झादि धुटी या परोपकार झआादि अच्ची राज _ 
के करने का जिप्त छाण में आयम्भ करता दे उस सम्प जीव की इच्छा शवादि उसी चित विचक 


श्र 2 


११० संत्याथप्रकाशः 


5 


झुक जाती दै, उसी क्षण में आत्मा के मीतर से बुरे काम करने में मय, शड्ा और लड्झा ++- ७ 

में अभय, निःशह्ुता और आनन्दोत्साद उठता है यद जीयात्मा की ओर से नहीं किखु 
ओर से दे। शोर जब जीवात्मा शुद्ध द्वोके परमात्मा का विचार करने में तत्पर रद्दता दे 
सम्रय दोनों प्रत्यक्ष द्वोते दैं। जब परमेश्वर का प्रत्यक्ष दोता दे तो अगुमानादि से पस्मेश्वर दे 
में क्या सन्देद दे ! क्‍योंकि फार्य्य को देख के कारण फा अनुमान द्वोता दे | (प्रश्न) ख़र 
किसी देश विशेष में रहता दै ? ( उत्तर ) व्यापक दे, क्‍योंकि जो एक देश में रद तो - - 
सर्वश्ष, सर्वेनियन्ता, सब फा स्नष्टा, सब फा धर्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता, अप्रात हे ई 
की क्रिया का असम्मष दे । ( प्रश्न ) परमेश्वर दयालु और न्यायकारी दि या नहीं * (उत्तर) दै। 
ये दोनों गुण परस्पर विशद्ध हैं जो न्याय फरे तो दया और दया करे तो न्याय छूट जाय। क्यो 
उसको कद्दते दें कि जो कर्मी के अनुसार म अधिक न.न्‍्यून सुख दुःख पहुँचाना। और देश * 
कहने दें ज्ञो अपराधी को विना दण्ड दिये छोड़ देना। ( उत्तर ) न्याय और दया फा नाममातर शी. 
क्योंकि जो स्पाप से प्रयोजन सिद्ध द्वोता दे वद्दी दया से | दणड देने का प्रयोजन दै कि मत * 
करने से बन्द द्वोफर दुःसरों को प्राप्त न हों । बद्दी दया कद्दाती दे ज्ञो पराये ढुःखों का छुशाग 
जअसा अर्प दया और न्याय का तुमने किया यह ठीक मद्दीं, क्‍योंकि जिसने जैसा '०५ 
किया द्वो उसको उतना यैसा ही दट्ड देना चाहिये उस्ली फा माम न्याय दे । और मो भार! अपर 
दण्ड मे दिया जाए तो दया फा नाश दोोज्ञाय । क्योंकि एक अपराधी डांकू फो घोह देने से ५ 
स्त्रा पुयपों को दु थ देना दे, जब पक के धोड़ते से सहस्नों मजुष्पों फो दुःख प्राप्त दोता दे. * $; 
मदर हो सकती दे दया यही दि कि उल डांकू को कारगार में रखकर पाप करने से पारा 
डस डाकू को मार देने से भग्य सदस्रों पर दया प्रकाशित इोती दे। ( प्रश्न) किए दया झोए सथा। ५ 
क्यों शुए है क्योंकि उन दोनों का भर्थ दक ही द्वोता दै तो दो शब्दों का द्वोना व्यर्थ दै इसलिये रो 
का (इना तो अच्चा था। इससे क्या घिदित होता दे कि दया और स्पाय का एक प्रयोजन हई॥| 
करा पद अपे कू अनेक माम भोर एक माम के अनेक छर्थ नहीं होते ? (परत) होते दैं। 
हो) चुष्ट मुपझो शह्टा कों हुए ! ( प्रश्न ) संसार में छुतते हैं, इसलिये। ( उत्तर ) संप्तार में ऐ 
शुभ होरों सुनते में आता दे पररतु डसको पियार से विश्वप करमा अपना काम दे । देशो (श 
दा! को यह दि दि जिसने सद जीयों के प्रयोगन छिझ होने के अर्थ जगत में सफल पदार्थ हम 
दाग हे एके दें । इससे मिन्न दूसरी बड़ी दया कौनसी दे ! अब स्थाय का फल धत्यद्ष वीं 
सुछ दुःख छी व्यवस्था भधिक ओर स्यूतता से कल को प्रकाशित कर रही दे। इस दोगों का 
शीमभेर्ट दि जो मन में सब को खुल दोने भौर दुःख छूटने की इच्छा और क्रिया फरा 
इतर इन बेड ऋधोश्‌ बरथत देदगादि यधावश्‌ दगृड़ देना स्याय कहता दे। दोनों का १५ मपे 
टैडिसर को पा भोर दुःथों से दूध कर देगा। ( प्रश्न ) रृंघर साकार दि था निराकार | 
िरइफ, करोड जो साडार होता तो स्यापक ते होता । जर ब्यापक से दवोता तो सपेशदि १! 
अप ८ कोड थरिमित बरतु में गुल कर्म ब्पमाव भी परितित इदते दें तप 
दुष्ट, वा कू र बोस, दीप, देदन भेदत भादि से रद्ित मई हो सकता। इसते यही तिधित 
दुक्‍दर डिडः कार है। हा साहार हो तो स्प्रे हाफ, कान, आंख आदि अयपदों का बतनेशाा पृ 


बन ब- हरे । करो।ह- जे, संदेया हे 3 हि ध्क 
इह़ यह । का: हू जे. संयोग से डल्यक्न होता है इसको संयुक्त कारतैदाला ठिराकार हम ह' 
से झाप दी आप झपता शरीर ६ 


शा कर पह छोर दइर देसा कटे हि ईज्वश्जे स्वेब्चा 
हो भी बहा कि हुआ सि शरीर दसके दे यूप्रे जिरादार दा। इसलिये परत्मात्मा कर्मी, 


सप्तमसमुल्लास १११ 


(शो फरता किन्तु निराकार इोने से सप जगत्‌ को घच्म फारणों से स्पूलाकार बना देता दे। ( प्र्म ) 
कर सर्वेशक्तिमान्‌ दे या नदों ? (उत्तर ) दै, परन्तु जैसा तुम सर्वशक्तिमान्‌ शग्द का अप ज्ञानते दो 
परत गंदीं। किन्तु सर्वशक्तिमान्‌ शब्द का यद्दी अर्थ दै कि ईश्वर अपने काम अर्थात्‌ उत्पत्ति, पालन, 
हुये भादि और सथ ज्ीथों के पुएप पाप की यथायोग्य व्ययस्था करने में किंचित्‌ भी किसी की 
/दायता नहीं लेता । अर्थात्‌ झपने अनन्त साम्रथ्ये से दो सब अपना फाम पूर्ण फर लेता दि। (प्रश्न) 
हा तो ऐसा मानते हैं कि ईश्वर चाद्दे सो करे, फ्योंकि उसके ऊपर दूसरा कोई नहीं दै। ( उत्तर ) पद 
की घादता है! जो तुम कद्दो कि सब कुछ धादता और कर सकता दे तो इम तुमसे पृद्धते हैँ कि 
स्मेश्यर अपने को भार, अनेक ईभ्यर बना स्वयं अविद्वान्‌ खोरी ध्यभिचारादि पापकर्म कर और 
! [ख्री भी हो सकता है! जैसे ये काम ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव से पिरद दें. तो जो तुग्दाया कइना 
हि कि पद सब कुछ कर सकता दे यदद कभी नद्ीीं घट सकता | इसलिये सर्वशक्तिमान्‌ शब्द फा अर्थ 
थे दमने कट्दा वद्दी टीक दे । (प्रश्न ) परमेश्वर सादि दे था अनादि ! ( उत्तर ) अनादि, भर्पात्‌ जिसका 
क्रादि कोई कारण या समय नद्दो उसको अनादि कहते हैं, इस्पादि सब अर्थ प्रथम समुझ्ास में 
कर दिया दे देख लीजिये। ( प्रश्न ) परमेश्यर क्या चादता दे ! (उत्तर ) सर की भलाई भोर सब फे 
लिये सुश्च चाइता दे परन्तु स्पतम्धता फे साथ किसी को पिना पाप किये पराधीन मद्दी करता। ( प्रश्न ) 
(स्मेशयर कौ स्तुति प्रार्थना और उपासना फरनी यादिये पा नहों ! ( उत्तर ) करनी घाद्िये। ( प्रश्न ) 
कया स्तुति आदि करने से इंश्वर झपना नियम छोड़ स्तुति प्रार्थ ना करनेयाले का पाप छुड्ा देग! ! (उत्तर) 
जैदों | ( मश्न ) तो फिर स्तुति प्रार्थना फ्यों करना ! ( उत्तर ) उनके करने का फल झम्प दी दे (( प्ररण) 
क्या दे ! ( उत्तर ) स्तुति ले ईश्वर में प्रीति, उसके गुण फर्म स्थमाय से अपने गुण कम शश्माद का 
'ुधारना, प्रार्थेना से निरभिमानता, उतसाए भौर सद्वाप का मिलना, उपासना से परणए छे पेन्न और 
इसका साछात्कार द्ोना। ( भश्न ) इनको स्पष्ट करफे समझाझो । ( उत्तर ) जैसे-- 


| स्‌ पर्मेगास्हुकर्मकायमंत्रणमंस्ताविर७ शुद्धमपापयिद्धम | एविमेनीपी पंरिभू३ स्प॑प्म्भूयोयार्त- 
'ध्युतोश्योन्‌ प्यदघास्छायवीम्य+ समाम्यः ॥ यशु० झ० ४० | मं" ८ ॥ > 


| ( इंश्यर की स्तुति ) यद्द परमात्मा सब्र में व्यापक, शीप्रकारी ओर झशग्त एलदाव, को शुद्ध 
सर्वेज्ष सपका भस्तर्पामी, सर्वोपरि विराशमान, समातन, स्यप्सिद्, परमेश्वर ऋपनी कीपरूप धरमातस 
अनादि प्रज्ञा को अपनी सनातन दिया से यधावत्‌ अर्थों का बोध वेद्द्वारा कराता दे वष्द सगुछ् बहुनि 
अर्थात्‌ जिस २ गुण से सद्दित परमेश्वर की स्तुति करता पद सगुण, ( झदाप ) अर्पात्‌ वई कमी शर्रर 
धारण या जन्‍म नददों लेता, शिसमें दिद्र नहीं दोता, माड़ी आदि के पनधन में महों झयता और बी एादा- 
घरण नद्दों वरता, शिसमें फ्रेश दुःण अष्ठाम वाभी नहों होता इस्पादि झिस ४ राग हे मेधरि गुऐों से 
पृथश्‌ मानकर परमेश्वर की स्तुति करता दे पद मिगुण स्तुति ऐै। इसका प यट टे कि जसे परम्ेश्यर 
दे गुर है दैसे गुण कर्म स्वभाव अपने भी चःशता। जैसे घट म्यापकारी है तो ऋाप भी स्दाएकारी 
दोबे। और जो केघल भांड फे समाम परमेभ्यर के गुशकरीत्तत करता झागरा कोर झऋपने सरिद्व गहों 


झुधारता उसकी स्तुति करणा घ्यर्थ दै ॥ मार्येता-- 


या प्ेधां देवगुणा: पितरैश्ञोपासते । सया मामप मेघयारओं मघाउिने इुरु राह ॥ १॥॥ 
यशु० अब र३े२। मन १४! 














श्र छात्याथेंप्रकाशः 


सेफ बज गाय थेद। शरसपाति बी मय पेहि। पलंमहि पल मर पद! 
मे चेहि ! मन्युरते मन्यूं मर्ये थेडि | सहोणति सहो मं घेढि ॥॥ पु० भर (६ ५ * 


यज्ञा्रतों दरमुदैति देवन्तद मुप्तस्य तयेवेति। दूरंग्म ज्यों ज्योव्फिलमे फ् 
संडरपमस्तु ॥ हे ॥ यह कर्मोए्यपर्सों सनीपिणों ये कुरेयान्त बिदयेपु धीएः । प्‌ हे 
मुस्तः प्रुजानों तन्‍्मे मन शिवसंझूस्पमस्तु ॥ ४ ॥। यद्मज्ञानमुत चेतो पृत्तिश मरय, 
प्रजासु। यस्मान्न शत हिचन फर्म करियते तन्मे मनेः शिवसकस्पमस्तु है १॥ पट डर 
भरिष्ययर्रिशतीतमशत सी । येर्न यपस्तायते सप्रोता तन्‍्मे मन शिवसेइला 
यस्पिन्दचः साम यु »पि यस्सिस्परतिष्टिता रपनामायिदागः । गरीसथित्त सगे एगट 
पने। मिरमंहस्पमस्तु ॥ ७॥ मुपारथिरयाँनित्र य्म॑नुष्यासेतीयतेल्मीश मिवीनिनेंधर हे! 
परतिर मार तनमे मनेः गिवसेइल्पस्‍्तु ॥ ८ ।ी यजु०् झ० देह । में* ६। २।१४) 


दे भप्रे) भर्पाद प्रकाशस्यरूप पस्मेश्यर झाप की छपा से शिस पुद्धि करी उपासरा रे 
कोर थोगी कोय करते हैं उसी युदधि से युक्त इमको इसी पर्समान समय में घड़मार कक रू 
डप धइप/ परूष हें कृपा कर गुर में मी प्रकाश स्थापन फीडिये। आप अमन्त रे 
शुभ हैं घी इदाधटाक में पूर्ण पाक्मम धरिये। आप अगस्त पल्तयुक्त दे इसलिये मुर्म 
इर्त बोर आप अन्त शाम्धयुक हैं इसलिये मुझको मी पूर्ण सामध्ये दीडिये। 8 
को चूदों दर बचभारी दें, सुसुको प्री वैसा ही दीजिये । आप निर्दा। स्तुति और हा 
हाटक बरफेव'ले है, कृपा शे मुझको मी वैसा दी फीमिये। २॥ हे दपानिये [| आपकी है 
6 ऋादअ दी दर » ह्ञागा, विध्यपुणयुक्त रदता दे चोर पट्टी सोते दुए मेरा मत शुपत्ि को एक 
कइफ है दुर +े छह ममाल स्यपडार काता, सब प्रकाशकों का प्रकाशक, एक घइ प्रैश मे! 
ऋदरोड आपके को८ दूसरे धािपों रे अप कव्याण का साइुफ्य करनेद्ारा होते) किसी की ६ 
के इफइ पु अ्थी ब इवे। ३॥ दे गवस्विरवासी ! जिपसे कर्म करनेड्ार धर्मयु्त विद्वान 
बोर ऋइ३ हमे रर्म करते हैं हो अपुर्य सामर्थ युक्त, पृव्मीय और प्रजां के सीतर रहगेवाण! 
डुब ६ इरदे 40) इच्छापुक होकर अधर्त को सर्वथा छोड़ हेपे (पा जो इाफए बात 
के *े किला+इापा विधतट्म स्यूत्ि है और जो प्रजाओं में मीतर प्रशाशयुक्त भीर हाशरदि 
शा बा शुदु नी अये बी दर सझतावइ गधा मन शाद गगी की इध्या कपडे १९५०) 
हरे २ ै डै अपदीम्कर ? फिससे सतत योगी अपा इन सब सूत सरिध्यते: वर्भमार 
ककर शो बहटइिस कीवा्धा का परप्राया के साथ विगदे सब धकार विकाॉगिड #ती 
कज आर घप्रिणा है कं बजटस्ट्यर्य्द्ि घर चारवायुकत रहतादें, इस पोगडप बड़ ! 
#ड7 है कप देश कर बम विन्रालयुक दोचर आविधात पोेशों ते कूचर रहें । ६४ *ै हे 
बट इहढग ? ऋण हृपा # देगे मद कैसे रथ सध्य चुरा मेँ आरा के इत हैं 
महु ६६ ऋपमाइद आह गडिेमदे ऋषधापडद मी वलिदित इक्य है. होड़ हितये सवेज कवेहशी ४ 
मर फिब बडड़ लत ढाजत है कह बेटा मत अस्या का इमण अर विधटधिए श३ 
हू ऋई कक्ालप है कर : के पेट! यम इस्सी हे गाडी के <माज झथदा योडों क मिपटा काल! 


साममसमप्तालः ११३ 











-ैष्यों को ऋग्यस्त इधर रधर शुलाता दै, शो हृदय में प्रतिष्तिद गतिमान और अत्यसत येग पाला दै 
है मेरा सगे सब इव्टियों को अधर्मांघरण से रोक के धर्मप्प में सदा घलाया करे, ऐसी छूपा 
मे पर बीडिये॥ ८ 

,भग्ने मय॑ मुप् गये अर्मान्‌ विश्वानि देव प्रयुनौनि दिद्वान्‌ | युयोध्युस्गर्जैद गणमेनो 
[पिंछों हु नम॑ उहि विधेम ॥ यजु० अ० ४० | में० १६ ॥ 
१ दे दि ह द्वाता इदप्रकाशस्यरूप सबको शामनेद्वारें परमास्मन्‌ ! आप दृम्को “ध मार्ग से 
पूर्ण परद्मामों को प्राप्त कराइये और शो इम में कुटिल पापायरणरुप मारे दे डससे पृथक फीजिये। 
सीलिये दम क्षोग शघतापूर्य क आपकी बट्दुनसी स्तुति करते हैं कि आप इमको पत्र करें ॥ 
, मा में महन्त॑युत मा नें भर्मफ मा न उ्धन्तमुत मा न॑ उ्ितम । मा ने पधीः पते मोत 
[वर मा ने; विपालस्यो रुद्र रीरिपः ॥ यमु० झ० १६ । मं० १४॥ 
ऐप रद ! ( दुटों को पाए के दुःशस्यरूप फल को देफे णलाने याले परमेश्वर) भाप हमारे 
दे हे जग, पर्भ, माता, दिता और प्रिय बस्घुय्ग तथा शरीरों का इनम करने के लिये मेरित मत 
कीजिये, ऐसे मार्ग से इमको घलाइये जिसले दम आपदे दरडनीय म दो ॥ 
भमतों मा सदू गमय तमसों मा ज्योतिगैमय मृत्योधौअयूर्त गमयेति ॥ 
शनप्थप्रा० [ १४।३॥ १। ३० ] 
दे पप्मणुरो परमास्मन्‌ ! आप एमको असस्‌ माय से पृषझ कर सम्मार्ग में भ्राप्त कौजिये। 
प्रविधासधकार को छुट्टा के विधारुप घर को प्राप्त कीमिये। और सस्यु रोग से पृथफ्‌ फरके मोह के 
प्राभम्दरए अस्त का प्राप्त कीक्िये । झर्थात्‌ जिस २ दोप था दुगुंण से परमेश्वर और अपने को भी 
[एक्‌ भाग के परमेश्यर की धार्थ ना कीज्ञाती दै वष्द विधि निषेधमुस धोने से समुण 88276: ॥ 
ही मनुष्य जिस बात दी ध्रार्यमा करता दे उसको यैसा दी वत्तेमान करना घाद़िये अर्थात्‌ जैसे सर्थो- 
हम बुद्धि के प्राप्ति के; लिए परमेश्वर की प्रार्थना करे उसके लिये जितना अपने से प्रयक्ष द्ोपफे 
ना किया करे। अर्थात्‌ श्रपते चुरुषार्थ के उपरास्त प्रार्थना करमी योग्य दे। ऐसी प्रार्थाा फभी न 
॥एरनी ब्राहिये और मे +रमेश्वए उसको स्थोकार करता दे कि जैसे दे परमेश्वर ! आप मेरे शब्रुशों फा 

##श, मुझको सद से यहा, मेरे दी प्रतिष्ठा भौर पेरे आधीन सब दो ज्ञायेँ इत्यादि, फ्योंकि शय दोनों 

(चित एक दूसरे के भाश के लिये प्रार्थना करें तो क्‍या परमेश्यर दोनों का माश करदे  औओो 

(ोई कट्दे कि जिसका प्रेम अधिक उसकी प्रार्थना सफल होजावे तव इम कद्द सकते दें कि जिसका 

(मम स्पून हो उसके शत्रु का मी म्यून माश दोना घादिये। ऐसी मूर्ता की प्रार्थना करते ९ फोई ऐसी 
मी परार्थना करेंगा हे परमेश्वर ! शाप हमको रोटी बनाकर खिलाइये, मेरे मकान में भाड़ लगाएये, 
प्र धो दीजिये और सेती बाहरी भी कीजिये। इस प्रकार जो परमेश्यर के भरीसे ग्ालसी धोकर थेठे 
रहते दें थे महामूर्ख हैं क्योंदि ज्ञो परमेश्यर की पुरुषार्थ करने की चाष्टा दे उसको जो फोई तोड़ेग। पदद 
“छुल्ष कमी नह्दी पावेया। असे-- 

पु लेवेइ कर्मांयि मिनीविपेच्छुत5 सर्मा; ॥ यज्ु० अ० ४० | में० २॥ 
परमेसर आशा देता दि कि मनुष्य सौ थे परयेन्त अर्धात जबतक ज्ञीये तवतक कमे करता 
टुआ औने की इचछा क रे, ऋातसी कमी म दो | देखो यु के थीध में शिवने आयी अथया अग्रादी हैं 


अं 





११७ स्वार्थ प्रदाशः 





पे सब अपने २ कर्म और यद्व करते दी रहते हैं। जैसे विपीक्तिफा आदि सदा प्रयत्े ्क 
आदि सदा घूमते और घृत्त आदि सदा बढ़ते घटते गहते हैँ वैसे यह दृष्टान्त मत्र॒णों व 
करना योग्य है । जैसे पुरुषार्थ करते हुए पुरुष का सद्ाव दसरा भी करता २३७ ३ 
पुरुष फा सदाय ईश्वर सी फरता दे। जैसे काम फरने याले पुरुष को सुर्य फरते हैं और 
फो गह्दों, देयने की इच्छा फरने और नेश्याले को डिखलाते हैं अन्य को नहीं, इसी घर हि 
भी सब के उपकार फरने की य्रार्थना में सदायक होता दे द्वातिकारक कर्म में नं): ५ 
मीठा दे ऐसा कद्दता दि उसको गश॒द् प्राप्त या उसको स्थाद प्राप्त कमी नहीं इोता और हो 
दे उसको शीघ्र या पिलम्य से गुद मिल दी जाता है ॥ अब तीसरी उपांसनता- 
सम्ाधिनिर्धृतमलस्य चेतसों निवेशितस्पात्मनि यस्तु्॑ मरे । 
न शक्‍यते वर्णीपितुं गिरा तदा स्वयन्तदस्तःकरणेन गृथते ॥ | 
यद्व उपनिषदु का यथन दै- जिस पुरुष के समाधियोग से श्रविद्यादि मत्त नेट पं 
आत्स्प द्वीकर परमात्मा में चित्त जिसने लगाया दे, उसको जो परमात्मा के योग को खत पे 
यह याणी से कट्दा नददं जा सकता, क्‍योंकि उस आनन्द को औयात्मा अपने अन्त 
करता दे । उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ द्ोना देै। अंग योग से पस्मात्मा के 


५ दा 
और उलको,सर्वव्यापी, सर्बास्तर्यामी रूप से प्रत्यक्ष फरने के लिये ज्ञो २ काम करना दोता दर 
करना चाद्िये, अर्थात्‌- 


तत्राःदिंसासत्यास्तेयग्रक्षचयीपरिग्रदा यमाः ॥ [ साधनपादे | छ० ३० ] हि 

इत्यादि खूज पातअलयोगशाद्ध के हैं--ज्ो उपासना का आरस्म फरना 20 $ 
यद्दी भारम्भ दे कि थद् किसी से वैर न रफ्ले, सवेदा सबसे प्रीति करे, सत्य योले, थी ही 
पोले, घोरी न करे। सत्य व्यवद्दार करे, मितेन्द्रिय दो, लम्पट न द्वी और निरमिमाती ६! 
फभी न करे। ये पांच प्रकार के यम मिल के उपासना योग का प्रथम झड़ है । 


0 
शोचसन्तोप॑तप/स्वाध्यायेश्वरप्राणिघानानि नियमाः ॥| योगछ० [ साधनपादे | * 


ही 

राग ढेप छोड़ भीतर और जलादि से बादर पविश्न रहे, धर्म से पुरुषार्थ फरते से ६ 
अस्न्नता ओर द्वानि में न अप्रक््षता करे, प्सन्न होकर आलस्य छोड़ सदा पुरुषार्थ फिया 
डुःख खु्खों का सदन और धर्म दी का अवष्टान करे अधर्म का नदीं। सर्वदा सत्य क्र 
पढ़ाने सत्युदपों का सक्न करे और “ओरेम्‌” इस पक परमात्मा के नाम का अर्थ विद 
पति जप किया करे! अपने आत्मा को परमेश्यर करे आशाचकुल समर्पित कर देवे। इन 
के नियमों को मिलता के उपाधनायोग का दूखरा अक्ल कद्ाता दे । इसके आगेद्ा अर म 
ऋषग्वेदादिध्राष्पभूमिका # में देख लेवें । जब उपाखना करना चाहें तब पफान्त शुद्ध देश 
आसन लगा, प्रायावाम कर याह्य विषयों से इन्द्रियों को शेक्र, मन को नामिप्रदेश में था का 
नेत, शिक्षा श्रथवा चीठ के मध्य हाड़ में किसी स्थान पर स्थिर कर अपने आत्मा और १ 
विवेचन करके परमात्मा # मग्म होज्ञाने से संयमी द्वोवें | ज्य इन साधनों फो करता 


पी के विड्ञान पढ़ा 
आता भार अन्तःकऋरण पदित्र धोकर सत्य से पूर्ण दो जाता दि । नित्यप्रति झाद विद्वान पढ़ें! 
तत्त्व...“ 


$ ऋग्वेद दिभाष्यमूमिका डे उपासना विषय में इनका वर्येन दे । स० 





दा 


सप्तमसमुल्लासा १११ 


४ पहुंच जञाता है। जो झांठ प्रदर में एक घष्टी भर भी इस प्रकार ध्यान करता दे ह सदा उच्चति 
"प्राप्त द्वोज्ञाता है। वहां स्वेज्ादि गुणों के साथ परमेश्वर की उपासना करनी सगुण और द्वेष, रूप, 
॥ गन्य; स्पर्शादि गुणों से पृथक मान, अतिधदम आत्मा के भीतर धाइर व्यापक परमेश्यर में दृढ़ 
गत द्ोशाना निगु णोपासना कट्दाती है। इसका फल--जैसे शीत से भातुर पुरुष का भप्मि के पास 
वि से शीत निवृत्त होजाता है पैसे परमेश्वर के समीप प्राप्त धोने से सब दोप दुःख छूट कर परमेश्यर 
गुण, कम, स्वभाव के सदश ज्ीयात्मा के शुण कर्म स्वभाव पवित्र दोजाते हें। इसलिये परमेश्वर 
॥ स्तुति प्रार्थना और डपासना अवश्य करनी घादिये | इससे इसका फल पृथक योगा परम्तु आत्मा 
। दल्ल इतना बढ़ेगा यद्द पदेत के समान दुःसत प्राप्त दोने पर भी में धपरावेगा ओर सह को सदन 
६ सकेगा | क्‍या यह छोटी याव दे  झौर जो परमेश्वर की स्तुति, भरार्थना और उपासना मह्दी करता 
£ एवम भौर मदामूर्स भी दोता दै, क्‍योंकि जिस परमात्मा ने इस झगत्‌ के सब पदार्थ शऔीषों को 
थ ऐे लिये दे रक्ले हैं उसका पुण भूल जाना ईश्यर दी को न मानना एतप्रता और मूर्यता दे। 
वक्ष ) झप्र परमेश्यप के थोन्र नेतादि इन्द्रियां नहीं हैँ फिर थद्ध इन्द्रियों का फाम कैसे कर 
केता दे ! ( उत्तर ) 

! . अपाणिपादों जबनो ग्रहोता पश्यत्पच्ुः स शूणोस्यकर्णः | स बेति विर्य ने थ तश्पास्ति 
धा तमाहुसपर्थ पुरुष पुराणम्‌ ॥ [ शेताश्रतर उपनिषद्‌ थ० हे । मं० १६ ] 

/ यह्द डपनिपद्‌ का धचन दे । परमेश्र के द्वाथ नहों परस्तु अपनी शक्तिरुप इाथ से सब का 
इन प्रदण करता, पग नह्ों परन्तु स्पापक होने से सब से च्धिक पेगयाद, घर का गोलक गहाँ 
एतु सब्र को यधावद्‌ देखता, थोत्र मह्वीं सथावि सब की बातें सुगता, झम्त;करण महों परम्तु सप 
परत को जागता दे और उसको अवधिसट्टित आाननेवाला कोई भी नहोँ। उसो को समातवं, सद हे 
'छ सप में पूर्ण दोने से|पुरुष कहते दैं। यट्ट शन्द्रियों भ्लोर अस्तःकरण से [ शोनेयाल ) काम अपने 
#मच्ये से करता दे। ( प्रश्न ) उसको बदुतसे भनुष्द निष्किय झोर निर्णय कटे हैं । ( उत्तर) 

|. मे तस्प फाय परण थ्‌ विधते न तत्ममथाम्यधिकरच दरपते | परास्प शाह दिवेषेद थूयते 


पामाविकी ह्वाननलक्रिया च्‌ ॥ [ श्रेताश्रतर उपनिपद्‌ भ० ६। में० ८ ] 
॥ यह उपनिषदू का दचन दे ॥परमात्मा से कोई तद्गप काये भोर डसको करए अर्थात्‌ साध- 
कम दूसरा भपेक्तित मद्टों । म कोई उसके तुल्प झोर न भ्धिष दि। सर्वोत्तम शक्ति अर्थाव्‌ जिसमे 
बनत्त छान, झमस्त बल झौर झमस्त किया दे थट्ट स्वाभाविक अर्थात्‌ सइञ् बसमें सुभी शी एि। 
ह परमेश्यर निष्णिय दोता तो जयत की उत्पत्ति स्थिति प्रखय ण कर सकता। इसलिये वह विभु 
(धापि चेतन टोने ऐे उसमें क्रिपा भी दे! ( भश्न ) जब यद् विया करता होगा तइ झअग्तश्ली शिया 
गैती दोगो दा अनम्त ? ( उत्तर ) जितने देश बगल में किया करना जचित समभता दे उतने हो देश 
ही में जिया करता है न अधिक न स्पून, क्योंकि यट् विदान, है। ( प्रश्न] एसमेश्शर ऋपना अध्त 
ग्रनता दै था हों ! ( उत्तर ) परमाश्मा पूर्ण ड्ामी टै, सयोंकि छाव उसको दडद्ते टें कि जिससे ज्यों 
# तथों जागा जाव झर्चात्‌ शो पदार्पे शिक्ष मझार का हो उसको डसी मकार झामते का बाम हागटे। 
/र परमेश्नर भन्‍म्त दे ती अपने को झगस्त दी जागमा दाद, उससे विशद अऋडान अयोत्‌ आऋष्लम्त 
हे सास्त और सास्त को ऋमस्त शागता चरम कदाता दि । 'यथाययेदर्शने ह्ञानमिति” जिसका हुँसा यु 
॥र्मे स्वभाव दो इस पदार्प को दैसा दी क्ावकर मानता री दान कोर विह्वान बद्माता टै, [इससे ] 
कटा झद्दाग । इसलिऐे-- 











११६ सम्पाधप्रकाशः 





कर , प्िप ह। मत 
फ्रैसरर्मगिपाराशवैरपराद्टः पुराविशेष इघरा ॥ योग ० [ समाषिरद ए 


४ ५ ९४2 2 
को अधिया दि फ्रेय. कुशस, ऋझुशल- इए. अनिए झोर मिप्र फलदापद्ध अरे ५ 
से रहित दै बइ सर जीडें से विस्लेर इंश्वर कद्दाठा दे । ( प्रश्न) 
ईम्रगानिद्धेः॥ १॥ [ सां भ० १। छ5 २२ ) 
प्रररामादात्र तत्पिद्धिः ॥ रे ॥ | साँ०् भ० ४ । सर १० ) 
मम्स्‍स्घावाराजसुमानम ॥ हे ॥ सांख्यय्ू० [ भ० १ । #९ है ॥| क 
पच् से हद सफते सैरवए की मिद्धि गहों होती ॥ १॥ क्योंकि मर इसी शिदे 
है मरी हो धरुवाशरि कदादा मई दो सझता ॥ रै॥ और ध्याति समवरध मे होने से भर6 
हे लदचा + पुडः पायक्षानुटात के मे होने से शाइपमाण झादि भी गईं मद छत ॥प ४ 
के सदर कइरेे इ। पक रोग ३३ ( उत्तर ) पहां ईश्वर की सिरधि में प्ण्या परमार शश ८ 
:ुकत करझु छूट प्रशाप*श कार्ट) है और पुरष सेविकदाण अर्थात्‌ सतत ०] दोनेस ४ कर 
कक दूर ओह करोड ये ह.पर करने से शो का भी ताम पुरुष है, कपोंकि इसी प्४९१ १६ 


इबाजट किए नास्य णहवरगिः ॥ १ ॥ रातामावास्पेस्सीघपेमू ॥ है । :400 
है कद । ३ + शबयपु [ अब ४ । ध्रू० ८ | & । ह२ ) 


के बू+र को पा हरा का घोष दो तो पुरुष मै सन्नापत्ति दोशाए अत की रे 
के फिक # ९ क 48 ३ में सश॑ यु है मेरी वरशकतर भी हषुस इंजाय । इसलिये पी कि 
कजटट॥ डे | बह हिल्‍तु तिअल कार ले है ॥ ६॥ जो चेतन से जता की वर्णत्ति शो को ै 
हनन ज २३ ८% है कक बाहर मैं में हार वर्त का घोष इोता चाहिये, सो गहीं है? इसमे ९ 
करार के परहल कर ० गह कल्स तिल ऋार तु दि । ३॥ क्योंकि गति प्री धक 
कलह? के आम + ४ के # था कं है ॥ ६॥ सेन 


रू म्ल॥ 5 इरटकज हाल बढ़ी धता घुतमातों स्यकपा। | 
बह कह पहर आए | झऋ* #। धर ४ |] का पते ै। 
के करण टिक कक 2 तो क जहृति है बडी ब्वड पाकार से बहुत गरक 
हैं 4६5 हल ०76 कली $ 5 मे भपकरासतह दो हाती है और पुदप अपरिला्ती | के 
के > आगाज डरा कप हू सह ओेप ये ऋतर २६ वास होता सवायुटश्व डिविकार हइता है ४ है 
के सके ७ ५ ओऔ कब खएट २ कदर हे छन्‍ा बढ अतीडाहयरदएँ है, करिसाप सती ही जेपी 
हाथ के सना के ही इजयिम छर अप के मी “झातमाट शव में अनरिरफादी है 
काम पर «बच क्र फ्रटड़ काप्ड नव ये 7प सता की बलीप ध्राखक आर साहा ति अर, 
अप मे. ऋ ५ तु #स8 2 नन्‍य कतफिक #ह करन एिफह माहक हैं ।/ हाय । लि हट ं 
महू & कह! आइग, अदा कद, कड़े उड़ उटह ६ इ8 23 8 /ख पर्लसाआ रत काल 


हे कटप मे बाणन है. 0०ड कचरा के पहक हि कि |] परमकतर जाम हुई शत रह 
के ह हैं बट न न्‍क टिक 4 बफत । ऊन्‍्पेट्यानमाज रत कद जात है ह 


अल्हीर [ऋर ४ । रा ०) 


सप्तमसमुज्नासः ११७ 














५ शीकृष्पज्ञी कहते हैं कि कब्र २ धमें का लोप होता दे तब तथ मैं शरोर धारण करता हैं! 
उत्तर ) यह थात येदविरुद्ध होने से प्रमाण नहों। ओर ऐसा ड्ो खकता दे कि धौकृूप्ण धर्मोत्मा और 
“में को रक्षा करमा घादते थे कि मैं युग २ मे जन्म सेके थेष्ठों को रप्ता और दुष्टों का नाश करूं तो 
ध दोष नहीं + क्योंकि “परोपकाराय सतों विभूतयः” परोपकार फे लिये सत्पुरुषों का तन, मन, धन 
हा दे। लधापि इससे थरोरृष्ण शेश्वर नहीं डो सकते ( प्रश्न) शो ऐेसा दे तो संसार ग्रे छीवीस 
खर के अवतार झोते हैँ और इनको झबतार क्‍यों मानते हैं! (उत्तर) वेदाये के न डानने, 
ज्यदायी लोगों के बद काने ओर अपने झधप अविद्वान्‌ दोते से भ्रमझाल में फंस के ऐसी २ ऋष्रामायिक 
हें करते और शामने छैँ। (प्रश्न ।ओ ईम्वर अवतार न लेवे ठो कंस राबणादि डुष्ठों का माश 
।से हो सके ! ( उत्तर | प्रथम तो जो जन्‍्मा दे यद अवश्य खत्यु को प्राप्त द्ोता दै। जो इम्वर ऋष्ठार 
/रीर धारण किये दिना झगत्‌ की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता दे उसके सामने कंस और शादणादि 
/क कीड़े के समान भी नहों। यह सर्वेब्यापक होने से कंस रायणादि के शररीरों मे मी परेइटर्र हैः 
(हा है, शव चाहे उसी समय मर्मच्देदन कर नाश कर सकता दे। मह्ता इस अस्ल्ट दा के 
खभ्माययुक्त परमात्मा को एक चुद छीव के मारने के लिये जन्म मरणयुक्त कइने यादे को पपगिद शिमस्य 
थे विशेष उपमा मिल सकती है भोर जो कोई कद्दे कि मक्तवनों के उद्धार रपये फिदेशल 
दा दै सो मी सत्य नहों, क्योंकि शो भक्तबन ईश्वर की आाडामुकूत्र खते हैं उन रूदा झरने अए 
प्रामर््य इृश्यर में दे। फ्या ईश्वर के पृचियी, सूर्य, चन्द्रादि जगत्‌ को दनाने. शारर सी: सहर झगरे 
इप कर्मों से फंस राययादि का बंध भोर गोषधनादि पर्चतों का उठाना दबे झमे में "डी झा इस्स 
शेष में परमेश्वर के कर्मो का विचार करे तो “न मूठो न मदिष्पति' इंसडाईस्टाटडटेन £.» 
थ्लोगा। भौर युक्ति से मी इश्यर का कनन्‍्म लिद नहा इोठा। 5से कोर्ट झलना आधा भरे अटट ईद 
शर्म में भाया था मूठी में धर लिया, ऐेसा कट्ना कमी सच नहों शो साबदा अर्पोपि अआफणज्ट ऋरम्ट 
और सध में व्यापक दै। इससे न आकाश बाइर आता झोर के मंतर जाट टी अलनट खह्खतइ 
हस्मास्मा' के टोने से डसका चारा ज्षाना कमी सरूद्ध न्‍हों हो स्खाा आारादा कप बहा ४ 
पका दै ज्रड्ठां न हो। क्‍या परमेश्वर गर्म में व्यापक न्‍्यों रा जोडों अना( करता #कर मद 
वाज्ो भीतर से निकला | ऐेसा ईएवर के बिएय में कनाऋर अकग रिथ्यमोन अेडशादन+ अर 
कष्ट और मान सध्गांँ इसलिये परमेश्वर का व्यय आरा झन मापा कमा मनड हरे कई झम 
(पसक्तिये “ईसा” झादि भी ईश्वर णे अवतार ज्टों रेयान्मन केश ब्योदि रुपए, इंच >का ना 
मय, शोक, दुःख, छुछ, ज्ञम्म, मरण आदि स्पदुच् इसे फंनटगई! असर, हअबत कपम रह 

















श््द घत्यार्थथकाशः 


प्राप्त कमी नहीं दो सकता, क्योंकि जैसे सृत्य, स्वामी ओर सेना, सेनाघ्यक्ष की आह अवा! - 
युद्ध में अनेक पुरुषों को मार के अपराधी नहीं द्वोते, वैले परमेश्वर की प्रेरणा और दर 
सिद्ध हों तो ज्ीय को पाप या पुएय न लगे। उस फल का भागी प्रेरक परमेश्वर ऐप! दर 
अर्थात्‌ दुःख सुख फी प्राप्ति भी परमेश्वर को द्ोवे। जैसे किसी मलुप्य ने... ..”' 
मारडाला तो बद्दी मारतेयाला पकड़ा ज्ञाता है और यद्दी दूएड पाठ दे, शस्र गहं। वैसे हो 
ज्ीय पाप पुएय का भागी सही दो सकता। इसलिये अपने सामर्थ्याडफूल कर्म फरने मे हर 
परन्तु जब थद्ट पाप कर चुकता दे तब ईश्वर की व्ययस्था में पराधीन होकर पाप 
इसलिये कर्म करने में जय स्वतस्त्र और पाए के दुःखरूप फल भोगने में परतन्त्र होठ दै।, 
हो परमेश्यर ज्ञीय को म पनाता और सामथ्ये न देता तो ज्ञीय कुछ भी न कर सकता इसखिें, न 
की प्रेग्टा दी से ज्वीथ कर्म करता दे । ( उत्तर) झ्ीय उत्पक्ष कमी न हुआ, अगारिई, 
और जगत्‌ का उपादान कारण निमित्त दे झोर ज्ञीय का शरीर तथा इच्द्रियों के गोद 
बताये हुए दें परन्तु थे सब ज्ञीय के आधीन देँ। जो कोई मन, कर्म, पचत से पाप 2० 
मोक्ठा दे ईश्वर शट्टी । सेसे किसी कारीगर मे पद्ाड़ से लोदा मिकाला, उस झोदे की ध्छि 
हे छिएा, इसभी दुकान से लोदार मे ले तलवार बनाई, उससे किसी लिपादी ने; तहवार के. 
इससे किसी को मारडाला । झए यहां जैसे धद्द छोद्दे को उत्पन्न फरने, उससे लेते, ततवार 
ओर शक्पार को पहुकु कर राजा दण्ड शहदों देता किखु मिसने तक्षयार से मारा वही हुए! * - 
इसी धद्यार शरीरादि बरी उत्पत्ति करनेयाला परमेश्वर उसके कर्मो का मोक्ता नदी दोता। पल 
मुएरे दाता होता दे । शो परमेश्यर कर्म करता सो कोई जीव पाप सद्दों करता फ्योकि पता, 
छोर भर्टिच् दोजेरो किसीजीयको पाप करनेमेप्रेर्या मद्दी फरता। इसलिये भी ' 
इप> हे #बषस्च्र टै। जेसे शी अपने कामों के करने में स्थतस्त्र दे पैसे दी परमेशर मी के 
दर है बदच्सत्र है। ( परत ) जीव भौर इंस्पए का स्वरूप, गुण, कर्म भोर स्थमाय देसा है!(४ 
हो हो शेन्टाइढप हैं, बयमा: दोनों का पविच, भविगाशी और धामिकता भावि है।एए 
थे शहद इलासि, ग्यिति, मलथ, शा को नियम में रशना, कीरयों को पाप वुएपोंके /6 «० 
अप इस है। और अप के धम्तानोत्पचि उनका पान, शिएपयियादि भष्तें परे करे 
है शहर, आपस, अजस्त बक आदि गुण हैं और जय कै-- 


पप्थिपियशग सदा खड़ानास्यात्मनों निद्कमिति ॥ स्याययू० [ भ० है | भार || हे ५ 
कज्यधारनिषयेपस्थपम बाय वेरिद्रियान्तगविका रा? सुखदू।खेघ्छाद्ेपी श्रपाधारमर्गी वि 
वैशेपिक छ० [ भ० ३। झा १ | ४९ 


५ (इच्दर ) पदायों छ पाति थी अमिन्ाता(पेष ) दुःशारि की अनिदद्ा स्व 
अपनाए बक् [ म्टुक ) काजल ( कुछ ) विश्राप अपसबता ( दान ) विवेक पहियागता वे है 
दैप आक हे बज) पतवायु को बाइर सिकाजता ( झपान)पाण कोबाइर रो मौत 
$ रैडयेड | कक दा नकल ( इसनेच । आय को ज्यखनजा (मन) निशा शमरण भौर अरईदीर 
$ कक) अकमा बलटरिए ) मत इन्ट्रियों छा बश्ाका चत्तरविकार )सिश्न र च्युधा, धपा हे या 
इंलपइ ह झत्प्ट के हुक परम्यत्था से निश्र हैं, हाडी ते आत्मा की म्रतीति करती 
झएक दो है। कद कड का हेड मे होठा दियनी कद थे तुन प्रदाधित रइसरैं धो ही 


शो न 


शसारम तमुन्नासः ११६ 





- दष्ता झाता दै शर थे धुत शरीर में गह्ों रहते । जिसके होने से जो हो झोर म होने सेस ड्टोंचे 
.. गयी दे होते टै। शैसे दीप भोर धुप्पांदि थे: म होने से प्रकाशादि का र होना और दोने से दोना 
है देसे है शीए और पत्मा-मा का विष्ाद शुए्दारा होता है। ( प्रश्च) परमेश्वर व्रिकालदर्शी दे 
(से भविष्यत्‌ को दाने शागवा दै। पह जैसा मिश्यय करेगा जीव वैसा दी करेगा। इससे शीय स्पतन्ज 
/! कोर शी को रेशपरर दण्ड भी मं देसकता, क्‍योंकि शैसा ईशर ने झपने ड्वान से मिशिखित 
, था है दशा ऐ। शीद करता टै ।( दत्तर ) रंटर को प्रिकाशदर्शी कदृमा सूर्यता का काम दे, क्‍योंकि 
, पोषर भ रेट दइ भूतफालद और न होदे होते यह मपिष्पकाल कदाता दे। क्या ईश्वर का कोई 
.म हो; बहदों दइता शया न शोक होता ऐ। इसलिये परमेश्यर का प्रान सदा एकरस, अस्टपिडत 
, मान इइता है । भूत, भविष्यत्त्‌ जोडों के लिये टै। दा ! जीदों के कर्म की अपेण्ता से त्रिफालघता 
डर मे टे रचतः गए । जला श्यताजता से जीव करता दे पैसा दी सर्वक्रता से इंश्सर जानता दै। 
९ अधा शिरर शागता दै यैसा जीव ररता है। अर्थात्‌ भूत, मविष्यत्‌ यर्रमाम के झान और फल 
[में इशर क्वतस्त् और जीद विशित्‌ दर्लमाव भौर करमे करमे में स्पतरत्र दे। ईश्वर का अनादि 
न द्दोनेसे जता कर्म दा शान दे दैसा ऐ दद्ड देने का भी झ्ञान झगादि दै। दोनों शान उसके सत्य 
क्या ब्मडान सद्या भोर दृएडशान मिप्पा कभी शो सहता है इसलिये इसमें कोई दोप महा 
ता । ( प्र ) शीव शरीर में मित्त विभु ऐ दा परिव्दिष ! ( उत्तर ) परिस्दिप्र, जो विभु द्योता तो शाप्रत्‌, 
एम, खुषुणि, मरण, शर्म, संयोग, वियोग, जाता झाना कभी महों दो सकता। इसलिये श्षीप का स्वरूप 
'एपह, ऋएप हर्थात्‌ एच्म टै और परमेश्यर झतीव पृष्मास्खुमतर, अनन्त, सर्यक्ष और सर्ेब्यापफ« 
बेकप टे। इसीलिए जीप झोर पसमेश्तर का ब्पाप्य प्पाएक सम्दस्ध दै। (प्रश्न) जिस जाइ में एक 
बतु ऐोती थे उस कर में दूसरी वस्तु गशं रद सकती। इसलिये श्ीप भौर ईश्यर का संयोग सम्बन्ध 
। सफता टि य्याप्य व्यापक मद्टी । ( इत्तर ) यश नियम सप्तान झाकारबाले पदार्थों में घट सकता है, 
समामाहति में नद्दी। जैसे लोहा श्पूल, भप्ति घृद्म दोता दि, इस कारण से खोददे में पिधुत्‌ अधि 
पपक्ट होकर <क है अवकाश में दोगों रहते हैं, धैसे जीप परमेश्वर से स्थूल भौर परमेश्वर जीप से 
धम होने से परमेश्यर प्यापक झोर शीव व्याप्य दे । जैसे यद्व स्पाप्य स्यापक सम्बन्ध ज्ीय ईश्वर का 
बैसे थी सेध्य सेबक, आधाराधेय, स्वामी शृत्य, राजा प्रजा ओर पिता पुत्र आदि भी सम्य्ध हैं । 


(एत्त ) डो पृथक २ हैं तो-- 
प्रश्न प्रद्म ॥ १॥ भह प्रक्नास्मि ॥ २ ॥ वच्तमसि ॥ है ॥ भयमात्मा पक्ष ॥ ४ 

दीं के इन भद्टाषाक्यों का हार्थ क्‍या दे ? (उत्तर) ये वेददाक्य दी गं हैं किन्तु माझण- 
थीं 8 दन हैं इनका शाम मद्दापाक्य कहां सत्यशास्ओों में मद्ीं हिखा। अर्थ--( भइम्‌) मैं 
महा ) भर्धात्‌ प्रह्मस्थ ( अस्मि ) हैं । पद्धां तात्स्थ्योपाधि द| जेसे "मजा: कोशन्ति” मझ्ान पुकारते 
) मझ्ञान झड़ हैं, इतमें पुकासमे का सामर्थ्य नद्दों, इसलिये मश्नस्थ मम्॒ुष्य पुकारते हैं। इसी प्रकार 
दा भी ज्ञानना | कोई कट्दे कि प्रह्मस्थ सब पदार्थ हैं, पुनः श्ीय को प्रष्मस्थ कटने में कया विशेष दे ! 
उका शक्तर यद् टै कि सद पदार्थ अह्मस्य थे परस्तु जैसा साधम्वेयुक्त निकटस्य जव दे पेसा अन्य 
दो भोर ज्ञीव को ईद्ा का ह्ञातन और मुक्ति में यद्द धर्म के साज्तात्सम्ध््ध में रइता दे। इसलिये शीय 
| ध्रह्म दे: साथ तास्सथ्प 4 _तस्सद्चरितोपाधि भर्थाव्‌ भ्क्म का सइकारी ज्ञीय है। इससे जीव भौर 
; पक नहों। जैसे कोई किसी से कदे कि हैं और यह एक हैं अर्थात्‌ अविरोधी दें, यैले ज्ञो ज्ञीध 
माधिस्प परमेशर में थमा होकर निमप्न दोता दे वद्दध कट सकता दे कि मैं और प्रद्म एक अर्थात्‌ 


हे 





५ न्‍मननीन 


श्रे० सात्यार्य प्रकाश: 














अविरोधी एक अ्यकराशब्ध हैं? को जीक परमेश्वर के एस, कर्म स्पमाष हे अनुएस भरे 7 
स्थमाय फरता है थही साध से प्राय के साथ पकता कइ सकता है। (शर्त ) अरस्दा दो 
अर्थ कैसा करोगे! ( तथ्‌ ) प्र्म ( त्थे) शू जीप अति ) है। हे जीय ! [ खम) दे (द), 
( श्रसि ) है । ( उत्तर ) तुम 'तत' शब्द से क्या छेते हो | / रथ । ग्राधवद की अतशृधि कर्त 0७ 


सदेव सोम्पेदमग्र भामीदेकमेयादितीय अश्न ! 


इस पूर्व धाक्य से। घुमने इस छास्दोग्य उपतियद्‌ का दर्शन मी माँ किया। हो वाई 
द्वोती तो यडां प्रह्म शप्द का पाठ ही महदं दे, देसा मूठ फ्यों फइने ! किस्तु धासदोस्य में तो: 


संदेव मोम्पेदमग्र भाषीदेकमयादिनीयम्‌ ॥| [ छा० श्र० ६ । खं० २ | मं" १) 
ऐसा पाठ दि यद्दां प्रहम शब्द नहीं ( ( प्रश्ष ) तो आप तच्दप्द से फ्या होते दें ( ( उत्तर )- 
स्‌ य एपोणिमा ॥ ऐवद्रास्म्यमिद मर्द तन्सस्पर् स आत्मा तत्यममि श्वेत ही 
छान्दो० [ प्र० है । ख्ं० ८। में? $॥9 ] 


धद् परमात्मा जानने योग्य दे जो यद्द भ्रत्यन्त खूदम भौर इस सब शगत्‌ कौर + 
भात्मा दि | थट्टी सत्यस्वरूप ओर अपना आत्मा आप दी दे। दे श्वेतकेतो प्रियपुत्र ! 


तदात्मकस्तदस्तयोमी त्यमसि ॥। 


डस परमात्